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प्रियदर्शन

एनडीटीवी इंडिया में 15 वर्षों से कार्यरत. उपन्यास 'ज़िंदगी लाइव', कहानी संग्रह 'बारिश, धुआं और दोस्त' और 'उसके हिस्से का जादू', कविता संग्रह 'नष्ट कुछ भी नहीं होता' सहित नौ किताबें प्रकाशित. कविता संग्रह मराठी में और उपन्यास अंग्रेज़ी में अनूदित. सलमान रुश्दी और अरुंधती रॉय की कृतियों सहित सात किताबों का अनुवाद और तीन किताबों का संपादन. विविध राजनैतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों पर तीन दशक से नियमित विविधतापूर्ण लेखन और हिंदी की सभी महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन.

  • योगेंद्र यादव के ट्वीट को लेकर हंगामा हो रहा है, लेकिन उसे ध्यान से देखने की ज़रूरत है. उन्होंने लिखा है, 'कांग्रेस को ख़त्म हो जाना चाहिए. अगर वो भारत के विचार की रक्षा के लिए बीजेपी को इन चुनावों में रोक पाने में नाकाम रही तो इस पार्टी के लिए भारतीय इतिहास में कोई सकारात्मक भूमिका नहीं है. आज किसी विकल्प के निर्माण में ये सबसे बड़ी बाधा की प्रतिनिधि है.'
  • 'टाइम्स ऑफ इंडिया' का संपादक रहते हुए कभी दिलीप पडगांवकर ने कहा था कि देश का सबसे ताकतवर आदमी इस देश का प्रधानमंत्री है और दूसरा सबसे ताकतवर आदमी 'टाइम्स ऑफ इंडिया' का संपादक है.तब भी इस वक्तव्य की बहुत आलोचना हुई थी.किसी अच्छे पत्रकार को ताकत के मोह में नहीं पड़ना चाहिए.यह मोह सबसे पहले उसकी पत्रकारिता का क्षरण करता है.लेकिन पत्रकारिता जब अपना काम कर रही होती है तब वह जिस नैतिक आभा से भरी होती है, उसकी ताकत के आगे भी सब सिर झुकाते हैं.
  • प्रज्ञा ठाकुर को भले पार्टी के दबाव में माफ़ी मांगनी पड़ी, लेकिन उनकी यह बात सौ फ़ीसदी सही है कि एक ख़ास विचारधारा के तहत गोडसे देशभक्त था- उसकी नज़र में देश की जो परिभाषा थी, उससे वह पूजा करता था. उसकी गांधी जी से कोई निजी दुश्मनी नहीं थी. उसको आरएसएस या हिंदू महासभा ने जो कुछ सिखाया, उस पर उसने पूरी तरह अमल किया. संकट यह है कि आज जो आरएसएस या उससे जुड़े संगठन हैं, उनको अपनी वैचारिकता का भरोसा ही नहीं, इसलिए वे गोडसे की तरह गांधी को सामने से गोली नहीं मारते, पीछे-पीछे उनका वध करते हैं.
  • जब हर तरफ़ राष्ट्रवाद का शोर है, राष्ट्रगान गाने पर ज़ोर है, तब रवींद्रनाथ टैगोर को याद करने का एक ख़ास मतलब है. टैगोर संभवतः दुनिया के अकेले कवि हैं जिनकी रचनाओं को दो-दो देशों ने अपने राष्ट्रगान की तरह अपनाया. भारत के अलावा बांग्लादेश का राष्ट्रगान भी उनकी ही रचना है. यही नहीं, श्रीलंका का राष्ट्रगान भी जिस आनंद समरकून ने लिखा, वे टैगोर के शिष्य थे- उन्होंने विश्व भारती से पढ़ाई की थी. कई लोगों का मानना है कि जिस गीत को श्रीलंका का राष्ट्रगान बनाया गया है, उसका संगीत टैगोर ने ही तैयार किया था.
  • अक्षय कुमार भारतीय नागरिक नहीं हैं. यह बात मुंबई में वोटिंग के दौरान सामने आई. कई सितारों ने वोट दिए. उनकी पत्नी ट्विंकल ने भी वोट डाला. लेकिन इस सूची में अक्षय कुमार नहीं थे, क्योंकि उन्होंने कनाडा की नागरिकता ले रखी है. लेकिन क्या नागरिकता न होने से अक्षय कुछ कम भारतीय हो जाते हैं...? इत्तफाक से पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने लगातार ऐसी फिल्में कीं, जिनका वास्ता देशभक्ति से है. बल्कि कुछ अतिरिक्त राजभक्ति दिखाते हुए उन्होंने बिल्कुल सरकारी कार्यक्रमों को बढ़ावा देने वाली 'टॉयलेट - एक प्रेम कथा' और 'पैडमैन' जैसी फिल्में भी कीं. और तो और, ऐन चुनावों के बीच उन्होंने प्रधानमंत्री का इंटरव्यू किया और देसी चुटकुले भी साझा किए.
