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रवीश कुमार

प्राइम टाइम एंकर, तीन बार रामनाथ गोयनका पुरस्कार से सम्मानित, 20 साल की पत्रकारिता, ब्लॉगर, फेसबुक पेज @RavishKaPage, ट्विटर @ravishndtv, लेखक - The Free Voice, इश्क़ में शहर होना.

  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 20 मार्च को देश भर के असली चौकीदारों से बात करेंगे. शाम साढ़े चार बजे यह बातचीत होगी. दावा किया जा रहा है कि 25 लाख चौकीदारों को संबोधित किया जाएगा. 31 मार्च को उन चौकीदारों से भी बात करेंगे जो ट्विटर पर बने हैं. इसका मतलब यह हुआ कि बीजेपी चौकीदार वाले अभियान को लेकर गंभीर है. तो हमने सोचा कि उन 25 लाख चौकीदारों में से झारखंड में 10,000 चौकीदारों का हाल पहले ही बता दें, जिन्हें कई महीनों से सैलरी नहीं मिली है. कुछ ज़िलों में नवंबर से सैलरी नहीं मिली है तो कुछ ज़िलों में जनवरी के बाद सैलरी नहीं मिली है. हर त्योहार से पहले इनकी यही खबर होती है कि दिवाली से पहले वेतन नहीं मिला तो फीकी रहेगी दिवाली और होली से पहले वेतन नहीं मिला तो फीकी रहेगी होली.
  • चुनाव शुरू हो चुका है. अभी तक कैच लाइन का पता नहीं है. बल्कि कैच लाइन वालों को मुसीबत का सामना करना पड़ रहा है. हो सकता है अभी आगे के लिए बचा कर रखा हो, मगर जो आ रहा है उसमें मज़ा नहीं आ रहा है. 2014 का चुनाव याद कीजिए. 'अच्छे दिन आने वाले हैं' कैंपेन चल पड़ा था. इस कैंपेन की चुनाव के दौरान धुलाई नहीं हो सकी. उस स्लोगन के बहाने जो लिखा गया, जो गाया गया मतदाता के बड़े वर्ग का वो गीत बनता चला गया. कायदे से स्लोगन तो यही हो सकता था कि अच्छे दिन आ गए हैं, अब आगे बहुते अच्छे दिन आने वाले हैं. विपक्ष ने भी अच्छे दिन कहां है, पूछ-पूछ कर पुराना कर दिया है और सत्ता पक्ष भी इससे बोर हो गया होगा. तभी तो पहले 'मोदी है तो मुमकिन' है लॉन्च हुआ. अगर वो जुबान पर चढ़ा होता तो 'हां मैं भी चौकीदार हूं' लॉन्च नहीं होता.
  • भारत ने अपनी समस्याओं को पहचान लिया है. सारी समस्याओं का एक ही नाम है, नेहरू. भारत में ऐसी कोई समस्या नहीं है जिसकी जड़ में नेहरू नहीं हैं. अगर नेहरू नहीं हैं तो वह समस्या नहीं हैं. दुनिया के पहले ऐसे नेता हैं जिन्होंने अकेले दम पर इतनी समस्याएं पैदा करी हैं.
  • चीन के कारण आतंकी संगठन जैश के मुखिया मसूद अज़हर फिर से ग्लोबल आतंकी घोषण नहीं हो सका. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा समिति की 1267 प्रतिबंध कमेटी की सुनवाई में चीन ने चौथी बार तकनीकि कारणों के आधार पर मसूद अज़हर को ग्लोबल आतंकी नहीं होने दिया.
  • हमने पाकिस्तान को घुस कर मारा. अब चीन को पिचकारी से मार देंगे. होली के पहले जितनी भी पिचकारियां आई हैं, मैं हर देशभक्त से अपील करूंगा कि वह सिर्फ तीन चीज़ें लेकर सीमा पर पहुंचे. एक बाल्टी पानी, रंग और चीन की पिचकारी. इसके बाद हम सब पिचकारी से ही चीन की सेना को ज़ुकाम करा देंगे. छींकते छींकते चीन की बोलती बंद हो जाएगी.
  • मंगलवार को गांधीनगर में अपने पहले राजनीतिक भाषण के बाद अगले दिन प्रियंका गांधी मेरठ चली आईं. उनका मेरठ आना पहले राजनीतिक भाषण से कहीं ज़्यादा राजनीतिक था. उत्तर प्रदेश की राजनीति पर नज़र रखने वाले इस मुलाकात को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकेंगे. भीम आर्मी के नेता चंशेखर आजाद से अभी तक बड़े नेता दूरी बना कर चल रहे थे. कारण यह था कि चंद्रशेखर की अपनी एक स्वतंत्र राजनीतिक विचारधारा है और संगठन है. लगातार जेल में रहने और भाषण देने से रोके जाने के कारण चंद्रशेखर का सियासी व्यक्तित्व भी स्वायत्त हो चुका है.
