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प्रियदर्शन

एनडीटीवी इंडिया में 15 वर्षों से कार्यरत. उपन्यास 'ज़िंदगी लाइव', कहानी संग्रह 'बारिश, धुआं और दोस्त' और 'उसके हिस्से का जादू', कविता संग्रह 'नष्ट कुछ भी नहीं होता' सहित नौ किताबें प्रकाशित. कविता संग्रह मराठी में और उपन्यास अंग्रेज़ी में अनूदित. सलमान रुश्दी और अरुंधती रॉय की कृतियों सहित सात किताबों का अनुवाद और तीन किताबों का संपादन. विविध राजनैतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों पर तीन दशक से नियमित विविधतापूर्ण लेखन और हिंदी की सभी महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन.

  • आज नीतीश कुमार मीडिया से चिढ़े हुए हैं. वे मीडिया से पूछ रहे हैं कि वह किसकी तरफ़ है. यह दरअसल इस बात की शिकायत है कि वह उनकी तरफ़ क्यों नहीं है.
  • मान लें, राष्ट्रपति को अपनी आस्थाएं प्रिय हैं. लेकिन वे ऐसी स्थिति में गोपनीय दान भी कर सकते थे. उनकी आस्था भी अखंडित रहती और उनके पद की मर्यादा भी बची रह जाती. क्या उन्हें संदेह था कि उनका गोपनीय दान ईश्वर या राम के लिए गोपनीय रह जाएगा? ईश्वर अगर सब कुछ देखता है तो उनका यह दान भी देख लेता. लेकिन यह तब होता जब राष्ट्रपति सिर्फ़ राम को दिखाना चाहते. वे निश्चय ही चाहते रहे होंगे कि देश देखे कि उन्होंने राम मंदिर के लिए पांच लाख का चंदा दिया है.
  • शुक्र है कि डोनाल्ड ट्रंप को समय रहते यह बात समझ में आ गई कि राष्ट्रपति बने रहने की ज़िद में वे अपनी ही नहीं, अमेरिका की भी जगहंसाई कर रहे हैं. बुधवार को उनके समर्थकों ने कैपिटोल हिल के भीतर जिस तरह का हंगामा किया, वह अमेरिकी लोगों के लिए अकल्पनीय था.
  • पाकिस्तान के ख़ैबर पख़्तूनवा में एक ऐतिहासिक हिंदू मंदिर तोड़े जाने की ख़बर सुर्खियों में रही. इसे भारत में सोशल मीडिया पर खूब शेयर किया गया. अख़बारों और टीवी चैनलों पर भी यह ख़बर ख़ूब चली. इसे इस बात के प्रमाण की तरह पेश किया गया कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हिंदुओं की स्थिति कितनी बुरी है. वहां जबरन धर्मांतरण कराए जाने की लगातार आ रही ख़बरें इस स्थिति के दूसरे प्रमाण की तरह गिनाई जाती हैं.
  • इस पूरे साल दुनिया एक वायरस से त्रस्त रही. इसकी वजह से सबको घरों के भीतर बंद होना पड़ा. इसकी वजह से उद्योग-धंधे चौपट हुए, लोगों की नौकरियां छूटीं, रोज़गार गया और करोड़ों लोगों के सामने भूखो मरने जैसे हालात आ गए. इस वायरस की वजह से दुनिया भर में आधिकारिक तौर पर 18 लाख लोग मर गए जिनमें से शायद ज्यादातर के हिस्से ज़िंदगी के कई बरस बाक़ी थे. लेकिन इसी वायरस ने कई लोगों को कुछ और अमीर बना दिया.
  • कम लोगों को एहसास होगा कि शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी का इंतक़ाल हिंदुस्तानी तहज़ीब और अदबी रिवायत के लिए कितना बड़ा नुक़सान है. 2020 के इस मनहूस बरस में मौत के साये जैसे दस्ताने पहन कर घूम रहे हैं, और वे चुन-चुन कर उन लोगों को ले जा रहे हैं जिन्होंने हमारे समय को ही मायने नहीं दिए, हमारे माज़ी को भी हमारे लिए बचाए रखा.
  • बिशन सिंह बेदी का कहना है कि अगर दिल्ली के फ़िरोज़शाह कोटला स्टेडियम में अरुण जेटली की प्रतिमा लगाई जा रही है, तो उनके नाम का स्टैंड हटा दिया जाए.
