NDTV Khabar

  • लोकसभा चुनाव के बाद बिहार की राजनीति को लेकर जो भी क़यास लगाए जा रहे हैं उसके केंद्र में एक ही बात की प्रमुखता होती है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का अगला कदम क्या होगा और राजद टूटेगी या अब एक बार फिर नीतीश कुमार की शरण में जाएगी.
  • बिहार में चमकी बुखार (Acute Encephalitis Syndrome) से  अब तक 150 बच्चों की मौत हो गयी है. निश्चित रूप से इस मुद्दे पर मुख्यमंत्री  नीतीश कुमार की सबसे अधिक आलोचना हो रही है. उसके बाद उप मुख्यमंत्री  सुशील मोदी जो विपक्ष के नेता के रूप में किसी भी घटना के बाद सबसे आक्रामक होके इस्तीफ़ा मांगते थे. इन सबके बाद राज्य के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय जो अपने संवेदनहीनता के कारण मज़ाक़ के पात्र बन बैठे हैं उनकी आलोचना हो रही है. ये तीनों नेता मीडिया से परेशान हैं क्योंकि मीडिया वाले इनका पीछा करते हैं और कुछ तो इनसे इन्हीं के पूर्व के बयानो का हवाला देते हुए पूछ देते हैं कि आख़िर इस्तीफ़ा कब देंगे. मीडिया ख़ासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में कई दिन तक सुबह से शाम तक प्राइम टाइम में बच्चों की मौत, अस्पतालों की बदहाल स्थिति के बहाने सरकार की निश्चित रूप से जायज बिंदुओं  पर चैनल के पत्रकार से संपादक तक एक स्वर से आलोचना करते हैं.
  • अगर कुछ महीने छोड़ दिए जाएं, तो पिछले कुछ सालों से दोनों नेता राज्य की सता पर क़ाबिज़ हैं, लेकिन अब बिहार में कुछ ही दिनों में 130 से अधिक बच्चों की मौत ने इनकी प्रशासनिक कुशलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं, और इसीलिए जहां नीतीश कुमार अपनी ज़िम्मेदारियों के बारे में बात करने की बजाय मीडिया से मुंह फुलाए बैठे हैं, वहीं सुशील मोदी का हमेशा की तरह इस बार भी 'लालू-राबड़ी' राग जारी है.
  • राजनीति में चीज़ें जितनी बदलती है उतनी ही अपने मूल स्वरूप में भी रह जाती हैं. ये सच बिहार के मुख्यमंत्री और जनता दल यूनाइटेड के अध्यक्ष नीतीश कुमार से बेहतर कोई नहीं जानता जो पिछले 5 दिनों से केंद्र के सरकार में हिस्सेदारी को लेकर सुर्ख़ियों में हैं. हालांकि वह हर दिन एक बात की दुहाई देते हैं की NDA में है और अगर केंद्र के सरकार में हिस्सेदारी को लेकर उनकी बात नहीं बनी तो इसका मतलब बिहार में BJP के साथ सरकार पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ेगा और साथ ही वह केन्द्र और बिहार में एनडीए में ही रहेंगे. लेकिन वर्तमान विवाद और संकट का क्या समाधान होगा उसके लिए नीतीश कुमार की राजनीति को 25 साल पहले से देखना होगा. उस समय क्या हुआ था यह बिहार बीजेपी के कई वरिष्ठ नेताओं जैसे सुशील मोदी और नंद किशोर यादव को अच्छी तरह से याद होगा. सत्ता में हिस्सेदारी का ही मामला था कि जब नीतीश कुमार ने लालू यादव से अलग होकर लोक समता पार्टी बनायी थी.
  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता में वापस आने की संभावना चुनाव घोषित होने के पहले हफ़्ते में प्रबल दिख रही है. जबकि ये भी सच है कि इस बार उत्तर प्रदेश में भाजपा के शीर्ष नेता से कार्यकर्ता तक मानकर चल रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में सीटों को संख्य कम होगी. वह पिछले लोकसभा चुनाव की तुलना में आधी भी हो सकती है. लेकिन इसके बावजूद एक महीने या 45 दिन पहले तक जो भाजपा उत्तर प्रदेश में हाशिये पर डबल डिजिट के लिए संघर्ष कर रही थी वह अब खेल में वापसी कर चुकी है.
