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राकेश कुमार मालवीय

पिछले 13 साल से पत्रकारिता, लेखन और संपादन से जुड़े हैं. वंचित और हाशिये के समाज के सरोकारों को करीब से महसूस करते हैं. ग्राउंड रिपोर्टिंग पर फोकस. सामाजिक सरोकारों पर लेखन के लिए नेशनल फाउंडेशन फॉर इंडिया नेशनल अवार्ड, रीच मीडिया फैलोशिप, विकास संवाद मीडिया फैलोशिप के लिए चुना गया. वर्तमान में भोपाल में रहकर लेखन, रिसर्च, मीडिया एडवोकेसी के काम से सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं.

  • इस चेहरे को गौर से देखिए। इस ब्लॉग की तस्वीर के हर चेहरे को गौर से देखिए. यह चेहरा पिछले तीस-पैंतीस सालों से एक संघर्ष का प्रतीक है. इस जैसे पैंतीस-चालीस हजार आम चेहरों की सालों से एक छोटी सी लड़ाई है. लड़ाई है अपनी जमीन से न उजाड़े जाने की.
  • लड़की दोहरा संघर्ष करती हैं। घर भी चलाती हैं और पढ़ भी लेती हैं, प्रथम श्रेणी भी हासिल कर लेती हैं, अपने माता-पिता का घर चलाने में मदद भी करवाती हैं, छोटे-छोटे कामों से, लेकिन वंश तो लड़का ही चलाता है।
  • सच है गणेश जी सरकार पर बड़ी कृपा करते हैं, और सरकार उन पर। लोग तो केवल मतदाता हैं, पांच साल में एक बार वोट भर देते हैं...
  • मध्यप्रदेश देश का पहला ऐसा राज्य बन गया है जिसने लोगों की खुशियों के लिए आधिकारिक रूप से चिंता जताई है। समाज में आनंद का तत्व लाने के लिए यहां पर एक ‘हैप्पीनेस मिनिस्ट्री’ का गठन करने को कैबिनेट ने मंजूरी दे दी है। क्या खुशहाली का यह राग दुखों के नगमों पर भारी पड़ सकेगा?
  • वह लड़की ही जानती है कि चलती रेल में उसके साथ क्या हुआ, या वह आदमी जानता है कि उसने लड़की को छुआ, या नहीं छुआ, या गलती से छुआ, लेकिन 'प्रभु' की रेल में महिलाओं की आवाज को बीच में गायब होते ज़रूर देखा।
  • सवाल यह है कि शिशु मरते क्यों हैं? परिवार मारता है, समाज मारता है, व्यवस्था मारती है, राजनीति मारती है या वह खुद ही मर जाते हैं? जवाब सभी को खोजना होगा। जीना हर बच्चे का हर शिशु का अधिकार है, कोई भी मौत उसके नैसर्गिक अधिकार का हनन है।
  • कुछ परिस्थितियां हमें दिखाई नहीं देती, कुछ देखना नहीं चाहते, और कुछ के इतने आदी हो जाते हैं कि वह हमें असामान्य दिखाई ही नहीं देती। बच्चों से जुड़े सारे मुद्दों के हालात ही ऐसे हैं जिन पर समाज में बहुत कम संवाद हैं।
  • हमारी सरकारी व्यवस्थाओं का हाल देखिये, देखिये कि कैसे यह जन कल्याण की बेहद महत्वपूर्ण व्यवस्थाएं नाकारा हो रही हैं या...इन्हें नाकारा बनाया जा रहा है? इसकी जवाबदेही कौन लेगा?
