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प्रियदर्शन

एनडीटीवी इंडिया में 15 वर्षों से कार्यरत. उपन्यास 'ज़िंदगी लाइव', कहानी संग्रह 'बारिश, धुआं और दोस्त' और 'उसके हिस्से का जादू', कविता संग्रह 'नष्ट कुछ भी नहीं होता' सहित नौ किताबें प्रकाशित. कविता संग्रह मराठी में और उपन्यास अंग्रेज़ी में अनूदित. सलमान रुश्दी और अरुंधती रॉय की कृतियों सहित सात किताबों का अनुवाद और तीन किताबों का संपादन. विविध राजनैतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों पर तीन दशक से नियमित विविधतापूर्ण लेखन और हिंदी की सभी महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन.

  • सुषमा स्वराज को नरेश अग्रवाल की टिप्पणी स्वीकार्य नहीं है, होनी भी नहीं चाहिए। वह एक अशालीन टिप्पणी थी जिस पर किसी भी संवेदनशील आदमी को एतराज़ होना चाहिए.
  • सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों के संविधान पीठ ने जब इच्छा मृत्यु पर कुछ शर्तों के साथ मुहर लगाई तो दरअसल वे जीवन और मृत्यु के दार्शनिक संबंध या मृत्यु की अपरिहार्यता पर ही नहीं, उस सामाजिक संकट पर भी ध्यान दे रहे थे जो हमारे समाज में वृद्धों के अकेलेपन और बीमारी से पैदा हुआ है.
  • आर्ट ऑफ़ लिविंग के गुरु श्रीश्री रविशंकर कह रहे हैं कि इस देश को सीरिया होने से बचाया जाए, इसलिए अयोध्या में विवादित स्थल पर राम मंदिर के निर्माण पर आम राय बनाई जाए. वे कहते हैं, सभी समुदायों के लोगों से बात करके इसका रास्ता निकाला जाए. वे कहते हैं कि अदालत का फ़ैसला मंदिर के पक्ष में आए या इसके ख़िलाफ़- लेकिन इससे माहौल बिगड़ेगा. मुसलमान दुखी होंगे या फिर हिंदू क्रोधित. देश गृह युद्ध के कगार पर चला जाएगा.
  • लेनिन की मूर्ति आपने गिरा दी, लेकिन कृपया पेरियार को छूने की कोशिश न करें.... यह वैधानिक नहीं, शुद्ध राजनीतिक चेतावनी है. आज की तारीख़ में अम्बेडकर, ज्योतिबा फुले और पेरियार महज़ मूर्तियां नहीं, ऐसे खंभे हैं, जिनमें बिजली दौड़ रही है.
  • सरकार बनने से पहले कम्युनिस्टों के साथ हिंसा की ख़बरें आ रही हैं. मूर्ति गिराई जा रही है. यह भारत को भारत नहीं रहने देना है. अफगानिस्तान और सीरिया में बदलना है. जो लोग मार्क्सवाद के शव के चारों तरफ खुशी से प्रेतनृत्य कर रहे हैं, उन्हें इस ध्वंस से डरना चाहिए. यह ध्वंस भारतीय परम्परा नहीं है. लेनिन की मूर्ति गिराने वाले वही लोग हैं, जो दूसरी जगह गोडसे की मूर्ति लगाते हैं. लेनिन मिट जाए और गोडसे बच जाए - कम से कम यह भारत नहीं चाहेगा.
  • 'इंगलिश-विंगलिश' और 'मॉम' में वह बिल्कुल केंद्रीय भूमिकाओं में थीं और लोग उम्मीद कर रहे थे कि वह कुछ और कामयाब फिल्मे देंगी.लेकिन मीडिया ने उनकी मौत का जिस तरह तमाशा बनाया, उसके दो बुरे नतीजे हुए. एक तो यह कि एक पारिवारिक हादसा - जो बहुत दिल तोड़ने वाला था - एक सनसनीखेज क्राइम केस में बदलता नज़र आया. दूसरा यह कि श्रीदेवी के अभिनय या योगदान का जो उचित मूल्यांकन होना चाहिए था, वह संभव नहीं हुआ. इसकी जगह अचानक बहुत फिल्मी किस्म का छाती-पीटू दृश्य नज़र आया, जिसमें श्रीदेवी 'भूतो न भविष्यतो' जैसी दिखाई पड़ने लगीं. मगर सच क्या है.