  • बिहार की राजनीति में रविवार तीन मार्च का दिन कई कारणों से याद किया जाएगा. इस दिन सुबह कश्मीर में शहीद हुए सब इंस्पेक्टर पिंटू सिंह का पार्थिव शरीर पटना आया था. तब न तो नीतीश कुमार समेत उनके मंत्रिमंडल के किसी सदस्य ने, न ही मोदी मंत्रिमंडल में शामिल बिहार के किसी मंत्री ने पटना में मौजूद रहने के बावजूद पटना एयरपोर्ट पर जाकर सिंह को श्रद्धांजलि देने की जरूरत समझी. इससे साफ है कि पुलवामा हो या अन्य घटना, इन नेताओं के लिए मीडिया में प्रचार पाने के अलावा कुछ नहीं.
  • लोकसभा चुनाव सिर पर है और हर दल अपने-अपने हिसाब से राजनीतिक दांव खेलने में व्यस्त हैं. जहां एक ओर राष्ट्रीय दल भाजपा और कांग्रेस के बीच सहयोगियों को जोड़ने की होड़ लगी है. वहीं, क्षेत्रीय दल भी अपने-अपने हिसाब से यानी कांग्रेस या BJP के साथ अब तालमेल को अंतिम रूप दे रहे हैं. कांग्रेस अगर सहयोगी या क्षेत्रीय दलों से समझौता कर रही है तो उसकी मजबूरी समझ में आती है लेकिन अचानक बीजेपी जिस तरह से महत्वपूर्ण राज्यों में अपने पुराने स्टैंड से 360 डिग्री घुमकर समझौते कर रही है, उससे तो यही लगता है कि भाजपा को अब सहयोगियों का महत्व समझ में आ रहा है. इतना ही नहीं, बीजेपी को शायद उनके बिना चुनाव में जाना आत्मघाती लग रहा है. इसलिए भाजपा एक बार फिर 'सहयोगी शरणम् गच्छामी' के मुद्रा में है. 
  • पश्चिम बंगाल में पिछले रविवार से लेकर अभी तक जो कुछ चल रहा है वह चिंताजनक है. बंगाल में सत्ता पर काबिज तृणमूल को भाजपा धूल चटाना चाहती है और सारी लड़ाई की जड़ में यही है. भाजपा का आकलन है जब तक तृणमूल प्रमुख ममता बनर्जी को सारदा घोटाले में फंसाया नहीं जाता तब तक बंगाल पर विजय का परचम फहराने का उनका कई दशक का सपना पूरा नहीं हो पाएगा.
  • प्रख्यात समाजवादी और पूर्व केंद्रीय मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस का शुक्रवार को अंतिम संस्कार क्रिश्चियन विधि से किया गया. इससे पूर्व बृहस्पतिवार को उनके शव को हिंदू तरीके से अंतिम विदाई दी गई. बिहार में जहां से वे आठ बार लोकसभा के लिए चुने गए और एक बार राज्यसभा भी गए थे वहां उनकी मौत की ख़बर के बाद दो दिनों का राजकीय शोक भी रहा है.
  • केंद्र सरकार द्वारा अगड़ी जातियों के ग़रीब लोगों के लिए जब से 10 प्रतिशत के आरक्षण के प्रावधान के लिए संविधान में संशोधन किया गया है, बिहार की राजनीति में या आप कह सकते हैं कि जातिगत राजनीति में एक बार फिर उबाल आ गया.
  • अब से पंद्रह दिन के बाद जब पांच राज्यों के परिणाम आयेंगे तो ये पता चल जायेगा कि आख़िर इस चुनाव का सिकंदर कौन है. लेकिन सबसे ज़्यादा सबकी निगाहें भाजपा शासित तीन राज्यों मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान  के परिणाम पर टिकी हैं जहां राजस्थान के अलावा दो राज्यों में भाजपा की सरकार पिछले पंद्रह वर्षों से है.