  • इस चुनाव में मीडिया भी एक मुद्दा है. इस मीडिया के लिए आप कैसे लड़ेंगे यह एक मुश्किल सवाल है, मीडिया खुद के लिए लड़ पाएगा या नहीं यह उसका सवाल है. मगर मीडिया एक मुद्दा है. मीडिया पर इस तरह हमला है और इतना हमला है कि आप भी किन-किन सवालों की परवाह करेंगे, और इसी तरह धीरे-धीरे आप उन सवालों को नज़रअंदाज़ कर सामान्य होने लगेंगे.
  • जब भी चुनाव आता है डॉ प्रणॉय रॉय चुनाव पढ़ने निकल जाते हैं. वे चुनाव कवर करने नहीं जाते हैं. चुनाव पढ़ने जाते हैं.कई साल से उन्हें चुनावों के वक्त दिल्ली से जाते और जगह-जगह से घूम कर लौटते देखता रहा हूं. अक्सर सोचता हूं कि उनके भीतर कितने चुनाव होंगे. वो चुनावों पर कब किताब लिखेंगे. वे अपने भीतर इतने चुनावों को कैसे रख पाते होंगे. हम लोग कहीं घूम कर आते हैं तो चौराहे पर भी जो मिलता है, उसे बताने लगते हैं. मगर डॉ रॉय उस छात्र की तरह चुप रह जाते हैं जो घंटों पढ़ने के बाद लाइब्रेरी से सर झुकाए घर की तरफ चला जा रहा हो.
  • इन पांच सालों में काफी कुछ बदल गया. जो सबसे ज़्यादा बदला वो सवाल पूछने की व्यवस्था. इस व्यवस्था की बुनियाद जाने अनजाने में 1975 में 'दीवार' फिल्म में सलीम जावेद ने डाली थी. जब अमिताभ अपने दारोगा भाई शशि कपूर को कहते हैं कि जाओ पहले उस आदमी का साइन लेकर आओ. मेरी राय में यही लाइन अब लाइन में बदल गई है कि जाओ पहले यह पूछ कर आओ कि 70 सालों में क्यों नहीं हुआ.
  • चुनाव आयोग ने जो चरण बांधे हैं उसे लेकर सवाल उठ रहे हैं. 2014 में बिहार में छह चरणों में चुनाव हुए थे. 2019 में 7 चरणों में होंगे. एक शांतिपूर्ण राज्य में सात चरणों में चुनाव का क्या मतलब है. 2014 में झंझारपुर, मधुबनी, दरभंगा को मधेपुरा, समस्तीपुर, बेगुसराय और खगड़िया के साथ चौथे चरण में रखा गया था. झंझारपुर, मधुबनी और दरभंगा एक दूसरे से सटा हुआ है. इस बार इन तीनों पड़ोसी ज़िले को अलग-अलग चरणों में रखा गया है. झंझारपुर में मतदान तीसरे चरण में यानी 23 अप्रैल को होगा. दरभंगा में मतदान 29 अप्रैल में हैं. मधुबनी में पांचवें चरण में 6 मई को होगा.
  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी इस असफलता को आतंकवाद और राष्ट्रवाद के जोशीले नारों से ढंकने की कोशिश में हैं मगर पांच साल में उस जगह को बर्बाद किया है जहां से किसान आता है और सेना के लिए जवान आता है. इसके बाद भी अगर चैनलों के सर्वे में मोदी की लोकप्रियता 100 में 60 और 70 के स्केल को छू रही है तो इसका मतलब है कि लोग वाकई अपनी आमदनी गंवा कर इस सरकार से बेहद ख़ुश हैं. यह एक नया राजनीतिक बदलाव है.
  • प्यारे नीरव मोदी, लंदन में तुमको लंदनर की तरह देखकर अच्छा लगा. वहां तुम कितने कूल लग रहे थे. हर बात पर नो-कमेंट कहे जा रहे थे. टैक्सी खोजते देखा तो थोड़ा दुख हुआ. तुम्हारे पास अपनी कार क्यों नहीं है. सुपर पावर इंडिया का नीरव मोदी लंदन में टैक्सी खोजे मुझे ठीक नहीं लगा.
  • काशी विश्वनाथ का बनारस बदल गया है. आगे और बदल जाएगा. बनारस के जिस हिस्से को दुनिया के प्राचीन बसावटों में गिना जाता था उसका काफी कुछ अब ग़ायब हो चुका है. सारा बनारस भले बनारस है मगर असली बनारस वही है जो बाबा की नगरी कहलाता है. जहां बाबा विश्वनाथ का मंदिर है और मंदिर के आस पास गलियों का संसार था. आम तौर पर दुनिया के किसी भी देश में ऐसी पुरानी बसावट में ज़रा भी हस्तक्षेप होता तो हलचल मच जाती.
