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प्रियदर्शन

एनडीटीवी इंडिया में 15 वर्षों से कार्यरत. उपन्यास 'ज़िंदगी लाइव', कहानी संग्रह 'बारिश, धुआं और दोस्त' और 'उसके हिस्से का जादू', कविता संग्रह 'नष्ट कुछ भी नहीं होता' सहित नौ किताबें प्रकाशित. कविता संग्रह मराठी में और उपन्यास अंग्रेज़ी में अनूदित. सलमान रुश्दी और अरुंधती रॉय की कृतियों सहित सात किताबों का अनुवाद और तीन किताबों का संपादन. विविध राजनैतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों पर तीन दशक से नियमित विविधतापूर्ण लेखन और हिंदी की सभी महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन.

  • बीजेपी शासित राज्यों में 'पद्मावत' के विरुद्ध चल रहे हिंसक प्रदर्शन बताते हैं कि हमारी लोकतांत्रिक चेतना किस हद तक सामंती जकड़न में क़ैद और कुंद होती जा रही है. सेंसर बोर्ड की हरी झंडी और सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद 'पद्मावती' के प्रदर्शन को लगभग नामुमकिन बना दिया गया है.
  • आप के 20 विधायकों को अयोग्य घोषित किए जाने से पैदा हुआ राजनीतिक संकट दिल्ली की तीनों पार्टियों बीजेपी, कांग्रेस और आप के लिए एक नई चुनौती भी है. अगले छह महीने में इन 20 सीटों पर चुनाव होंगे जो किसी छोटे राज्य के पूरे चुनाव से कम नहीं होंगे. 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले ये चुनाव अपने-अपने पानी की परख करने का अवसर होंगे.
  • कई बार असावधानी से पढ़ते हुए कुंवर नारायण किसी को बहुत मामूली कवि लग सकते हैं- ऐसे ठंडे कवि जो काव्योचित ऊष्मा पैदा नहीं करते. उनमें सूक्तियां चली आती हैं, व्यंग्य चला आता है, बहुधा सामान्य ढंग से कही गई बातें चली आती हैं. मगर ध्यान से देखें तो यही मामूलीपन कुंवर नारायण को बड़ा बनाता है. उनको पढ़ते हुए अचानक हम पाते हैं कि यह सिर्फ कविता नहीं है, एक पूरा सभ्यता विमर्श है जो अपने निष्कर्षों को लेकर बेहद चौकन्ना भी है. यह अनायास नहीं है कि मिथकों और इतिहास को अपनी कविता का रसायन बनाते हुए भी कुंवर नारायण उनके भव्य अर्थों के प्रलोभन में नहीं फंसते, उन्हें बिल्कुल समकालीन और आधुनिक मूल्यों की कसौटी पर कसते हैं. ऐसा भी नहीं कि वे किसी 'पॉलिटिकल करेक्टनेस' को निभाने की कोशिश करते हों, वे बस उन्हें एक ज़रूरी और छूटा हुआ अर्थ देते हैं जिससे कविता अचानक प्रासंगिक हो उठती है. 
  • पाकिस्तान की मुख्यधारा दुर्भाग्य से अब भी वही लोग बना रहे हैं जो पाकिस्तान को बिल्कुल किसी अंधेरे दौर में ले जाने पर आमादा हैं. पहले अल्लाह, आर्मी और अमेरिका का जो त्रिकोण पाकिस्तान को चलाता था, उसका गठजोड़ भले एक-दूसरे से कुछ कमज़ोर हुआ हो, लेकिन अब भी पाकिस्तान इन्हीं तीन ताकतों के बीच जैसे झूल रहा है. वहां कट्टरता गहरी हो रही है या उसके आगे समर्पण बड़ा हो रहा है.
  • हिंदी को सबसे ज़्यादा हिंदी प्रेमियों से बचाने की जरूरत है. हिंदी रक्षा का काम कुछ लोग उसी तरह करना चाहते हैं जैसे गोरक्षा का काम करते हैं. वे अचानक हिंदी से तमाम तद्भव, देशज-विदेशज शब्दों को हटाने की मांग करते हैं. कुछ अरसा पहले दीनानाथ बतरा के नेतृत्व में बनी एक कमेटी ने पाठ्य पुस्तकों से ऐसे शब्दों को हटाने की सिफ़ारिश की. यह सबसे ख़तरनाक मांग है. भाषाओं को सबसे ज़्यादा शुद्धतावाद मारता है.
  • अनुपम मिश्र स्मार्टफोन और इंटरनेट के इस दौर में चिट्ठी-पत्री और पुराने टेलीफोन के आदमी थे. लेकिन वे ठहरे या पीछे छूटे हुए नहीं थे. वे बड़ी तेजी से हो रहे बदलावों के भीतर जमे ठहरावों को हमसे बेहतर जानते थे.
  • सिनेमाघरों में फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रगान की अनिवार्यता के सुप्रीम कोर्ट के आदेश ने एक अजीब स्थिति पैदा कर दी है. हम सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना नहीं कर सकते, लेकिनइस पर अमल में राष्ट्रगान की अवमानना का ख़तरा निहित है, जिसे हम नज़रअंदाज़ भी नहीं कर सकते. ख़तरा यह भी है कि जल्द ही सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश को कुछ उत्साही देशभक्तसिनेमाघरों में अपने स्तर पर लागू करवाने के नाम पर कई अशोभनीय और हिंसक दृश्य उपस्थित कर सकते हैं.
