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क्रांति संभव

2003 से NDTV इंडिया में कार्यरत. फिलहाल न्यूज़ एंकर और एडिटर, ऑटोमोबील्स. तमाम न्यूज़ शो के साथ-साथ 14 साल से 'रफ़्तार' कार्यक्रम भी कर रहे हैं. लिखने का शौक़ है तो गाड़ियों के अलावा भी कई मुद्दों पर हाथ साफ कर लेते हैं, जिनमें राजनीति और संगीत ख़ास हैं. आमतौर पर व्यंग्य लिखते रहे हैं.

  • बच्चे चंट होते हैं, मासूमियत तो जवानी में होती है... बुढ़ापा बेरुखेपन और क्रूरता के बीच झूलता है, अधेड़ उमर काइयां होती है, पर मासूमियत तो जवानी में होती है... बचपन की मासूमियत अब सिंथेटिक है... क्यूटनेस मैनुफैक्चर्ड है...
  • शोर सबसे शुरुआती हिंसा है, जिसके असल हिंसा में तब्दील होने में वक़्त नहीं लगता है. सोशल मीडिया से लेकर ट्रैफिक हर तरफ बढ़ता शोर हिंसा के पिनकोड में ही आते हैं. हिन्दू-मुस्लिम कर इसे जस्टीफाई करने की नहीं, इस हिंसा से सबको बचाने की ज़रूरत है. धरती वालों को भी और ऊपर वालों को भी, बिना इस बहस में पड़े कि किस धर्म का डेसिबल लेवल कितना है.
  • इस फेसबुक की दुनिया में सड़कों पर दोस्त बनाता एक बाइकर. हाल फ़िलहाल में बहुत कम ऐसे लोग मिलते हैं जिन्हें देखते ही पहली नज़र में महसूस होता है कि वो इन्सपिरेशनल हैं, जिनकी कहानी प्रेरणा दे.
  • यह भी लगा कि शायद इतनी सारी तेज़-तर्रार कारें चलाने के बाद अब मिजाज़ शांत हो गया है, योगी टाइप का हो गया हूं. न हर्ष, न विषाद. तो दिल-दिमाग संतुलित हो गया है. लेकिन मुंह-हाथ धोकर वापस आ रहा था, तो लगा कि शायद घड़ी की रीडिंग ही गड़बड़ा गई होगी... :)
  • चिंता और आश्चर्य की बात तो है ही. अपना समाज जो प्रदर्शन और मर्यादा के इतने कड़क पैरामीटर पर जीता है, उठता-बैठता-सोता है, वही हमारा प्रबुद्ध वर्ग आख़िर राहुल गांधी से राजनीति क्यों नहीं छुड़वा रहा?
  • डियर तो लिख नहीं सकते, क्योंकि डियर बोलने पर मंत्री जी ने दूसरे नेता की भावनाओं को ऐसा थकूच दिया कि डियर पार्क से भी छिटका-छिटका रहता हूं... प्रिय भी नहीं लिख सकता, क्योंकि मुझे शक है कि मेरी स्वच्छंदता से जलने वाले मेरे मित्र इस चिट्ठी का प्रिंटआउट मेरी पत्नी तक पहुंचा सकते हैं और रही बात आदरणीय की, तो वह सिर्फ हमारी स्कूल प्रिंसिपल रही हैं...
  • हो सकता है 21वीं शताब्दी में बड़े होने वाले जेनरेशन में एंबैसेडर को लेकर उतनी उत्सुकता न हो, पर अस्सी-नब्बे की दशक में बड़े होने वालों के लिए तो सवालों का पिटारा खुल गया है. क्या वाकई कार वापस आएगी? आएगी तो कितनी बदल कर आएगी? नया इंजन लगेगा? बॉडी का शेप कैसा होगा? छत का डिज़ाइन तो नहीं बदल जाएगा?
  • अगर आप दिल्ली में कार चलाते हैं और आपके जीवन का एक ही लक्ष्य हो कि ट्रैफिक में पागल नहीं होना है तो फिर उसके लिए दो ही तरीके हैं - एक तो संगीत और दूसरा दूसरों की कारों में झांकना, जिसे स्थानीय भाषा में ताड़ना कहते हैं. लेकिन अगर आपकी मध्यम वर्ग की कुटी हुई सभ्य अपब्रिंगिंग है तो फिर आप एक ही तरीका अपनाएंगे वो है संगीत का. और मेरी समस्या इसी मुद्दे से शुरू हुई और फिर बढ़ती-बढ़ती ब्लॉग का शक्ल ले चुकी है.
  • बहुत दिनों के बाद ब्लॉग लिखना पड़ रहा है, क्योंकि ख़बर ही ऐसी आई है. आभास तो तब ही से लग रहा था कि जब मैंने एक टैलेंट शो देखा था. जिसमें बहुत से बच्चे गा रहे थे. जज सुन रहे थे और हर गाने के बाद तारीफ़ों के पुल बांध रहे थे. विशेषणों की बरसात की जा रही थी. ‘माइंडब्लोइंग’ 'सुपर्ब’ ‘बेस्ट’ ‘ऑसम’ 'अनबिलीवबल' वगैरह वगैरह. हर बच्चे को सदी का गायक बताया जा रहा था, मानवता पर आशीर्वाद. पर बावजूद इन विशेषणों के, बच्चे छांटे जा रहे थे.
  • धकना दरअसल एक व्यसन है, इसका असल मज़ा झुंड में ही है, चुनौती सिर्फ़ ये है कि इसकी शेल्फ़ लाइफ़ बहुत छोटी होती है. सिर्फ़ टाइमलाइन जितनी लंबी. ट्रेंडिंग लिस्ट जितनी बड़ी. तो ऐसे मे ज़रूरी है कि नए-नए धिक्कार-योग्य व्यवहार, शर्मनाक बयान, ओछे भाषण और टुच्चे ट्वीट की सप्लाई होती रहे.
