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क्रांति संभव

2003 से NDTV इंडिया में कार्यरत. फिलहाल न्यूज़ एंकर और एडिटर, ऑटोमोबील्स. तमाम न्यूज़ शो के साथ-साथ 14 साल से 'रफ़्तार' कार्यक्रम भी कर रहे हैं. लिखने का शौक़ है तो गाड़ियों के अलावा भी कई मुद्दों पर हाथ साफ कर लेते हैं, जिनमें राजनीति और संगीत ख़ास हैं. आमतौर पर व्यंग्य लिखते रहे हैं.

  • वैसे तो बहुत दिनों से मैं सोच रहा था कि एक नई केंद्रीय नीति की मांग करते हुए ब्लैक फॉन्‍ट में व्हाइटपेपर की बात लिखूं लेकिन युद्धोन्माद के माहौल में आपको पता है कि ललित निबंधों की हैसियत कैसी होती है? पैक्ड समोसों के गट्ठर में लाल चटनी के पैकेट की तरह. खुला तो खुला नहीं तो सब वैसे ही समोसा समेट गए.
  • शुरुआत में दबे-कुचले स्वर में आज्ञाकारी पुत्र जैसे साउंडबाइट देते अखिलेश बाद में मुखर भी हुए तो भी बलात्कारियों का बचाव करते बयान नहीं सुने, अपने सहयोगियों को चोर कहते नहीं सुना. मायावती की चुटकी भी बुआ कहते हुए ही सुनी है. तो ऐसे विनम्रता से विद्रोह करने वाले अखिलेश दबे कुचले बेटों के लिए एक पायनियर बने हैं.
  • शरीर अब बंधन नहीं रहा. वह तात्कालिक सच्चाई है. मन अब मुक्त है. दिल और दिमाग़ का संघर्ष अब सहअस्तित्त्व की बात कर रहे हैं. दोनों ने ठौर पकड़ ली, अपनी शरणस्थली ढूंढ ली है. अब शरीर रीयल वर्ल्‍ड में जी रहा है. मन वर्चुअल वर्ल्‍ड में.
  • अगर प्राइवेट जेट नहीं होते प्रजातंत्र की इमारत इतनी मजबूत कैसे होती? जेट न होते तो नेता एक-दूसरे से मिलते कैसे? मान-मनौव्वल कैसे होता? सोचिए प्राइवेट जेट न होते तो राजनीतिक परिवारों के मनमुटाव कैसे दूर होते? भाई-भाई संवाद कैसे होते? यूपी का समाधान दिल्ली में कैसे निकलता? चोरी-छुपे रात में फ्लाइटें न उतरतीं तो गॉसिप कहां से आते? या फिर आकाओं और राकाओं की मुलाकात कैसे होती?
  • जुमला शाश्वत है. न उसका ओर है न छोर. न वो दिखाई देता है न सुनई देता है, उसे सिर्फ़ महसूस किया जा सकता है. तेज़ गति से आता है और कान में वैक्यूम सा बनता चला जाता है. न उसका रूप है न रंग. आदि काल से आज तक कोई ये नहीं बता पाया है कि ये जुमला है या वो जुमला है.
  • इंटरनेट पर टीसीआई यानि ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया और आईआईएम कोलकाता द्वारा किए गए सर्वे की एक रिपोर्ट मिली जो बता रही है कि देश में हर साल, ट्रैफिक जाम की वजह से होने वाली देरी से 21 अरब डॉलर से अधिक का नुकसान होता है.क्यों नहीं दिल्ली की बड़ी सड़कों से, देश की बाकी तेज रफ्तार ट्रैफिक वाली सड़कों से तीन पहियों को हटा देती सरकारें.
  • सबसे बड़ा मुद्दा तो यह भी है कि ऑरिजिनल तो पाकिस्तानी कोक स्टूडियो ही है, जिसे रोहेल हयात ने शुरू किया था. वहीं से यूट्यूब पर वह प्रोग्राम किंवदंती बना, जिसे लोकप्रियता की वजह से उसे भारत लाया गया.
  • देश में गुरुओं को सम्मानित करने के लिए जो पुरस्कार का नाम रखा गया वह द्रोणाचार्य के नाम पर पड़ा. वही द्रोणाचार्य जिन्होंने राजकुमारों के लिए अपने स्कूल में सूत पुत्र को एडमिशन नहीं दिया था. वैसे महाभारत के साहित्य को देखिए और आज के वक्त के हिसाब से व्याख्या करें तो लगेगा कि यह कथाएं आज के युग की थीं.
  • सीसीटीवी के लेंस ने ही अब मौत को एक बड़ा कैनवस दिया है. इंसान का मरना नगण्य है, डाउन मार्केट है, लो व्यूअरशिप है, सोशल मीडिया पर ट्रैक्शन नहीं मिलता है. अब इंसानियत से नीचे की हत्या वायरल कैटगरी में आ ही नहीं सकती. इंसान एक निमित्त मात्र है, सीसीटीवी फ़ुटेज में विज़ुअल प्रूफ़ बनाने वाले किरदार के तौर पर. सीसीटीवी की सत्ता में इंसान को अपनी हैसियत समझनी होगी.
