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रवीश कुमार

प्राइम टाइम एंकर, तीन बार रामनाथ गोयनका पुरस्कार से सम्मानित, 20 साल की पत्रकारिता, ब्लॉगर, फेसबुक पेज @RavishKaPage, ट्विटर @ravishndtv, लेखक - The Free Voice, इश्क़ में शहर होना.

  • अगर यह ख़बर सही है तो इस पर व्यापक बहस होनी चाहिए. अख़बार में छपी ख़बर के अनुसार उत्तर प्रदेश का कार्मिक विभाग यह प्रस्ताव ला रहा है कि समूह ख व ग की भर्ती अब 5 साल के लिए संविदा पर होगी. कांट्रेक्ट पर. पांच साल के दौरान जो छंटनी से बच जाएंगे उन्हें स्थायी किया जाएगा. इस दौरान संविदा के कर्मचारियों को स्थायी सेवा वालों का लाभ नहीं मिलेगा.
  • पिछले रविवार से ही छात्र ट्वीटर की टाइम लाइन पर ट्रेंड आंदोलन चला रहे हैं. 35 से 70 लाख ट्वीट करने के बाद भी पीयूष गोयल चुप रहे तब छात्रों ने 5 सितंबर को शाम 5 बजे थाली बजाने का आंदोलन शुरू किया.
  • नोटबंदी और तालाबंदी ये दो ऐसे निर्णय हैं जिन्हें कड़े निर्णय की श्रेणी में रखा गया. दोनों निर्णयों ने अर्थव्यवस्था को लंबे समय के लिए बर्बाद कर दिया. आर्थिक तबाही से त्रस्त लोग क्या यह सवाल पूछ पाएँगे कि जब आप तालाबंदी जैसे कड़े निर्णय लेने जा रहे थे तब आपकी मेज़ पर किस तरह के विकल्प और जानकारियाँ रखी गईं थीं.
  • सावधान हो जाएं. आर्थिक निर्णय सोच समझ कर लें. बल्कि अब यही ठीक रहेगा कि सुशांत सिंह राजपूत का ही कवरेज देखते रहिए. यह बर्बादी की ऐसी सतह है जहां से आप अब बेरोज़गारी के प्रश्नों पर विचार कर कुछ नहीं हासिल कर सकते.
  • भारत संचार निगम लिमिटेड वाले जानते होंगे कि एक समय कई हज़ार करोड़ का मुनाफ़ा कमाने वाली कंपनी कैसे ख़त्म की गई. उससे कहा गया कि आप 2G से 4G का मुक़ाबला करो. इस फ़ैसले से किसे लाभ हुआ BSNL के लोग जानते थे मगर हिन्दू मुसलमान की राजनीति ने कइयों के विवेक पर गोबर लीप दिया था.
  • दिल्ली की छतों का एक ही मतलब रहा है. जहां काले रंग की पानी की टंकी होती थी. जिसमें पानी मोटर से चढ़ता था.फिर उतरता था. लोग छत पर टंकी देखने जाते हैं. जब टंकी लीक करती है. क्या कभी पहले भी इस रात का आसमान इस तरह देखना होता था? हाउसिंग सोसायटी के लोग अपनी बालकनी से आती-जाती कारें देखा करते हैं. छत की सीलिंग देखते हैं. जहां छत है वहाँ डिश एंटेना लगा है. लोग घरों में बंद है. 
  • एकदम से सुबह की रौशनी बिखर जाने से ठीक पहले का सफ़ेद अंधेरा. जाती हुई रात अपने आख़िरी वक्त में सफ़ेद लगती है. रात गहराने से पहले भौंक कर सोने वाले कुत्ते भी सुबह होने से पहले भौंकने लगते हैं, कौआ पहले बोलता है या गौरैया पहले बोलती है. ची ची ची ची। ची च। ची ची ची ची. पेड़ पर कुछ कोलाहल तो है. हवा ठंडी है. ऐसे वक्त की खुली दुकानों की अपनी ख़ुश्बू होती है. भीतर बल्ब जल रहा है. बाहर सड़क पर थोड़ी सफ़ाई हो चुकी है. दुकान की बेंच बाहर रखी जा रही है. भजन बज रहा है.
