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प्रियदर्शन

एनडीटीवी इंडिया में 15 वर्षों से कार्यरत. उपन्यास 'ज़िंदगी लाइव', कहानी संग्रह 'बारिश, धुआं और दोस्त' और 'उसके हिस्से का जादू', कविता संग्रह 'नष्ट कुछ भी नहीं होता' सहित नौ किताबें प्रकाशित. कविता संग्रह मराठी में और उपन्यास अंग्रेज़ी में अनूदित. सलमान रुश्दी और अरुंधती रॉय की कृतियों सहित सात किताबों का अनुवाद और तीन किताबों का संपादन. विविध राजनैतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों पर तीन दशक से नियमित विविधतापूर्ण लेखन और हिंदी की सभी महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन.

  • रअसल, पुलिस ने इस दौरान एक चिट्ठी निकाल ली जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या का इरादा जताया गया था.
  • शिक्षा और संस्कृति, साहित्य और इतिहास के प्रश्न अब स्थगित हैं- या इतने भर उपयोगी हैं कि उनसे किसी विचारधारा की राजनीति सधती हो. पढ़ाई-लिखाई को करिअर बनाने की चीज़ मान लिया गया है, संस्कृति के नाम पर बस बॉलीवुड है, कविता के नाम पर मंचीय फूहड़ता, मनोरंजन के नाम पर क्रिकेट और टीवी का शोर है. सारे सांस्कृतिक-साहित्यिक संस्थान 'अपने-अपने' लोगों को भरने की जगहों में बदल चुके हैं. 
  • विश्व भारती के दीक्षांत समारोह में आए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर को याद करते हुए उनका रिश्ता गुजरात से खोज निकाला. यह जानकारी दी कि अहमदाबाद में रहते हुए उन्हें 'क्षुधित पाषाण' लिखने का ख़याल आया. लेकिन यहां भी उनसे एक चूक हो गई. 'क्षुधित पाषाण' एक कहानी है जिसे उन्होंने उपन्यास बता डाला. इस कहानी पर दो फ़िल्में भी बन चुकी हैं. गुलज़ार की फिल्म 'लेकिन' भी इसी कहानी पर केंद्रित है.
  • यह सच है कि कर्नाटक में विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर, यानी JDS के बीच तीखा टकराव रहा. कांग्रेस आरोप लगाती रही कि JDS दरअसल BJP की 'बी टीम' है. इस लिहाज़ से BJP की यह शिकायत जायज़ है कि अब चुनाव के बाद कांग्रेस और JDS का गठबंधन 'अपवित्र' और जनादेश-विरोधी है. इस 'अपवित्र' को इस बिना पर सही नहीं ठहराया जा सकता है कि ठीक यही काम BJP ने हाल ही के दिनों में गोवा सहित तीन राज्यों में किया है और आज जो लोग कर्नाटक में कांग्रेस की कोशिश को 'लोकतंत्र के साथ खिलवाड़' बता रहे हैं, वही BJP के कृत्य को अमित शाह का रणनीतिक पौरुष बताकर ताली बजा रहे थे.
  • थलसेनाध्यक्ष जनरल विपिन सिंह रावत बिल्कुल ठीक कहते हैं. कश्मीर के आतंकवादी भारतीय सेना का मुकाबला नहीं कर सकते. दरअसल मुकाबले की यह बात ही बेमानी है, दोनों में कोई बराबरी नहीं. भारतीय सेना दुनिया की सबसे अनुशासित और सक्षम सेनाओं में गिनी जाती है. वह हमारी सरहदों की रक्षा में पूरी तरह समर्थ है.
