NDTV Khabar
होम | ब्लॉग |   प्रियदर्शन 

प्रियदर्शन

एनडीटीवी इंडिया में 15 वर्षों से कार्यरत. उपन्यास 'ज़िंदगी लाइव', कहानी संग्रह 'बारिश, धुआं और दोस्त' और 'उसके हिस्से का जादू', कविता संग्रह 'नष्ट कुछ भी नहीं होता' सहित नौ किताबें प्रकाशित. कविता संग्रह मराठी में और उपन्यास अंग्रेज़ी में अनूदित. सलमान रुश्दी और अरुंधती रॉय की कृतियों सहित सात किताबों का अनुवाद और तीन किताबों का संपादन. विविध राजनैतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों पर तीन दशक से नियमित विविधतापूर्ण लेखन और हिंदी की सभी महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन.

  • हिंदी की आलोचना परंपरा में जो चीज़ नामवर सिंह को विशिष्ट और अद्वितीय बनाती है, वह उनकी सर्वसुलभ सार्वजनिकता है. वे किन्हीं अध्ययन कक्षों में बंद और पुस्तकों में मगन अध्येता और विद्वान नहीं थे, वे सार्वजनिक विमर्श के हर औजार का जैसे इस्तेमाल करते थे. उन्होंने किताबें लिखीं, अख़बारों और पत्रिकाओं में लेख लिखे और साहित्यिक पत्रिकाओं का संपादन किया.
  • इस गारंटी का बैंक चार्ज कई मिलियन यूरो का होता. दसॉ के मुताबिक बैंक दर 1.25 फ़ीसदी सालाना होती जबकि भारतीय बातचीत टीम के मुताबिक यह .38% पड़ती. यही नहीं, 2007 में परफॉर्मेंस गारंटी और वारंटी का भी प्रावधान था जिसके मुताबिक कंपनी को कुल करार की क़ीमत की  10 फ़ीसदी गारंटी देनी पड़ती. यह गारंटी सारी आपूर्ति होने तक चलती जिसका कुल समय करीब 5.5 साल होता. जब ये गारंटियां नहीं रहीं तो इस बचत का फायदा किसको मिला? सीएजी की रिपोर्ट नोट करती है कि इसका फायदा दसॉ ने उठा लिया, मंत्रालय को नहीं दिया.
  • इस बात को बहुत साफ़ ढंग से कहा जाना चाहिए कि राजनीति में शालीनता का न्यूनतम निर्वाह ज़रूरी है. सिर्फ़ शराफ़त के तक़ाज़े से नहीं- हालांकि यह तक़ाज़ा भी ज़रूरी है- रणनीति के लिहाज से भी. क्योंकि जब आप किसी के लिए अवज्ञा भरे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं तो उससे पहले आपके बारे में राय ख़राब होती है.
  • जिस समय लोकसभा में राष्ट्रपति के भाषण पर चर्चा का जवाब देते समय अपनी पीठ ठोकते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिना नाम लिए सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता पंक्तियां दुहरा रहे थे- कि मैं सूरज को डूबने नहीं दूंगा, लगभग उसी समय झूंसी में यूपी सरकार की पुलिस एक कवि अंशु मालवीय को अपहर्ताओं की तरह एक कार्यक्रम के बीच से उठा कर गाड़ी में डाल कर कहीं ले जा रही थी.
  • वह एक जुगुप्सा पैदा करने वाला दृश्य है. इसलिए नहीं कि इसमें गांधी को गोली मारने का अभिनय किया जा रहा है, बल्कि इसलिए कि यह इतनी कल्पनाशून्यता के साथ किया जा रहा है कि इसमें कहीं कोई विचार नहीं दिखता- गांधी को मारने का विचार तक नहीं. यह एक फूहड़ तमाशा है जिसके कुछ गिने-चुने तमाशबीन हैं.
  • लेकिन भारत में पढ़ाई-लिखाई छोड़ कर, विचार-विमर्श भूल कर, वे गिरफ़्तारी से बचने की कोशिश में लगे हुए हैं. पहले उनके ख़िलाफ़ हिंसा भड़काने का मामला दर्ज किया गया, फिर उनके माओवादी लिंक खोजे गए, सीधे प्रधानमंत्री की हत्या की साज़िश से उन्हें जोड़ दिया गया, अदालत ने राहत दी तो पुलिस ने इसकी परवाह नहीं की, उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया. हाइकोर्ट की फटकार पर छोड़ा गया.
