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रवीश कुमार

प्राइम टाइम एंकर, तीन बार रामनाथ गोयनका पुरस्कार से सम्मानित, 20 साल की पत्रकारिता, ब्लॉगर, फेसबुक पेज @RavishKaPage, ट्विटर @ravishndtv, लेखक - The Free Voice, इश्क़ में शहर होना.

  • नागरिकता संशोधन क़ानून इसलिए लाया गया है ताकि इसके आधार पर जनता को उल्लू बनाया जा सके. अब देखिए. हिन्दी प्रदेशों में अख़बारों और व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी में जो ठेला गया है उसका आधार सिर्फ़ यह है कि किसी के कपड़े देखकर बहुसंख्यक सोचना बंद कर देंगे और बीजेपी की तरफ़ एकजुट हो जाएंगे. हंसी आती है. हर दूसरी चर्चा में सुनता रहता हू. क्या यह मान लिया गया है कि लोगों ने सोचना बंद कर दिया है?
  • ऐसा क्या फैसला है ये कि इसे समझाने के लिए बीजेपी को देश भर में 250 प्रेस कांफ्रेंस और 1000 सभाएं करनी पड़ रही हैं. इसमें स्थानीय और राष्ट्रीय नेता भी हैं और दरवाज़े दरवाज़े जाकर कानून को समझाने का कार्यक्रम भी है. जब इस कानून को 130 करोड़ भारतीयों का समर्थन हासिल है तो फिर बीजेपी को इतनी रैलियां क्यों करनी पड़ रही हैं. अब यह देखा जाना चाहिए कि 1000 सभाओं में से कितनी सभाएं असम और पूर्वोत्तर के राज्यों में होती हैं. जहां इस कानून के विरोध का स्वरूप ही कुछ अलग है.
  • जब से नागरिकता संशोधन कानून का विरोध तेज़ हुआ है, इसके समर्थन में गांधी जी का उदाहरण दिया जाने लगा है. गांधी जी उदाहरण इस तरह से दिया जा रहा है जैसे सारा काम गांधी जी के बताए रास्ते पर ही चलकर करते हों. अब गांधी जी ने तो नहीं कहा था कि गोडसे को देशभक्त बताने वाले को टिकट देनी है और सांसद बनाना है. तो फिर नागरिकता कानून का बचाव गांधी जी के नाम पर क्यों किया जा रहा है?
  • जम्मू कश्मीर पुलिस ने अपने डीएसपी दविंदर सिंह को बर्खास्त करने की सिफारिश की है. कड़ी कार्रवाई के नाम पर यही ब्रेक्रिंग न्यूज़ है. इसके पहले कड़ी कार्रवाई यह हुई थी कि गिरफ्तार डीएसपी को निलंबित किया गया था. क्या आप इसी सूचना का इंतज़ार कर रहे थे या आतंकियों के साथ गिरफ्तार डीएसपी के बारे में आप कुछ और जानना चाहते हैं? जो अफसर आतंक के आरोप में जेल में है, वो निलंबित रहे या बर्खास्त हो क्या फर्क पड़ता है?
  • मुझे हैरानी हो रही है कि डीएसपी दविंदर सिंह की आतंकवादियों के साथ गिरफ्तारी से लोग हैरान हैं. दरअसल हैरानी इसलिए कि बार-बार मना करने के बाद भी बहुत लोग आतंकवाद को मज़हब की निगाह से ही देखते हैं. आतंक को दूसरे सवालों और संबंधों के साथ नहीं देखते हैं?
  • मनोज साह 1984 से खिलौना बेच रहे हैं. बुलाया तो पहले कहा दाम नहीं चाहिए, ऐसे ही ले लीजिए. इतना बोलते ही रोने लगे. दोनों आंखों से लोर टपकने लगा. तभी लोग गेंद खरीदने आ गए तो उनसे अपनी आंखें छिपाने लगे. उनके जाने के बाद उनका रोना फिर शुरू हो गया. मनोज ने बताया कि उनके दादा की दो बीघा जमीन थी, किसी ने अपने नाम से जमाबंदी करा ली. मतलब अपने नाम से करा ली. जब मनोज ने विरोध किया तो पुलिस से मिलकर चोरी के आरोप में जेल में बंद करा दिया. किसी तरह जमानत पर बाहर आए. मगर पुलिस वाला उनके परिवार को तंग करता है. बच्चों को मारता है.