  • राहुल गांधी या उनकी मां सोनिया गांधी पर यह इल्ज़ाम नहीं लगाया जा सकता कि उनमें प्रधानमंत्री बनने की चाहत है. 2004 में UPA को मिले बहुमत के बाद जब कई दलों ने अपने समर्थन की चिट्ठी सोनिया गांधी के नाम कर दी थी और जब BJP की सुषमा स्वराज और उमा भारती जैसी नेता सोनिया के प्रधानमंत्री बनने पर बाल मुंडाने की बात कर रही थीं, तब सोनिया ने यह पद छोड़कर इस पूरी राजनीति को अंगूठा और आईना दिखा दिया था. उस एक मास्टरस्ट्रोक के साथ सोनिया का कद काफी ऊंचा हो गया था. 2009 में जब कांग्रेस दोबारा सरकार बनाने की स्थिति में आई, तो उत्साही कांग्रेसियों ने राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने की मांग की. तब राहुल ने बड़ी शालीनता से यह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया. यह शील BJP के बड़े नेताओं ने भी नहीं दिखाया. आडवाणी मज़ाक में 'PM इन वेटिंग' कहे जाने लगे और अंततः नई पीढ़ी के महत्वाकांक्षी नेताओं द्वारा मार्गदर्शक मंडल में निर्वासित कर दिए गए.
  • एक साल में हालात बदल गए हैं. आतंकवाद में स्थानीय नौजवानों की भागेदारी बढ़ी है. बल्कि कल तक सड़कों पर चक्कर काटने वाले, पुलिस बल में काम करने वाले और विश्वविद्यालयों में पढ़ाने वाले अचानक दहशतगर्द बन रहे हैं और सुरक्षा बलों की गोली खाकर मारे जा रहे हैं.
  • मोहम्मद अली जिन्ना की वजह से देश दो हिस्सों में बंट गया. वे भारत विभाजन के गुनहगार हैं. उनकी मदद से अंग्रेजों ने देश बांट दिया. इसलिए आ़ज़ाद भारत में उनकी तस्वीर की कोई जगह नहीं है. यह तर्क इतना सहज और सरल लगता है कि उनकी तस्वीर लगाए रखने वाला अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय अचानक गुनहगार मालूम पड़ता है.
  • मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा पर महाभियोग उचित है या अनुचित- इस प्रश्न पर दुर्भाग्य से हर कोई अपनी राय अपनी राजनीतिक पक्षधरता के हिसाब से तय करता मिलेगा. किसी कांग्रेस समर्थक से पूछिए तो शायद वह कहेगा कि महाभियोग बिल्कुल उचित है, किसी मोदी भक्त से पूछिए तो वह न्यायपालिका को लांछित करने के लिए कांग्रेस की भर्त्सना करेगा.
  • अपराजिता शर्मा हिंदी की लेखक या कवयित्री हो सकती थीं, लेकिन वे चित्रकार या कलाकार हैं. उनके मित्र उनसे पूछते भी हैं कि कुछ गंभीर साहित्य क्यों नहीं लिखती, चित्र-वित्र क्यों बनाती हो. यह दरअसल अपराजिता का नहीं, उस संसार का संकट है जो शब्दों को विचार और संवेदना की इकलौती पूंजी मानता है. बहरहाल, अपराजिता शर्मा के नाम पर पहली बार ध्यान तब गया जब उन्होंने हिंदी के लिए इमोजी की तर्ज पर हिमोजी बनाई. हालांकि तब मुझे यह ख़याल आया कि संकेत चिह्नों को भाषा की ज़रूरत क्यों हो. लेकिन धीरे-धीरे हिमोजी के संसार को ख़ुद अपराजिता पीछे छो़ड़ती दिखीं. उन्होंने वाणी प्रकाशन से प्रकाशित नीलिमा चौहान की किताब 'पतनशील पत्नियों के नोट्स' के लिए बड़ी मेहनत से इलस्ट्रेशन बनाए.
  • उन्नाव, कठुआ और सूरत में सामने आई बलात्कार की घटनाओं के विरुद्ध देश भर में फूटा रोष सच्चा है, इसमें संदेह नहीं. इन सभी मामलों में पीड़ित के साथ जो जघन्य क्रूरता हुई, वह किसी भी सभ्य इंसान और व्यवस्था को सिहरा देने-शर्मिंदा कर देने के लिए काफ़ी है.