  • भाजपा के नेताओं ने सार्वजनिक रूप से नीतीश कुमार के इस क़दम का स्वागत किया. ख़ुद प्रकाश पर्व के दौरान जब पटना के गांधी मैदान में मुख्य समारोह में भाग लेने ख़ुद प्रधान मंत्रीनरेंद्र मोदी जब आये तब उन्होंने बिहार में शराबबंदी के लिए नीतीश कुमार की तारीफ़ की . जिससे यह साफ़ था कि इन दोनो नेताओं के बीच तनाव ख़त्म और संवाद जारी हैं .लेकिन इससे पूर्व वो या नीतीश की सोची समझी रणनीति कहिए या संयोग कि महागठबंधन में नीतीश नोटबंदी के मुद्दे पर अलग थलग पर गये थे.
  • बिहार के मुख्यमंत्री के पास दो पूंजी हैं एक सुशासन और दूसरा उनकी व्यक्तिगत ईमानदार नेता की छवि जो भ्रष्टाचार और गलत कमाई से कोसों दूर रहता है. लेकिन सुशासन बाबू नीतीश कुमार को शुक्रवार को उनके ही दो पुलिस कर्मियों ने वह भी उनके नाक तले राजधानी पटना में चुनौती दी, जब एक महिला पुलिसकर्मी की डेंगू से हुई मौत के बहाने जमकर हंगामा किया गया.
  • भले सीबीआई के इतिहास में एक निदेशक आलोक वर्मा और अतिरिक्त निदेशक राकेश अस्थाना के बीच जारी वर्चस्व की लड़ाई में पूरे देश के नेता और पुलिस अधिकारी हर दिन के घटनाक्रम पर नज़र लगाए बैठे हैं लेकिन बिहार में ये एक मुद्दा बनता जा रहा है.
  • जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के नव नियुक्त सदस्य और चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर का मानना है कि अगले दस सालों तक बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही रहेंगे. इस बयान के कई मायने निकाले जा रहे हैं.
  • आज भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक दिल्ली में हो रही है. सभी की निगाहें इस बात पर हैं कि आखिर पार्टी एससी-एसटी एक्ट के मुद्दे पर देशभर में अगड़ी जातियों में असंतोष के माहौल का क्या निदान ढूंढती है. किसी भी भाजपा नेता को इस बात में कोई गलतफहमी नहीं है कि 90 के दशक से अब तक हिंदी पट्टी के राज्यों में मंडल की शक्तियों और दलों से मुक़ाबला करने में भाजपा का अगर किसी वर्ग ने जमकर साथ दिया है तो वे हैं अगड़ी जातियां और इनके समूह.
  • इस शीर्षक को देखकर आप सब लोग चकित हो रहे होंगे, लेकिन मुझे ये स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं कि पहले हरिवंश जी का राजनीति में जाना, राज्यसभा सदस्य बनना और राज्यसभा का उप सभापति वह भी पहले टर्म में ही बन जाना, मुझे बहुत ख़ुशी नहीं हो रही.
  • इंसान कभी-कभी खामोश रहके अपने समर्थकों और विरोधियों दोनों को परेशान करता है. लेकिन जब वो इस मौन व्रत को खत्म करता है तब उसके वाक्य और प्रतिक्रिया की सबको बेताबी से इंतज़ार रहता है. मुजफ्फरपुर प्रकरण पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की हालत कुछ वैसे ही खामोश इंसान की थी.
  • ब्रजेश ठाकुर ने जो कुछ भी किया उससे बाद हर कोई पूछ रहा है कि क्‍या मीडिया के लोग इस जघन्य कांड के लिए बच्चियों या उनके परिवारवालों या देश के लोगों से माफ़ी मांगेंगी. क्‍योंकि इस कांड का आरोपी ब्रजेश ठाकुर एक अख़बार का मालिक और संपादक है.
  • शनिवार को बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए सरकार के एक साल पूरे हो गए. अपनी सरकार का सालाना लेखा जोखा देने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कोई आयोजन नहीं किया और न विपक्ष ने उनके इस कार्यकाल के बारे में कोई आरोप पत्र जारी किया या संवाददाता सम्मेलन ही किया. इसके बाद एक से एक राजनीतिक क़यास लगाए जा रहे हैं.
1234»

Advertisement