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कादम्बिनी शर्मा

1999 में बिज़नेस रिपोर्टिंग से करियर की शुरुआत की. करीब आठ साल लीगल रिपोर्टिंग और फिर लगातार 11 वर्षों से विदेशी मामलों- घटनाओं, भारत की विदेश नीति पर रिपोर्टिंग और एंकरिंग करती रही हैं. खास नज़र भारत के पड़ोस, वहां की राजनीति और वहां पनपे आतंक का भारत पर हो रहे असर पर. चीन, अमेरिका और यूरोप पर. लेकिन इस छोटी सी बड़ी दुनिया में हर घटना-दुर्घटना के तार एक दूसरे से जुड़े होते हैं और देश की राजनीति का असर होता है अंतरर्राष्ट्रीय रिश्तों पर भी तो उस की खास ऐनालिसिस. पर्दे के पीछे चलती अलग अलग ट्रैक की डिप्लोमेसी सबके सामने लाने में दिलचस्पी. सामाजिक मुद्दों पर भी कई बार भड़ास निकालने को लिख बैठती हैं.

  • शिनजियांग डायरी का ये आखिरी हिस्सा चीन से लौटने के करीब महीने भर बाद लिख रही हूं. इसलिए नहीं कि वक्त नहीं मिला या इच्छा नहीं हुई, बल्कि इसलिए कि इस बीच इस पर मेरी बनाई डॉक्युमेंट्री 'चीन का चाबुक' ऑन एयर हो गई और मैं देखना चाहती थी कि इस पर प्रतिक्रिया क्या होती है. क्योंकि सीधे तौर पर भारत से जुड़ा मुद्दा नहीं है तो यह भी लगा कि पता नहीं लोग देखें ना देखें. लेकिन यूट्यूब पर सवा लाख से भी ज्यादा लोगों ने देखा और अधिकतर ने सराहा. कुछ ने कुछ सवाल भी पूछे.
  • इससे उन्हें डीरैडिकलाज़ करने में आसानी होती है और वो कोई ना कोई काम सीख कर सरकार की दी आर्थिक मदद के ज़रिए एक सामान्य चीनी नागरिक के तौर पर जीवनयापन कर सकते हैं. सुनने में बुरा नहीं लगता, जब तक कि आप जाकर खुद इन सेंटरों में रह रहे लोगों से बात नहीं करते. बात करने के बाद अधिकारियों की बात सिर्फ दलील लगने लगती है. कम से कम मुझे यही लगा.
  • मैं 16 अगस्त की शाम चीन के उइघर मुस्लिमों के सबसे बड़ी आबादी वाले प्रदेश उइघर ऑटोनोमस प्रोवंस की राजधानी उरमुची शहर पहुंची. यह खुद चीन की सरकार के आमंत्रण पर था. मकसद था पश्चिमी मीडिया में उइघरों के बारे में चीन की दमनकारी नीतियों की 'सच्चाई' दिखाना. मैं भी लगातार इस तरह की खबरें देख-सुन और पढ़ रही थी. मन में कई सवाल थे और खुद पड़ताल करने की इच्छा.
  • चीन सरकार के बुलावे पर मैं इस समय उरुमुची में हूं. आज उरुमुची के इंटरनेशनल इस्लामिक इंस्टिट्यूट जाने का मौक़ा मिला. वहां, पर छात्रों को इमाम के काम के लिए ट्रेनिंग दी जाती है. छात्रों को मासिक भत्ता भी मिलता है. क़ुरान की पढाई में भी छात्र यहां महारत हासिल करते हैं.
  • विदेश सचिव एस जयशंकर ने पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की शुरू की हुई परंपरा को बरक़रार रखा है. सुषमा स्वराज विदेशों में मुश्किलों में फंसे भारतीयों की मदद ट्विटर के ज़रिए करती रहीं और इस वजह से काफी लोकप्रिय भी हुईं.
