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राकेश कुमार मालवीय

पिछले 13 साल से पत्रकारिता, लेखन और संपादन से जुड़े हैं. वंचित और हाशिये के समाज के सरोकारों को करीब से महसूस करते हैं. ग्राउंड रिपोर्टिंग पर फोकस. सामाजिक सरोकारों पर लेखन के लिए नेशनल फाउंडेशन फॉर इंडिया नेशनल अवार्ड, रीच मीडिया फैलोशिप, विकास संवाद मीडिया फैलोशिप के लिए चुना गया. वर्तमान में भोपाल में रहकर लेखन, रिसर्च, मीडिया एडवोकेसी के काम से सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं.

  • यह पूरा एक चक्र है जो एक महिला की शादी से लेकर उसके मां बनने तक चलता है, और इसकी कोई भी कड़ी कमजोर होने से बेहतर करने की कोशिश धरी की धरी रह जाती है. यूपी में सबसे ज्यादा बुरे हालात हैं. अब देखना यह होगा कि शाकाहार के रास्ते पर चल रही सरकार भरपूर शाकाहारी पोषण का सहज रास्ता क्या निकालती है...?
  • सवाल यह भी है कि किसी भी विचारधारा की सरकारें गद्दी पर आसीन हों, क्या अंतरराष्ट्रीय राजनीति और बाज़ार की ताकतें उसमें अपनी भूमिका निभाती हैं. उद्योग से हम सेवा करने की उम्‍मीद नहीं करते हैं. वह तो लाभ कमाने के लक्ष्‍य से ही आगे बढ़ता है.
  • बच्चे किसी मुख्यधारा की राजनीति का एजेंडा कभी नहीं बने हैं. बच्चों की स्थिति पर कभी कोई सरकार न बनी, न गिरी. बच्चों को एजेंडे में लाकर वोट हासिल भी नहीं किए जा सकते. अब सवाल यह है कि बच्चे यदि ऐसी किसी प्रक्रिया का हिस्सा नहीं है, तो उनके भयावह आंकड़े कब ठीक होंगे.
  • हम खूब महिला दिवस मना लें, लेकिन सच तो यही है कि हिन्दुस्तान में महिलाएं न घर से बाहर सुरक्षित हैं, न घर में सर्व-सम्मानित. हाल ही में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के नतीजे जारी किए गए हैं. इन नतीजों में तमाम मानक तो यही कहानी पेश कर रहे हैं.
  • थोड़ी लिखा-पढ़ी की जाती और आंकड़ों को खंगाला जाता तो उत्तर प्रदेश का वह चेहरा सामने आता है, जहां अभी सरकार को बहुत काम करना था. सोचने की बात यह है कि ऐसे चुनावी समय में, जबकि ऐसे संवेदनशील विषय विपक्षी पार्टियों के लिए सरकार को घेरने के मौके तथ्यात्मक और गंभीर तरीके से दे सकते थे, उस वक्त भी यह बहस गधे-घोड़ों में उलझकर रह गई.
  • भोली जनता उस वक्त और ठगी सी रह जाती है जब विकास न करने के लिए राज्य, केंद्र और केंद्र, राज्य को बिना सोचे-समझे कठघरे में खड़ा कर देते हैं. एक बोलता है हम केंद्र से पैसा भेजते हैं वह आप तक नहीं पहुंच पाते, दूसरा बोलता है पैसा ही नहीं है तो विकास कहां से करें ! संशय में हैं कि हम नागरिक, दोषी ठहराएं तो कि‍से, श्रेय दें तो कि‍से ?
  • आंगन में बैठी इन महिलाओं को गौर से देखिए. इनके माथे पर बिंदी नहीं है. मांग में सिंदूर भी नहीं. ये सभी विधवा हैं. पति को खोने के बाद अब ये लाचार सी जिंदगी जी रही हैं. यह महिलाएं मध्यप्रदेश के शिवपुरी जिले के पोहरी ब्लॉक के एक ही गांव जाखनौद के एक मोहल्ले में रहती हैं. इन सभी के पति टीबी के कारण मौत का असमय ही शिकार हो गए. इस जिले में गांव-गांव की ऐसी ही कहानी है, जहां आपको मोहल्ले के मोहल्ले टीबी से पीड़ित मिलेंगे. शिवपुरी ही क्यों, तकरीबन 17 हजार साल पुरानी टीबी की यह बीमारी चुपचाप देश के गांव-गांव में फैल रही है. शिवपुरी जिले के बारे में तो कहा जाता है कि इस जिले में रहने वाले बच्चे कुपोषण से असमय मरते हैं और सहरिया आदिवासी टीबी से.
  • इसलिए यदि देश में 10 लाख तालाब जमीन पर बन गए होते, उनमें पानी रुक गया होता, तो दूसरे गांवों में पहुंचकर उतनी निराशा नहीं होती, जितनी गोरवा गांव में पहुंचकर खुशी होती है.
