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राकेश कुमार मालवीय

पिछले 13 साल से पत्रकारिता, लेखन और संपादन से जुड़े हैं. वंचित और हाशिये के समाज के सरोकारों को करीब से महसूस करते हैं. ग्राउंड रिपोर्टिंग पर फोकस. सामाजिक सरोकारों पर लेखन के लिए नेशनल फाउंडेशन फॉर इंडिया नेशनल अवार्ड, रीच मीडिया फैलोशिप, विकास संवाद मीडिया फैलोशिप के लिए चुना गया. वर्तमान में भोपाल में रहकर लेखन, रिसर्च, मीडिया एडवोकेसी के काम से सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं.

  • सोचिए गर्भवती मां हिंसा का शिकार हो तो। जब एक स्त्री को देखभाल की सबसे अधिक जरूरत है, जब उसे परिवार के मानसिक और शारीरिक सहारे की सबसे ज्यादा जरूरत है उस स्थिति में भी वह हिंसा का शिकार हो, उसे मारा पीटा जाए, नाना प्रकार से सताया जाए तो..?
  • सोचना यह भी होगा कि जब हम रायसेन के पास सलामतपुर के बांशिदों की रिवर्स माइग्रेशन की तारीफ कर रहे होते हैं तो दूसरी ओर हमारी नीतियों में व्यापक रूप से क्या यह मॉडल आ पाता है।
  • सोचिये कि कब तक हम उन्हें दलितों का नाम पर एक आईकॉन की तरह देखते रहेंगे। एक समता मूलक समाज की रचना में कितना और समय लगाएंगे ?
  • सातवें वेतन आयोग के जरिये सरकारी कर्मचारियों के वारे-न्यारे कर देने वाली सरकार की अंटी से मजदूरों के लिए पैसा न निकला...! ये दो चेहरे किसके लिए हैं... मंदी है तो सबके लिए है, सब उसका सामना करेंगे, और यदि समृद्धि है तो भी सबके लिए है...
  • केरल की घटना सबक की तरह सामने आई है, सरकार चेतेगी। उसे चेतना ही होगा। व्यवस्थाओं में कसावट लानी होगी, लेकिन यह भागीदार लोगों के लिए भी बड़ा सबक है। यह उनकी अपनी सुरक्षा का सवाल है, इसलिए समाज का हर तबका मिलकर ही इसे सुरक्षित और आनंदमय बना सकता है।
  • हमने 'मौन' रहकर भी खुशी का इन्तज़ार किया और 'मन की बात' कहकर भी खुशी को बुला रहे हैं, लेकिन वह आती नहीं... भेड़ियाघसान की तरह एक दिशा में मुंह करके भागते जा रहे समाज को कोई तो बताए कि खुशी आखिर कैसे आएगी...?
  • पिछले सालों में हम जो विधानसभाओं में अपने वेतन के लिए उदारमना विधायकों को देखते रहे हैं, उनसे एक बात स्पष्ट हो जाती है कि जहां अपनी बात आती है वहां माननीय वैसा रुख नहीं अपनाते, चाहे विपक्ष ही क्यों न हो ! सही है, वैसा रुख अपनाएं ही क्यों?