  • मामला बिगड़ता गया क्योंकि आचार संहिता के उल्लंघन के मामले में पीएम मोदी पर जो सवाल उठे उसमें चुनाव आयोग क्लीन चिट देता गया. इस पर चुनाव आयोग के अंदर का मतभेद खुल कर सामने आ गया, जब चुनाव आयुक्त अशोक लवासा की मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा को लिखी चिट्ठी में उनकी अलग राय को रिकॉर्ड नहीं करने की बात सामने आई. उसके बाद लाख सफाई भी काम ना आई.
  • वो दुनिया के अलग-अलग अलग हिस्सों से आए, कोई इंग्लैंड, कोई अमेरिका, कोई ऑस्ट्रेलिया कोई डेनमार्क, कोई फिलीपींस. मदद की पेशकश हर जगह से. थाइलैंड के चिरांग राई में दो हफ्ते से गुफा में फंसे जूनियर फुटबॉल टीम के 13 सदस्यों के लिए.
  • एक साल के भीतर भारत के नौ राज्यों में व्हॉट्सऐप (WhatsApp) पर बच्चा चोरी की अफवाहों के कारण 27 मासूम लोगों को भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला. फेक न्यूज़ का यह सबसे वीभत्स रूप है, लेकिन इसके और भी चेहरे हैं, और हर तरफ नज़र आ रहे हैं. फेक न्यूज़ या फिर झूठी ख़बर कभी जाने-पहचाने चेहरों के ज़रिये आप तक पहुंचती है, कभी सोशल मीडिया पर छिपे हुए लोगों की फैलाई हुई होती हैं. कई बार अपने विचारों के कारण लोग फेक न्यूज़ पर भरोसा करते हैं या फिर जिनके ज़रिये उन तक वह झूठी ख़बर पहुंची है, उन पर भरोसे के कारण ख़बर पर भी भरोसा हो जाता है. लेकिन फेक न्यूज़ का हर अवतार घातक है, किसी न किसी तरह. लोगों को मार डालना एक उदाहरण है. हमने फेक न्यूज़ के कारण दंगे, तनाव भी भड़कते देखे हैं, समुदायों में वैमनस्य पनपना देख रहे हैं. लेकिन तब क्या होता है, जब कोई नेता, वह नेता, जिस पर इस बात की ज़िम्मदारी है कि वह तथ्यों को लेकर झूठ नहीं बोलेगा, लोगों को बहकाएगा नहीं, झूठ बोलता है...? पत्रकार के तौर पर हमारी ज़िम्मेदारी हर ख़बर को देख-परखकर ही उसे दर्शकों या पाठकों तक पहुंचाने की होती है, लेकिन जब फेक न्यूज़ वायरल बुखार की तरह फैल जाए, तब क्या...?
  • मेरी आंखें बार-बार भर आ रही थीं. उन पुरानी तस्वीरों, अखबार की कतरनों को देख-पढ़ कर सिहर जा रही थी. ये अमेरिकी इतिहास का सबसे डरावना और शर्मनाक पन्ना है. अमेरिका के अलबामा राज्य के मौंटगोमरी शहर में 26 अप्रैल, 2018 को खोला गया लेगेसी म्यूज़ियम ठीक उस जगह पर बना है जहां एक गोदाम में अफ्रीकी-अमेरिकी गुलामों को रखा जाता था.
  • डोकलाम में भारतीय और चीनी सेना आमने सामने थी. पीछे से हर कूटनीतिक कोशिश की जा रही थी इस बेहद तनावपूर्ण स्थिति को सुलझाने की. ये स्थिति दो महीनों से भी ज्यादा तक बनी रही. आखिर अचानक 28 अगस्त 2017 को दोनों देशों की सेनाएं पीछे हट गईं. कहा गया कि मामला सुलझा लिया गया है. लेकिन तब से लेकर अब तक बयानों का जो सिलसिला है उससे तो यही लगता है कि स्थिति साफ होने की बजाय उतनी ही धुंधली है जितनी पहले दिन थी.
