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प्रियदर्शन

एनडीटीवी इंडिया में 15 वर्षों से कार्यरत. उपन्यास 'ज़िंदगी लाइव', कहानी संग्रह 'बारिश, धुआं और दोस्त' और 'उसके हिस्से का जादू', कविता संग्रह 'नष्ट कुछ भी नहीं होता' सहित नौ किताबें प्रकाशित. कविता संग्रह मराठी में और उपन्यास अंग्रेज़ी में अनूदित. सलमान रुश्दी और अरुंधती रॉय की कृतियों सहित सात किताबों का अनुवाद और तीन किताबों का संपादन. विविध राजनैतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों पर तीन दशक से नियमित विविधतापूर्ण लेखन और हिंदी की सभी महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन.

  • भारत में साठ का दशक आज़ादी के बाद के पहले मोहभंग का दशक भी था. आज़ादी के दौर में देखे गए सपने थकने से लगे थे. आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाली पीढ़ी विदा हो चुकी थी और उसकी कमाई खाने वाले लोग हर तरफ़ उभर रहे थे, चीन युद्ध के बाद की हताशा और नेहरू के निधन से पैदा शून्य के बीच भारतीय राजनीति ख़ुद को पुनर्परिभाषित और पुनर्व्याख्यायित करने की चुनौती से गुज़र रही थी.
  • वे अपनी नायिकाओं की तरह दिलेर थीं. उनकी नायिकाएं जिस हाल में हों, कभी 'पीड़ित' या 'शिकार' होने की कुंठा उनके भीतर नहीं दिखती. जीवन उनके लिए अपनी ज़िद पर अमल का नाम है. वे बेख़ौफ़, बेधड़क, रूढ़ियों की परवाह न करने वाली औरतें हैं जो यथास्थिति को बार-बार चुनौती देती हैं, जीवन को उसकी दी हुई शर्तों पर मंज़ूर नहीं करतीं, उसे अपने ढंग से बदलने का जतन करती हैं.
  • सवाल है, क्या यह पत्ता तुरूप का पत्ता साबित होगा? मुट्ठी जब तक बंद होती है तो वह लाख की मानी जाती है, खुलती है तो समझ में आता है कि जादू की इस पुड़िया में जादू नहीं रेत है. कांग्रेस के इस फ़ैसले के दो तात्कालिक असर तो देखने को मिलने लगे हैं. बीजेपी ने पहला हमला प्रियंका पर नहीं, राहुल गांधी पर किया है. वह प्रियंका के आगमन को राहुल की नाकामी बता रही है. अब तक उसने प्रियंका पर हमला नहीं किया है, लेकिन जल्द ही यह हमला शुरू होगा जिसके एक सिरे पर वंशवादी राजनीति को बढ़ावा देने का आरोप होगा और दूसरे सिरे पर वाड्रा से जुड़े मामलों को लेकर भ्रष्टाचार की तोहमत मढ़ी जाएगी.
  • इसमें शक नहीं कि बीजेपी के ख़िलाफ़ यूपी से बिहार और बंगाल तक जो महागठबंधन तैयार करने की बात हो रही है, उसके बहुत सारे संकट हैं. अलग-अलग राज्यों में सीटों के बंटवारे की चुनौती है, एक-दूसरे के साथ हितों के टकराव हैं, अतीत के अविश्वास हैं, और सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस गठबंधन का नेतृत्व कौन करेगा.
  • नामवर सिंह अस्पताल में हैं. 92 बरस की उम्र में उन्हें सिर पर चोट लगी है. अगर प्रार्थना जैसी कोई चीज़ होती है तो हिंदी के संसार को उनके लिए प्रार्थना करनी चाहिए. हमारी पीढ़ी का दुर्भाग्य है कि हमने उन्हें उनके उत्तरार्द्ध में देखा- उस उम्र में जब उनकी तेजस्विता का सूर्य ढलान पर था.
  • यह देखना दिलचस्प है कि जो लोग अब तक सामाजिक आधार पर आरक्षण को प्रतिभा के विलोम की तरह देखते रहे और इसे भारतीय व्यवस्था का नासूर मानते रहे, वे अपील कर रहे हैं कि गरीबों के हक की ख़ातिर यह आर्थिक आरक्षण मान लिया जाए - बिना यह बताए कि हर महीने 65,000 रुपये कमाने वाले लोग किस कसौटी से गरीब कहलाएंगे.
