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  • एक अच्छी-प्यारी सी ताजी खबर और हम भारतीयों के लिए काफी-कुछ चौंकाने वाली भी. खबर यह है कि ब्रिटेन की सरकार ने अपने यहां के दस पाउंड वाले नोट पर अपनी मशहूर लेखिका जेन आस्टिन की तस्वीर छापी है.
  • एक ही घर में रहने वाले लोग जब अपने-अपने कमरों में कैद हो जाते हैं, तो घर मकान बनने लगता है. और जब वे ही लोग आंगन में इकट्ठे होकर आपस में बतिया रहे होते हैं, तो वही मकान घर में परिवर्तित होकर गुंजायमान हो उठता है.
  • देश के प्रधानमंत्री का सीधे कलेक्टरों से बात करना, और वह भी 9 अगस्त को ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की 75वीं वर्षगाँठ जैसे अत्यन्त महत्वपूर्ण अवसर पर, इन दोनों के गहरे प्रतीकात्मक अर्थ हैं.
  • और भ्रम फैलाने का सबसे अच्छा माध्यम यह है कि शब्दों के परंपरागत-संस्कारगत अर्थों को भ्रष्ट करके उनकी परिभाषायें बदल दी जायें. इस राजनीतिक औजार की सबसे अधिक जरूरत लोकतांत्रिक प्रणाली वाली व्यवस्था में पड़ती है, और भारत में फिलहाल यही प्रणाली काम कर रही है.
  • 34-वर्षीय महिला आईपीएस पूरे साहस के साथ बीजेपी के स्थानीय नेता का मुकाबला कर रही थी, जो बिना हेल्मेट पहने बाइक चलाते हुए पुलिस द्वारा पकड़ा गया था. यह न केवल बदलते हुए भारत की तस्वीर थी, बल्कि उससे कहीं ज्यादा बदलते हुए उस उत्तर प्रदेश की कानून और व्यवस्था की तस्वीर थी, जिसे पहले की सरकारों ने तथाकथित 'जंगलराज' में तब्दील कर दिया था.
  • यहां मूल चिंता यह है कि वह दिन कब आएगा, जब इस देश के वंचित वर्ग का व्यक्ति अपनी जाति से नहीं बल्कि अपनी योग्यता से जाना जाएगा, क्योंकि जाति का लेबल उसकी योग्यता को निरस्त करके उसे अनावश्यक ही कुंठित कर देता है.
  • यूनान के दार्शनिक सुकरात ने कहा था, "मेरे इस शहर के सभी लोग मूर्ख हैं, क्योंकि वे यह जानते हैं कि वे सब कुछ जानते हैं... एक केवल मैं ही ज्ञानी हूं, क्योंकि मैं यह जानता हूं कि मैं कुछ नहीं जानता..."
  • मूर्ख से मूर्ख व्यक्ति भी यह सोचने को मजबूर है कि बात-बात पर, यहां तक कि बिना बात का भी बतंगड़ बनाकर लगभग रोजाना ही दहाड़ने वाला वह शेर आज मौन क्यों है? आरोप कोई बाहरी व्यक्ति नहीं लगा रहा है. लगाने वाला उन्ही के मंत्रीपरिषद का उनका एक विश्वसनीय साथी है. तो क्या उन आरोपों का उत्तर चुप्पी होगी ? देश के वित्तमंत्री ने उन पर मानहानि का मुकदमा ठोंक दिया है. यह विकल्प केजरीवाल के पास भी है. क्या वे भी कपिल मिश्रा के साथ ऐसा ही कुछ करके जनता के सामने अपने निर्दोष होने का प्रमाण पेश करेंगे?
  • ज़ाहिर है, जहां राजसत्ता के पास लोकचेतना की इतनी मजबूत, बड़ी और गहरी शक्ति हो, उसे क्यों अपने आपको किसी विधान का मोहताज बनना चाहिए. फिर भी यदि ऐसा किया जाता है, तो वह कहीं न कहीं राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमज़ोरी को व्यक्त करता है, चाहे इस कमज़ोरी का कारण कुछ भी हो...
  • योगी अदित्यनाथ ने अपने अभी तक के बढ़ाए गए कदमों से यह तो सिद्ध करने में सफलता हासिल कर ली है कि 'मेरा अपना कोई स्वार्थ नहीं है'. यह जनविश्वास के लिए बहुत जरूरी था. उन्होंने नौकरशाहों को यह संदेश स्पष्ट रूप से दे दिया है कि काम किए बिना गुजारा नहीं है, और सही तरीके से काम करना पड़ेगा. इसी के साथ जुड़ी हुई बात है- टारगेट फिक्स करना. यानी कि अब 'देखा जाएगा और देखते हैं' के स्थान पर 'होगा' की कार्यसंस्कृति को अपनाने के बहुत स्पष्ट निर्देश दे दिए गए हैं.
