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राकेश कुमार मालवीय

पिछले 13 साल से पत्रकारिता, लेखन और संपादन से जुड़े हैं. वंचित और हाशिये के समाज के सरोकारों को करीब से महसूस करते हैं. ग्राउंड रिपोर्टिंग पर फोकस. सामाजिक सरोकारों पर लेखन के लिए नेशनल फाउंडेशन फॉर इंडिया नेशनल अवार्ड, रीच मीडिया फैलोशिप, विकास संवाद मीडिया फैलोशिप के लिए चुना गया. वर्तमान में भोपाल में रहकर लेखन, रिसर्च, मीडिया एडवोकेसी के काम से सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं.

  • आंगन में बैठी इन महिलाओं को गौर से देखिए. इनके माथे पर बिंदी नहीं है. मांग में सिंदूर भी नहीं. ये सभी विधवा हैं. पति को खोने के बाद अब ये लाचार सी जिंदगी जी रही हैं. यह महिलाएं मध्यप्रदेश के शिवपुरी जिले के पोहरी ब्लॉक के एक ही गांव जाखनौद के एक मोहल्ले में रहती हैं. इन सभी के पति टीबी के कारण मौत का असमय ही शिकार हो गए. इस जिले में गांव-गांव की ऐसी ही कहानी है, जहां आपको मोहल्ले के मोहल्ले टीबी से पीड़ित मिलेंगे. शिवपुरी ही क्यों, तकरीबन 17 हजार साल पुरानी टीबी की यह बीमारी चुपचाप देश के गांव-गांव में फैल रही है. शिवपुरी जिले के बारे में तो कहा जाता है कि इस जिले में रहने वाले बच्चे कुपोषण से असमय मरते हैं और सहरिया आदिवासी टीबी से.
  • इसलिए यदि देश में 10 लाख तालाब जमीन पर बन गए होते, उनमें पानी रुक गया होता, तो दूसरे गांवों में पहुंचकर उतनी निराशा नहीं होती, जितनी गोरवा गांव में पहुंचकर खुशी होती है.
  • यह कहना सही नहीं लगता कि‍ नागरिक देश के लिए अपना योगदान नहीं देते. आरोप तो यह है कि देश की व्यवस्थाएं ही इस कर से देश की सेवा पूरे ईमान से नहीं कर पातीं. थोड़ा-सा व्यंग्य आपने हम पर कर दिया, चलिए, थोड़ा-सा हम भी आप पर कर देते हैं. बजट में हिसाब बराबर हुआ.
  • वो न ‘शानदार’ बोलता है, न ‘जबर्दस्त’ न ‘जिंदाबाद’. सुखदेव किसी के गम मे बावरे भी न हैं. उनका मानसिक संतुलन बिलकुल ठीक है. लेकिन उनका हौसला बीवी की जुदाई में गमगीन दशरथ मांझी से बिलकुल भी कम नहीं है. वही दशरथ मांझी जिसकी कहानी आप रुपहले परदे पर देख चुके हैं. दशरथ ने पहाड़ तोड़ सड़क निकाल दी, सुखदेव ने बंजर पथरीली जमीन खोद पाताल से पानी निकाल दिया.
  • अनुपम हमारे लिए बहुत कुछ छोड़ गए हैं. एक जीवनशैली, एक लेखनशैली, एक विचारशैली, एक व्यक्तित्वशैली. वह हमें इस दौर में भी कभी निराश नहीं करते. हमेशा उम्मीद बंधाते हैं.
  • जिस साल निर्भया जैसा जघन्य बलात्कार का मामला दिल्ली जैसे शहर में हुआ, उस साल नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट में महिलाओं की अस्‍मत तार-तार करने के 24,923 मामले दर्ज हुए.
  • अभी अप्रैल के महीने में हमने शिप्रा नदी को पुनर्जीवित करने की बड़ी-बड़ी घोषणाएं सुनी थीं. आठ महीने बाद हम नर्मदा सेवा यात्रा 'नमामि देवी नर्मदे' शुरू होते देख रहे हैं. सुखद है कि साल-दर-साल बदहाल होती नदियों के बारे में सरकार की तंद्रा टूटी. पहले नर्मदा ही सही. आखिर नर्मदा ने ही तो अपना पानी देकर सिंहस्थ में शिप्रा की लाज बचाई थी.
  • भोपाल की ज़मीन और उस खूनी कारखाने में अब भी मौजूद हजारों टन जहरीले कचरे को हटाए बिना क्या भोपाल असल मायनों में स्वच्छ हो सकता है.
  • 1989 में इसी दिन अंतरराष्ट्रीय बाल अधिकार समझौते को संयुक्त राष्ट्र की महासभा ने पारित किया था, दुनिया के अधिकतर देशों ने इस पर हामी भरते हुए अपने देश में बच्चों की स्थिति सुधारने को कोरा वायदा नहीं बल्कि हस्ताक्षर करके प्रतिबद्धता जताई थी. भारत भी उनमें से एक देश था.
