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कादम्बिनी शर्मा

1999 में बिज़नेस रिपोर्टिंग से करियर की शुरुआत की. करीब आठ साल लीगल रिपोर्टिंग और फिर लगातार 11 वर्षों से विदेशी मामलों- घटनाओं, भारत की विदेश नीति पर रिपोर्टिंग और एंकरिंग करती रही हैं. खास नज़र भारत के पड़ोस, वहां की राजनीति और वहां पनपे आतंक का भारत पर हो रहे असर पर. चीन, अमेरिका और यूरोप पर. लेकिन इस छोटी सी बड़ी दुनिया में हर घटना-दुर्घटना के तार एक दूसरे से जुड़े होते हैं और देश की राजनीति का असर होता है अंतरर्राष्ट्रीय रिश्तों पर भी तो उस की खास ऐनालिसिस. पर्दे के पीछे चलती अलग अलग ट्रैक की डिप्लोमेसी सबके सामने लाने में दिलचस्पी. सामाजिक मुद्दों पर भी कई बार भड़ास निकालने को लिख बैठती हैं.

  • क्या आडंबर ही सच है...? या यूं कहें कि किताब का कवर ही उसकी सबसे बड़ी खासियत है...? मुलायम सिंह यादव 75 साल के हो गए हैं तो उनके खासमखास आज़म खान को लगता है कि इस मौके को ऐसे मनाना चाहिए, जैसे पहले कभी न हुआ हो...
  • आज हरियाणा पुलिस का पुरुषार्थ जाग उठा और उसने कार्रवाई शुरू की, वह भी कैसै... पहले उसने अपनी बहादुरी, अपनी कमिटमेंट मीडिया को दिखाई, मीडिया को बुलाया, एक जगह पर रहने को कहा और अचानक मीडिया पर ही लाठियां लेकर टूट पड़े, जिसमें 100 के करीब मीडियाकर्मी घायल हुए।
  • सबसे ज़्यादा डराने वाली बात यह है कि इस तरह की सोच पढ़े-लिखे लोगों की है... ऐसे लोग इस तरह के नियम बना रहे हैं, जिन पर आगे की नस्लों की सोच-समझ को संवारने का जिम्मा है... यह भविष्य के लिए अच्छा संकेत नहीं...
  • आजकल तो दिन ही ठीक नहीं चल रहे। एक तो सासू मां की पार्टी चुनाव पर चुनाव हार रही है ऊपर से बेकार का ये हंगामा। मैंने पहले ही कहा था, मुझे भी चुनाव प्रचार करने दो। ये भी कहा था कि राजनीति में आने को तैयार हूं। पर, ज़रा सा किसी ने सवाल क्या कर दिया, साइड में बिठा दिया मुझे। यस आइ ऐम सीरीयस।
  • राजनीतिक पत्रकारिता में जब आप किसी के होते दिखते हैं तो किसी के नहीं रहते और जिसके होने की कोशिश करते हैं वह अपना लेगा इस मुगालते में बड़े बड़े निबट गए।
  • मोदी सरकार ने शुरुआत ही की थी विदेश नीति की एक अलग पहल कर शपथ ग्रहण समारोह में आठ देशों के नेताओं को बुलाया। पाकिस्तान को भी निमंत्रण भेजा गया। सभी आए भी। इसे चुनावी भाषणबाज़ी से अलग एक व्यवहारिक और सकारात्मक पहल के तौर पर देखा गया।
  • तिब्बत जाकर मुझे भी इस पर विश्वास हो गया। तिब्बत के अंदर से कहीं ज्यादा बाहर से तिब्बत के बारे में खबरें आती रही हैं जिन्हें सुन, देख, पढ़ हम इस जगह के बारे में अपनी धारणाएं बनाते रहे हैं। हाँ मैं भी।
  • जब डॉक्टर साहब ने नाड़ी पकड़ी तो मुझे जरा भी नहीं लगा था कि वह इस वक्त कोई डायग्नोसिस दे पाएंगे, लेकिन मैं गलत थी। असल में तिब्बती चिकित्सा पद्धति के बारे में जानने के लिए हमें शैनन प्रिफेक्चर के ज़ेडांग शहर में तिब्बती चिकित्सा पद्धति के अस्पताल में लाया गया था।
  • आज हमें ल्हासा में उस महल को देखने का मौक़ा मिला, जिसमें चौदवें दलाई लामा ने 1956 से 1959 तक की तीन गर्मियां बिताई थीं। ये महल नार्बुलिंका में बना है।
  • चीन तिब्बत में लगातार रेल नेटवर्क के विस्तार में लगा है। उसने पहले बीजिंग और ल्हासा के दुर्गम इलाक़े को रेल लिंक से जोड़ा और अब वो ल्हासा से क़रीब 250 किलोमीटर आगे शिगाज़े तक रेल लाईन बिछा चुका है। शिगाज़े तिब्बत के दक्षिण में पड़ने वाला प्रिफेक्चर है, जिसकी सीमा नेपाल और भूटान से लगती है।
  • 'जिस व्यक्ति ने 1959 में तिब्बत छोड़ दिया हो उसे तिब्बत को लेकर कुछ भी बोलने का हक़ नहीं' - यह कहना है तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र के कार्यकारी उप सचिव वु यिंग्जी का। यिंग्जी ने ये बात भारत, नेपाल और भूटान के पत्रकारों के दल के साथ बातचीत में दलाई लामा को लेकर पूछे गए एक सवाल के जवाब में कही।
  • आज सुबह का कार्यक्रम है हमें तिब्बती हस्तशिल्प और तिब्बती चिकित्सा पद्धति से रूबरू कराने का। पहले हमें एक छोटे से शोरूम में ले जाया गया, जहां तिब्बती राजघरानों में सजाया जाने वाले तान्खा पेंटिग्स तो हैं ही, यहां की पारंपरिक पोशाकें, जूते, कपड़े सब कुछ हैं।
  • पहली नजर में लगा ही नहीं कि यह कोई गांव है। किसी हाउसिंग सोसाइटी की तरह सजा-संवरा है ये। मुख्य दरवाजे से ही सोलर लैंप पोस्ट का सिलसिला शुरू हो जाता है। धूप यहां तीखी होती है, जिसका भरपूर इस्तेमाल ऊंर्जा संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए होता है...
  • दुनिया की छत पर पहुंचने का मौका हर दिन नहीं मिलता, इसीलिए जब हमें यह मौका मिला, तो हमने फैसला किया कि जितना कुछ हो सके, इस मौके से हासिल कर लिया जाए...
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