  • राजस्थान के राजसमंद में अफ़राज़ुल नाम के एक मुस्लिम मजदूर को कुल्हाड़ी से काटने और फिर जला देने वाले आरोपी शंभुलाल रैगर को अपने किए पर कोई अफसोस नहीं है. जाहिर है, जिसे 'इन्डॉक्ट्रिनेशन' कहते हैं- यह उसका चरम है. आम तौर पर ऐसी ख़ौफ़नाक घुट्टी आतंकी संगठन अपने सदस्यों को पिलाते हैं. वे जो फ़िदाईन दस्ते तैयार करते हैं, वहां इस तरह का वैचारिक चरम दिखता है.
  • आम आदमी पार्टी की इस अराजकता का सबसे नया उदाहरण मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के आवास पर दिल्ली के मुख्य सचिव अंशु प्रकाश के साथ हुई बदसलूकी है।
  • अब लाल किले में राष्ट्र रक्षा यज्ञ होगा. देश के अलग-अलग हिस्सों से इसके लिए मिट्टी लाई जाएगी. किसी और ने नहीं, गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने इसके लिए रथ यात्रा को हरी झंडी दिखाई है. यह न पूछें कि क्या संविधान इसकी इजाज़त देता है?
  • मोहन भागवत के इस बयान में कई सवाल छुपे हुए हैं? क्या संघ-प्रमुख भारतीय सेना की क्षमता पर भरोसा नहीं करते? क्या उन्हें लगता है कि सीमा पर कभी ऐसी स्थिति आएगी कि भारतीय सेना को संघ परिवार के सैनिकों की ज़रूरत पड़ेगी?
  • आज के राजनीतिक-सामाजिक माहौल में किसी नगर निगम से यह उम्मीद करना एक तरह का अन्याय है कि वह अपने लेखकों-कलाकारों या संस्कृतिकर्मियों को भी पहचानेगा. इस बात से क्या होता है कि महादेवी वर्मा हिन्दी लेखक भर नहीं, आधुनिक भारत की उन मनीषी महिलाओं में रही हैं, जिनका नाम कई पीढ़ियां गौरव से लेती रही हैं और इलाहाबाद वह शहर है, जिसे कभी भारत की साहित्यिक राजधानी माना जाता था. इलाहाबाद नगर निगम ने महादेवी वर्मा से उनके निधन के 30 साल बाद 44,000 रुपये का मकान कर मांगा है और खुद पेश होने को कहा है, वरना यह मकान ज़ब्त हो जाएगा.
  • प्रधानमंत्री अक्सर जिस संसदीय और संवैधानिक गरिमा की बात करते हैं, क्या वह राष्ट्रपति के अभिभाषण का जवाब देते हुए उनके वक्तव्य में थी? यह ठीक है कि सांसदों का एक समूह उनके भाषण के बीच भी हंगामा कर रहा था, लेकिन क्या यह उचित था कि इस हंगामे से वे इतने विचलित हो जाएं कि अपने पूरे वक्तव्य को एक तल्ख़ राजनैतिक वक्तव्य में ही नहीं, लगभग एक प्रतिशोधी कार्रवाई में बदल डालें?
  • दास्तानगोई का फ़न कभी महफ़िलों-मजलिसों की जान हुआ करता था. अब न मह़फ़िलें सजती हैं, न मजलिसें लगती हैं, न वे मोहल्ले-टोले- ठिकाने बचे हैं जहां गप हो, क़िस्से सुनाए-दुहराए जाएं और अपने-अपने मिज़ाज के हिसाब से बदले जाएं. ऐसी ही महफ़िलों-मजलिसों में दास्तानगोई बाक़ायदा एक विधा की तरह परवान चढ़ी.
