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रवीश कुमार

प्राइम टाइम एंकर, तीन बार रामनाथ गोयनका पुरस्कार से सम्मानित, 20 साल की पत्रकारिता, ब्लॉगर, फेसबुक पेज @RavishKaPage, ट्विटर @ravishndtv, लेखक - The Free Voice, इश्क़ में शहर होना.

  • बिहार में कई यूनिवर्सिटी में आज भी तीन साल का ही बीए पांच साल में हो रहा है. समय पर रिज़ल्ट नहीं आता.
  • क्या आपको शर्म आ रही है कि चैनलों के ज़रिए एक यूनिवर्सिटी के ख़िलाफ़ अभियान चलाया जा रहा है?
  • यह इस वक्त का कमाल है. राष्ट्रवाद के नाम पर युवाओं को देशद्रोही बताने के अभियान के बाद भी जे एन यू के छात्र अपने वक्त में होने का फ़र्ज़ निभा रहे हैं. इतनी ताकतवर सरकार के सामने पुलिस की लाठियां खा रहे हैं. उन्हें घेर कर मारा गया. सस्ती शिक्षा मांग किसके लिए है? इस सवाल का जवाब भी देना होगा तो हिन्दी प्रदेशों के सत्यानाश का एलान कर देना चाहिए. क़ायदे से हर युवा और मां-बाप को इसका समर्थन करना चाहिए मगर वो चुप हैं. पहले भी चुप थे जब राज्यों के कालेज ख़त्म किए जा रहे थे. आज भी चुप हैं जब जे एन यू को ख़त्म किया जा रहा है. टीवी चैनलों को गुंडों की तरह तैनात कर एक शिक्षा संस्थान को ख़त्म किया जा रहा है.
  • माननीय मुख्यमंत्री कमलनाथ जी, आपका बहुत शुक्रिया. आपने एक फ़ेसबुक पोस्ट के आधार पर फार्म की फ़ीस वृद्धि का फ़ैसला वापस लिया. छात्र जिस तरह से राहत महसूस कर रहे हैं उससे पता चलता है कि उनके लिए 1000-2000 की फ़ीस बड़ी बात थी. उन्हीं ने बताया है कि आपने बढ़ी हुई फ़ीस वापस ले ली है. अब 250 और 500 में फार्म भरे जा सकेंगे. 2000 नहीं देने पड़ेंगे.
  • मुझे तभी लगा था जब वित्त मंत्री के रूप में अपना पहला बजट लेकर आईं थीं. ब्रीफ़केस की दासता से भारत को आज़ादी दिलाने वाली वित्त मंत्री बजट के मामले में जल्दी ही विचित्र साबित हुईं. गोदी मीडिया ने उन्हें लक्ष्मी बनाकर पेश किया जबकि काम कुबेर का था. तभी लगा था कि कुबेर छवियों के संसार में अपने विस्थापन को सहन नहीं करेंगे.
  • मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग ने ऑनलाइन परीक्षाओं की फीस दोगुनी से ज्यादा कर दी है. वन सेवा की परीक्षा में सामान्य वर्ग के लिए 1200 की जगह 2500 रुपए, वहीं आरक्षित वर्ग के लिए 600 की जगह 1250 रुपए.
  • माननीय गौतम गंभीर जी, मैं आपके समर्थन में खड़ा हूं. वो भी गंभीरता से. मैं पहला शख़्स हूं जिसने किसी हल्के काम का इतनी गंभीरता से समर्थन किया है. 
  • स्टाफ सेलेक्शन कमीशन (SSC) की CGL 2017 की परीक्षा का परिणाम आ गया. यह रिजल्ट ढाई साल की देरी से आया है. छात्रों ने बहुत संघर्ष किया. परीक्षा पर सवाल उठा और जांच भी हुई. सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद परिणाम का रास्ता साफ़ हुआ तो एसएससी चुप हो गई. परिणाम निकालने में देरी होने लगी तो छात्र बेचैन होने लगे. छात्रों ने आवाज़ उठाई और प्राइम टाइम के ज़रिए आवाज़ और मुखर हुई.