  • आखिरी ओवर के बाद जब लगातार पिछले मैच की तरह ही हारते-हारते डेविड वॉर्नर की टीम ने जज्बा दिखाया और अंतत: फतह को गले से लगाया तो हजारों लोग मायूस हो गए। विराट को ट्रॉफी को अपने हाथों में लेकर चूमते देखने की तमन्ना लाखों लोगों के बीच अधूरी ही रही। मैं हैरान था कि कहीं से कोई पटाखे की आवाज नहीं आ रही थी।
  • सांस्कृतिक रूप से एक ही इलाका है, बुंदेलखंड, राजनैतिक रूप से दो राज्यों में बंटा हुआ, विचित्र बात है कि एक ही इलाके में सूखे से निपटने की दो भिन्न परिस्थितियां हैं। एक जगह बेहतर काम हो रहा है, दूसरी जगह वही कछुआ चाल है।
  • जितने लोग अब से दो साल पहले सड़कों पर बेघरबार थे, अब भी वैसे ही लू के थपेड़े सह रहे हैं। दो साल का वक्त यूं तो काफी नहीं होता है, लेकिन यदि आप इसमें भी घर-रोटी और रोजगार से ज्यादा प्राथमिकता शौचालय को देंगे, तो जाहिर सी बात है कि बिना पानी के वह कैसे काम करेंगे?
  • फेसबुक पर एक मित्र ने पोस्ट शेयर की, शीर्षक था 'बस यही बाकी रह गया था।' नजर पोस्ट के साथ नत्थी तस्वीर पर गई। एक सरकारी आदेश था। चार प्राचार्यों को जूते-चप्पल की रखवाली की जिम्मेदारी दी गई थी...
  • सोचिए गर्भवती मां हिंसा का शिकार हो तो। जब एक स्त्री को देखभाल की सबसे अधिक जरूरत है, जब उसे परिवार के मानसिक और शारीरिक सहारे की सबसे ज्यादा जरूरत है उस स्थिति में भी वह हिंसा का शिकार हो, उसे मारा पीटा जाए, नाना प्रकार से सताया जाए तो..?
  • सोचना यह भी होगा कि जब हम रायसेन के पास सलामतपुर के बांशिदों की रिवर्स माइग्रेशन की तारीफ कर रहे होते हैं तो दूसरी ओर हमारी नीतियों में व्यापक रूप से क्या यह मॉडल आ पाता है।
  • सोचिये कि कब तक हम उन्हें दलितों का नाम पर एक आईकॉन की तरह देखते रहेंगे। एक समता मूलक समाज की रचना में कितना और समय लगाएंगे ?
  • सातवें वेतन आयोग के जरिये सरकारी कर्मचारियों के वारे-न्यारे कर देने वाली सरकार की अंटी से मजदूरों के लिए पैसा न निकला...! ये दो चेहरे किसके लिए हैं... मंदी है तो सबके लिए है, सब उसका सामना करेंगे, और यदि समृद्धि है तो भी सबके लिए है...
  • केरल की घटना सबक की तरह सामने आई है, सरकार चेतेगी। उसे चेतना ही होगा। व्यवस्थाओं में कसावट लानी होगी, लेकिन यह भागीदार लोगों के लिए भी बड़ा सबक है। यह उनकी अपनी सुरक्षा का सवाल है, इसलिए समाज का हर तबका मिलकर ही इसे सुरक्षित और आनंदमय बना सकता है।
  • हमने 'मौन' रहकर भी खुशी का इन्तज़ार किया और 'मन की बात' कहकर भी खुशी को बुला रहे हैं, लेकिन वह आती नहीं... भेड़ियाघसान की तरह एक दिशा में मुंह करके भागते जा रहे समाज को कोई तो बताए कि खुशी आखिर कैसे आएगी...?
  • पिछले सालों में हम जो विधानसभाओं में अपने वेतन के लिए उदारमना विधायकों को देखते रहे हैं, उनसे एक बात स्पष्ट हो जाती है कि जहां अपनी बात आती है वहां माननीय वैसा रुख नहीं अपनाते, चाहे विपक्ष ही क्यों न हो ! सही है, वैसा रुख अपनाएं ही क्यों?
  • कल रात जब बांग्लादेश से भारत की क्रिकेट टीम अपना किला भिड़ा रही थी, तब ऐसा ही हुआ। लंबे समय बाद ऐसा हुआ। परिणाम चाहे जिस तरफ जाता, विजय चाहे जिसे चुनती, लेकिन केवल खेल और केवल खेल के नजरिए से देखा जाए तो यह एक बेहद रोमांचक मुकाबला साबित हुआ।
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