  • हम में से जो भी कभी अहमदाबाद नहीं भी गए हैं वो भी थोड़ा थोड़ा उस शहर को जानने लगे हैं. ये कमाल है प्रधानमंत्री मोदी का. असल में विश्व के बड़े नेताओं को प्रधानमंत्री मोदी ने गुजरात के अहमदाबाद ले जाने की शुरुआत जब से की है, तब से ये होने लगा है.
  • डोकलाम इलाके में भारत और चीन की सेना को आमने-सामने खड़े एक महीना होने को आया. दोनों में से कोई भी सेना पीछे हटने की जल्दी में नहीं. जिस इलाके को चीन प्राचीन काल से अपना बताकर सड़क बनाने की बात कर रहा है और भारत को पीछे हटने को कह रहा है, भारत लगातार उसे भूटान का क्षेत्र बताते हुए चीन को पीछे हटने को कह रहा है. भूटान की जमीन पर भारत का यह रुख इसलिए है क्योंकि भूटान से उसका रणनीतिक समझौता है जिसके तहत सैन्य मदद उसे मिलती है.
  • मोसुल की जीत बड़ी भी है और प्रतीकात्मक तौर पर इस्लामिक स्टेट (आईएसआईएस) को धक्का देने वाली भी, क्योंकि मोसुल की सबसे बड़ी मस्जिद में ही अबू बकर अल बगदादी ने ख़िलाफ़त (Caliphate) स्थापित करने का ऐलान किया था.
  • पड़ोसियों से रिश्ते बेहतर करने पर मोदी सरकार की विदेश नीति का बड़ा जोर रहा है. रिश्ते सुधारने की लाख कोशिशों के बावजूद चीन और पाकिस्तान भारत के लिए बड़ा सिरदर्द बने हुए हैं. लेकिन जहां तक अफगानिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल का सवाल है, हालात अलग हैं.
  • पाकिस्तान से अगर बात भी की जाए, तो किससे - नवाज़ शरीफ से, या पाक सेना से...? पाकिस्तान में भी अगले साल चुनाव होने हैं, तो क्या पाकिस्तान का कोई भी नेता बात करने को तैयार होगा...? और बात करने के लिए भारत सरकार को अपने कड़े रुख से कितना पीछे हटना होगा...?
  • कोर्ट के चीफ रॉनी अब्राहम ने इस मामले में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को चिट्टी भी लिखी है. इस पूरे मसले में कुछ सवाल उठे हैं. 
  • तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तईप एर्दोगन दो दिन के भारत दौरे पर हैं. लेकिन भारत पहुंचने के पहले उन्होंने एक भारतीय टीवी चैनल को इंटरव्यू में ये कहकर सनसनी फैला दी कि कश्मीर मसले को हमेशा के लिए सुलझाने के लिए कई पक्षीय बातचीत होनी चाहिए. भारत हमेशा कहता आया है कि कश्मीर भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय समस्या है और बातचीत भी सिर्फ दो पक्षों के बीच ही होगी.
  • पाकिस्तान में कथित भारतीय जासूस कुलभूषण जाधव की गिरफ्तारी के पीछे एक नहीं कई पेंच हैं। पाकिस्तान इसके ज़रिए न सिर्फ भारत पर पाकिस्तान में जासूसी, बलूचिस्तान में हिंसा फैलाने के आरोप की पुष्टि करने की कोशिश कर रहा है, बल्कि कहीं न कहीं...
  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सउदी अरब का दौरा न सिर्फ वहां से आने वाले 20 फीसदी क्रूड तेल, हज, उमराह और वहां बड़ी संख्या में काम कर रहे भारतीयों के कारण अहम है बल्कि एक तरह से पाकिस्तान को घेरने के लिए भी बेहद जरूरी है।
  • सालों से चली आ रही नीति से बिल्कुल अलग हटते हुए भारत ने अफ़गानिस्तान को चार अटैक हेलीकॉप्टर देना मंज़ूर किया। ये ख़बर पिछले महीने आई थी और अब इन Mi25 रूसी गनशिप में से तीन काबुल पहुंचा भी दिए गए हैं। ये हेलीकॉप्टर मशीन गन, रॉकेट और ग्रेनेड लॉन्चरों से लैस हैं।
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