  • हिन्दी प्रदेशों के युवाओं में प्रतिभा की कमी नहीं है बस उनमें निखार न आए इसका इंतज़ाम सिस्टम और समाज ने कर रखा है. सैंकड़ों किलोमीटर तक लाइब्रेरी नज़र नहीं आएगी. इसे बीते ज़माने का बताया जाता है. मैं अमरीका के सैन फ़्रांसिस्को में हूं. यहां यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया, बर्कले की लाइब्रेरी की रीडिंग रूम की तस्वीर दिखाना चाहता हूं. 
  • उत्तराखंड के सोलह आर्युवेदिक कॉलेज के हज़ारों छात्र-छात्राएं 45 दिनों से आंदोलन कर रहे हैं. धरना दे रहे हैं. मार्च निकाल रहे हैं. पुलिस की मार खा रहे हैं फिर भी अपने इरादे पर क़ायम हैं. हुआ यह है कि बिना नियमों का पालन किए मेडिकल फ़ीस 80,000 सालाना से बढ़ाकर 2 लाख 15 हज़ार कर दी गई. 
  • संतोष कुमार सिंह की पोस्ट से पता चला कि वशिष्ठ नारायण सिंह नहीं रहे. उनका पार्थिव शरीर काफ़ी देर तक अस्पताल के गलियारे में पड़ा रहा. एंबुलेंस नहीं मिली. 1960 के दशक में जिस यूनिवर्सिटी से वशिष्ठ नारायण सिंह ने पीएचडी की थी, वहां पहुंचा हूं.
  • जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय ही नहीं, आईआईटी के एमटेक और पीएचडी के छात्र भी फीस वृद्धि को लेकर आंदोलन कर रहे हैं. उत्तराखंड के 16 आयुर्वेदिक कालेजों के छात्र भी फीस वृद्धि के खिलाफ 43 दिनों से आंदोलन कर रहे हैं. यह बताता है कि खराब आर्थिक स्थिति का असर आम परिवारों पर पड़ा है. जहां नौकरियां जा रही हों, सैलरी न बढ़ रही हो, मजदूरी घट रही हो, वहां फीस बढ़े यह अजीब है. अगर सरकारी संस्थान महंगे होंगे तो सबको शिक्षा नहीं मिलेगी. जेएनयू में सिर्फ फीस वृद्धि को लेकर नहीं बल्कि होस्टल मैनुअल, लाइब्रेरी के समय को लेकर भी आंदोलन हो रहा है. कई लोग कहते हैं कि छात्र आंदोलन क्यों करते हैं, इसका जवाब ये है कि अगर आंदोलन न करें तो देश की यूनिवर्सिटी में क्या-क्या खेल हो जाएगा, आपको पता नहीं चलेगा. वैसे ही लोगों की चुप्पी यूनिवर्सिटी को कबाड़ में बदल रही है जिसका नुकसान आम लोगों को ही हो रहा है.
  • सुप्रीम कोर्ट का फैसला कैसा है, इससे पहले कि आप जवाब दें, लोग ख़ुद ही बोल देते हैं कि चलो बवाल ख़त्म हुआ. लेकिन तब भी पहला सवाल तो रह ही जाता है कि फैसला कैसा था. यह वाकई तारीफ की बात है कि जनता ने संयम और परिपक्वता के साथ सामना किया. वो जनता यह भी जानना चाहेगी कि फैसला कैसा है. फैसले की नुक्ताचीनी से वह नहीं घबराने वाली. आम सहमति से आए इस फैसले को जब कानून की क्लास में पढ़ाया जाएगा तब शायद ही छात्रों के बीच आम सहमति बन पाएगी. ऐतिहासिक फैसला है इसलिए इसकी समीक्षा आज ही नहीं, लंबे समय तक होती रहेगी.
