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  • आजादी के बाद यह पहला अवसर है, जब सीधे-सीधे राजनीतिक उद्देश्यों से प्रेरित विशुद्ध राजनीतिक फिल्में (बायोग्राफी के रूप में ही सही) आईं. हालांकि इसकी एक शुरुआत सन् 1975 में 'आंधी' से हुई थी, लेकिन आपातकाल के तूफान का कुछ ऐसा कहर इस पर टूटा कि फिल्मकारों की राजनीतिक विषयों पर फिल्म बनाने की हिम्मत ही टूट गई.
  • आज इसी महाद्वीप का सीना सुलग रहा है. इसके एक तिहाई से ज़्यादा देश अनेक तरह के आंदोलनों, विरोध प्रदर्शनों, परस्पर संघर्षों तथा अन्य संकटों से जूझ रहे हैं. यदि इन सभी देशों के आंदोलनों का एक कोलाज बना दिया जाए, तो उसमें उन देशों की संघर्ष गाथा सुनाई दे जाएगी, जिन पर इन्होंने निर्मम शासन किया था, और जिनके स्वायत्तता संबंधी विरोधों को ये राष्ट्रद्रोह कहकर सूलियों पर चढ़ा दिया करते थे.
  • पहले देश के तीन राज्य के लोगों ने सत्ता में बैठे राजनीतिक दलों में बदलाव किया. नई पार्टी सत्ता पर आसीन हुई, और गद्दी पर आने के बाद उसने जो दूसरा बड़ा काम किया, वह था - बड़ी संख्या में प्रशासनिक फेरबदल. मीडिया में इसे 'प्रशासनिक सर्जरी' कहा गया. 'सर्जरी' किसी खराबी को दुरुस्त करने के लिए की जाती है. ज़ाहिर है, इससे ऐसा लगता है कि इनके आने से पहले प्रशासन में जो लोग थे, वे सही नहीं थे. अब उन्हें ठिकाने (बेकार के पद) लगाया जा रहा है, जैसा व्यक्तिगत रूप से बातचीत के दौरान एक नेता ने थोड़ा शर्माते हुए कहा था, "पहले उनके लोगों ने मलाई खाई, अब हमारे लोगों की बारी है..."
  • अब, जबकि वर्ष 2018 अपने अंत के करीब है, मन में मौजूद एक विचित्र किस्म के खालीपन की चुभन का एहसास निरंतर तीखा होता जा रहा है. दिमाग इस प्रश्न का उत्तर ढूंढने की जद्दोजहद में कुछ ज्यादा ही बेचैन है कि क्या सचमुच में मानव जाति की सामूहिक स्मृति इतनी अधिक कमजोर है कि वह डेढ़-दो सौ साल पहले की ऐसी बातों को अपनी दिमागी स्लेट से ऐसे मिटा दे, मानो कि उसका अस्तित्व कभी रहा ही न हो. बावजूद इसके कि वह घटना, वह व्यक्ति ऐसा क्रांतिकारी हो कि उसके बाद अभी तक उसका कोई भी सानी न हो.
  • यह बात भी कम महत्वपूर्ण नहीं है कि हाल ही में अमेरिका-जापान और यूरोपीय संघ ने विश्व व्यापार संगठन में सुधार लाने के लिए जिन बिन्दुओं पर सहमति जताई है, वे आगे चलकर चीन के विरुद्ध जाएंगे. इस सहमति का मूल संबंध बौद्धिक सम्पदा की सुरक्षा से है. चीन अमेरिका के सिलिकॉन वैली के अलावा ब्रिटेन और जर्मनी के कई स्टार्ट-अप में तेज़ी से निवेश कर रहा है. इसके कारण उसे उत्कृष्ट तकनीकी मिल जाती है, जिसका इस्तेमाल वह अपने असैन्य और रक्षा के क्षेत्र में करता है.
  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सिंगापुर में आयोजित 23वें आसियान शिखर सम्मेलन में जाना पहले की तुलना में अब इस मायने में ज़्यादा महत्व रखता है कि भारत-प्रशांत क्षेत्र में चीन के साम्राज्यवादी मंसूबे कुछ अधिक तेज़ी से फैलते दिखाई दे रहे हैं. इस लिहाज़ से इसी सम्मेलन के दौरान क्वाड समूह के तीन अन्य देशों के साथ उनकी बातचीत अहम मायने रखती है. ये तीन अन्य देश जापान, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया हैं, जिनका प्रशांत महासागर से सीधा संबंध है.
  • 'स्त्री', 'सुई-धागा' और 'मंटो', इन तीनों फिल्मों में एक बात जो एक-सी है, वह है - नारी की शक्ति और उसके अधिकारों की स्वीकृति. 'स्त्री' भले ही एक कॉमेडी थ्रिलर है, लेकिन उसमें स्त्री के सम्मान और शक्ति को लेकर समाज की जितनी महीन एवं गहरी परतें मिलती हैं, वह अद्भुत है. यही कारण है कि भूत-प्रेत जैसी अत्यंत अविश्वसनीय कथा होने के बावजूद उसने जबर्दस्त कलेक्शन किए.
  • निर्णय लेना आसान नहीं होता, और जो निर्णय लिए गए, वे तो और भी ज़्यादा कठिन थे. इसके लिए बहुत अधिक साहस की ज़रूरत थी, किन्तु भारत ने यह साहस कर दिखाया, वह भी एक ही दिन में, तथा एक ही देश की इच्छा के विरुद्ध नहीं, उसकी आदेशनुमा धमकियों को भी दरकिनार करते हुए...