  • बेगूसराय भी कहीं बनारस साबित न हो, यह डर बिल्कुल निराधार नहीं है. भारत में चुनाव बेशक किसी जश्न से कम नहीं, लेकिन उनको लड़ा किसी जंग की तरह ही जाता है.
  • जैसे-जैसे हम किताबों से दूर होते जा रहे हैं, किताबों को लेकर हम ज्यादा प्रेम जताने लगे हैं. जो लोग कहते हैं कि उन्हें किताबें पढ़ना अच्छा लगता है, उनमें वाकई दस फ़ीसदी लोग ही वाकई नियमित तौर पर किताबें पढ़ते हैं. बाकी किताबों के बारे में पढ़ लेते हैं.
  • मार्च खत्म होते-होते मौत ने जैसे अपने बही खाते का आखिरी हिसाब वसूल लिया- हिंदी की जानी-मानी लेखक, संपादक और संचयनकर्ता रमणिका गुप्ता को अपने साथ ले गई. पीछे छूट गए हमारी तरह के पेशेवर श्रद्धांजलि लेखक- यह बताने के लिए कि इस साल अर्चना वर्मा, कृष्णा सोबती और नामवर सिंह के बाद हिंदी के साहित्याकाश को हुई चौथी क्षति है और यह जोड़ने के लिए कि 89 को छूती उम्र में रमणिका गुप्ता का निधन शोक का नहीं, एक जीवन की संपूर्णता को महसूस करने का विषय है.
  • हिंदी की आलोचना परंपरा में जो चीज़ नामवर सिंह को विशिष्ट और अद्वितीय बनाती है, वह उनकी सर्वसुलभ सार्वजनिकता है. वे किन्हीं अध्ययन कक्षों में बंद और पुस्तकों में मगन अध्येता और विद्वान नहीं थे, वे सार्वजनिक विमर्श के हर औजार का जैसे इस्तेमाल करते थे. उन्होंने किताबें लिखीं, अख़बारों और पत्रिकाओं में लेख लिखे और साहित्यिक पत्रिकाओं का संपादन किया.
  • इस गारंटी का बैंक चार्ज कई मिलियन यूरो का होता. दसॉ के मुताबिक बैंक दर 1.25 फ़ीसदी सालाना होती जबकि भारतीय बातचीत टीम के मुताबिक यह .38% पड़ती. यही नहीं, 2007 में परफॉर्मेंस गारंटी और वारंटी का भी प्रावधान था जिसके मुताबिक कंपनी को कुल करार की क़ीमत की  10 फ़ीसदी गारंटी देनी पड़ती. यह गारंटी सारी आपूर्ति होने तक चलती जिसका कुल समय करीब 5.5 साल होता. जब ये गारंटियां नहीं रहीं तो इस बचत का फायदा किसको मिला? सीएजी की रिपोर्ट नोट करती है कि इसका फायदा दसॉ ने उठा लिया, मंत्रालय को नहीं दिया.
  • इस बात को बहुत साफ़ ढंग से कहा जाना चाहिए कि राजनीति में शालीनता का न्यूनतम निर्वाह ज़रूरी है. सिर्फ़ शराफ़त के तक़ाज़े से नहीं- हालांकि यह तक़ाज़ा भी ज़रूरी है- रणनीति के लिहाज से भी. क्योंकि जब आप किसी के लिए अवज्ञा भरे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं तो उससे पहले आपके बारे में राय ख़राब होती है.
  • जिस समय लोकसभा में राष्ट्रपति के भाषण पर चर्चा का जवाब देते समय अपनी पीठ ठोकते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिना नाम लिए सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता पंक्तियां दुहरा रहे थे- कि मैं सूरज को डूबने नहीं दूंगा, लगभग उसी समय झूंसी में यूपी सरकार की पुलिस एक कवि अंशु मालवीय को अपहर्ताओं की तरह एक कार्यक्रम के बीच से उठा कर गाड़ी में डाल कर कहीं ले जा रही थी.
  • वह एक जुगुप्सा पैदा करने वाला दृश्य है. इसलिए नहीं कि इसमें गांधी को गोली मारने का अभिनय किया जा रहा है, बल्कि इसलिए कि यह इतनी कल्पनाशून्यता के साथ किया जा रहा है कि इसमें कहीं कोई विचार नहीं दिखता- गांधी को मारने का विचार तक नहीं. यह एक फूहड़ तमाशा है जिसके कुछ गिने-चुने तमाशबीन हैं.