  • तेल कंपनी की तुलना आप टेलिकॉम और एविएशन से नहीं कर सकते हैं. वैसे दोनों सेक्टर की हालत ख़राब है. टेलिकॉम की प्राइवेट कंपनियों को तीन महीने के भीतर 1 लाख 42 हज़ार करोड़ देने हैं जो मुमकिन ही नहीं है. रोज़गार देने वाला यह सेक्टर सूख चुका है. जिन कंपनियों ने फ्री में फोन दिए वे दूसरी शर्तों के साथ पैसे लेने लगे हैं.
  • इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विवादित 2.77 एकड़ ज़मीन को तीन पक्षों में बांट दिया था. उस साल और उस दिन भारत के नागरिकों ने अद्भुत परिपक्वता का परिचय दिया था. लगा ही नहीं कि इस मसले को लेकर हम दशकों लड़े थे. हमने साबित किया था कि मोहब्बत से बड़ा कुछ नहीं है. कहीं कुछ नहीं हुआ. तब भी नहीं हुआ, जब इलाहाबाद कोर्ट से निकलकर सब अपनी-अपनी असंतुष्टि ज़ाहिर कर रहे थे और सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कर रहे थे.
  • 8 नवंबर को एक और ख़बर आई है. रेटिंग एजेंसी मूडी ने भारत के कर्ज़ चुकाने की क्षमता को निगेटिव कर दिया है. इसका कहना है कि पांच तिमाही से आ रहे अर्थव्यवस्था में ढलान से कर्ज़ बढ़ता ही जाएगा. 2020 में बजट घाटा जीडीपी का 3.7 प्रतिशत हो जाएगा जो 3.3 प्रतिशत रखने के सरकार के लक्ष्य से बहुत ज़्यादा है. भारत की जीडीपी 6 साल में सबसे कम 5 प्रतिशत हो गई है.
  • तीस हज़ारी कोर्ट में वकील और पुलिस के बीच हिंसक झड़पों का एक और वीडियो सामने आया है. इस वीडियो से संकेत मिलता है कि उस दिन महिला डीसीपी के साथ क्या हुआ.
  • एक हफ्ता तक वह किसी महापुरुष से प्रेरित नहीं हुए. उनके ट्वीट पर किसी की जयंती या पुण्यतिथि का स्मरण नहीं है. 31 अक्तूबर को वह ट्वीट के ज़रिये सरदार पटेल से प्रेरित हो जाते हैं. लिखते हैं, "उनकी इच्छाशक्ति फौलाद जैसी दृढ़ थी, देश के लिए उनकी प्रतिबद्धता अद्वितीय थी, उनका संकल्प अटल था... देशहित के लिए जो भी कार्य मिला, उन्होंने पूरी निष्ठा से पूर्ण कर दिखाया..."
  • दिल्ली हाईकोर्ट ने तीस हज़ारी कोर्ट में पुलिस और वकीलों के बीच हुई हिंसा की न्यायिक जांच के आदेश दिए हैं. इस घटना से संबंधित कई वीडियो हैं. वकीलों और जवानों की तरफ से कई तरह के दावे हैं. बहुत तरह की बातें हैं. लेकिन इन सबके बीच एक सवाल गुम हो गया है.
  • किरण रिजीजू ने आईपीएस असलम खान के ट्वीट को री ट्वीट करते हुए ट्वीट किया था जिसमें असलम ने उस वीडियो को भी ट्वीट किया था जिसमें एक वकील कांस्टेबल करण को मार रहा है. आप सरल हिन्दी में सोच कर देखिए. इसके लिए आपको नान रेजिडेंट इंडियन होने की ज़रूरत भी नहीं है. एनआरआई तो इस दृश्य को भी ऐसे देखेंगे जैसे भारत के बागों में बहार आई है.
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