  • आखिर किस लहज़े में लिखा जाए कि सरकार युवाओं की सुनें. यूपी का युवा रात को व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी में जेएनयू और दीपिका की फ़र्ज़ी बातें पढ़कर सोता है. जागता है तो रवीश कुमार याद आता है. फिर सैकड़ों मैसेज आने लगते हैं लेकिन दोपहर बाद बंद हो जाता है. आईटी सेल को हिन्दू-मुस्लिम का डोज़ बढ़ा देना चाहिए. अगर मुसलमानों की आबादी वाले पोस्ट बढ़ा दिए जाएं तो युवा दस साल और बेरोजगार रहने के लिए तैयार हो सकते हैं. बल्कि आबादी नियंत्रण के नाम पर जो बोगस क़ानून का प्रोपेगैंडा रचा जा रहा है उससे यूपी या किसी भी हिन्दी प्रदेश के युवाओं को फंसाकर बेरोज़गार रखा जा सकता है. सारे मंत्री इसी पर लेक्चर दें, देखिए लोग कैसे नशे में झूमते हैं. इसमें आरक्षण का भूत भी अचूक काम करेगा.
  • दिल्ली पुलिस के क्राइम ब्रांच की प्रेस कांफ्रेस में कहानी 5 जनवरी की हिंसा से ज्यादा 4 जनवरी की थ्योरी पर पहुंचती है, जिसके सहारे जेएनयू प्रशासन बार बार दावा करता है कि लेफ्ट के छात्रों ने सर्वर रूप को क्षतिग्रस्त किया और मारपीट की. जो प्रशासन की शुरू से लाइन रही है. 4 जनवरी की हिंसा का न तो स्केल वैसा था और अगर वैसा था तो उसकी एफआईआर कराने का ख्याल जेएनयू प्रशासन को 5 जनवरी की हिंसा के बाद ही क्यों आया, इसका जवाब नहीं मिला.
  • वैसे क्या आपको पता है कि 5 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 समाप्त होने के बाद प्रधानमंत्री और गृहमंत्री दोनों की कश्मीर नहीं गए हैं. भाषण तो बड़ा दिया था कि कश्मीर के लोग हमारे हैं. हम गले लगाएंगे लेकिन अभी तक जाने का वक्त नहीं मिला.
  • राजनीति में पूरा जीवन लगा देने के बाद कोई मुख्यमंत्री बनता है. मैं समझना चाहता हूं कि फिर काम क्यों नहीं किया जाता है. सिर्फ़ दिखने या दिखाने लायक़ योजनाओं पर ही ज़ोर नहीं लगाना चाहिए. आपकी सरकार है. आख़िर कब नौकरियों के सिस्टम को बेहतर करेंगे.
  • इतना लिखने के बाद भी कोई नहीं कहता कि हम सांप्रदायिक थे, मगर इसके झांसे से निकल रहे हैं. निकला नहीं जा रहा है, आप मदद कीजिए. या किसी को बुरा भी नहीं लगता कि हम सांप्रदायिक नहीं हैं, आपने ऐसा क्यों लिखा. तब मैं पूछता कि फिर यूनिवर्सिटी हिंसा को लेकर इस पत्र में एक पंक्ति क्यों नहीं है. अगर आप हिंसा के समर्थन में हैं तो वही लिखिए. कम से कम आपकी ईमानदारी तो झलकेगी.
  • सेंट स्टीफेंस के छात्रों का इस तरह से सड़क पर आना, जेएनयू, जामिया मिलिया और एएमयू के खिलाफ उस चुप्पी को तोड़ना है जिसकी तरफ इशारा कर बताया जा रहा था कि समाज में पुलिस हिंसा के प्रति समर्थन है. क्योंकि वो समाज सिर्फ अपने बहुसंख्यक धर्म के चश्मे से देख रहा है.
