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अनुराग द्वारी

दुनिया न जीत पाओ, तो हारो न ख़ुद को तुम, थोड़ी बहुत तो ज़ेहन में नाराज़गी रहे... - स्वभाव में सामाजिक बदलाव की चेतना लिए अनुराग द्वारी की बतौर पत्रकार पढ़ाई जारी है. डेढ़ दशक से भी लम्बे करियर में फ्री प्रेस, ऑल इंडिया रेडियो, PTI, स्टार न्यूज़, BBC और फिलहाल NDTV में बतौर डिप्टी एडिटर कार्यरत हैं. जामिया मिल्लिया इस्लामिया से विकास संचार में पोस्ट ग्रेजुएट अनुराग ने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय से पत्रकारिता का ककहरा सीखा. शास्त्रीय संगीत में रुचि रखते हैं, तबले में प्रभाकर के साथ-साथ हॉकी में भी राष्ट्रीय स्तर पर खेल चुके हैं.

  • वो कवि थे, नेता थे, खाने के शौक़ीन थे... प्रेम भी बखूबी किया... ताउम्र किया. दिल्ली में बैठकर जो छवि अटलजी के लिये गढ़ी गई वो तो एक शब्द में 94 साल के उनके बचपने के दोस्त, पुराने नवाब इक़बाल अहमद तोड़ देते हैं. बशर्ते लुटियन की सीमा छोड़ आप शिंदे की छावनी आएं, गली के आख़िरी छोर पर बने उनके घर तक जाएं.
  • 10 फरवरी 1931 को मंदसौर जिले की मनासा तहसील के रामपुर गांव में हिन्दी कवि और लेखक आदरणीय बालकवि बैरागी जी का जन्म हुआ था. मनासा में ही वो रहे, यहीं भाटखेड़ी रोड पर कवि नगर में उन्होंने अंतिम सांस ली.
  • वो बच्ची जो घोड़े लेने आई, पर लौटी नहीं! क्या ऐसे कई बच्चों को हम बचा नहीं सकते? क्यों वो स्कूल छोड़ गाय-बकरी चराने निकलते हैं? क्या "14 साल से कम उम्र के बच्चों की अनिवार्य शिक्षा" का कानून बेमानी है? मन परेशान था, तभी कुछ पुरानी बातें, पुरानी तस्वीरें याद आ गईं!
  • वो चुपचाप ऊंचे खंभे पर चढ़ गया, क्योंकि कुछ लड़कों ने उसे कहा थाली में भरपेट खाना मिलेगा, खंभे पर चढ़ जाओ... फिर वो चुपचाप खंभे से उतर गया, क्योंकि पुलिस वालों ने कहा थाली में भरपेट खाना मिलेगा खंभे से उतर जाओ. अधनंगा था वो, भूखा-प्यासा... लोग कह रह थे पागल है...
  • हिन्दुस्तान सोचना दाना मांझी को, पाकिस्तान सोचना 20 साल के लड़के को जो लाख रुपये में सरहद पार चला आता है... मरने के लिए... न-न बरगलाना मत उसे गाजी या शहीद नहीं बनना था... सिर्फ परिवार का पेट भरना था...
  • सात राज्यों में प्रति व्यक्ति आय जम्मू-कश्मीर के मुकाबले कम है. इन राज्यों में यूपी, एमपी, बिहार, झारखंड जैसे राज्य शामिल हैं. शिक्षा के मामले में भी छह राज्य जम्मू-कश्मीर के नीचे हैं. फिर भी न कश्मीर शांति से जी रहा है, न देश! याद रखना चाहिए कि आजादी और स्वतंत्रता में फर्क है... हम आजाद नहीं हैं, एक तंत्र के अंदर हैं... जिसका नाम है संविधान.
  • टी एम कृष्णा लगातार कर्नाटक संगीत को लोकतांत्रिक बनाने की कोशिश में जुटे हुए हैं जो उनके ख्याल से संभ्रातों के बीच सिमटा था। चेन्नई की झुग्गियों में सुबह की महफिल सजाने से लेकर मछुआरों की बस्ती में जाकर गाने तक, बावजूद इसके 'एलिट महफिल' आपको नकार नहीं सकती।
  • चाहे कांग्रेस हो या बीजेपी, सब रोज़गार के बड़े-बड़े वादे करती हैं, राजन जैसे अर्थशास्त्री लंबी किताबी बातें बाते हैं, लेकिन तीन दशकों के आंकड़े देखिए, देसी-विदेशी कंपनियां रोजगार मशीनों को दे रही हैं, ऐसे में मांग-आपूर्ति का सिद्धांत छलावा नहीं तो और क्या है...?
  • कैराना, तुम जब सुरों में ढले तो किराना बने... वही किराना जिसने "गाने वाली" गंगू को गंगूबाई का दर्जा दिया। याद है कैराना कैसे सारे रस्मो-रिवाज़ तोड़ केवट गंगूबाई तुम्हारे सुरों में बंधी 30 किलोमीटर भागी चलती आती थीं।

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