  • लेकिन भारत में पढ़ाई-लिखाई छोड़ कर, विचार-विमर्श भूल कर, वे गिरफ़्तारी से बचने की कोशिश में लगे हुए हैं. पहले उनके ख़िलाफ़ हिंसा भड़काने का मामला दर्ज किया गया, फिर उनके माओवादी लिंक खोजे गए, सीधे प्रधानमंत्री की हत्या की साज़िश से उन्हें जोड़ दिया गया, अदालत ने राहत दी तो पुलिस ने इसकी परवाह नहीं की, उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया. हाइकोर्ट की फटकार पर छोड़ा गया.
  • चिटफंड घोटाले इस देश में नए नहीं हैं. यह बात भी नई नहीं है कि किसी भी दूसरे उद्योग-धंधे के मुकाबले चिटफंड कंपनियों के मालिक राजनीतिक दलों के ज़्यादा क़रीब देखे गए हैं. यही नहीं, ये चिटफंड कंपनियां मीडिया में भी हाथ आज़माती रही हैं. पिछले दो-तीन दशकों में कई चिटफंड कंपनियां शुरू और बंद हुईं और उनके साथ बहुत से गरीबों और मध्यमवर्गीय लोगों की मेहनत की कमाई भी लुट गई.
  • यह कई बार सोचा है कि मुक्तिबोध पर लिखते हुए यह नहीं लिखूंगा कि उनकी कविता 'अंधेरे में' में आधी रात को डोमाजी उस्ताद के नेतृत्व में चल रहा विराट जुलूस हमारे आज के यथार्थ का प्रतीक है. यह बात इतनी बार कही जा चुकी है कि इसे दुहराना व्यर्थ लगता है. लेकिन डोमाजी उस्ताद हर तरफ़ हैं और हर बार उकसाते हैं कि उनके बारे में कुछ कहा जाए.
  • भारत में साठ का दशक आज़ादी के बाद के पहले मोहभंग का दशक भी था. आज़ादी के दौर में देखे गए सपने थकने से लगे थे. आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाली पीढ़ी विदा हो चुकी थी और उसकी कमाई खाने वाले लोग हर तरफ़ उभर रहे थे, चीन युद्ध के बाद की हताशा और नेहरू के निधन से पैदा शून्य के बीच भारतीय राजनीति ख़ुद को पुनर्परिभाषित और पुनर्व्याख्यायित करने की चुनौती से गुज़र रही थी.
  • वे अपनी नायिकाओं की तरह दिलेर थीं. उनकी नायिकाएं जिस हाल में हों, कभी 'पीड़ित' या 'शिकार' होने की कुंठा उनके भीतर नहीं दिखती. जीवन उनके लिए अपनी ज़िद पर अमल का नाम है. वे बेख़ौफ़, बेधड़क, रूढ़ियों की परवाह न करने वाली औरतें हैं जो यथास्थिति को बार-बार चुनौती देती हैं, जीवन को उसकी दी हुई शर्तों पर मंज़ूर नहीं करतीं, उसे अपने ढंग से बदलने का जतन करती हैं.
  • सवाल है, क्या यह पत्ता तुरूप का पत्ता साबित होगा? मुट्ठी जब तक बंद होती है तो वह लाख की मानी जाती है, खुलती है तो समझ में आता है कि जादू की इस पुड़िया में जादू नहीं रेत है. कांग्रेस के इस फ़ैसले के दो तात्कालिक असर तो देखने को मिलने लगे हैं. बीजेपी ने पहला हमला प्रियंका पर नहीं, राहुल गांधी पर किया है. वह प्रियंका के आगमन को राहुल की नाकामी बता रही है. अब तक उसने प्रियंका पर हमला नहीं किया है, लेकिन जल्द ही यह हमला शुरू होगा जिसके एक सिरे पर वंशवादी राजनीति को बढ़ावा देने का आरोप होगा और दूसरे सिरे पर वाड्रा से जुड़े मामलों को लेकर भ्रष्टाचार की तोहमत मढ़ी जाएगी.
  • इसमें शक नहीं कि बीजेपी के ख़िलाफ़ यूपी से बिहार और बंगाल तक जो महागठबंधन तैयार करने की बात हो रही है, उसके बहुत सारे संकट हैं. अलग-अलग राज्यों में सीटों के बंटवारे की चुनौती है, एक-दूसरे के साथ हितों के टकराव हैं, अतीत के अविश्वास हैं, और सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस गठबंधन का नेतृत्व कौन करेगा.
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