  • अभ्यर्थियों के इस पत्र को सत्यापित करने का कोई ज़रिया नहीं है. आप पत्र में लिखी बातों की जांच करा सकते हैं. यह निश्चित रूप से दुखद है कि आपके राज में 2018 में शुरू हुई OCT 49568 की प्रक्रिया अगस्त 2020 तक पूरी नहीं हुई है. पत्र से यह भी नहीं लगता कि कोई क़ानूनी अड़चन है.अत: ये भर्ती तो समय से पूरी हो सकती थी.
  • क्या उन ख़बरों को ऐसे लिखे- छोटे, लघु व मध्यम श्रेणी के उद्योगों की अपनी रिपोर्ट है कि अगस्त तक चार करोड़ लोगों की नौकरियाँ जा सकती हैं. कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. CMIE का कहना है कि पचास लाख वेतनभोगी लोगों की नौकरी चली गई होगी. कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. ट्रैवल एंड टूरिज़्म सेक्टर से चार करोड़ों लोगों की नौकरियाँ जा सकती हैं.कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. एयर इंडिया के पचास पायलट निकाले गए. कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. बिक जाएगा एयर इंडिया, सरकार करेगी फ़ैसला.  कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता.
  • बुधवार को ऐलान हुआ है कि नेशनल रिक्रूटमेंट एजेंसी बनेगी, जो केंद्र सरकार की भर्तियों की आरंभिक परीक्षा लेगी. इस आरंभिक परीक्षा से छंटकर जो छात्र चुने जाएंगे. उन्हें फिर अलग-अलग विभागों की ज़रूरत के हिसाब से परीक्षा देनी होगी. इसके लिए ज़िलों में परीक्षा केंद्र बनाए जाएंगे.
  • बिहार की जवानी प्रतिभा से भरी है और बेड़ियों से जकड़ी है. अत: युवाओं के बड़े तबके से कोई उम्मीद रखना पानी पर आग तापने जैसा होगा. इनकी सीमित आंकाक्षाओं से किसी भी राजनीतिक दल को ख़ुश होना चाहिए. बस लगन के टाईम में इन्हें कोई परेशान न करे. दहेज के सामानों का निर्बाध आवागमन रहे. आज जनमानस में सांप्रदायिकता सहज वृत्ति है. इसे बदलने का कोई भी प्रयास न करे. जातिवाद तो नैसर्गिक है. ऐसे हालात में अगर बिहार सरकार युवाओं की बात न भी मानें तो उसे कोई ख़तरा नहीं है. मेरा तर्क है कि इसी आधार पर इनकी बात सुनी जाए। बिना शर्त निष्ठा का इतना लाभ तो मिले. 
  • ये पत्र सूखे पत्रों की तरह इस इनबॉक्स से उस इनबॉक्स तक उड़ रहे हैं. हवा पत्तों को इस किनारे लगा देती है तो उस किनारे. इन नौजवानों को समझना होगा कि उनके भीतर आर्थिक मुद्दों की चेतना समाप्त कर दी गई है. तभी तो वे नेताओं के काम आ रहे हैं.
  • यूजीसी ने कहा है कि विश्वविद्यालयों में परीक्षाओं के आयोजन का काम यूजीसी का है न कि किसी राज्य सरकार का. यूजीसी ने फिर से कहा है कि वह सितंबर तक परीक्षाओं के आयोजन के हक़ में है जो कि छात्रों के भविष्य के हितों के मद्देनज़र सही है.यूजीसी ने यह भी कहा कि बिना परीक्षा के मिली डिग्री को मान्यता नहीं दी जा सकती. या
  • 8 अगस्त को प्रधानमंत्री कार्यालय ने एक ट्विट किया है. प्रधानमंत्री का बयान है कि "आप ज़रा कल्पना कीजिए, अगर कोरोना जैसी महामारी 2014 से पहले आती तो क्या स्थिति होती? "
  • अर्थ तंत्र ने मुक्त मन संसार को कुछ ज़्यादा ही अधिग्रहीत कर लिया था. शिक्षा, फ़ीस और परीक्षा जैसे सवाल उचित ही जर्जर होकर ख़त्म हो गए. इनका कुछ होता तो नहीं है, अनावश्यक एक की चिंता दूसरे तक फैल जाती है. रोज़गार कारोबार तो वैसे ही बनते-बिगड़ते रहे हैं. अब इन सबका कवरेज बंद होना चाहिए. पत्रकारिता को इन प्रश्नों से दूरी बनाने की ज़रूरी है.
