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प्रियदर्शन

एनडीटीवी इंडिया में 15 वर्षों से कार्यरत. उपन्यास 'ज़िंदगी लाइव', कहानी संग्रह 'बारिश, धुआं और दोस्त' और 'उसके हिस्से का जादू', कविता संग्रह 'नष्ट कुछ भी नहीं होता' सहित नौ किताबें प्रकाशित. कविता संग्रह मराठी में और उपन्यास अंग्रेज़ी में अनूदित. सलमान रुश्दी और अरुंधती रॉय की कृतियों सहित सात किताबों का अनुवाद और तीन किताबों का संपादन. विविध राजनैतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों पर तीन दशक से नियमित विविधतापूर्ण लेखन और हिंदी की सभी महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन.

  • कुछ लोगों के व्यक्तित्व में अपनी तरह की एक ऊष्मा होती है. अटल बिहारी वाजपेयी का व्यक्तित्व कुछ ऐसा ही था. एक बड़प्पन उनकी शख्सियत में था. वे जवाहरलल नेहरू की तारीफ़ कर सकते थे, इंदिरा गांधी को बांग्लादेश युद्ध के बाद दुर्गा बता सकते थे और विपक्ष के बहुत सारे नेताओं से ऐसे दोस्ताना संबंध रख सकते थे जो दलगत राजनीति से ऊपर हों.
  • जेएनयू से पीएचडी कर रहे छात्र उमर ख़ालिद को तीन साल पहले तक कोई नहीं जानता था. वह एक छात्र भर थे- शायद कुछ अतिरिक्त उत्साही और जेएनयू के भीतर भी धार्मिक नहीं, राजनीतिक तौर पर बेहद अल्पसंख्यक- क्योंकि जेएनयू में भी उनके संगठन की कोई स्वीकार्यता नहीं थी.
  • असम के नागरिकता रजिस्टर से उठने वाला असली अंदेशा यही है- यह सिर्फ 40 लाख लोगों की नागरिकता तय करने का मामला नहीं है, करोड़ों दूसरे लोगों को यह दिखाने का मामला भी है कि वे भारत में अपनी नागरिकता को असंदिग्ध न मानें.
  • प्रधानमंत्री की यह बात बिल्कुल सही है कि उद्योगपति देश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं, उन्हें चोर-लुटेरे समझना या कहना ठीक नहीं और उनके साथ रिश्ते रखने में कोई बुराई नहीं. हो सकता है, उनका यह आरोप भी सच हो कि जो लोग सार्वजनिक जीवन में उद्योगपतियों से दूरी बरतते हैं, वे चुपचाप उनके घरों में जाकर दंडवत होते हैं. नेताओं के पाखंड के बारे में आम राय अब इतनी स्पष्ट है कि दलों के आर-पार जाकर उनके इस कथन पर भरोसा किया जा सकता है.
  • बीजेपी बार-बार यह कह रही है कि विपक्ष मजबूत सरकार नहीं दे सकता. गठबंधन की मजबूरी में बनी सरकारें मज़बूत नहीं हो सकतीं. आज भी यह बात बीजेपी के प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने कही. एक हद तक यह बात सच है. बीजेपी के अकेले बहुमत और एनडीए के समर्थन के साथ नरेंद्र मोदी बेहद मज़बूत प्रधानमंत्री हैं. यह मज़बूती उनकी अपनी छवि का भी नतीजा है.
  • शशि थरूर के वक्तव्य पर आ रही प्रतिक्रियाएं बताती हैं कि हमारी राजनीतिक भाषा की समझ कितनी इकहरी, सतही और भोंथरी हो गई है. शशि थरूर ने कहा कि 2019 में बीजेपी की जीत से भारत 'हिंदू पाकिस्तान' हो जाएगा. इस वक्तव्य से असहमत होने की गुंजाइश बहुत सारी है, लेकिन पहले इस बयान का मतलब भी ठीक से समझने की ज़रूरत है.
