NDTV Khabar

  • लोकसभा चुनाव सिर पर है और हर दल अपने-अपने हिसाब से राजनीतिक दांव खेलने में व्यस्त हैं. जहां एक ओर राष्ट्रीय दल भाजपा और कांग्रेस के बीच सहयोगियों को जोड़ने की होड़ लगी है. वहीं, क्षेत्रीय दल भी अपने-अपने हिसाब से यानी कांग्रेस या BJP के साथ अब तालमेल को अंतिम रूप दे रहे हैं. कांग्रेस अगर सहयोगी या क्षेत्रीय दलों से समझौता कर रही है तो उसकी मजबूरी समझ में आती है लेकिन अचानक बीजेपी जिस तरह से महत्वपूर्ण राज्यों में अपने पुराने स्टैंड से 360 डिग्री घुमकर समझौते कर रही है, उससे तो यही लगता है कि भाजपा को अब सहयोगियों का महत्व समझ में आ रहा है. इतना ही नहीं, बीजेपी को शायद उनके बिना चुनाव में जाना आत्मघाती लग रहा है. इसलिए भाजपा एक बार फिर 'सहयोगी शरणम् गच्छामी' के मुद्रा में है. 
  • पश्चिम बंगाल में पिछले रविवार से लेकर अभी तक जो कुछ चल रहा है वह चिंताजनक है. बंगाल में सत्ता पर काबिज तृणमूल को भाजपा धूल चटाना चाहती है और सारी लड़ाई की जड़ में यही है. भाजपा का आकलन है जब तक तृणमूल प्रमुख ममता बनर्जी को सारदा घोटाले में फंसाया नहीं जाता तब तक बंगाल पर विजय का परचम फहराने का उनका कई दशक का सपना पूरा नहीं हो पाएगा.
  • प्रख्यात समाजवादी और पूर्व केंद्रीय मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस का शुक्रवार को अंतिम संस्कार क्रिश्चियन विधि से किया गया. इससे पूर्व बृहस्पतिवार को उनके शव को हिंदू तरीके से अंतिम विदाई दी गई. बिहार में जहां से वे आठ बार लोकसभा के लिए चुने गए और एक बार राज्यसभा भी गए थे वहां उनकी मौत की ख़बर के बाद दो दिनों का राजकीय शोक भी रहा है.
  • केंद्र सरकार द्वारा अगड़ी जातियों के ग़रीब लोगों के लिए जब से 10 प्रतिशत के आरक्षण के प्रावधान के लिए संविधान में संशोधन किया गया है, बिहार की राजनीति में या आप कह सकते हैं कि जातिगत राजनीति में एक बार फिर उबाल आ गया.
  • अब से पंद्रह दिन के बाद जब पांच राज्यों के परिणाम आयेंगे तो ये पता चल जायेगा कि आख़िर इस चुनाव का सिकंदर कौन है. लेकिन सबसे ज़्यादा सबकी निगाहें भाजपा शासित तीन राज्यों मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान  के परिणाम पर टिकी हैं जहां राजस्थान के अलावा दो राज्यों में भाजपा की सरकार पिछले पंद्रह वर्षों से है.
  • भाजपा के नेताओं ने सार्वजनिक रूप से नीतीश कुमार के इस क़दम का स्वागत किया. ख़ुद प्रकाश पर्व के दौरान जब पटना के गांधी मैदान में मुख्य समारोह में भाग लेने ख़ुद प्रधान मंत्रीनरेंद्र मोदी जब आये तब उन्होंने बिहार में शराबबंदी के लिए नीतीश कुमार की तारीफ़ की . जिससे यह साफ़ था कि इन दोनो नेताओं के बीच तनाव ख़त्म और संवाद जारी हैं .लेकिन इससे पूर्व वो या नीतीश की सोची समझी रणनीति कहिए या संयोग कि महागठबंधन में नीतीश नोटबंदी के मुद्दे पर अलग थलग पर गये थे.