  • चिटफंड घोटाले इस देश में नए नहीं हैं. यह बात भी नई नहीं है कि किसी भी दूसरे उद्योग-धंधे के मुकाबले चिटफंड कंपनियों के मालिक राजनीतिक दलों के ज़्यादा क़रीब देखे गए हैं. यही नहीं, ये चिटफंड कंपनियां मीडिया में भी हाथ आज़माती रही हैं. पिछले दो-तीन दशकों में कई चिटफंड कंपनियां शुरू और बंद हुईं और उनके साथ बहुत से गरीबों और मध्यमवर्गीय लोगों की मेहनत की कमाई भी लुट गई.
  • यह कई बार सोचा है कि मुक्तिबोध पर लिखते हुए यह नहीं लिखूंगा कि उनकी कविता 'अंधेरे में' में आधी रात को डोमाजी उस्ताद के नेतृत्व में चल रहा विराट जुलूस हमारे आज के यथार्थ का प्रतीक है. यह बात इतनी बार कही जा चुकी है कि इसे दुहराना व्यर्थ लगता है. लेकिन डोमाजी उस्ताद हर तरफ़ हैं और हर बार उकसाते हैं कि उनके बारे में कुछ कहा जाए.
  • भारत में साठ का दशक आज़ादी के बाद के पहले मोहभंग का दशक भी था. आज़ादी के दौर में देखे गए सपने थकने से लगे थे. आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाली पीढ़ी विदा हो चुकी थी और उसकी कमाई खाने वाले लोग हर तरफ़ उभर रहे थे, चीन युद्ध के बाद की हताशा और नेहरू के निधन से पैदा शून्य के बीच भारतीय राजनीति ख़ुद को पुनर्परिभाषित और पुनर्व्याख्यायित करने की चुनौती से गुज़र रही थी.
  • वे अपनी नायिकाओं की तरह दिलेर थीं. उनकी नायिकाएं जिस हाल में हों, कभी 'पीड़ित' या 'शिकार' होने की कुंठा उनके भीतर नहीं दिखती. जीवन उनके लिए अपनी ज़िद पर अमल का नाम है. वे बेख़ौफ़, बेधड़क, रूढ़ियों की परवाह न करने वाली औरतें हैं जो यथास्थिति को बार-बार चुनौती देती हैं, जीवन को उसकी दी हुई शर्तों पर मंज़ूर नहीं करतीं, उसे अपने ढंग से बदलने का जतन करती हैं.
  • सवाल है, क्या यह पत्ता तुरूप का पत्ता साबित होगा? मुट्ठी जब तक बंद होती है तो वह लाख की मानी जाती है, खुलती है तो समझ में आता है कि जादू की इस पुड़िया में जादू नहीं रेत है. कांग्रेस के इस फ़ैसले के दो तात्कालिक असर तो देखने को मिलने लगे हैं. बीजेपी ने पहला हमला प्रियंका पर नहीं, राहुल गांधी पर किया है. वह प्रियंका के आगमन को राहुल की नाकामी बता रही है. अब तक उसने प्रियंका पर हमला नहीं किया है, लेकिन जल्द ही यह हमला शुरू होगा जिसके एक सिरे पर वंशवादी राजनीति को बढ़ावा देने का आरोप होगा और दूसरे सिरे पर वाड्रा से जुड़े मामलों को लेकर भ्रष्टाचार की तोहमत मढ़ी जाएगी.
  • इसमें शक नहीं कि बीजेपी के ख़िलाफ़ यूपी से बिहार और बंगाल तक जो महागठबंधन तैयार करने की बात हो रही है, उसके बहुत सारे संकट हैं. अलग-अलग राज्यों में सीटों के बंटवारे की चुनौती है, एक-दूसरे के साथ हितों के टकराव हैं, अतीत के अविश्वास हैं, और सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस गठबंधन का नेतृत्व कौन करेगा.
  • नामवर सिंह अस्पताल में हैं. 92 बरस की उम्र में उन्हें सिर पर चोट लगी है. अगर प्रार्थना जैसी कोई चीज़ होती है तो हिंदी के संसार को उनके लिए प्रार्थना करनी चाहिए. हमारी पीढ़ी का दुर्भाग्य है कि हमने उन्हें उनके उत्तरार्द्ध में देखा- उस उम्र में जब उनकी तेजस्विता का सूर्य ढलान पर था.
