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  • पिछले दो दिनों से संसद से बिहार विधानमंडल के दोनों सदनों में एक ही मुद्दे पर हंगामा हो रहा है, वह है राज्य के मुजफ्फरपुर में एक बालिका गृह से सम्बंधित स्कैंडल का. खुद पुलिस और समाज कल्याण विभाग द्वारा अब तक 42 बालिकाओं की मेडिकल रिपोर्ट में 29 बालिकाओं के साथ यौन शोषण की जब से पुष्टि हुई है तब से पूरे देश में इस घटना की चर्चा तेज़ हुई है.
  • बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्य की सता में सहयोगी भारतीय जनता पार्टी से उम्मीद जताई है कि 15 अगस्त तक उन्हें ये बता दिया जाएगा कि आखिर उनके पास जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के लिए अगले साल लोकसभा चुनाव में प्रत्याशी उतारने के लिए कितनी सीटों का ऑफ़र है. नीतीश ने सोमवार को जब से ये बात बोली है तब से इसका अर्थ और विश्लेषण सब लोग अपनी तरह से कर रहे हैं. इसका सीधा मतलब यह है कि नीतीश कुमार सीटों के मुद्दे पर बहुत ज्यादा इंतजार नहीं करना चाहते. उन्होंने भले ही भाजपा के कर्ता धर्ता अमित शाह को इंतजार के समय के बारे में नहीं बताया हो, लेकिन मीडिया के माध्यम से और सुशील मोदी की उपस्थिति में समय का खुलासा कर दिया है.
  • बिहार से इन दिनों अच्छी ख़बर नहीं आती. एक बार फिर राज्य नेगेटिव ख़बरों के कारण अब ज़्यादा सुर्ख़ियां बटोरता है.
  • साल 2000 तक बिहार में हर चुनाव बैलेट पेपर से हुए, लेकिन हर चुनाव में जीत का मुख्य आधार सामाजिक समीकरण ही रहे. हालांकि, यह भी सच है कि उम्मीदवार अपनी जीत के लिए बैलेट पेपर को लूटने के प्रयास करते रहे. हालात ऐसे थे कि अगर पार्टी सता में होती तो प्रशासन का साथ मिलता, लेकिन विपक्ष में रहने पर गोलीबारी, चुनाव में अथाह खर्चे आदि करना एक नियमित अनिवार्य प्रक्रिया थी, जिसे नजर अंदाज करना चुनाव से पहले घुटने टेकने के समान था. इसलिए मतदान के दिन हिंसा, गोली चलना, बम विस्फोट एक आम बात थी. शायद ही कोई एक ऐसा चुनाव हो जब लोकतंत्र के नाम पर बूथ लूटने में बीस लोगों से कम जाने गयी हो. 
  • इन दिनों पूरे देश में एक बार फिर से EVM पर बहस शुरू हो गई है. खासकर कांग्रेस महाधिवेशन के बाद जिसमें फिर से बैलेट पेपर के माध्यम से चुनाव कराने की मांग की गई है. कई क्षेत्रिय दलों ने यह मांग पहले से कर रखी है. लेकिन अगर आप मुझसे पूछेंगे तो मेरे हिसाब से ये बहस बेमानी है. क्योंकि बिहार, जहां बैलेट और बुलेट का संघर्ष जगव्यापी रहा है, वहां ईवीएम से गरीब और वंचित समाज के लोग ज्यादा निर्भिक होकर मतदान करते हैं. बिहार हो या उतर प्रदेश या कोई अन्य राज्य, अभी चुनाव में जीत-हार आपके सामाजिक समीकरण , चुनाव अभियान के नेतृत्व और आपके संगठन की शक्ति तय करते हैं. लेकिन पिछले क़रीब तीन दशक के बिहार चुनाव परिणामों पर नजर दौड़ाएंगे तो यह दूध का दूध और पानी का पानी साबित हो जाएगा. 
  • अगर आज आपसे कोई यह पूछे कि एक बिहार के आम नागरिक, उनके पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश और झारखंड के निवासी में क्या अंतर है तो आपका जवाब यही होना चाहिए कि जहां भाजपा के मुख्यमंत्री हैं उन सरकारों ने फिल्म में रुचि रखने वाले निवासियों के लिए अपनी पुलिस की मौजूदगी में इतना सुनिश्चित किया कि वे फिल्म पद्मावत देख सकें. लेकिन भाजपा के समर्थन और राज्य में कानून के राज का दावा करने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पूरे बिहार की तो छोड़िए राजधानी पटना में भी इस फिल्म को रिलीज़ नहीं करवा पाए.
  • रविवार देर रात दिल्ली में बिहार से पूर्व केंद्रीय मंत्री, पूर्व सांसद और कई बार विधायक रहे रघुनाथ झा का निधन हो गया. लेकिन बहुत कम लोगों को याद होगा कि 1990 में जब लालू यादव पहली बार मुख्यमंत्री चुने गए थे, अगर रघुनाथ झा की उम्मीदवारी नहीं होती तो शायद लालू की जगह रामसुंदर दास मुख्यमंत्री होते.