  • बिहार के मुख्यमंत्री के पास दो पूंजी हैं एक सुशासन और दूसरा उनकी व्यक्तिगत ईमानदार नेता की छवि जो भ्रष्टाचार और गलत कमाई से कोसों दूर रहता है. लेकिन सुशासन बाबू नीतीश कुमार को शुक्रवार को उनके ही दो पुलिस कर्मियों ने वह भी उनके नाक तले राजधानी पटना में चुनौती दी, जब एक महिला पुलिसकर्मी की डेंगू से हुई मौत के बहाने जमकर हंगामा किया गया.
  • भले सीबीआई के इतिहास में एक निदेशक आलोक वर्मा और अतिरिक्त निदेशक राकेश अस्थाना के बीच जारी वर्चस्व की लड़ाई में पूरे देश के नेता और पुलिस अधिकारी हर दिन के घटनाक्रम पर नज़र लगाए बैठे हैं लेकिन बिहार में ये एक मुद्दा बनता जा रहा है.
  • जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के नव नियुक्त सदस्य और चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर का मानना है कि अगले दस सालों तक बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही रहेंगे. इस बयान के कई मायने निकाले जा रहे हैं.
  • आज भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक दिल्ली में हो रही है. सभी की निगाहें इस बात पर हैं कि आखिर पार्टी एससी-एसटी एक्ट के मुद्दे पर देशभर में अगड़ी जातियों में असंतोष के माहौल का क्या निदान ढूंढती है. किसी भी भाजपा नेता को इस बात में कोई गलतफहमी नहीं है कि 90 के दशक से अब तक हिंदी पट्टी के राज्यों में मंडल की शक्तियों और दलों से मुक़ाबला करने में भाजपा का अगर किसी वर्ग ने जमकर साथ दिया है तो वे हैं अगड़ी जातियां और इनके समूह.
  • इस शीर्षक को देखकर आप सब लोग चकित हो रहे होंगे, लेकिन मुझे ये स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं कि पहले हरिवंश जी का राजनीति में जाना, राज्यसभा सदस्य बनना और राज्यसभा का उप सभापति वह भी पहले टर्म में ही बन जाना, मुझे बहुत ख़ुशी नहीं हो रही.
  • इंसान कभी-कभी खामोश रहके अपने समर्थकों और विरोधियों दोनों को परेशान करता है. लेकिन जब वो इस मौन व्रत को खत्म करता है तब उसके वाक्य और प्रतिक्रिया की सबको बेताबी से इंतज़ार रहता है. मुजफ्फरपुर प्रकरण पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की हालत कुछ वैसे ही खामोश इंसान की थी.
  • ब्रजेश ठाकुर ने जो कुछ भी किया उससे बाद हर कोई पूछ रहा है कि क्‍या मीडिया के लोग इस जघन्य कांड के लिए बच्चियों या उनके परिवारवालों या देश के लोगों से माफ़ी मांगेंगी. क्‍योंकि इस कांड का आरोपी ब्रजेश ठाकुर एक अख़बार का मालिक और संपादक है.
  • शनिवार को बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए सरकार के एक साल पूरे हो गए. अपनी सरकार का सालाना लेखा जोखा देने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कोई आयोजन नहीं किया और न विपक्ष ने उनके इस कार्यकाल के बारे में कोई आरोप पत्र जारी किया या संवाददाता सम्मेलन ही किया. इसके बाद एक से एक राजनीतिक क़यास लगाए जा रहे हैं.
  • पिछले दो दिनों से संसद से बिहार विधानमंडल के दोनों सदनों में एक ही मुद्दे पर हंगामा हो रहा है, वह है राज्य के मुजफ्फरपुर में एक बालिका गृह से सम्बंधित स्कैंडल का. खुद पुलिस और समाज कल्याण विभाग द्वारा अब तक 42 बालिकाओं की मेडिकल रिपोर्ट में 29 बालिकाओं के साथ यौन शोषण की जब से पुष्टि हुई है तब से पूरे देश में इस घटना की चर्चा तेज़ हुई है.
  • बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्य की सता में सहयोगी भारतीय जनता पार्टी से उम्मीद जताई है कि 15 अगस्त तक उन्हें ये बता दिया जाएगा कि आखिर उनके पास जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के लिए अगले साल लोकसभा चुनाव में प्रत्याशी उतारने के लिए कितनी सीटों का ऑफ़र है. नीतीश ने सोमवार को जब से ये बात बोली है तब से इसका अर्थ और विश्लेषण सब लोग अपनी तरह से कर रहे हैं. इसका सीधा मतलब यह है कि नीतीश कुमार सीटों के मुद्दे पर बहुत ज्यादा इंतजार नहीं करना चाहते. उन्होंने भले ही भाजपा के कर्ता धर्ता अमित शाह को इंतजार के समय के बारे में नहीं बताया हो, लेकिन मीडिया के माध्यम से और सुशील मोदी की उपस्थिति में समय का खुलासा कर दिया है.
  • बिहार से इन दिनों अच्छी ख़बर नहीं आती. एक बार फिर राज्य नेगेटिव ख़बरों के कारण अब ज़्यादा सुर्ख़ियां बटोरता है.
  • साल 2000 तक बिहार में हर चुनाव बैलेट पेपर से हुए, लेकिन हर चुनाव में जीत का मुख्य आधार सामाजिक समीकरण ही रहे. हालांकि, यह भी सच है कि उम्मीदवार अपनी जीत के लिए बैलेट पेपर को लूटने के प्रयास करते रहे. हालात ऐसे थे कि अगर पार्टी सता में होती तो प्रशासन का साथ मिलता, लेकिन विपक्ष में रहने पर गोलीबारी, चुनाव में अथाह खर्चे आदि करना एक नियमित अनिवार्य प्रक्रिया थी, जिसे नजर अंदाज करना चुनाव से पहले घुटने टेकने के समान था. इसलिए मतदान के दिन हिंसा, गोली चलना, बम विस्फोट एक आम बात थी. शायद ही कोई एक ऐसा चुनाव हो जब लोकतंत्र के नाम पर बूथ लूटने में बीस लोगों से कम जाने गयी हो. 
  • इन दिनों पूरे देश में एक बार फिर से EVM पर बहस शुरू हो गई है. खासकर कांग्रेस महाधिवेशन के बाद जिसमें फिर से बैलेट पेपर के माध्यम से चुनाव कराने की मांग की गई है. कई क्षेत्रिय दलों ने यह मांग पहले से कर रखी है. लेकिन अगर आप मुझसे पूछेंगे तो मेरे हिसाब से ये बहस बेमानी है. क्योंकि बिहार, जहां बैलेट और बुलेट का संघर्ष जगव्यापी रहा है, वहां ईवीएम से गरीब और वंचित समाज के लोग ज्यादा निर्भिक होकर मतदान करते हैं. बिहार हो या उतर प्रदेश या कोई अन्य राज्य, अभी चुनाव में जीत-हार आपके सामाजिक समीकरण , चुनाव अभियान के नेतृत्व और आपके संगठन की शक्ति तय करते हैं. लेकिन पिछले क़रीब तीन दशक के बिहार चुनाव परिणामों पर नजर दौड़ाएंगे तो यह दूध का दूध और पानी का पानी साबित हो जाएगा. 
  • अगर आज आपसे कोई यह पूछे कि एक बिहार के आम नागरिक, उनके पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश और झारखंड के निवासी में क्या अंतर है तो आपका जवाब यही होना चाहिए कि जहां भाजपा के मुख्यमंत्री हैं उन सरकारों ने फिल्म में रुचि रखने वाले निवासियों के लिए अपनी पुलिस की मौजूदगी में इतना सुनिश्चित किया कि वे फिल्म पद्मावत देख सकें. लेकिन भाजपा के समर्थन और राज्य में कानून के राज का दावा करने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पूरे बिहार की तो छोड़िए राजधानी पटना में भी इस फिल्म को रिलीज़ नहीं करवा पाए.
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