  • आरक्षण को लेकर BJP और कांग्रेस जैसी मूलतः अगड़े वर्चस्व वाली पार्टियां हमेशा दुविधा में रहीं. लेफ्ट फ्रंट को भी जातिगत आधार पर आरक्षण के सिद्धांत का समर्थन करने में वक्त लगा. संघ परिवार खुलेआम आरक्षण का विरोध करता रहा. 1990 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने पिछड़ी जातियों के आरक्षण के लिए मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने का ऐलान किया, तो देशभर में जो मंडल-विरोधी आंदोलन चल पड़ा, उसे इन राजनीतिक दलों की शह भी हासिल थी. मंडल की काट के लिए BJP ने कमंडल का दांव भी खेला.
  • अगर आप वह वीडियो देखेंगे और सुनेंगे, तो हैरान रह जाएंगे. नोएडा सेक्टर 58 के पार्क में पांच-छह दाढ़ी-टोपी वाले लोग गोल घेरे में बैठकर कुछ पैसा जुटा रहे हैं, कुछ चटाइयां बिछी हुई हैं, एक कर्कश आवाज़ उनसे लगभग बदतमीज़ी से जवाब तलब कर रही है - कहां से आए हो, यहां क्यों आए हो, किससे पूछकर यहां बैठ गए, पुलिस से परमिशन ली है, क्या गड़बड़ करना चाहते हो...?
  • आमिर खान के बाद देश के उपराष्ट्रपति रहे हामिद अंसारी को भी लोगों ने नहीं बख्शा. बार-बार उनके अलग-अलग व्यवहार को राष्ट्रविरोधी साबित करने की कोशिश हुई. वे सारी कोशिशें निराधार निकलीं. बाद में जब हामिद अंसारी बहुत शालीन लहजे में इस बढ़ती असहिष्णुता की ओर इशारा किया तो उन पर भी हमले शुरू हो गए.
  • 1984 की हिंसा और 2002 के दंगों में एक दुखद साम्य है. दोनों मामलों में राज्य के देखते-देखते हज़ारों लोग घरों से निकालकर सड़कों पर मार दिए गए, उन्हें ज़िंदा जलाया गया, महिलाओं से बलात्कार किया गया. 18 साल के अंतर पर हुए इन दो हत्याकांडों में इंसाफ को लगातार राजनीति ने स्थगित रखा. महज दो साल के राजनीतिक अनुभव पर प्रधानमंत्री बन गए राजीव गांधी ने तब यह हैरान करने वाला बयान दिया था - "एक बड़ा पेड़ गिरता है, तो धरती कुछ हिलती ही है..." यह वक्तव्य भले नादानी में दिया गया हो, लेकिन आने वाले दिनों में तमाम दंगाइयों को बड़ी निस्पृह क्रूरता के साथ बचाया गया, जिसका गुनाह कांग्रेस सरकार पर जाता है.
  • पांच राज्यों के चुनावी नतीजों के बाद राहुल गांधी ने जो वक्तव्य दिया, वह लगातार आक्रामक होती जा रही राजनीतिक संस्कृति में बहुत शिष्ट हस्तक्षेप कहा जा सकता है. अमूमन पिछली सरकारों की विफलताओं का ढोल बजाने की रिवायत छोड़कर उन्होंने माना कि पहले से चले आ रहे अच्छे कामों को वे आगे बढ़ाएंगे. उनके पूरे वक्तव्य में अहंकार की जगह विचार झांक रहा था- इस सवाल से जुड़ा हुआ कि आगे क्या करना है और कैसे करना है?
  • सिद्धांततः हर चुनाव अलग होता है और भारत जैसे विविधता भरे देश में एक चुनाव को दूसरे का सेमीफाइनल बताना मीडिया का सरलीकरण भर हो सकता है. इसके अलावा ऐसे अनुभव भी रहे हैं जब राज्यों में हारने वाली पार्टियां केंद्र में जीत गई हों. वर्ष 2003 में राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के नतीजे अपने पक्ष में देखकर ही अटल सरकार ने समय से पहले लोकसभा चुनाव कराए और हार गई.
  • विचारधाराएं अपनी आस्था के अनुसार जगहों के नाम बदलती रही हैं. कुछ व्यावहारिक और कुछ बड़ी मुश्किलों के अलावा इसमें ख़तरा बस इतना है कि सत्ता बदलने के साथ ये नाम नए सिरे से बदल दिए जा सकते हैं. उत्तर प्रदेश में यह तमाशा हमने बार-बार देखा और अब ठीक से याद भी नहीं रहता कि किस पुराने शहर को किस नए नाम से पुकारा जाए.