  • जो संसद अत्यंत महत्वपूर्ण विधेयकों को निर्धारित समय से भी कम समय में पारित कर देती है, उसी संसद की लोकसभा ने मानसिक स्वास्थ्य बिल के लिए निर्धारित दो घंटे के बदले सात घंटे लिए. ज़ाहिर है, देश मानसिक स्वास्थ्य के प्रति काफी चिंतित जान पड़ रहा है.
  • वांगनुई न्यूजीलैंड की तीसरी सबसे लंबी नदी का नाम है. गंगा-यमुना भारत की सबसे चर्चित दो नदियां हैं. अलग-अलग देशों में होने के बावजूद इनमें एक बहुत बड़ी समानता यह है कि ये नदियां-नदियां न होकर अब एक जीवित व्यक्ति बन गई हैं. आइए, इस रहस्य को थोड़ा समझते हैं.
  • केंद्र में सत्ता में आते ही मंत्रिमंडल ने पहला निर्णय काले धन के लिए एक समिति गठित करने का लिया था, और देश के सबसे बड़े राज्य में सत्ता में आते ही इस मंत्रिमंडल ने अगला अत्यंत परिवर्तनवादी एवं प्रभावशाली फैसला किया है - राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति का.
  • महेश भट्ट की पहली और अद्भुत फिल्म “सारां” की शुरुआत ही इस दृश्य से होती है कि एक पिता विदेश में पढ़ रहे अपने जवान बेटे का अस्थि-कलश लेने के लिए लाइन में लगा हुआ है, और बाद में उसके लिए तंत्र से जूझता है. फिलहाल हमारे सामने ठीक इसके विपरीत यथार्थ दृश्य मौजूद है. इस दृश्य में एक पिता अपने मृत बेटे को बेटा मानने से इनकार करके उसके शव को लेने से मना कर देता है. ऊपरी तौर पर तो देखने से यही लगता है कि फिल्म का पिता एक करुणामय पिता है, तथा सच का पिता कठोर. किन्तु सच्चाई को जानने के बाद यह धारणा एकदम से पलट जाती है. आइए, इसे जानते हैं.
  • ऐसी स्थिति में विश्व राजनीति का उभरता हुआ जो नया समीकरण दिखाई दे रहा है, वह यह कि अमेरिका दुनिया के मामलों से खुद को अलग करता जाएगा. इससे जो स्थान रिक्त होगा, उसे भरने के लिए चीन तेजी के साथ आगे आएगा.
  • काला टीका लगाया जाना ज़रूरी है, अन्यथा नज़र लगने की यह बीमारी संक्रामक रूप ले लेगी. फिल्मों के रिलीज़ होने से पहले ही लोगों की आस्थाएं आहत होने लगती हैं. यहां तक कि उन वकीलों की भी, जिन्हें समाज तार्किक-बुद्धिजीवी मानता है. किताबें आहत करती हैं, कथन आहत करते हैं, लेख आहत करते हैं.
  • हर उस रचनाकार को, चाहे उसके हाथ में कलम हो, कूची हो, या कैमरा हो, जो यथास्थितिवादिता के विरुद्ध खड़े होने का साहस दिखाते हैं, उस दौर से गुजरना ही पड़ता है, जिससे 'पद्मावती' फिल्म के निर्देशक संजय लीला भंसाली गुजरे. फिल्म 'बाजीराव मस्तानी' बनाने और दिखाने का भी उनका रास्ता कोई निरापद नहीं था.
  • इन पंचरंगी चुनावों में फिलहाल सबसे गाढ़ा और चटख रंग है उत्तर प्रदेश का, और इसके बाद बारी आती है पंजाब की. लोकसभा में बहुत कम सांसद भेजने वाले उत्तराखंड (5), गोवा (2) और मणिपुर (2) इसमें महज कदमताल भर कर रहे हैं, हालांकि 'आप' की उपस्थिति के कारण गोवा के बारे में थोड़ा-बहुत सुनाई पड़ जाता है.
  • इस बार का बजट कैसा होना चाहिए, इसके अनुमान के लिए हमारे पास फिलहाल दो सबसे प्रमुख तत्व हैं. इनमें से एक आर्थिक है, तो दूसरा विशुद्ध राजनीतिक. आर्थिक के केंद्र में है - विमुद्रीकरण के बाद बनी देश की आर्थिक तस्वीर. राजनीतिक फ्रंट पर तात्कालिक रूप में पांच राज्यों के चुनाव हैं.
  • उत्तर प्रदेश के चुनाव, चाहे वे लोकसभा के हों या विधानसभा के, उस पर उस प्रदेश की ही नहीं बल्कि पूरे देश की नजर हमेशा से ही रही है, सो इस बार भी है. गणना वाली राजनीतिक प्रणाली में सबसे बड़ी जनसंख्या वाले राज्य की हैसियत भी बड़ी हो जाती है, वह तो है ही, लेकिन इस बार के चुनाव परिणाम और चुनावी परिदृश्य, दोनों अपने अंदर इससे कई गुना अधिक अर्थों को समेटे हुए हैं.
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