  • निर्भया के मुजरिमों के साथ कोई हमदर्दी नहीं रखी जा सकती है. उनका अपराध इतना नृशंस था कि 6 साल बाद भी उसकी याद एक सिहरन पैदा करती है. न्याय की सहज बुद्धि कहती है कि इनके साथ किसी क़िस्म की नरमी की बात सोचना गलत है. हमारे संविधान में अगर किसी जघन्य अपराध के लिए फांसी की व्यवस्था है तो वह जघन्य अपराध ऐसा ही हो सकता है. इसलिए कोई नादान ही बोलेगा कि निर्भया के मुजरिमों को फांसी नहीं होनी चाहिए.
  • 'संजू' फिल्म का खलनायक कौन है...? राजू हिरानी के मुताबिक वह प्रेस, जो सूत्रों के मुताबिक या प्रश्नवाचक चिह्न लगाकर अफ़वाहों को ख़बरों की तरह पेश करता है. मीडिया से इस शिकायत को फिल्म में इतनी अहमियत दी गई है कि फिल्म का अंत बाकायदा एक गाने से होता है, जिसमें मीडिया का मज़ाक बनाया गया है. यह सच है कि मीडिया कई बार गैरज़िम्मेदार ढंग से पेश आता रहा है. वह कई बार अपनी ताक़त के नकली गुमान में रहता है. कई बार दूसरे ताकतवर लोग भी उसका यह भरम बनाए रखने में मददगार होते हैं. कई बार यह लगता है कि इन ताकतवर लोगों को ईमानदार नहीं, एक बेईमान मीडिया ही चाहिए, समझदार नहीं, सनसनी वाला मीडिया ही चाहिए.
  • फिल्म 'आंधी' 1975 में बनी थी इमरजेंसी से पहले. फिल्म में सुचित्रा सेन ने एक ऐसी नेता की भूमिका अदा की थी जो अपने पति से अलग रह रही है. बरसों बाद वे मिलते हैं और उनके बीच पुरानी स्मृतियों का रेला बहता रहता है. सुचित्रा सेन का मेकअप काफी कुछ इंदिरा गांधी जैसा था. इमरजेंसी के दौरान यह फिल्म रोक दी गई. लेकिन 1977 में इमरजेंसी खत्म होने के बाद फिल्म फिर से रिलीज हुई और बेहद कामयाब रही. राहुल देव बर्मन ने फिल्म का जो संगीत दिया था, वह आज भी हिंदी फिल्मों के बेहतरीन संगीत की विरासत है. गुलजार के लेखन और निर्देशन की जानी-पहचानी भावुकता को छूती संवेदनशीलता यहां भी मौजूद है.
  • यह सच है कि इमरजेंसी भारतीय लोकतंत्र का काला अध्याय है. इस दौर में नागरिक अधिकार छीन लिए गए. नेताओं, लेखकों, पत्रकारों को जेल में डाला गया. उन्हें यंत्रणाएं दी गईं. लोगों की जबरन नसबंदी कराई गई. 20 सूत्री कार्यक्रम थोपा गया. अनुशासन पर्व के नाम पर तानाशाही का चाबुक चलाया गया. यह भी सच है कि इंदिरा गांधी को इतिहास उनके इस कृत्य के लिए कभी माफ़ नहीं करेगा. भारतीय जनता ने तो उन्होंने 1977 में ही दंडित कर दिया था.
  • जम्मू-कश्मीर में अब फिर से राज्यपाल का शासन है. महबूबा सरकार से अलग हुई बीजेपी समझाने में जुटी है कि वहां राज्यपाल का शासन क्यों ज़रूरी है. वह अपने जाने-पहचाने शब्दाडंबर पर लौट आई है.
  • जो लोग दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनके सहयोगियों पर अहंकारी और अराजक होने की तोहमत लगाते हैं, उन्हें दिल्ली के उपराज्यपाल अनिल बैजल का रवैया देखना चाहिए. उनके गेस्ट रूम में आठ दिन से राज्य के मुख्यमंत्री-उपमुख्यमंत्री धरने पर बैठे हैं, उपमुख्यमंत्री और स्वास्थ्यमंत्री अनशन की वजह से अस्पताल तक पहुंच चुके, लेकिन उपराज्यपाल ने जैसे तय कर रखा है कि जब तक केंद्र सरकार से हरी झंडी नहीं मिलेगी, वह इन आंदोलनकारियों से बात तक नहीं करेंगे. उनके लिए मुख्यमंत्री के ट्वीट और उनकी ओर से आ रहे अनुरोध भी बेमानी हैं.
