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प्रियदर्शन

एनडीटीवी इंडिया में 15 वर्षों से कार्यरत. उपन्यास 'ज़िंदगी लाइव', कहानी संग्रह 'बारिश, धुआं और दोस्त' और 'उसके हिस्से का जादू', कविता संग्रह 'नष्ट कुछ भी नहीं होता' सहित नौ किताबें प्रकाशित. कविता संग्रह मराठी में और उपन्यास अंग्रेज़ी में अनूदित. सलमान रुश्दी और अरुंधती रॉय की कृतियों सहित सात किताबों का अनुवाद और तीन किताबों का संपादन. विविध राजनैतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों पर तीन दशक से नियमित विविधतापूर्ण लेखन और हिंदी की सभी महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन.

  • अगर कश्मीर में ज़मीन खरीदने और कश्मीरी लड़कियों से शादी करने का बाक़ी भारतीयों का उत्साह कुछ कम हुआ हो तो उन्हें अब इस पर भी सोचना चाहिए कि अनुच्छेद 370 को बेमानी बनाए जाने के क़रीब तीन महीने बाद कश्मीर के हालात क्या हैं?
  • श्यौराज सिंह बेचैन की आत्मकथा का नाम है- 'मेरा बचपन मेरे कंधों पर.' यह आत्मकथा बताती है कि एक दलित बचपन कैसा होता है. बचपन बीत गया, लेकिन अपनी दलित पहचान का सलीब अब भी अपने कंधों पर लेकर घूमने को मजबूर हैं श्यौराज सिंह बेचैन. वे दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में पढ़ाते हैं. वरिष्ठता क्रम में बीते महीने की तेरह तारीख़ को उनको विभागाध्यक्ष बनाया जाना था. बताया जाता है कि बारह तारीख़ को विश्वविद्यालय ने उनसे दस्तावेज़ लिए, उनके नाम पर लगभग मुहर लगा दी.
  • बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने हिंदी को लेकर अचानक जो विवाद पैदा किया, क्या उसकी कोई ज़रूरत थी? क्या बीजेपी के पास वाकई कोई भाषा नीति है जिसके तहत वह हिंदी को बढ़ावा देना चाहती है? या वह हिंदू-हिंदी हिंदुस्तान के पुराने जनसंघी नारे को अपनी वैचारिक विरासत की तरह फिर से आगे बढ़ा रही है?
  • पिछले कुछ दिनों में भारत में जो 'न्यू नॉर्मल' बनाया गया है, उसका असर बहुत सारी चीज़ों पर पड़ा है. ऐसे में यह ज़रूरी है कि ख़तरनाक चीज़ों की एक सूची बनाई जाए जिनसे हम सब बच सकें. इस सूची में सबसे ताज़ा प्रविष्टि दुनिया के महानतम उपन्यासों में गिने जाने वाले लियो टॉल्स्टॉय के 'वार एंड पीस' की है. इस उपन्यास को महाराष्ट्र पुलिस ने ख़तरनाक माना है. इसे भीमा कोरेगांव केस में गिरफ़्तार किए गए सामाजिक कार्यकर्ता वर्नेन गोंजाल्वेस के ख़िलाफ़ सबूत के तौर पर पेश किया गया है. आदरणीय बॉम्बे हाइकोर्ट ने भी गोंजाल्वेस से पूछा कि वे ऐसी किताब क्यों पढ़ते हैं जो किसी दूसरे देश के युद्ध के बारे में है.
  • सुषमा स्वराज इस देश के लाखों- बल्कि करोड़ों- लोगों की प्रिय नेता रहीं. वे शायद हाल के वर्षों की सबसे अच्छी वक्ता भी थीं. उनकी वक्तृता शैली अपनी सहजता और शुद्धता में वाजपेयी की ठहराव भरी नाटकीयता को मात करती थी और उसमें नरेंद्र मोदी की शैली वाली सत्ता की हनक नहीं थी. वे सरल और सहज थीं- हालांकि सरलता और सहजता की भी अपनी जटिलताएं और वक्रताएं होती हैं- इस बात को बहुत सारे दूसरे लोगों की तरह वो प्रमाणित करती थीं.