  • हमें यह सोचना होगा कि लोकतंत्र की आत्मा मूलतः लोक में बसती है या ब्यूरोक्रेसी में...? इतने उच्च स्तर पर प्रवेश करने से पहले ब्यूरोक्रेसी के ये सदस्य आए भले ही लोक-जीवन से क्यों न हों, लेकिन मसूरी की प्रशासनिक अकादमी में प्रवेश करते ही उनकी चेतना का जो रूपान्तरण होता है, वह उन्हें लोकतंत्र पर शासन करने वाले एक विशिष्ट तंत्र में तब्दील कर देता है,
  • वे अमेरिकी अपने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की लगभग पौने तीन साल की कार्यशैली से खुश हो सकते हैं, जो 'अमेरिकन फर्स्ट' के नारे पर विश्वास करते हुए अपने देश के लिए एक 'स्वर्णयुग' की कल्पना कर रहे हैं, लेकिन सच यह है कि अधिकांश अमेरिकी उनकी कार्यशैली से बेहद नाखुश हैं.
  • केंद्र सरकार ने विभिन्न मंत्रालयों के संयुक्त सचिव के 10 पदों के लिए निजी क्षेत्र के लोगों से जो आवेदन मंगवाए थे, उसके जवाब में कुल 6,077 आवेदन प्राप्त हुए हैं. यानी प्रति पद के लिए औसतन 600 व्यक्ति. यह एक अद्भुत संयोग है कि जिस सिविल सेवा परीक्षा के तहत IAS अधिकारियों की भर्ती होती है, उसमें बैठने वाले और सेलेक्ट होने वाले परीक्षार्थियों का अनुपात भी लगभग यही होता है
  • पिछले महिने एशिया और यूरोप महाद्वीपों के बिल्कुल बीच में बसे हुए आठ करोड़ की आबादी वाले तुर्की नामक इस्लामिक देश में एक छोटी-सी ऐसी राजनीतिक घटना घटी है, जिसकी ओर फिलहाल दुनिया का ध्यान उतना नहीं गया, जितना जाना चाहिए था, जबकि यह घटना भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है.
  • डोनाल्ड ट्रंप के बचे हुए ढाई साल दुनिया के सामने अमेरिका के चेहरे को बेनकाब कर देंगे. इससे विश्व का नेतृत्व करने का उसका अब तक का दावा ध्वस्त होगा, और एक नई विश्व-व्यवस्था का आकार उभरेगा, जिसे डोनाल्ड ट्रंप की विश्व को देन के रूप में लिया जाना चाहिए.
  • लोकसभा चुनाव से करीब 10 महीने पहले ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने यह धमाकेदार घोषणा कर देश की सियासत को गर्मा दिया है कि वह हर जिले में दारुल कजा (शरिया अदालत) खोलेगी.
  • दिल्ली सरकार के साथ पिछले दिनों जो कुछ हुआ, या इसे यूं भी कह लें कि उसने जो कुछ किया, उससे कई महत्वपूर्ण सवाल मन में उठते हैं. पहला सवाल तो यही कि देश की राजधानी की सरकार लगभग 10 दिन तक हड़ताल पर रही. सरकार के खिलाफ हड़तालों की बात तो आम थी, लेकिन यह एकदम से खास हो गई. और वह हड़ताल भी किसके विरूद्ध - अपने ही उपराज्यपाल के विरुद्ध, और वह भी उन्हीं के दफ्तर में घुसकर.
  • और इसी कारण 12 जून, 2018 का दिन दुनिया के इतिहास में तब तक के लिए दर्ज हो गया, जब तक दुनिया मौजूद रहेगी. इसी के साथ समय की पीठ पर इन दो नेताओं के नाम के अक्षर भी हमेशा-हमेशा के लिए अंकित हो गए.
  • अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर स्टारर फिल्म '102 नॉट आउट' का इतनी तेज़ी से हो रहा प्रभाव मार्क्सवादियों की कलाविषयक इस धारणा को बखूबी पुष्ट कर रहा है कि कलाएं समाज का आईना ही नहीं, समाज को बदलने और गढ़ने वाली छेनी-हथौड़ी भी होती हैं.
  • कर्नाटक विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार के दौरान जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि चुनाव बाद कांग्रेस PPP पार्टी बन जाएगी, तो मुझे पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप की तर्ज पर लगा कि वह विपक्षियों के बीच गठबंधन की बात कर रहे हैं. लेकिन बाद में उन्होंने खुद इसका अर्थ बताया कि कांग्रेस 'पंजाब, पुदुच्चेरी और परिवार' की पार्टी रह जाएगी. दो दिन के बाद राहुल गांधी ने जेडीएस का नया अर्थ दिया - जनता दल संघ परिवार. निःसंदेह, जनता को इससे मजा आ रहा है.
  • तकनीकी अनुसंधानों के द्वारा आदमी पर नियंत्रण रखकर उसे इतना निरीह और गुलामों से भी बदतर गुलाम बना दिया जायेगा, इसकी शायद कल्पना भी नहीं की गई थी.
  • एक सभ्य समाज में संदिग्धता के लिए कोई जगह नहीं होती. फिर भी यदि कोई व्यक्ति विशेष संदिग्ध हो जाये, तो चलेगा. यदि कोई संस्था संदिग्ध हो जाये, तो एक बार वह भी ढक जायेगा. लेकिन यदि कोई जनान्दोलन, और वह भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में, संदिग्ध हो जाये, तो इसे चलाते रहना व्यवस्था के भविष्य के लिए बेहद खतरनाक हो जाता है.
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