  • यह कहना सही नहीं लगता कि‍ नागरिक देश के लिए अपना योगदान नहीं देते. आरोप तो यह है कि देश की व्यवस्थाएं ही इस कर से देश की सेवा पूरे ईमान से नहीं कर पातीं. थोड़ा-सा व्यंग्य आपने हम पर कर दिया, चलिए, थोड़ा-सा हम भी आप पर कर देते हैं. बजट में हिसाब बराबर हुआ.
  • वो न ‘शानदार’ बोलता है, न ‘जबर्दस्त’ न ‘जिंदाबाद’. सुखदेव किसी के गम मे बावरे भी न हैं. उनका मानसिक संतुलन बिलकुल ठीक है. लेकिन उनका हौसला बीवी की जुदाई में गमगीन दशरथ मांझी से बिलकुल भी कम नहीं है. वही दशरथ मांझी जिसकी कहानी आप रुपहले परदे पर देख चुके हैं. दशरथ ने पहाड़ तोड़ सड़क निकाल दी, सुखदेव ने बंजर पथरीली जमीन खोद पाताल से पानी निकाल दिया.
  • अनुपम हमारे लिए बहुत कुछ छोड़ गए हैं. एक जीवनशैली, एक लेखनशैली, एक विचारशैली, एक व्यक्तित्वशैली. वह हमें इस दौर में भी कभी निराश नहीं करते. हमेशा उम्मीद बंधाते हैं.
  • जिस साल निर्भया जैसा जघन्य बलात्कार का मामला दिल्ली जैसे शहर में हुआ, उस साल नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट में महिलाओं की अस्‍मत तार-तार करने के 24,923 मामले दर्ज हुए.
  • अभी अप्रैल के महीने में हमने शिप्रा नदी को पुनर्जीवित करने की बड़ी-बड़ी घोषणाएं सुनी थीं. आठ महीने बाद हम नर्मदा सेवा यात्रा 'नमामि देवी नर्मदे' शुरू होते देख रहे हैं. सुखद है कि साल-दर-साल बदहाल होती नदियों के बारे में सरकार की तंद्रा टूटी. पहले नर्मदा ही सही. आखिर नर्मदा ने ही तो अपना पानी देकर सिंहस्थ में शिप्रा की लाज बचाई थी.
  • भोपाल की ज़मीन और उस खूनी कारखाने में अब भी मौजूद हजारों टन जहरीले कचरे को हटाए बिना क्या भोपाल असल मायनों में स्वच्छ हो सकता है.
  • 1989 में इसी दिन अंतरराष्ट्रीय बाल अधिकार समझौते को संयुक्त राष्ट्र की महासभा ने पारित किया था, दुनिया के अधिकतर देशों ने इस पर हामी भरते हुए अपने देश में बच्चों की स्थिति सुधारने को कोरा वायदा नहीं बल्कि हस्ताक्षर करके प्रतिबद्धता जताई थी. भारत भी उनमें से एक देश था.
  • समाज में ऐसी व्यवस्थाएं लगभग गायब हैं, जहां कुछ समय बिना नगदी के भी काम चल जाया करता था. इस पूरे सिस्टम ने बाजार को गुलामी में ऐसा जकड़ा है कि उसका छूटना लगभग मुश्किल है. आखिर क्यों कुछ कागजी मुद्राओं के एक-दो दिन बंद होने से इतना हल्ला मचना चाहिए...?
  • राकेश कुमार सिंह के कुछ सामान्य से सवाल हैं, जो उन्होंने अपनी टीशर्ट पर लिख रखे हैं. वह कहते हैं कि मैं तो वह पाठशाला खोजने निकला हूं जहां कि बलात्कारी पैदा होते हैं, जहां कि महिलाओं के खिलाफ अत्याचार करने वाले पैदा होते हैं, जहां कि दहेज लोभी बनाए जाते हैं.
  • उत्तरप्रदेश की राजनैतिक-सामाजिक चेतना से यह सवाल पूछा जाना चाहिए, आखिर बच्चों के लिए वह एक सुरक्षित समाज आज तक क्यों नहीं बना पाए.
  • जब कोई विदेशी पर्यटक भारत में गरीब-लाचार लोगों की तस्वीरें लेता है, कुपोषित बच्चों की तस्वीरें उतारता है, सड़क पर भीख मांगते लोगों को दया का पात्र मानता है, ढाबों-होटलों में बच्चों को टेबल साफ करते देखता है, तो वह समझता है, यही भारत है. ऐसे भारत पर हमको भी दया आती है. हम कामना करते हैं किसी भी पर्यटक को ऐसा भारत खोजने से भी न मिले.
  • सत्ता से बाहर बैठकर विरोध करने और सत्ता में बैठकर निर्णय लेने में बहुत फर्क होता है. सत्ता को यह समझ आ रहा है कि कश्मीर का हल किए बिना कोई भी ठोस नतीजा सामने नहीं आ सकता.
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