  • जम्मू-कश्मीर से जुड़े केंद्र सरकार के ताज़ा फ़ैसलों पर सोशल मीडिया की प्रतिक्रिया देखिए तो लगेगा कि हिंदुस्तान ने जैसे जम्मू-कश्मीर पर कोई जीत हासिल की है. खुशी का ऐसा माहौल है जैसा क्रिकेट में पाकिस्तान को हराने पर होता है. बाकायदा गंभीर समझे जाने वाले लेखक भी जैसे ललकार कर कह रहे हैं कि लो हटा दी गईं विवादास्पद धाराएं, अब कुछ कह कर दिखाओ.
  • न्यूजीलैंड के खिलाफ सेमीफाइनल मुकाबले में महेंद्र सिंह धोनी जिस तरह रन आउट हुए, उसका रिप्ले फिर से देखिए. देखिए कि गुप्तिल ने कहां जाकर गेंद पकड़ी और कैसे उसे थ्रो किया. दरअसल यह गुप्तिल की किस्मत रही कि उनका थ्रो सीधे स्टंप में लगा और धोनी रन आउट हो गए. खुद गुप्तिल ने ही अगले दिन यह बात भी मानी. धोनी की जगह कोई और खिलाड़ी होता तो भी वह इस थ्रो पर रन आउट हो गया होता. धोनी दरअसल एक रन को दो रन में बदल रहे थे. यह काम वे पहले भी करते रहे हैं. जो महान खिलाड़ी उन पर धीमे होने का इल्ज़ाम लगा रहे हैं, वे शायद अपने पूरे करिअर में उतने तेज़ नहीं रहे जितने धोनी उस दिन थे.
  • हेग के अंतरराष्ट्रीय न्यायालय से आए फ़ैसले के बाद भारत में जीत और जश्न का जो माहौल है, उसमें यह बात जैसे छुपी रह जा रही है कि कुलभूषण जाधव की बस फांसी टली है, उन पर संकट नहीं टला है. क्योंकि हेग से आए फ़ैसले ने बेशक भारत के बहुत सारे आरोपों को सही पाया है लेकिन बहुत सारी दूसरी मांगें ठुकरा भी दी हैं. भारत की मांग थी कि कुलभूषण जाधव को भारत भेजा जाए और उन पर कोर्ट मार्शल के तहत सुनाए गए फ़ैसले को अवैध करार दिया जाए.
  • विश्व कप के कुछ मैचों में दूसरों की उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन न कर पाने की वजह से जो लोग महेंद्र सिंह धोनी को रिटायर होने की सलाह दे रहे हैं, उन्हें कुछ बातें याद दिलाना ज़रूरी है. 2005 के बाद से लगातार सचिन तेंदुलकर को सलाह दी जाती रही कि वे रिटायर हो जाएं. 2007 के विश्व कप के बाद सचिन ने लगभग तय कर लिया था कि अब वे नहीं खेलेंगे. उन तीन मैचों में वे बस 60-70 रन बना पाए थे. लेकिन तब विवियन रिचर्ड्स ने उन्हें कहा कि वे खेलते रहें, किसी की सुनने की जरूरत नहीं है. सचिन ने यह बात मानी- वनडे और टेस्ट क्रिकेट को मिलाकर सौ शतक पूरे किए, 2011 का वर्ल्ड कप टीम के साथ उठाया और अंततः एक अविश्वसनीय क्रिकेट करिअर पूरा कर बल्ला रखा.