  • चारा घोटाले के एक मामले में जब से बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और राजद सुप्रीमो लालू यादव को साढ़े तीन साल जेल की सजा हुई है, उसके बाद बिहार की राजनीति में ये कायास लगाये जा रहे हैं कि आखिर इस पूरे मामले से किसे नफा होगा और किसे नुकसान. अगर आप इस बात को समझना चाहते हैं तो इसके लिए आपको बिहार की वर्तमान राजनीति से इतर उसके पीछे की राजनीति को थोड़ा याद करना होगा. एक तरफ जहां वर्तमान में लालू यादव चारा घोटाले में एक बार फिर सजा काट रहे हैं, वहीं उनके कभी राजनीतिक सहयोगी और अब विरोधी नीतीश कुमार को ‘प्रोबिटी इन पॉलिटिक्स एंड पब्लिक लाइफ' के मुफ्ती मोहम्मद अवार्ड से नवाजा जा रहा है.
  • राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) ने जब अपनी पार्टी में चुनाव समय से पहले कराने को घोषणा की तब इस संबंध में कई क़यास लगाए गए कि आख़िर इसके पीछे लालू यादव की असल मंशा क्या हैं? कुछ लोगों को लग रहा था शायद जेल जाने के डर से लालू अपनी पार्टी की कमान अपने ही परिवार में किसी और को दे सकते हैं. लेकिन जैसे-जैसे चुनाव की औपचारिकता पूरी की गई उससे लगा कि लालू खुद राष्ट्रीय अध्यक्ष दसवीं बार बनने के लिए चुनाव का तमाशा कर रहे हैं.
  • कांग्रेस पार्टी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने पिछले कुछ दिनों में दो निर्णय लिए. एक उन्होंने झारखंड में पार्टी की कमान एक ऐसे व्यक्ति डॉक्टर अजय कुमार के हाथ में दी जो कुछ साल पहले ही पार्टी में आए हैं. दूसरा राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू यादव के पुत्र और बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने साथ भोजन किया.
  • इस साल के सबसे बड़े राजनीतिक घटनाक्रमों में बिहार का सत्ता परिवर्तन यानी सत्ता से राजद की विदाई और भाजपा के साथ नीतीश कुमार का सरकार बनाना भी शामिल है. 26 जुलाई यानी जिस दिन और जिस समय नीतीश ने इस्तीफ़ा दिया, उसके कुछ घंटे पहले तक दिल्ली से लेकर पटना तक कुछ चुनिंदा लोगों को छोड़ दें तो किसी को इस राजनीतिक परिवर्तन का अंदाज़ा तक नहीं था.
  • ये हेडलाइन पढ़ने में निश्चित रूप से अटपटी लग रही होगी. ख़ासकर इस वाक्य को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पटना विश्वविद्यालय के शताब्दी समारोह में दिये गए भाषण के बाद अगर किसी ने दुहरा दिया होता तो शायद उसका लोग, ख़ासकर नाराज़ छात्र इलाज कर देते.
  • इस बात में कोई शक नहीं कि अगर राजनेताओं और उनकी राजनीतिक चाल के लिए सालाना ओलम्पिक होता तो इस साल की राजनीतिक उलटपलट में सबसे लंबी उल्टी छलांग लगाने की श्रेणी में नि:संदेह गोल्ड मेडल बिहार के मुख्यमंत्री और जनता दल यूनाइटेड के अध्यक्ष नीतीश कुमार को मिलता. नीतीश कुमार की जो भी राजनीतिक मजबूरी रही हो लेकिन उनकी पूरे देश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ बनी एक सशक्त नेता की छवि धूमिल हुई.
  • पिछले एक हफ़्ते से अधिक से देश की राजनीति में जो भूचाल आया है उसके केंद्र में हैं पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा. उनके एक अख़बार में लिखे लेख के बाद पहली बार देश की आर्थिक व्यवस्था चर्चा के केंद्र में है.
  • तेजस्वी यादव देश के उन गिने चुने नेताओं में से एक हैं जिन्होंने अपने छोटे से राजनीतिक करियर में इतने उतार-चढ़ाव देख लिए हैं जिसे कुछ लोग पूरे जीवन में नहीं देख पाते. तेजस्वी को जितनी जल्दी ऊंचाई मिली उससे कही तेजी से धरातल भी देखने को मिल रहा है.
  • बिहार की राजनीति में पिछले हफ्ते जो हुआ, उस पर पूरे देश में बहस जारी है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जिस नाटकीय घटनाक्रम में महागठबंधन को अलविदा कहते हुए बीजेपी के साथ सरकार बनाई, उससे खुद पटना से दिल्ली तक बीजेपी के नेता हतप्रभ थे.
  • बिहार में पिछले एक पखवाड़े से अधिक समय से चले आ रहे राजनैतिक गतिरोध का अंत कब होगा, सब यही जानना चाहते हैं. कैसे होगा ये सबको मालूम है लेकिन जो भी होगा, राज्य और देश की राजनीति पर उसका असर आने वाले दिनों में देखने को मिलेगा.
  • बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की तबीयत खराब है और सोमवार को जनसंवाद समेत उनके मीडिया से रूबरू होने के तय कार्यक्रम रद्द हो गए हैं. नीतीश कुमार की बीमारी का कारण वायरल बुखार बताया जा रहा है.
  • रघुबर दास के राज्य में मांस-मछली की  खरीद-बिक्री बिना लाइसेंस के नहीं हो सकती और सरकार गाय के मांस की खरीद-बिक्री पर सख्ती से पाबंदी चाहती है. वहीं, नीतीश कुमार बिहार के लोगों को शराब की लत से दूर रखना चाहते हैं.
  • अब सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि राज्य सरकार इस साल के परीक्षा परिणामों को कितनी बड़ी चुनौती के रूप में लेती है. अगर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार चाहें तो इस ख़राब परिणाम की बुनियाद पर बिहार के छात्रों के स्वर्णिम भविष्य की बुनियाद रख सकते हैं.
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