  • चैनल न्यूज़ एशिया देख रहा था, अनसोहातो देखने लगा. काफ़ी देर तक दक्षिण पूर्व एशिया के देशों में कोरोना को लेकर ख़बरें आती रहीं, जाती रहीं. भारत में तो कोई सोच भी नहीं सकता. कोरोना का मसला ही खत्म मान लिया गया है. WHO के चीफ़ ने कहा है कि कई वैक्सीन उम्मीदवार अपने परीक्षण के तीसरे चरण में हैं, लेकिन फ़िलहाल उम्मीद की कोई किरण दिखाई नहीं देती. शायद कोई भी हो न. उनका ज़ोर अभी भी उन्हीं बुनियादी बातों पर है. अस्पतालों को ठीक किया जाए. कोई संक्रमित हो तो उसका टेस्ट हो और उसके संपर्कों की जांच हो. फिर सबका इलाज हो. ये संक्रमण न हो इसके लिए देह से दूरी का पालन करते रहा जाए.
  • रोज़ाना मैसेज आते हैं कि सर, हमारी परीक्षा रद्द करवा दें, कोरोना का ख़तरा है. वे जानते हैं कि मैं शिक्षा मंत्री नहीं हूं, न ही यूजीसी हूं, फिर भी लिखते हैं. छात्र सुप्रीम कोर्ट भी गए थे कि परीक्षा न हो. 10 अगस्त तक सुनवाई टल गई. यूजीसी ने छह जुलाई को आदेश जारी किया है कि सितंबर के अंत तक अंतिम वर्ष की परीक्षा पूरी की जा सकती है. कोई छात्र बाढ़ में फंसा है, कोई होली में घर गया तो तालाबंदी के कारण घर ही रह गया. किताब कापी कहीं और छूट गई. इस बीच कइयों के घर आर्थिक तबाही आई होगी, तो दिल्ली या पढ़ने के शहर आकर किराया देने में ही पसीने छूटेंगे. लेकिन जब कोर्ट से राहत नहीं मिली तो मैं क्या कर सकता हूं. मैं समझ नहीं पाता कि क्या इन छात्रों को उम्मीद करना भी नहीं आता, सिर्फ मुझ लिख देना ही ध्येय है क्या. 
  • अयोध्या प्रशासन की यह विज्ञप्ति कम ऐतिहासिक नहीं है. एक साँस में पढ़ जाइये. पसीने छूट जाएँगे. किसी कंपनी के सी ई ओ तो अस्पताल में भर्ती हो जाएँ. निर्देशों की भरमार है.
  • सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में काम करने वालों के लिए यह ख़ुशख़बरी है. उनका प्रदर्शन बेहतर होगा और वे प्राइवेट हो सकेंगे. जिस तरह से रेलवे के निजीकरण की घोषणाओं का स्वागत हुआ है उससे सरकार का मनोबल बढ़ा होगा. आप रेलमंत्री का ट्विटर हैंडल देख लें. पहले निजीकरण का नाम नहीं ले पाते थे लेकिन अब धड़ाधड़ ले रहे हैं. जो बताता है कि सरकार ने अपने फ़ैसलों के प्रति सहमति प्राप्त की है. हाँ ज़रूर कुछ लोगों ने विरोध किया है मगर व्यापक स्तर पर देखें तो वह विरोध के लिए विरोध जैसा था. जो भी दो चार लोग विरोध करेंगे उनके व्हाट्स एप में मीम की सप्लाई बढ़ानी होगी ताकि वे मीम के नशे में खो जाएँ. नेहरू वाला मीम ज़रूर होना चाहिए.
  • कोई 12 साल पहले पहाड़गंज में चाकू की धार तेज़ करने वाले ने भी ऐसा ही कुछ कहा था. वो साइकिल पर ही बैठा रहता है. साइकिल को दीवार से सटा देता है ताकि अतिक्रमण न लगे और चाकू तेज़ करता है. उसने कहा था कि कभी एम्स नहीं देखा है. कनाट प्लेस किस तरह से बदला है वो नहीं देखा है.
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