  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा का जवाब देते हुए राज्यसभा में जो भाषण दिया, वह अब राज्यसभा के रिकॉर्ड का हिस्सा हो चुका है. इस रिकॉर्ड में प्रधानमंत्री के सौजन्य से ग़ालिब के नाम एक ऐसा शेर दर्ज है जो ग़ालिब का नहीं है. दरअसल यह क़ायदे से शेर भी नहीं है. शेर का अपना एक अनुशासन होता है जिससे शायरी की दुनिया से सामान्य परिचय रखने वाले लोग भी मोटे तौर पर परिचित होते हैं.
  • इस तरह देखें, तो तबरेज़ की हत्या एक राजनीतिक विचारधारा के तहत की गई हत्या है. यह राजनीतिक विचारधारा भीड़ को एक तरह की वैधता और मान्यता देती है. इस राजनीतिक विचारधारा को एक शक्तिशाली भारत का ख़याल बहुत लुभाता है. 'मोदी है, तो मुमकिन है' जैसा नारा ताक़त के इसी ख़याल से पैदा होता है
  • उत्तर प्रदेश की योगी सरकार छात्रों को देशभक्त बनाने के लिए एक अध्यादेश लेकर आई है. उत्तर प्रदेश निजी विश्वविद्यालय अध्यादेश नाम के इस कानून के मुताबिक विश्वविद्यालयों में अगर राष्ट्र विरोधी गतिविधियां हुईं तो उन पर कार्रवाई हो सकती है, उनकी मान्यता भी खतरे में पड़ सकती है.
  • लोकसभा में असदुद्दीन ओवैसी जब शपथ लेने के लिए आए, तो BJP सांसदों ने 'वन्दे मातरम्' और 'भारत माता की जय'के नारे लगाने शुरू कर दिए. असदुद्दीन ओवैसी हमेशा की तरह ज़्यादा समझदार निकले और उन्होंने हाथ से इशारा किया कि और ऊंची आवाज़ में यह नारे लगाए जाएं.
  • गिरीश कर्नाड की कुछ अंतिम मार्मिक छवियां उन प्रतिरोध सभाओं से बनती हैं, जहां वह कभी 'मैं भी अर्बन नक्सल' और कभी 'नॉट इन माई नेम' की तख़्ती लगाकर पहुंचे दिखाई पड़ते थे. 80 साल की उम्र में अपनी लगातार बड़ी होती शारीरिक व्याधियों के बीच वह अगर इन सभाओं में लंबी दूरी तय कर पहुंचते थे, तो इसलिए नहीं कि उनमें किसी तात्कालिक राजनीतिक प्रतिरोध का शौक या जुनून था, बल्कि इसलिए कि वह जिस बहुलता, विविधता और स्वतंत्रता को भारतीय चेतना का मूल्य मानते रहे, उस पर बढ़ रहे खतरे का उन्हें गंभीरता से एहसास था.
  • यह सच है कि 2014 और 2019 के आम चुनाव में राहुल गांधी और कांग्रेस बुरी तरह पराजित हुए हैं. नरेंद्र मोदी और BJP की ऐतिहासिक जीत के आईने में यह हार कुछ और बड़ी और दुखी करने वाली लगती है. लेकिन अतीत में देखें तो ऐसे इकतरफ़ा परिणाम और अनुमान कांग्रेस और BJP दोनों के हक़ में आते रहे हैं और दोनों को हंसाते-रुलाते रहे हैं. 1984 में जब राजीव गांधी को 400 से ज्यादा सीटें मिली थीं और अटल-आडवाणी को महज 2, तब भी कुछ लोगों को लगा था कि अब तो BJP का सफ़ाया हो गया. लेकिन 1989 आते-आते BJP वीपी सिंह की सत्ता का एक पाया बनी हुई थी.
  • योगेंद्र यादव के ट्वीट को लेकर हंगामा हो रहा है, लेकिन उसे ध्यान से देखने की ज़रूरत है. उन्होंने लिखा है, 'कांग्रेस को ख़त्म हो जाना चाहिए. अगर वो भारत के विचार की रक्षा के लिए बीजेपी को इन चुनावों में रोक पाने में नाकाम रही तो इस पार्टी के लिए भारतीय इतिहास में कोई सकारात्मक भूमिका नहीं है. आज किसी विकल्प के निर्माण में ये सबसे बड़ी बाधा की प्रतिनिधि है.'