  • मैं आज यह ब्लॉग इसलिए नहीं लिख रहा क्योंकि कानपुर में सवा सौ लोग ट्रेन हादसे में मर गए हैं. वो एक दुर्घटना थी, भयावह दुर्घटना थी. इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि हमारी सरकारों के सरोकार ऐसी ही दुर्घटनाओं के बीच दिखाई देते हैं, जो अब तक तो दिखाई नहीं दिया है. सड़क पर मरने वालों का कुछ हुआ नहीं, ट्रैक पर मरने वालों की हालत बेहतर होगी लगता नहीं है. नजदीकी भविष्य में सरोकार बदलेंगे लगता नहीं है, क्योंकि मरने वाले लोग आम आदमी हैं.
  • इस समाज का आचार-सदाचार ही पचरंगा अचार है, स्वाद बदलने के लिए इस्तेमाल होता है. मेन कोर्स मेन्यू तो भ्रष्टाचार ही है. स्वीकार्य है, स्वादिष्ट है और सामिष-निरामिषों में समान रूप से मान्य है.
  • सबकी आंख पनियाई हुई है. सब ढों-ढों करके खांस रहे हैं. तीन-चार निपट लिए हैं, फर्श पर लोट रहे हैं. महिलाएं साड़ी से मुंह ढंक कर आंख मूंद कर बैठ गई हैं. पुरुषों के पास नाक ढंकने के लिए रुमाल नहीं और धोती भी छोटी पड़ रही है महराज.
  • मैं हद से ज़्यादा प्रेम में पड़ा हुआ था और रामकटोरी को मेरी भावनाओं की कोई क़द्र नहीं थी. पहली नज़र में होने वाले प्यार पर शक़ होना वाजिब है, लेकिन रामकटोरी के लिए जिस तरह से प्रेम ग्राफ़ मेरा चढ़ा था, वह बहुत ही संतुलित तरीक़े से परवान पर पहुंचा था. पर पता नहीं क्यों रामकटोरी ने कई बार मुझे धोखा दिया था.
  • आखिर वह कौन सा साल था जब से स्कूलों में सेकेंड नेम फर्स्ट हो गया? और यह तय किसने किया? परिवारों ने या नेताओं ने? ये फ्लोचार्ट किसने तय किया कि आरक्षण के समर्थन और विरोध में पहले छात्रों को भिड़ाया जाएगा, फिर दो दशक के बाद अगड़ों को आरक्षण देने की मुहिम चलाई जाएगी? जाति व्यवस्था को मिटाने के नाम पर जातियों की आइडेंटिटी को इतना गाढ़ा कर दिया जाएगा कि हम एक दूसरे को जाति से ही पहचानेंगे?
  • अपने पिछले ब्लॉग में मैंने एक बात अधूरी छोड़ दी थी. वो थी साहस की. मैंने लिखा था कि कला में साहस की ज़रूरत होती है, पर बॉलीवुड तो एक इंडस्ट्री है. वो एक अधूरी बात थी. साहस की ज़रूरत इंडस्ट्री में भी होती है, जो उत्कृष्ट करना चाहते हैं, अपनी सीमाओं का विस्तार करना चाहते हैं, वो इंडस्ट्री जो क्रिएटिव होना चाहती है. पर बॉलीवुड एक ऐसी इंडस्ट्री है जो सिर्फ़ सफल होना चाहती है, और सफलता के साथ एक समस्या है.
  • करण जौहर ने एक माफ़ीनामा जारी किया है. 'ऐ दिल है मुश्किल' मुश्किल में आई है और उसके बाद ये माफ़ी वाला वीडियो आया था. और सवाल उठ रहे हैं कि करण जौहर ने साहस क्यों नहीं दिखाया. क्यों घुटने टेक दिए, क्यों एमएनएस की धमकी से डर गए.
  • बचपन से ही मैं चाहता था कि मैं बायकॉट करूं. बहुत दिन से ललक थी. पर एक्प्रेस नहीं कर पा रहा था. परिस्थितियां मेरी इस इच्छा को चारों ओर से कूट रही थीं, जैसे अनजान कॉलनी में घुसे कुत्ते की हालत होती है. पहले तो ये शर्त सुना कि बायकॉट केवल लड़कियां ही कर सकती थीं.
  • जम्मू एवं कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने एक स्टोरी ट्वीट की, जिसे मैंने बहुत ग़ौर से नहीं देखा था. राजनाथ सिंह को यूपी का मुख्यमंत्री बनाए जाने की मुहिम का ज़िक्र था और बाकी 'इत्यादि' टाइप की जानकारियां टंकित थीं. फिर वापस जाने पर उमर साहब की टिप्पणी देखी तो पता चला कि वो सेकंड लास्ट पैरा पढ़ने के लिए भी लिखे थे.
  • सुना है कि ड्रोन से भी शूट हुआ है. रात का शूट है तो नाइट विज़न कैमरा भी इस्तेमाल हुआ हो सकता है? पता नहीं एचडी में होगा कि नहीं, आजकल युद्ध के शॉट हाई डेफिनिशन पर न देखें तो मजेदार नहीं लगता है. एचडी फुटेज के इंतजार में मैं डाटा भी कम ही इस्तेमाल कर रहा हूं. वाईफाई खोज खोज के काम चला रहा हूं. बस आ जाए जल्दी. कब तक हॉलीवुड का प्रोडक्शन देख देखकर काम चलाएं.
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