  • कठुआ की घटना से द्रवित मेनका गांधी पॉक्सो यानी यौन उत्पीड़न से बच्चों के संरक्षण के क़ानून में अब बलात्कार के लिए फांसी की सज़ा जोड़ना चाहती हैं. इससे पहले बीजेपी शासित तीन राज्यों- राजस्थान, मध्य प्रदेश और हरियाणा में नाबालिग से बलात्कार पर बलात्कार का क़ानून बना चुकी है. बहुत सारे लोगों को लगता है कि बलात्कार के लिए फांसी की सज़ा होगी तो मुजरिम डरेंगे. लेकिन फांसी कैसे होगी?
  • यूपी में राम राज लाने का दावा कर रही योगी सरकार किसी और से नहीं तो अपने इष्टदेव भगवान राम से कुछ सीख लेती. सिर्फ़ एक धोबी के आरोप पर उन्होंने अपनी पत्नी को निर्वासित कर दिया था. ऐसा नहीं कि उन्हें पता नहीं था कि वे अन्याय कर रहे हैं, लेकिन संभवतः उनका मानना था कि राजा के चरित्र को सभी संदेहों से परे होना चाहिए.
  • लगातार स्थूल होती जा रही हमारी राजनीति बहुत सूक्ष्म प्रश्नों पर विचार करने की आदत या तो बना नहीं सकी, या पूरी तरह छोड़ चुकी है. वह प्रतीकों की राजनीति करती है, मगर प्रतीकों का महत्व नहीं समझती.
  • क्या एक घंटे या चंद घंटों के उपवास को उपवास मानेंगे? दलित उत्पीड़न के विरुद्ध देश भर में कांग्रेस कार्यकर्ताओं से उपवास रखने की अपील करने वाले राहुल गांधी राजघाट पर एक बजे अनशन के लिए पहुंचे. थोड़ी देर बाद उनका अनशन ख़त्म हो गया.
  • अच्छा हुआ कि सरकार ने फेक न्यूज़ पर सूचना-प्रसारण मंत्रालय की नई गाइलाइन वापस ले ली. वरना ऐसी गाइडलाइन याद दिलाती हैं कि सरकारें जब प्रेस से असुविधा महसूस करती हैं.
  • अरविंद केजरीवाल का इन दिनों लगातार मज़ाक उड़ाया जा रहा है. उनके माफ़ीनामों पर तरह-तरह के चुटकुले चल रहे हैं. लोग कह रहे हैं- वीर सावरकर का रिकॉर्ड वीर केजरीवाल तोड़ देंगे. सावरकर ने एकाधिक बार अंग्रेज़ों से माफ़ी मांगी थी- केजरीवाल उनसे आगे निकल जाएंगे. माफ़ीनामे के सवाल पर उनकी पार्टी टूटते-टूटते बची. 
  • बीजेपी को अंबेडकर का विचार नहीं उनकी मूर्ति चाहिए जिस पर वे माला चढ़ा सकें. उन्हें बौद्ध नहीं, हिंदू दिखने वाले अंबेडकर चाहिए. क्या यह भी एक वजह है कि सरकार को उनके नाम के साथ रामजी जोड़ना ज़रूरी लग रहा है?
  • कई अर्थों मे महादेवी वर्मा हिंदी की विलक्षण कवयित्री हैं. उनमें निराला की गीतिमयता मिलती है, प्रसाद की करुण दार्शनिकता और पंत की सुकुमारता- लेकिन इन सबके बावजूद वे अद्वितीय और अप्रतिम ढंग से महादेवी बनी रहती हैं. उनके गीतों से रोशनी फूटती है, संगीत झरता है.
  • 35 साल पहले लिखी गई कविता ‘मांझी का पुल’ में हल चलाते और खैनी की तलब के वक़्त रुक कर मांझी के पुल पर नज़र डालते लालमोहर की मृत्यु की ख़बर इस संग्रह में आती है। कभी सन 47 को याद करते हुए नूर मियां का जिक्र छेड़ने वाले केदारनाथ सिंह इस संग्रह में गफ़ूर मियां से मिलने और उनकी तस्वीर लेने की गुज़ारिश करते हैं जिनकी शतायु हो चुकी झुर्रियों में एक पूरी बस्ती बसती है।
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