  • भाषा या कविता के इस व्यर्थता-बोध के बावजूद यह एहसास जाता नहीं कि अंततः रास्ता कोई और नहीं है. मंगलेश डबराल कविता न लिखते तो क्या करते? विकट और विराट ईश्वरों और दरिंदों के मुक़ाबले वे अपनी मनुष्यता का संधान न करते तो क्या करते. अन्याय को पहचानने का सयानापन कई जगह से मिल सकता है, लेकिन अन्याय से आंख मिलाने का साहस और अन्याय न करने का मनुष्योचित विवेक अगर सबसे ज़्यादा कहीं से मिल सकता है तो वह कविता है.
  • पाकिस्तान के कैबिनेट मंत्री फ़वाद चौधरी ने अपनी संसद में कह दिया है कि पुलवामा हमले के पीछे पाकिस्तान का हाथ था. भारत में आतंकवाद को बढ़ावा देने और उसमें सक्रिय हिस्सेदारी निभाने का आरोप पाकिस्तान पर पुराना है और गाहे-ब-गाहे उसके सबूत भी मिलते रहते हैं. मगर पहली बार संसद में किसी मंत्री का यह बयान एक अलग अहमियत रखता है.
  • बिहार में पटना की रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मगही बोलने की कोशिश करते नज़र आए. बिहार की तीन प्रमुख भाषाओं में मगही कुछ लटपटाई हुई सी भाषा है. उसमें न भोजपुरी वाली अक्खड़ता है और न मैथिली वाला माधुर्य, बल्कि इसकी जगह एक घरेलूपन है जिसमें प्रेम और क्रोध दोनों एक सीमा के भीतर ही प्रगट होते हैं.
  • नीतीश कुमार को हम क़सूरवार क्यों मानें? दरअसल हमारी राजनीति ही नहीं, हमारे समूचे सार्वजनिक विमर्श की भाषा बहुत सपाट और निरर्थक हो चुकी है. इस विमर्श में शब्द अपने अर्थ जैसे खो चुके हैं. वे तभी चुभते या तंग करते हैं जब वे बहुत अश्लील या फूहड़ ढंग से इस्तेमाल किए जाते हैं.या तब भी वे चुभते नहीं हैं, बस हमारे राजनीतिक इस्तेमाल के लायक हो जाते हैं. हम अपना पक्ष देखकर उनका विरोध या बचाव करते हैं.
  • एक बड़ी अंतर्दृष्टि से भरी किताब है- 'टॉकिंग टु माई डॉटर: अ ब्रीफ़ हिस्ट्री ऑफ़ कैपिटलिज़्म.' इसके लेखक हैं यानिस वारौफ़किस, जो यूनान के संकट में वित्त मंत्री भी बने. अर्थशास्त्री और दार्शनिक के रूप में उनकी ख्याति रही है. वे अर्थशास्त्र के इस ज़िक्र में साहित्य और सिनेमा भी लाते हैं. किताब उन्होंने अपनी पंद्रह साल की बिटिया को संबोधित करते हुए लिखी है- तो बहुत सरल भाषा में है.
  • 2015 के विधानसभा चुनावों में भाकपा माले ने लगभग अकेले दम पर तीन सीटें जीती थीं- बलरामपुर, दरौली और तरारी. बेशक, तरारी वाली सीट वह बहुत कम अंतर से जीत पाई थी- शायद मुश्किल से सवा दो सौ या ढाई सौ वोटों से. लेकिन भोजपुर क्षेत्र में उसकी वापसी का मज़बूती भरा इशारा भी थी. सुदामा प्रसाद को पूरे दो दशक बाद यह कामयाबी मिली थी. बेशक, तब वाम मोर्चे के नाम पर जुटे बहुत सारे दलों का गठबंधन उसके साथ था, लेकिन उन चुनावों में भाकपा-माकपा- किसी का खाता नहीं खुल पाया था. जाहिर है, माले की जीत उसकी अपनी थी.
  • पता नहीं, इस पूरे विवाद के बीच तनिष्क को कितना नुक़सान हुआ होगा, लेकिन एक समाज के रूप में हमारा नुक़सान ज़्यादा हुआ है. अपने-आप से हमारा यह पूछना बनता है कि हम कैसा समाज बना रहे हैं जिसमें कोई शख़्स या समूह एक सकारात्मक संदेश का इस्तेमाल करते हुए भी डरे? वह हर जगह हिसाब लगाता फिरे कि इससे कितने हिंदू नाराज़ होंगे या कितने मुसलमान? 