  • समाज में ऐसी व्यवस्थाएं लगभग गायब हैं, जहां कुछ समय बिना नगदी के भी काम चल जाया करता था. इस पूरे सिस्टम ने बाजार को गुलामी में ऐसा जकड़ा है कि उसका छूटना लगभग मुश्किल है. आखिर क्यों कुछ कागजी मुद्राओं के एक-दो दिन बंद होने से इतना हल्ला मचना चाहिए...?
  • राकेश कुमार सिंह के कुछ सामान्य से सवाल हैं, जो उन्होंने अपनी टीशर्ट पर लिख रखे हैं. वह कहते हैं कि मैं तो वह पाठशाला खोजने निकला हूं जहां कि बलात्कारी पैदा होते हैं, जहां कि महिलाओं के खिलाफ अत्याचार करने वाले पैदा होते हैं, जहां कि दहेज लोभी बनाए जाते हैं.
  • उत्तरप्रदेश की राजनैतिक-सामाजिक चेतना से यह सवाल पूछा जाना चाहिए, आखिर बच्चों के लिए वह एक सुरक्षित समाज आज तक क्यों नहीं बना पाए.
  • जब कोई विदेशी पर्यटक भारत में गरीब-लाचार लोगों की तस्वीरें लेता है, कुपोषित बच्चों की तस्वीरें उतारता है, सड़क पर भीख मांगते लोगों को दया का पात्र मानता है, ढाबों-होटलों में बच्चों को टेबल साफ करते देखता है, तो वह समझता है, यही भारत है. ऐसे भारत पर हमको भी दया आती है. हम कामना करते हैं किसी भी पर्यटक को ऐसा भारत खोजने से भी न मिले.
  • सत्ता से बाहर बैठकर विरोध करने और सत्ता में बैठकर निर्णय लेने में बहुत फर्क होता है. सत्ता को यह समझ आ रहा है कि कश्मीर का हल किए बिना कोई भी ठोस नतीजा सामने नहीं आ सकता.
  • सतर्क रहिए, सुरक्षित रहिए. सुरक्षा के हर संभव इंतजाम कीजिए. लेकिन असली दुश्मनों को भी पहचानिए. पहचानिए कि नौकरशाही की कौन सी कुर्सी देश के लिए खतरनाक काम कर रही है.
  • बात-बात पर रिश्वत लेने-देने वाला, टैक्स बचाने के तमाम जतन करने वाला, सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने वाला, अपनी ही बहन-बेटियों के साथ बलात्कार करने वाला, हत्याएं करने वाला, पड़ोसियों से जलने वाला, एक-दूसरे को नीचा दिखाने वाला यह समाज जब देशभक्ति की बातें करता है, तो इन्हें पचाना आसान नहीं होता...?
  • एक वह दौर था जब बच्चे अंग्रेजी में पास होने के लिए अपने 17 नंबरों को निबंध, आवेदन और सवालों से जोड़ लिया करते थे उसमें भी हम कभी ‘वंडर ऑफ साइंस’ और ‘अवर नेशनल लीडर महात्मा गांधी’ से ज्यादा कुछ नहीं सोच पाए, शहरी परिवेश में अब स्कूली शिक्षा में हिन्दी का ठीक वही हाल हो रहा है जो कभी इस तरह की अंग्रेजी का था.
  • ''यहां अगर हम आज के हिंदुस्तान में गाय को वही जगह देना चाहते है तो पहली जरूरत यह है कि पूजा के घुटन भरे दायरे से निकालकर उसे सौंदर्य और उपयोगिता के स्तर पर पहचान दिलाएं. जिस देश की खेती गिरी हुई हो, जहां मिलावटी दूध हो और घी गायब होता जा रहा हो, जहां दुनिया की सबसे अधिक गाय सबसे कम दूध देती हों, वहां गाय-पूजा बेमतलब, बेजान चीज है. गाय-पूजा दरअसल गाय उपेक्षा का दूसरा नाम है और उसका बहाना है.
  • लेकिन दिक्कत यही है कि ऐसे मुश्किल हालात में भी हम कागजों, रिपोर्टों में तरक्की कर रहे हैं, विज्ञापनों में 'शाइनिंग इंडिया' से लेकर 'सबका साथ, सबका भरपूर विकास' हो रहा है. हमारे पास दिखाने को बहुत कुछ है, और छिपाने को भी बहुत कुछ...! जिस दिन हम छिपाने की कोशिश सबसे कम करना शुरू कर देंगे, समझिएगा कि अब सब कुछ ठीक होने लगा है. इस मुश्किल समाज में यह पंक्तियां ही याद आती हैं...
  • क्रिकेट से कोई बैर नहीं, और क्रिकेट अन्य खेलों का दुश्मन भी नहीं. बैर उसकी भक्ति से है. क्यों न हम खेलों में ऑस्ट्रेलिया हो जाते हैं, क्रिकेट में भी जीतते हैं और ओलिम्पिक में भी सिर ऊंचा करके आते हैं.
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