  • रोहित वेमुला को शायद अंदाज़ा था कि लड़ाई लंबी चलने वाली है, इसीलिए लिखा था अंतिम यात्रा शांतिपूर्वक निकले. उसने शायद पहले देख लिया था कि उसे एक बुद्धि, एक मानस या किसी संभावना से काटकर उसका मूल्य एक दलित छात्र माना जाएगा, जिसे एक पक्ष गाढ़ा करेगा, दूसरा पक्ष नकारेगा. उसने शायद यह समझ लिया था कि उसके डेथ सर्टिफिकेट से ज़्यादा अहम कास्ट सर्टिफिकेट होने वाला है.
  • शहरों में जात-पात का अंतर तो पॉलिटिकली इन्करेक्ट हो जाता है, लेकिन अंदर की सच्चाई छोटी-छोटी हरकतों में दिखती है. रोज़मर्रा की आदतों में. वह भी इतने गहरे तक धंसे संस्कार हैं कि नेताओं को गरियाने के वक्त हम यह भूल जाते हैं कि हमारे नेता वैसे ही होते हैं, जैसे हम होते हैं.
  • कई इंसानों में क्रूरता तो होती ही है, लेकिन अब जो ट्रेंड देखने को मिल रहा है वह अलग है. वह है क्रूरता का जश्न. इसका वीडियो बनाना और उन्हें अपलोड करना
  • लद्दाख़ जाकर पहाड़ों-पर्वतों की ऊंचाई, खाइयों को देखकर न सिर्फ़ इंसान का विनम्र होना स्वाभाविक है, भले ही उसका अहंकार किसी और के सामने यह न मानने दे, लेकिन मन ही मन इस विशाल धरती की छाती पर खड़े इन विशाल पर्वतों के सामने ख़ुद को एक न एक पल के लिए एक कण जैसा ज़रूर महसूस करता है, अपनी हैसियत समझता है.
  • आज छुट्टी थी तो शाम को टीवी पर एचडी चैनल लगाकर, आवाज तेज करके आपही सबको देख रहा था. आपमें से ज़्यादातर को पहचान नहीं पाया लेकिन उसमें मेरी ग़लती नहीं, आपकी है. कैसे यह बताऊंगा इस पत्र में. तो हॉकी मैच देखा और अभिनव बिंद्रा आपको भी देखा.
  • खारदुंग-ला...एक ऐसा नाम जो जून-जुलाई-अगस्त में इंडिया में 'वर्ल्ड-फ़ेमस' हो जाता है. इतने साल के बाद पता लगा कि खारदुंग-ला तो दुनिया का सबसे ऊंचा मोटरेबल पास है ही नहीं. यह जानकारी स्थानीय लोगों ने भी दी.
  • तो यह कहानी रही लद्दाख़ की... लेह की...मैंने दुनिया के कुछेक हिस्से ही देखें हैं, कुछेक देशों में ही गया हूं. लेकिन जहां भी गया हूं, जितनी जगहें देखी हैं, उनमें अब तक सबसे खूबसूरत यही इलाका लगा.
  • ...तो अब लोगों के पास मदद न करने का बहाना भी नहीं है और सरकार के पास नियम-सज़ा दोनों हैं, अब उसे असल ज़िम्मेदारी निभानी है एन्फोर्समेंट की... बढ़े जुर्माने और साथ में सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी गुड समैरिटन लॉ पर निर्देश एक ऐसी बुनियाद बना रहे हैं, जहां देश की सड़कों को ज़्यादा सुरक्षित बनाती इमारत बन सकती है...
  • नियम तो पहले भी थे, आगे भी रहेंगे. जुर्माना पहले भी था, आगे भी होगा. लेकिन असल मुद्दा है कि कैसे इन नियमों को ईमानदारी और कड़ाई से लागू किया जाएगा. तभी बनेंगी हिन्दुस्तानी सड़कें सुरक्षित.
  • मैं यह सुझाव दे रहा हूं कि मल्टीप्लेक्सों में अब अपना खाना अलाऊ करना चाहिए. पूड़ी-आलू भुजिया अलाऊ कीजिए, रिक्लाइनर वाली सीट पर लेटकर मैं हर वीकेंड फिल्म देखते पाया जाऊंगा, या 'लिट्टी-चोखा' ही अलाऊ कर दे सरकार...
  • हो सकता है कि आप मुझे जानते हों, इसलिए नहीं कि मैं टीवी पर दिखता हूं, इसलिए क्योंकि आप तो ब्रह्मा-विष्णु-महेश में से एक हैं, तो इसीलिए शायद. बाक़ी जो जनसंख्या है और जो डेटा की ओवरलैपिंग है उसमें कुछ गफ़लत हो सकती है.
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