  • के आसिफ़ ने 'मुगले आज़म' एक ऐसे दौर में बनाई थी जब हिंदुस्तान का दिल टूटा हुआ था. देश ने आजादी की एक बड़ी क़ीमत चुकाई थी और देश की दो आंखें कहलाने वाली हिंदू-मुस्लिम आबादी एक दूसरे को शक, शिकायत, नफरत सब तरह से देख रही थी. बेशक, आज़ादी के साथ देश को नए सिरे से बनाने का एक रचनात्मक जज्बा भी था जो उस दौर में बनी कई फिल्मों में लगातार दिखता रहा.
  • मसला लोकसभा-विधानसभा चुनाव साथ कराने का है. लेकिन केंद्र सरकार इसे 'एक देश एक चुनाव' बता रही है- शायद इसलिए कि एक देश की बात करने से समर्थन जुटाने में आसानी होती है. हालांकि तथ्य के तौर पर यह गलत है. अगर केंद्र सरकार का सुझाव चल भी निकले तो एक देश में एक साथ चुनाव होंगे, लेकिन कई चुनाव होंगे. 
  • गांधी की विरासत का कांग्रेस ने जो हाल किया है, उसको देखकर लेखक की यह कल्पना अजूबा नहीं जान पड़ती. हमारे राजनीतिक सत्ता प्रतिष्ठान ने एक तरह से गांधी को मार डाला है.
  • अगर 'पद्मावत' पर बहस से फ़ुरसत पा लें तो स्टीवन स्पीलबर्ग की फ़िल्म 'द पोस्ट' भी देख लें. वियतनाम युद्ध के दौरान अमेरिकी सरकार अपनी ही जनता से झूठ बोल रही है. रैंड कारपोरेशन के लिए काम कर रहा एल्सबर्ग नाम का एक शख़्स मायूसी से देखता है कि उसके सच बताने के बावजूद राष्ट्रपति देश को बरगलाने में लगे हैं.
  • बीजेपी शासित राज्यों में 'पद्मावत' के विरुद्ध चल रहे हिंसक प्रदर्शन बताते हैं कि हमारी लोकतांत्रिक चेतना किस हद तक सामंती जकड़न में क़ैद और कुंद होती जा रही है. सेंसर बोर्ड की हरी झंडी और सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद 'पद्मावती' के प्रदर्शन को लगभग नामुमकिन बना दिया गया है.
  • आप के 20 विधायकों को अयोग्य घोषित किए जाने से पैदा हुआ राजनीतिक संकट दिल्ली की तीनों पार्टियों बीजेपी, कांग्रेस और आप के लिए एक नई चुनौती भी है. अगले छह महीने में इन 20 सीटों पर चुनाव होंगे जो किसी छोटे राज्य के पूरे चुनाव से कम नहीं होंगे. 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले ये चुनाव अपने-अपने पानी की परख करने का अवसर होंगे.
  • कई बार असावधानी से पढ़ते हुए कुंवर नारायण किसी को बहुत मामूली कवि लग सकते हैं- ऐसे ठंडे कवि जो काव्योचित ऊष्मा पैदा नहीं करते. उनमें सूक्तियां चली आती हैं, व्यंग्य चला आता है, बहुधा सामान्य ढंग से कही गई बातें चली आती हैं. मगर ध्यान से देखें तो यही मामूलीपन कुंवर नारायण को बड़ा बनाता है. उनको पढ़ते हुए अचानक हम पाते हैं कि यह सिर्फ कविता नहीं है, एक पूरा सभ्यता विमर्श है जो अपने निष्कर्षों को लेकर बेहद चौकन्ना भी है. यह अनायास नहीं है कि मिथकों और इतिहास को अपनी कविता का रसायन बनाते हुए भी कुंवर नारायण उनके भव्य अर्थों के प्रलोभन में नहीं फंसते, उन्हें बिल्कुल समकालीन और आधुनिक मूल्यों की कसौटी पर कसते हैं. ऐसा भी नहीं कि वे किसी 'पॉलिटिकल करेक्टनेस' को निभाने की कोशिश करते हों, वे बस उन्हें एक ज़रूरी और छूटा हुआ अर्थ देते हैं जिससे कविता अचानक प्रासंगिक हो उठती है. 
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