  • यह देखना दिलचस्प है कि जो लोग अब तक सामाजिक आधार पर आरक्षण को प्रतिभा के विलोम की तरह देखते रहे और इसे भारतीय व्यवस्था का नासूर मानते रहे, वे अपील कर रहे हैं कि गरीबों के हक की ख़ातिर यह आर्थिक आरक्षण मान लिया जाए - बिना यह बताए कि हर महीने 65,000 रुपये कमाने वाले लोग किस कसौटी से गरीब कहलाएंगे.
  • आरक्षण को लेकर BJP और कांग्रेस जैसी मूलतः अगड़े वर्चस्व वाली पार्टियां हमेशा दुविधा में रहीं. लेफ्ट फ्रंट को भी जातिगत आधार पर आरक्षण के सिद्धांत का समर्थन करने में वक्त लगा. संघ परिवार खुलेआम आरक्षण का विरोध करता रहा. 1990 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने पिछड़ी जातियों के आरक्षण के लिए मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने का ऐलान किया, तो देशभर में जो मंडल-विरोधी आंदोलन चल पड़ा, उसे इन राजनीतिक दलों की शह भी हासिल थी. मंडल की काट के लिए BJP ने कमंडल का दांव भी खेला.
  • अगर आप वह वीडियो देखेंगे और सुनेंगे, तो हैरान रह जाएंगे. नोएडा सेक्टर 58 के पार्क में पांच-छह दाढ़ी-टोपी वाले लोग गोल घेरे में बैठकर कुछ पैसा जुटा रहे हैं, कुछ चटाइयां बिछी हुई हैं, एक कर्कश आवाज़ उनसे लगभग बदतमीज़ी से जवाब तलब कर रही है - कहां से आए हो, यहां क्यों आए हो, किससे पूछकर यहां बैठ गए, पुलिस से परमिशन ली है, क्या गड़बड़ करना चाहते हो...?
  • आमिर खान के बाद देश के उपराष्ट्रपति रहे हामिद अंसारी को भी लोगों ने नहीं बख्शा. बार-बार उनके अलग-अलग व्यवहार को राष्ट्रविरोधी साबित करने की कोशिश हुई. वे सारी कोशिशें निराधार निकलीं. बाद में जब हामिद अंसारी बहुत शालीन लहजे में इस बढ़ती असहिष्णुता की ओर इशारा किया तो उन पर भी हमले शुरू हो गए.
  • 1984 की हिंसा और 2002 के दंगों में एक दुखद साम्य है. दोनों मामलों में राज्य के देखते-देखते हज़ारों लोग घरों से निकालकर सड़कों पर मार दिए गए, उन्हें ज़िंदा जलाया गया, महिलाओं से बलात्कार किया गया. 18 साल के अंतर पर हुए इन दो हत्याकांडों में इंसाफ को लगातार राजनीति ने स्थगित रखा. महज दो साल के राजनीतिक अनुभव पर प्रधानमंत्री बन गए राजीव गांधी ने तब यह हैरान करने वाला बयान दिया था - "एक बड़ा पेड़ गिरता है, तो धरती कुछ हिलती ही है..." यह वक्तव्य भले नादानी में दिया गया हो, लेकिन आने वाले दिनों में तमाम दंगाइयों को बड़ी निस्पृह क्रूरता के साथ बचाया गया, जिसका गुनाह कांग्रेस सरकार पर जाता है.
  • पांच राज्यों के चुनावी नतीजों के बाद राहुल गांधी ने जो वक्तव्य दिया, वह लगातार आक्रामक होती जा रही राजनीतिक संस्कृति में बहुत शिष्ट हस्तक्षेप कहा जा सकता है. अमूमन पिछली सरकारों की विफलताओं का ढोल बजाने की रिवायत छोड़कर उन्होंने माना कि पहले से चले आ रहे अच्छे कामों को वे आगे बढ़ाएंगे. उनके पूरे वक्तव्य में अहंकार की जगह विचार झांक रहा था- इस सवाल से जुड़ा हुआ कि आगे क्या करना है और कैसे करना है?
  • सिद्धांततः हर चुनाव अलग होता है और भारत जैसे विविधता भरे देश में एक चुनाव को दूसरे का सेमीफाइनल बताना मीडिया का सरलीकरण भर हो सकता है. इसके अलावा ऐसे अनुभव भी रहे हैं जब राज्यों में हारने वाली पार्टियां केंद्र में जीत गई हों. वर्ष 2003 में राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के नतीजे अपने पक्ष में देखकर ही अटल सरकार ने समय से पहले लोकसभा चुनाव कराए और हार गई.
12345»

Advertisement