  • यह 2015 का साल था जब वित्त मंत्री अरुण जेटली राज्यसभा की भूमिका पर सवाल खड़े कर रहे थे. उनका कहना था कि जनता की चुनी हुई लोकसभा के पारित विधेयकों पर राज्यसभा को सवाल उठाने का हक़ नहीं है. तब लोकसभा के स्पीकर रहे सोमनाथ चटर्जी ने भी इसकी आलोचना की थी और कांग्रेस सांसद मधुसूदन मिस्त्री ने जेटली के खिलाफ विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव पेश किया था. दिलचस्प यह है कि अरुण जेटली तब यह बात कह रहे थे जब वे ख़ुद लोकसभा चुनाव हारकर राज्यसभा की मार्फ़त संसद में आए और मंत्री बने.
  • BJP अपने आराध्य देव राम की मर्यादा को याद रखती, तो उसे ख़याल आता कि सार्वजनिक पद पर बैठे हुए व्यक्ति पर लगा लांछन कितने सख्त दंड की मांग करता है. सीता पर एक मामूली-से आरोप के बाद राम ने उन्हें महल से बाहर कर दिया - यह जितनी सज़ा सीता की थी, उतनी ही राम की भी - क्योंकि अंततः इसका लांछन राम के सिर भी आना था. एक तरह से महज एक लांछन पर राम ने सिर्फ सीता का बहिष्कार नहीं, अपना आत्मनिर्वासन भी चुना था.
  • बेशक, दिल्ली के अपने फरेब हैं और उसकी सांस्कृतिक चेतना का अपना खोखलापन, सतहीपन या पाखंड भी- लेकिन इन सबके बावजूद इस शहर में अपनी तरह की हलचल है जो गाहे-बगाहे आपको ऊष्मा और ऊर्जा दे सकती है.
  • व्यभिचार कानून को रद्द करने का सुप्रीम कोर्ट का फैसला बस इतना नहीं है कि स्त्री और पुरुष के विवाहेतर संबंधों को अब जुर्म नहीं माना जाएगा. दुर्भाग्य से हमारे लगातार सतही-सपाट होते समय में ज़्यादातर लोग इस फैसले की इतनी भर व्याख्या करेंगे. लगातार चुटकुलेबाज होते जा रहे हमारे समाज को यह फैसला अपने लिए स्त्री-पुरुष संबंधों के खुलेपन पर कुछ छींटाकशी का अवसर भर लग सकता है, लेकिन यह एक ऐतिहासिक फैसला है.
  • मंटो एक जलते हुए शोले का नाम है. उसको छूना दुस्साहस का काम है. छूते ही हाथ जल जाते हैं. मगर इस बदनाम लेखन के भीतर कोई ऐसी कशिश है कि उसको छूने की इच्छा होती है, कोई ऐसी तपिश है जो अपनी ओर खींचती है.
  • अब यह लगभग स्पष्ट है कि केंद्र सरकार के लिए दो साल पहले हुई सर्जिकल स्ट्राइक के निशाने पर जितने सीमा पार बैठे आतंकी थे, उससे कहीं ज़्यादा भारतीय लोकतंत्र था. अन्यथा एक बहुत संक्षिप्त सैन्य कार्रवाई को राष्ट्रीय जलसे में बदलने की ऐसी कवायद न होती कि यूजीसी जैसे संस्थान को इसके लिए विश्वविद्यालयों को सर्कुलर जारी करना पड़ता. सर्जिकल स्ट्राइक निस्संदेह भारतीय सेना की वीरता और क्षमता का उदाहरण थी. सीमा पार जाकर पाक शिविरों में बैठे आतंकियों और उनके आकाओं को तबाह करना और बिना कोई नुक़सान उठाए सुरक्षित लौट आना आसान नहीं था. यह असंभव लगता कारनामा भारतीय सेना ने इतने अचूक ढंग से किया कि पाकिस्तान हैरान रह गया.
  • हिंदी के विलक्षण कवि-लेखक विष्णु खरे नहीं रहे. बुधवार दोपहर बाद दिल्ली के गोविंद वल्लभ पंत अस्‍पताल में उनका निधन हो गया. करीब हफ़्ते भर पहले वे मस्तिष्काघात के शिकार हुए थे और नीम बेहोशी में अस्पताल लाए गए थे.
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