  • 2016 में प्रधानमंत्री ने नोटबंदी का बोगस और आपराधिक फ़ैसला लिया था. तभी पता चल गया कि उन्होंने देश की गाड़ी गड्ढे में गिरा दी है मगर झांसा दिया गया कि दूरगामी परिणाम आएंगे. तब नशा था.
  • इसके बाद भी 5 जनवरी की शाम को जिस दिन हिंसा हुई थी, उस दिन जेएनयू प्रशासन उस हिंसा के खिलाफ एफआईआर नहीं कराता है. दिल्ली पुलिस अपनी तरफ से स्वत: संज्ञान लेते हुए अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराती है. इस एफआईआर का कुछ हिस्सा पढ़ना चाहता हूं.
  • एक्सप्रेस ने पीटीआई के हवाले से खबर लिखी है कि इन सुरक्षा गार्ड ने एडमिन ब्लॉक में प्रदर्शन में छात्रों पर हमला किया था. उन्हें घसीट कर हटाया और सामान फेंक दिए. उसमें कुछ लड़कियों को चोट भी लगी थी. वो सिक्योरिटी गार्ड 5 जनवरी की शाम कहां थे, जिन्हें जेएनयू की सुरक्षा को बेहतर करने के लिए लाया गया था और तीन साल से काम कर रहे 400 गार्ड को हटाया गया था.
  • मेरे रिटायरमेंट का टाइम आ रहा है तो थोड़ा ठेले पर अकेले चाय पीने की आदत डालनी है. काश मेरी एक बात दुनिया मान लेती कि भारत का कोई भी टीवी चैनल नहीं देखती. अपने घरों से कटवा देती. पर कोई बात नहीं. मैंने कम से कम कहा तो आपसे. फेल हो गया तो हो गया. हम कौन सा आई आई टी टॉपर थे. वैसे बहुतों ने टीवी देखना बंद कर दिया. उनका शुक्रिया.
  • ऐसा लगता है कि राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार का फ़ोकस बीजेपी पर निशाना साधने में ही है. अपनी ज़िम्मेदारी निभाने में कम है. कोटा के जे के लोन अस्पताल का मामला एक हफ़्ते से पब्लिक में है. इसके बाद भी एक्सप्रेस के रिपोर्टर दीप ने पाया है कि इंटेंसिव यूनिट में खुला डस्टबिन है. उसमें कचरा बाहर तक छलक रहा है. क़ायदे से तो दूसरे दिन वहां की सारी व्यवस्था ठीक हो जानी चाहिए थी. लेकिन मीडिया रिपोर्ट से पता चल रहा है कि वहां गंदगी से लेकर ख़राब उपकरणों की स्थिति जस की तस है. जबकि मुख्यमंत्री की बनाई कमेटी ही लौट कर ये सब बता रही है. सवाल है कि क्या एक सरकार एक हफ़्ते के भीतर इन चीजों को ठीक नहीं कर सकती थी?
  • प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना अपने लॉन्च होने के साल में ही सवालों से घिर गई थी. 2016 में यह योजना लॉन्च हुई थी. प्रीमियम देने के बाद भी बीमा की राशि के लिए किसानों को कई राज्यों में प्रदर्शन करने पड़े हैं.
  • जब सारे देश में प्राथमिक स्वास्थ्य की खस्ता हालत पर लिखता और प्रोग्राम करता हूं तो आईटी सेल का गिरोह कंबल ओढ़ कर सो जाता है. वह तभी जागता है जब किसी अपराध में शामिल कोई मुसलमान दिखता है या फिर भी वो ग़ैर भाजपा सरकार से संबंधित कोई घटना हो.
  • तो क्या असम के मुख्यमंत्री ने नागरिकता संशोधन कानून से बग़ावत कर दी है? सोनेवाल ने कहा है कि इस क़ानून के चलते कोई भी विदेशी असम की धरती पर नहीं आ सकता. असम पुत्र होने के नाते कभी किसी विदेशी को यहां बसने नहीं दूंगा.
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