  • हमारी लड़ाई कश्मीर को लेकर है, कश्मीरियों से नहीं है, प्रधानमंत्री ने यह बात देश से कही थी मगर उन्हीं की पार्टी के दो नौजवान कार्यकर्ताओं ने नहीं सुनी. क्या कश्मीरी होना अपने आप में अपराध हो चुका है कि जहां वे दिखाई दे वहां दो चार लोग लाठी डंडा लेकर पीटने लगें. क्या हम इस स्थिति में आ पहुंचे हैं, कभी सोचिएगा कि नफरत करने से पहले कश्मीर या कश्मीरियों के बारे में आप क्या जानते हैं. न्यूज़ चैनलों और व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी के फैलाए प्रोपेगैंडा से आप कश्मीर और कश्मीरियों के बारे में राय रखते हैं तो आपको एक बार खुद को चेक करना चाहिए. वरना आधी अधूरी जानकारी आपको अपराध के रास्ते पर ले जा सकती है.
  • सीक्रेट आउट होने पर ही घोटाला आउट होता है. घोटाला आउट होने पर फाइल को सीक्रेट बताने का फार्मूला पहली बार आउट हुआ है. बोफोर्स से लेकर 2 जी तक तमाम घोटाले की ख़बरों को इसी तरह से हासिल किया गया है. दुनिया भर की अदालतों में स्वीकार हुआ है और उनके आधार पर जांच आगे बढ़ी है. सरकार रंगे हाथों पकड़ी गई है.
  • 20-21 मार्च को होली है, मगर होली जैसी खबर आ गई है. भारत की राजनीति में जूते का इस्तेमाल कम ही हुआ है. जूते की साइज़ न बता पाने के लिए हम माफी मांगते हैं. किस ब्रांड का जूता था यह भी नहीं बताने के लिए हम माफी मांगते हैं. देखिए हम कितने अच्छे हैं. हमने कुछ नहीं किया फिर भी माफी मांग रहे हैं. संत कबीर नगर में जो घटा है वो कबीर की हर वाणी के खिलाफ घटा है. संत कबीर नगर की इस घटना में न तो कबीर जैसा कुछ था, न ही संत जैसा. कुछ था तो सिर्फ जूता था.
  • आप समझ सकते हैं कि क्यों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बेरोज़गारी पर बात नहीं कर रहे हैं. पुलवामा के बाद एयर स्ट्राइक उनके लिए बहाना बन गया है. देश प्रेम-देश प्रेम करते हुए चुनाव निकाल लेंगे और अपनी जीत के पीछे भयावह बेरोज़गारी छोड़ जाएंगे. प्रधानमंत्री का एक ही देश प्रेम है जो चुनाव में जीत प्रेम है. मोदी सरकार के पांच साल में शिक्षा क्षेत्र का कबाड़ा हुआ. जो यूपीए के समय से होता चला आ रहा था.
  • कल रात से रेलवे के ग्रुप डी के परीक्षार्थियों के फोन आ रहे हैं. मेसेज आ रहे हैं. इनकी बेचैनी में मैं अब एक ही बात पढ़ता हूं. जनता ही जनता की लिस्ट से बाहर कर दी गई है. चैनलों ने इतनी मेहनत कर उन्माद में झोंका है, सांप्रदायिकता में झोंका है, इसलिए नहीं कि आप अपने अधिकार के लिए आवाज़ उठाएंगे तो वे दौड़कर कैमरा लेकर आ जाएंगे बल्कि इसलिए अब आप एक पार्टी की राजनीति के काम आएंगे. दिमाग नहीं लगाएंगे. ऐसी हताशा झेलने वाले आप अकेले नहीं हैं.
  • रेलवे के ग्रुड-डी के नतीजे आए हैं, बड़ी संख्या में परीक्षार्थी रेल मंत्री पीयूष गोयल की टाइम लाइन पर लिख रहे हैं कि जो अंक मिले हैं उसकी प्रक्रिया जानना चाहते हैं. मुझे भी बहुत से मैसेज आए हैं कि 100 अंक के पेपर में किसी को 110 या 148 नंबर कैसे मिल सकते हैं. नौजवान किसी नॉर्मलाइज़ेशन की बात कर रहे थे, जिसके कारण ऐसा हुआ है, उनके मन में तरह-तरह के सवाल हैं. एक सवाल यही कि पहले मूल अंक दिखाना चाहिए फिर नॉर्मलाइज़ेशन के अंक को जोड़कर औसत अंक बताना चाहिए. बेहतर है कि रेल मंत्री या रेल मंत्रालय छात्रों को प्रक्रिया के बारे में बताए और उनके सवालों के जवाब दे. वे काफी परेशान हैं. कई बार हम ये सोचते हैं कि जिनका नहीं हुआ है वही हल्ला कर रहे हैं, तब भी परीक्षा की विश्वसनीयता के लिए ज़रूरी है कि प्रक्रिया के बारे में सबको बताया जाए.
  • न्यूज़ चैनलों के बनाए हुए दर्शकों की दुनिया में जब लोगों को समस्या होती है तो उन लोगों का नाम दर्शकों के बहीखाते से काट दिया जाता है. आप देखेंगे कि सारी बहस दो दलों के नेताओं के आस-पास घूम रही है और लोगों की आवाज़ किसी के आस-पास नहीं पहुंच रही है.
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