  • कल रात जब बांग्लादेश से भारत की क्रिकेट टीम अपना किला भिड़ा रही थी, तब ऐसा ही हुआ। लंबे समय बाद ऐसा हुआ। परिणाम चाहे जिस तरफ जाता, विजय चाहे जिसे चुनती, लेकिन केवल खेल और केवल खेल के नजरिए से देखा जाए तो यह एक बेहद रोमांचक मुकाबला साबित हुआ।
  • विचार यह नहीं है कि लोककल्याणकारी राज्य में सरकार को लोककल्याण और सरोकारी योजनाओं, या यूं कहिए कि अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त कर दिया जाए, बल्कि विचार यह भी है कि समाज अपने आसपास के विकास और ज़रूरतों के लिए कितना सजग और सक्रिय है।
  • सोचिए देश में महिलाएं कितना काम करती हैं? यदि मैं कहूं कि देश के लगभग एक साल के बजट के बराबर तो चौंकिएगा नहीं। बावजूद इसके महिलाओं के इन घरेलू, लेकिन महत्वपूर्ण काम का कोई मूल्य नहीं माना जाता है।
  • क्या नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की 2014 रिपोर्ट में दर्ज यह आंकड़ा खतरनाक नहीं है, जो बताता है कि एक साल के दौरान देश में आत्महत्या करने वाले 10,900 लोग थे, जिनकी उम्र 18 साल से कम है।
  • किसानों की औसत आय तो पहले से ही कम है। किसी चतुर्थ श्रेणी नौकरीपेशा से भी कम। ऐसे में हर साल बीस फीसदी के हिसाब से आय बढ़ भी जाए तो किसान आत्महत्याओं वाले देश में यह कदम पर्याप्त होगा ? उसमें भी बीच में मोदी सरकार को एक और चुनाव का सामना करना पड़ेगा।
  • जनकल्याणकारी बजट वही है, जिसमें आम लोगों के लिए पूरी-पूरी गुंजाइश रखी गई हो, हालांकि अच्छी बात यह है कि इस बार किराया न बढ़ाने का संकेत ही काफी होगा। कम से कम यही काफी होगा कि 'अच्छे दिन' आएं न आएं, बुरे तो नहीं ही आएंगे। जैसे दिन गुज़र रहे हैं, वैसे ही गुज़रते रहेंगे।
  • होना तो यह चाहिए कि किसानों की आत्महत्याओं को अब अलग से दर्ज करने का सिस्टम बने, जिसमें हर आत्महत्या का ऑडिट हो, और आत्महत्या की असली वजह का पता लगाया जाए, क्योंकि जब एक किसान मरता है तो पूरा परिवार ही संकट में आ जाता है।
  • कर्ज में लदे किसानों की इतनी हैसियत नहीं है कि वह खेती की बढ़ती लागत के बीच अपने साहस की जोर-आजमाइश कर सकें। यही कारण है कि खेती से लगातार लोग कम होकर शहरों की और पलायन कर रहे हैं। आरोप तो यह भी हैं कि ऐसा अनजाने में नहीं, बल्कि जान बूझकर किया जा रहा है।
  • यह सही है कि विकसित राज्यों में अविकसित राज्यों के मुकाबले बाल लिंगानुपात का गिरता स्तर बड़ी समस्या है, लेकिन इसे सुधारने का रास्ता इस गली से होकर नहीं जाता है। सोचना यह चाहिए कि हमारे समाज में लड़कियों को मारे जाने की सबसे बड़ी वजह क्या है।
  • जनवरी के पहले तक रोहित वेमुला को शायद ही कोई जानता हो, लेकिन कथित हत्या के बाद देश ने गणतंत्र दिवस के सप्ताह भर पहले तक जो कुछ देखा, उसे भारत के हम लोग संविधान में समानता और बराबरी के हक की हत्या के रूप में ही देख रहे हैं।
  • कमाल की बात है, एक और मध्‍य प्रदेश सरकार फसल बर्बादी के लिए तकरीबन साढ़े तीन हजार करोड़ रुपये का मुआवजा भी बांट देती है और दूसरी और बंपर अन्न उत्पादन के लिए तमगा भी हासिल कर लेती है। वह भी ऐसा-वैसा नहीं राष्‍ट्रीय स्‍तर का।
  • देश की शताब्दियों-राजधानियों में सफर करने वाले मुसाफिरों की तो 'डायपर' जैसी समस्या का भी फौरी हल मिल जाता है, लेकिन पैसेंजर गाड़ियों के मुसाफिर उसी फ़िज़ां में सड़ते रहेंगे, क्योंकि उनकी 'दाल-रोटी' किसी सोशल प्लेटफार्म पर मयस्सर नहीं होगी।
  • जब आपने उम्र घटा ही दी है तो क्या अब यह नहीं किया जाना चाहिए कि शादी की उम्र में परिवर्तन कर दिया जाए, क्योंकि हमने मान ही लिया है कि देश में अब 16 साल की उम्र वाले एक किशोर में सोचने-समझने और परिपक्व निर्णय लेने की क्षमता का विकास हो गया है।
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