  • इन चुनावों में नित्यानंद राय या इसके पहले के चुनाव में गिरिराज सिंह के बयान इसकी ओर इशारा करते हैं. कभी मोदी विरोधियों को पाकिस्तान भेजने की ललकार और कभी आरजेडी की जीत पर कश्मीरी आतंकियों के पनाह लेने की चेतावनी बताती है कि बीजेपी जिस सामाजिक ध्रुवीकरण को अपना मुख्य राजनैतिक मूल्य बना चुकी है, उसे वह बिहार पर भी लागू करेगी.
  • नीतीश कुमार अकेले मुख्यमंत्री नहीं हैं जिन्होंने 15 साल लगातार शासन किया. दिल्ली आने से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तीन बार चुने जा चुके थे और लगभग 13 साल पूरे कर चुके थे. दिल्ली में शीला दीक्षित ने 15 साल पूरे किए, उसके बाद चुनाव हारीं. ओडिशा में नवीन पटनायक भी उनसे लंबे समय से सरकार चला रहे हैं.
  • इन दिनों सोशल मीडिया पर बहुत ज़ोर-शोर से मुसलमानों के आर्थिक बहिष्कार की मुहिम चलाई जा रही है. वैसे यह कोई नई सूझ नहीं है. हिंदुत्व ब्रिगेड के उत्साही विचारक-प्रचारक पहले भी यह बात कहते रहे हैं, बल्कि चोरी-छुपे इस पर अमल करने की कोशिश भी करते रहे हैं. किराये पर मकान देने में, नौकरी देने में और यहां तक कि कभी-कभी कुछ ख़रीदने बेचने में वह इस बात का ध्यान रखते हैं कि सामने वाला मुसलमान, अछूत या पिछड़ी जाति का तो नहीं है?
  • दिल्ली और देश में जो कुछ हो रहा है, उसके लिए न भारतीय जनता पार्टी को कोसें और न ही संघ परिवार को. ये सब अपने लक्ष्यों को लेकर बहुत ईमानदार संगठन हैं- लक्ष्य तक पहुंचने के लिए चाहे जितनी बेईमानी कर लें. एक समुदाय के प्रति अपने भाव इन्होंने कभी नहीं छुपाए और यह इरादा भी कभी नहीं छुपाया कि सत्ता में आने के बाद वे इस देश के बहुसंख्यकवाद को नई ताक़त देंगे. धारा 370 हटाने की बात हो, राम मंदिर निर्माण की बात हो, तीन तलाक़ की बात हो, एनआरसी की बात हो- सब बीजेपी के घोषणापत्र में पहले से दर्ज है. बल्कि कई बार इस आधार पर उनकी खिल्ली उड़ाई गई कि वे सत्ता में आने के बाद अपना एजेंडा भूल जा रहे हैं. अब वे अपना घोषित एजेंडा पूरा कर रहे हैं तो इस पर आप दुखी हो सकते हैं, हैरान नहीं.
  • यह सच है कि दिल्ली के नागरिकों ने ध्रुवीकरण की राजनीति को नकार दिया है. लेकिन यह इतना सपाट मामला नहीं है. नागरिकों के फ़ैसले के पीछे और भी वजहें हो सकती हैं. आम आदमी पार्टी का दावा है कि उसके काम की वजह से उसे वोट मिले. बहुत दूर तक यह बात सही लगती है. मुफ्त बिजली-पानी, महिलाओं के लिए मुफ़्त यात्रा और स्कूलों और मोहल्ला क्लीनिकों की सुविधा इस महानगर के ग़रीब और निम्नमध्यवर्गीय लोगों के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं रही. हालांकि सांप्रदायिकता ऐसी अंधी होती है कि उसे कई बार कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता है.
  • प्रधानमंत्री की आलोचना इस देश की आलोचना है, सरकार के ख़िलाफ़ कुछ कहना या करना देश के ख़िलाफ़ कुछ करना और कहना है. बाक़ी ज़रूरी सवालों पर जो सरलीकृत राय है- मसलन, तीन तलाक का ख़ात्मा बिल्कुल उचित है, पाकिस्तान में सताए जा रहे हिंदू भारत न आएं तो कहां जाएं, कश्मीर में धारा 370 तो ख़त्म होनी ही चाहिए थी, मुसलमानों को ज़्यादा बच्चे पैदा नहीं करने चाहिए, पाकिस्तान को नेस्तनाबूद कर देना चाहिए- वही इनकी भी राय है.
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