  • पेले भारत के लिए फुटबॉल खिलाड़ी कम और एक किंवदंती ज़्यादा रहा. अब वक्त बदल रहा है. कोलकाता के एक चाय बेचने वाले ने मॉस्को जाकर वर्ल्डकप देखने के लिए पैसा जुटाया, लेकिन रकम कम पड़ गई. तब उसने अपने मकान को ही अर्जेंटीना के रंगों में रंग लिया
  • किम भी अमेरिका से डरकर अगर ऐटमी कार्यक्रम से पीछे हट जाते तो क्या होता...? अमेरिका एक 'रोग नेशन' को ख़त्म करने के जज़्बे के साथ उत्तर कोरिया पर टूट पड़ता और लोकतंत्र के नाम पर अमेरिकी सैन्य आधिपत्य का एक नंगा नाच चल रहा होता.
  • जिस दौर में किसी रोहित वेमुला को हैदराबाद विश्वविद्यालय में आत्महत्या करनी पड़े, जिस दौर में उत्साही गोरक्षकों का हुजूम कहीं अल्पसंख्यकों को निशाना बनाता हो और कभी दलितों की पीठ उधेड़ता हो, जिस दौर में दलित प्रतिरोध तरह-तरह की शक्लें अख़्तियार कर रहा हो, उस दौर में कोई कारोबारी फिल्म ऐसी भी बन सकती है जैसी 'काला' है.
  • रअसल, पुलिस ने इस दौरान एक चिट्ठी निकाल ली जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या का इरादा जताया गया था.
  • शिक्षा और संस्कृति, साहित्य और इतिहास के प्रश्न अब स्थगित हैं- या इतने भर उपयोगी हैं कि उनसे किसी विचारधारा की राजनीति सधती हो. पढ़ाई-लिखाई को करिअर बनाने की चीज़ मान लिया गया है, संस्कृति के नाम पर बस बॉलीवुड है, कविता के नाम पर मंचीय फूहड़ता, मनोरंजन के नाम पर क्रिकेट और टीवी का शोर है. सारे सांस्कृतिक-साहित्यिक संस्थान 'अपने-अपने' लोगों को भरने की जगहों में बदल चुके हैं. 
  • विश्व भारती के दीक्षांत समारोह में आए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर को याद करते हुए उनका रिश्ता गुजरात से खोज निकाला. यह जानकारी दी कि अहमदाबाद में रहते हुए उन्हें 'क्षुधित पाषाण' लिखने का ख़याल आया. लेकिन यहां भी उनसे एक चूक हो गई. 'क्षुधित पाषाण' एक कहानी है जिसे उन्होंने उपन्यास बता डाला. इस कहानी पर दो फ़िल्में भी बन चुकी हैं. गुलज़ार की फिल्म 'लेकिन' भी इसी कहानी पर केंद्रित है.
  • यह सच है कि कर्नाटक में विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर, यानी JDS के बीच तीखा टकराव रहा. कांग्रेस आरोप लगाती रही कि JDS दरअसल BJP की 'बी टीम' है. इस लिहाज़ से BJP की यह शिकायत जायज़ है कि अब चुनाव के बाद कांग्रेस और JDS का गठबंधन 'अपवित्र' और जनादेश-विरोधी है. इस 'अपवित्र' को इस बिना पर सही नहीं ठहराया जा सकता है कि ठीक यही काम BJP ने हाल ही के दिनों में गोवा सहित तीन राज्यों में किया है और आज जो लोग कर्नाटक में कांग्रेस की कोशिश को 'लोकतंत्र के साथ खिलवाड़' बता रहे हैं, वही BJP के कृत्य को अमित शाह का रणनीतिक पौरुष बताकर ताली बजा रहे थे.
  • थलसेनाध्यक्ष जनरल विपिन सिंह रावत बिल्कुल ठीक कहते हैं. कश्मीर के आतंकवादी भारतीय सेना का मुकाबला नहीं कर सकते. दरअसल मुकाबले की यह बात ही बेमानी है, दोनों में कोई बराबरी नहीं. भारतीय सेना दुनिया की सबसे अनुशासित और सक्षम सेनाओं में गिनी जाती है. वह हमारी सरहदों की रक्षा में पूरी तरह समर्थ है.
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