  • 'टाइम्स ऑफ इंडिया' का संपादक रहते हुए कभी दिलीप पडगांवकर ने कहा था कि देश का सबसे ताकतवर आदमी इस देश का प्रधानमंत्री है और दूसरा सबसे ताकतवर आदमी 'टाइम्स ऑफ इंडिया' का संपादक है.तब भी इस वक्तव्य की बहुत आलोचना हुई थी.किसी अच्छे पत्रकार को ताकत के मोह में नहीं पड़ना चाहिए.यह मोह सबसे पहले उसकी पत्रकारिता का क्षरण करता है.लेकिन पत्रकारिता जब अपना काम कर रही होती है तब वह जिस नैतिक आभा से भरी होती है, उसकी ताकत के आगे भी सब सिर झुकाते हैं.
  • प्रज्ञा ठाकुर को भले पार्टी के दबाव में माफ़ी मांगनी पड़ी, लेकिन उनकी यह बात सौ फ़ीसदी सही है कि एक ख़ास विचारधारा के तहत गोडसे देशभक्त था- उसकी नज़र में देश की जो परिभाषा थी, उससे वह पूजा करता था. उसकी गांधी जी से कोई निजी दुश्मनी नहीं थी. उसको आरएसएस या हिंदू महासभा ने जो कुछ सिखाया, उस पर उसने पूरी तरह अमल किया. संकट यह है कि आज जो आरएसएस या उससे जुड़े संगठन हैं, उनको अपनी वैचारिकता का भरोसा ही नहीं, इसलिए वे गोडसे की तरह गांधी को सामने से गोली नहीं मारते, पीछे-पीछे उनका वध करते हैं.
  • जब हर तरफ़ राष्ट्रवाद का शोर है, राष्ट्रगान गाने पर ज़ोर है, तब रवींद्रनाथ टैगोर को याद करने का एक ख़ास मतलब है. टैगोर संभवतः दुनिया के अकेले कवि हैं जिनकी रचनाओं को दो-दो देशों ने अपने राष्ट्रगान की तरह अपनाया. भारत के अलावा बांग्लादेश का राष्ट्रगान भी उनकी ही रचना है. यही नहीं, श्रीलंका का राष्ट्रगान भी जिस आनंद समरकून ने लिखा, वे टैगोर के शिष्य थे- उन्होंने विश्व भारती से पढ़ाई की थी. कई लोगों का मानना है कि जिस गीत को श्रीलंका का राष्ट्रगान बनाया गया है, उसका संगीत टैगोर ने ही तैयार किया था.
  • अक्षय कुमार भारतीय नागरिक नहीं हैं. यह बात मुंबई में वोटिंग के दौरान सामने आई. कई सितारों ने वोट दिए. उनकी पत्नी ट्विंकल ने भी वोट डाला. लेकिन इस सूची में अक्षय कुमार नहीं थे, क्योंकि उन्होंने कनाडा की नागरिकता ले रखी है. लेकिन क्या नागरिकता न होने से अक्षय कुछ कम भारतीय हो जाते हैं...? इत्तफाक से पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने लगातार ऐसी फिल्में कीं, जिनका वास्ता देशभक्ति से है. बल्कि कुछ अतिरिक्त राजभक्ति दिखाते हुए उन्होंने बिल्कुल सरकारी कार्यक्रमों को बढ़ावा देने वाली 'टॉयलेट - एक प्रेम कथा' और 'पैडमैन' जैसी फिल्में भी कीं. और तो और, ऐन चुनावों के बीच उन्होंने प्रधानमंत्री का इंटरव्यू किया और देसी चुटकुले भी साझा किए.
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