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  • कुछ तो ऐसा अनोखा है कि यह बेजुबान किताबें लाखों की जुबान बनकर बोलने लगती हैं, कभी खामोशी में तो कभी नारों में तब्दील होकर। और कभी-कभी तो ज़हीन लोगों की कलम की स्याही में भी उतरकर। कुछ ऐसा ही करिश्मा हुआ जस्टिस कौल के साथ जब वे चेन्नई की अदालत में बैठे हुए थे। तब उनकी कलम ने अल्फाज़ बयां किए।
  • भारतकालीन नियोग परम्परा में ‘मां’अपनी होती थी, ‘इन-विट्रो फर्टिलाइज़ेशन’ परम्परा में पिता अपना होता है। बात तो वही है, केवल पाला बदल गया है।अब हमें इस कटु और कड़वे सच से आंख मिलाने की हिम्मत दिखानी ही होगी कि चाहे लड़के हों या लड़कियां, शादी के नाम से घबराने लगे हैं।
  • ब्रिटेन का पढ़ा-लिखा वर्ग यूरोपीय समुदाय में रहने के पक्ष में था। उनकी नहीं चली। चली उन आम लोगों की जो अर्थशास्त्र के सिद्धांतों एवं सूत्रों से पूरी तरह अनजान हैं, और जिन्हें इस बात की चिंता अधिक है कि हमारी संस्कृति का क्या होगा।
  • एक बहुत बड़ी मुश्किल अभी बाकी है... अंग्रेजी में कहावत है, 'ओल्ट हैबिट्स डाई हार्ड...' सुनने में आ रहा है कि अब निहलानी जी ने अनुराग कश्यप की अगली फिल्म 'हरामखोर' में यह कहकर पेंच डाल दिया है कि उसकी कहानी हमारे समाज के सम्मानित शिक्षकों की गरिमा के खिलाफ है...
  • क्या यह बेहतर नहीं होता कि कलर से सोनी में शिफ्ट करने की यात्रा के दौरान आप कुछ नया सोचते... खुद का अनुसंधान करते, इनोवेट करते... सोनी का यह शो एक नया शो है, सो, कुछ तो नया दिखता...
  • पूंजीपतियों की अकूत सम्पत्ति उनमें 'अमरता का बोध' पैदा कराने लगी है। यह वृत्ति उनमें भी है, जो स्वयं को समाज का 'विशिष्ट व्यक्ति' समझने लगे हैं। ज़ाहिर है, इससे साहित्य में आत्मकथाओं का सैलाब आ गया है। सिनेमा में भी शुरुआत हो चुकी है 'गुरु' से... देखें, यह आगे कहां तक जाती है।
  • यदि अभी चार राज्यों एवं एक केन्द्र शासित प्रदेश में हुए विधानसभा चुनावों को नरेंद्र मोदी की सरकार के पिछले दो सालों के कामों पर दिया गया जनमत मान लिया जाये तो निश्चित रूप से निष्कर्ष उनके पक्ष में जायेंगे।
  • किसी भी ‘दलित लड़की’ का नाम सुनते ही हमारे जेहन में जो तस्वीर उभरती है, उसे बताना यहाँ जरूरी नहीं है। लेकिन यदि आपने पिछले दिनों एक लड़की टीना डाबी को टी.वी. चैनलों पर देखा हो, तो पक्का है कि टीना की छवि उस तस्वीर से मैच नहीं करेगी, दूर-दूर तक मैच नहीं करेगी।
  • बहुत पुरानी नहीं, यही मुश्किल से करीब पचास साल पहले की बात है, जब मेरी दादी अपने पैर छूने वाली अपनी हर जवान बहू को एक यही आशीर्वाद देती थी ‘दूधो नहाओ, पूतो फलो।’
  • नोबेल पुरस्कार विजेता श्रीनिवास रामानुजन के बारे में जानना हर भारतीय का 'ज्ञान का अधिकार' है। क्या कोई मेरे इस अधिकार की रक्षा के लिए आगे आएगा...? क्या कोई मेरी इस गुहार को सुनेगा...?