  • असली सवाल यहीं छुपा है- इस युद्धवाद में कितना देशप्रेम है और कितना वह उन्माद जो हाल के वर्षों में बाकायदा एक विचारधारा की तरह विकसित किया गया है? वे कौन से लोग हैं जो विपक्ष में रहते हुए भारत के पौरुष को ललकारते रहे और एक के बदले दस सैनिकों के सिर काट कर लाने की बात करते रहे?
  • वे जैसे धीमी गति से चलने वाले समाचारों के दिन थे- हालांकि कतई उनींदे नहीं। उन दिनों एक अजब सी ऊष्मा, एक अजब सी ऊर्जा पूरे जीवन और समाज में दिखती थी। बेशक, आज जैसी दानवी रफ़्तार उन दिनों नहीं थी जिसमें हर कोई जैसे हांफता हुआ, अपने विगत को कुचलता हुआ, सब कुछ भूलता हुआ, बस दौड़े जा रहा है।
  • दरअसल महाश्वेता अपने-आप में प्रतिरोध की आवाज़ थीं - प्रतिरोध की आस्था थीं। उनको देखकर लेखन और संघर्ष में एक भरोसा जागता था। बेशक, वे पिछले कई दिनों से बीमार थीं - अस्पताल में भर्ती थीं। लेकिन तब भी वे ऐसे समय गईं, जब इस प्रतिरोध, संघर्ष और भरोसे की ख़ासी ज़रूरत थी।
  • नैतिक तौर पर हमें सौमित की मृत्यु पर शोक करने का अधिकार नहीं है- लेकिन यह समझने की ज़रूरत है कि इस मृत्यु में हम सबकी धीमी मृत्यु भी प्रतिबिंबित है- देर-सबेर फिर किसी की बारी आएगी और फिर कोई एक बेमानी सी श्रद्धांजलि लिखेगा।
  • जन्मदिन पर जनकवि नागार्जुन को याद करते हुए अगर संकोच होता है तो शायद इसलिए भी कि अगर वह जीवित होते तो शायद इस पर ठठा कर हंस पड़ते। कई अर्थों में वह खड़ी हिंदी के आख़िरी महाकवि रहे।
  • अगर वह गोमांस था- जैसा कि मथुरा की प्रयोगशाला की फॉरेसिंक रिपोर्ट बताती है- तब भी क्या भीड़ को यह हक़ था कि वह अख़लाक़ के घर हमला करे और उसे पीट-पीट कर मार डाले?
  • क्या बाई के काम को इतनी हिकारत से देखना चाहिए जितनी हिकारत से 'निल बटे सन्नाटा' नाम की फिल्म देखती है? मां-बेटी के रिश्तों, उनके सपनों और संघर्षों पर बनी और एक कोमल लय में चलती यह कारोबारी फिल्म इस एक सवाल पर एक बड़ी दुविधा पैदा करती है।
  • बेशक, भारत की कल्पना में एक भारत माता भी होनी चाहिए। देश सिर्फ़ कागज़ का नक़्शा नहीं होता। उसके साथ भावुक रिश्ता होता है। अगर भारत माता नहीं होगी, तो वह शुष्क भूगोल का नाम होगा, हमारी नसों में बजने वाले संगीत का नहीं, होंठों पर तिरने वाली कविता का नहीं, रगों में दौड़ने वाले खून का नहीं।
  • उत्तर प्रदेश में चले राम मंदिर आंदोलन ने उत्तर प्रदेश को कम से कम 20 साल पीछे धकेल दिया। न राम मंदिर बन पाया और न उत्तर प्रदेश। बीजेपी दोनों को छोड़कर आगे बढ़ गई।
  • जो लोग यह मान रहे हैं कि महज दस लड़कों के कुछ नासमझी भरे नारों के लिए जेएनयू को बदनाम किया जा रहा है, वे दरअसल एक भारी भूल कर रहे हैं। यह जेएनयू से ज्यादा जेएनयू की अवधारणा है जो बीजेपी, संघ परिवार और दक्षिणपंथी विचारधारा को स्वीकार्य नहीं है।
  • ज़ोर-ज़ोर से बोलें, भारत माता की जय। बीच-बीच में किसी लेखक या बुद्धिजीवी की पिटाई करते रहें। किसी किताब या कलाकृति में आपकी नजर में कुछ राष्ट्रविरोधी हो तो फौरन उसका विरोध करें, उसे जला दें या तोड़फोड़ दें।
  • स्मार्ट सिटी को हिंदी में क्या कहेंगे? इसके लिए हिंदी में क़ायदे का कोई शब्द नहीं मिलता। अनुवाद करके कुछ बनाना चाहें तो शायद हम कुछ शब्द गढ़ लेंगे, लेकिन उनमें स्मार्ट शहर वाली स्मार्टनेस और जीवंतता नहीं होगी - वे वैसी ही कृत्रिम और बेजान अभिव्यक्ति के वाहक होंगे जो हमें कई दूसरे अनुवादों में दिखती है।
  • 'हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी, जिसको भी देखना बार-बार देखना।' सोमवार की सुबह आख़िरी सांस लेने वाले शायर निदा फ़ाज़ली की ताकत यही थी- बेहद सादा ज़ुबान में ढली उनकी नज़्में और ग़ज़लें बार-बार देखे और पढ़े जाने का न्योता देती थीं।
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