  • सोचता हूं कि यदि यही कंगना और ऋतिक टाइम ट्रेवल करके आज से 50 साल पीछे चले जाएं, तो वे एक-दूसरे से किस प्रकार का व्यवहार कर रहे होते...? प्रेमी ही नहीं, उस समय के फैन्स भी ऐसे ही होते थे, लेकिन यह 50 साल पहले की बात है।
  • किसी भी सार्वजनिक बहस में सार्थकता तभी आती है, जब वह अपने वर्गहितों से ऊपर उठकर तार्किक आधार पर की जाए। अन्यथा उसकी सामाजिक भूमिका एक फूलझड़ी से अधिक नहीं रह जाती। वह मात्र एक बौद्धिक-विलास बनकर रह जाती है।
  • मुझे जिस बात का सबसे ज़्यादा अंदेशा है, वह यह है कि कहीं धीरे-धीरे यह हैप्पीनेस मंत्रालय एक धार्मिक मंत्रालय न बन जाए। किसी नेता या अफसर को अचानक जब एक दिन यह ज्ञानोदय होगा कि 'आनंद को केवल धर्म के जरिये पाया जा सकता है', उस दिन क्या होगा, आप सोच सकते हैं।
  • मित्रो, यही कहा जा सकता है कि यह घटना एक है, लेकिन अपने पीछे कई सवाल छोड़ गई है। हत्यारा कौन है, यदि यह हत्या थी, तो पता लगाया जा रहा है। लेकिन इसके साथ ही बहुत कुछ और भी पता लगाया जाना चाहिए, क्योंकि इस मामले में हम सभी कुछ न कुछ सीमा तक तो कठघरे में खड़े ही हैं।
  • अब, जब इतिहास पर डाला गया पर्दा उठ रहा है, निश्चित रूप से इससे उत्पन्न कई-कई प्रश्नों के उत्तर उनकी पार्टी को देने होंगे, जबकि संकट की इस घड़ी में कांग्रेस की जो दिमागी हालत है, इससे किसी ठोस और संतोषजनक उत्तर की उम्मीद नहीं की जा सकती।
  • अच्छा होता कि गडकरी जनता से इन दोनों उपाधियां प्रदान करने का अधिकार नहीं छीनते, और बेहतर होगा कि शशि थरूर भी इतिहासकार बनने का मोह छोड़कर राजनीति ही करें, क्योंकि राजनीति की डिक्शनरी में चारणगत शब्दों का अकाल नहीं है।
  • भूटान के राजा जिग्मे खेसर नामग्येल वांगचुक के घर भविष्य के राजा ने जन्म लिया, और पूरे भूटान ने अपने प्यारे राजकुमार का स्वागत किया, अपनी धरती पर एक लाख से भी अधिक पौधों का रोपण कर... वह भी तब, जब ईको-फ्रेंडली भूटान की ज़मीन का 60 फीसदी हिस्सा पहले ही पेड़ों से ढका है।
  • जनाब असदुद्दीन ओवैसी तो कानून के जानकार हैं। उन्हें इतना तो मालूम होगा ही कि संविधान 'मानवीय गरिमा की रक्षा' तथा दूसरों के धर्म एवं संस्कृति के प्रति सम्मान की भावना रखने की बात भी कहता है, लेकिन मुश्किल यह है कि संविधान की यह भावना राजनीति की बिसात से मेल नहीं खाती।
  • जब बारी आई नौकरशाहों की टीम बनाने की, तो वहां पीएम ने कोई समझौता नहीं किया, भले ही इसके लिए अध्यादेश लाना पड़ा हो। प्रधानमंत्री के चयन के तौर-तरीकों पर बहस की जा सकती है, लेकिन उनकी योग्यताओं पर बहस की गुंजाइश नहीं, जिन्हें वह अपनी निकट की टीम में लेकर आए।
  • जैसे कहा जाता है, 'प्रेम किया नहीं जाता, हो जाता है...' इसी तर्ज पर कहा जा सकता है, प्रेम खोया नहीं जाता, खो जाता है। प्रेम का होना भले ही हमारे हाथ में न हो, लेकिन उसका खोना न खोना हमारे हाथ में ज़रूर है। वह कैसे, कुछ इसी तरह की तरकीबों पर हम यहां बात करेंगे।
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