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रवीश कुमार

प्राइम टाइम एंकर, तीन बार रामनाथ गोयनका पुरस्कार से सम्मानित, 20 साल की पत्रकारिता, ब्लॉगर, फेसबुक पेज @RavishKaPage, ट्विटर @ravishndtv, लेखक- The Free Voice, इश्क़ में शहर होना। हिन्दी मेरी जान, भोजपुरी मेरा ईमान।

  • बैंकों ने जितना लोन दिया, उस लोन का जितना हिस्सा बहुत देर तक नहीं लौटता है तो वह नॉन परफार्मिंग असेट हो जाता है. जिसे एनपीए कहते हैं. एनपीए को लेकर यूपीए बनाम एनडीए हो रहा है. लेकिन जिसने इन दोनों सरकारों में लोन लिया या नहीं चुकाया, उसका तो नाम ही कहीं नहीं आ रहा है. 2015 में जब आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष अग्रवाल ने भारतीय रिज़र्व बैंक से पूछा था कि लोन नहीं देने वालों के नाम बता दीजिए तो रिजर्व बैंक ने इंकार कर दिया था. जबकि सुप्रीम कोर्ट ने नाम बताने के लिए कहा था. क्या यह अजीब नहीं है कि जिन लोगों ने लोन नहीं चुकाया उनका नाम राजनीतिक दल के नेता नहीं लेते हैं. न प्रधानमंत्री लेते हैं न राहुल गांधी लेते हैं न अमित शाह नाम लेते हैं. क्या यह मैच फिक्सिंग नहीं है. असली खिलाड़ी बहस से गायब है और दोनों तरफ के कोच भिड़े हुए हैं.
  • फ्रांस की कंपनी दास्सो से खरीदे जाने वाले रफाल लड़ाकू विमान को लेकर फिर से अरुण शौरी, यशवंत सिन्हा और प्रशांत भूषण ने प्रेस कांफ्रेंस की है. तीनों की यह दूसरी प्रेस कांफ्रेंस है. पहले सरकार ने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा को देखते हुए सौदे का डिटेल नहीं दिया जा सकता है, लेकिन बाद में याद दिलाया गया कि रक्षा राज्य मंत्री तो नवंबर 2016 में ही संसद में रफाल विमान का दाम बता चुके थे. हाल ही में अरुण जेटली ने ब्लॉग लिखकर कांग्रेस को घेरा है. उसके बाद विदेश राज्य मंत्री एमजे अकबर ने भी लेख लिखा है. हम उन लेख में उठाए गए प्रश्नों और दावों के बारे में संक्षेप में बात करेंगे, लेकिन पहले सुनते हैं कि प्रशांत भूषण ने आज प्रेस कांफ्रेंस क्यों की.
  • तेल की बढ़ी क़ीमतों पर तेल मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का तर्क है कि यूपीए सरकार ने 1.44 लाख करोड़ रुपये तेल बॉन्ड के ज़रिए जुटाए थे,जिस पर ब्याज की देनदारी 70,000 करोड़ बनती है. मोदी सरकार ने इसे भरा है. 90 रुपये तेल के दाम हो जाने पर यह सफ़ाई है तो इसमें भी झोल है. सरकार ने तेल के ज़रिए 'आपका तेल' निकाल दिया है. ऑनिद्यो चक्रवर्ती ने हिसाब लगाया है कि यूपीए ने 2005-6 से 2013-14 के बीच जितना पेट्रोल डीज़ल की एक्साइज़ ड्यूटी से नहीं वसूला उससे करीब तीन लाख करोड़ ज़्यादा उत्पाद शुल्क एनडीए ने चार साल में वसूला है. उस वसूली में से दो लाख करोड़ चुका देना कोई बहुत बड़ी रक़म नहीं है.
  • रुपया, पेट्रोल और डीज़ल ने भारत बंद का विरोध किया है. विपक्ष का भारत बंद होने के बाद भी रुपए का गिरना बंद नहीं हुआ और पेट्रोल डीज़ल के दाम का चढ़ना बंद नहीं हुआ. भारत का रुपया इस साल के 9 महीने में 12 प्रतिशत गिर चुका है और गिरता ही जा रहा है.
  • सोमवार को 12 बज कर 03 मिनट पर डॉलर ने भारतीय रुपये को फिर धक्का दिया है. इस समय पर रुपये का भाव ऐतिहासिक रूप से नीचे चला गया. एक डॉलर 72 रुपये 55 पैसे का हो गया. वाकई अब श्री श्री रविशंकर से कहना होगा कि वे आएं और कुछ भभूत-वभूत छिड़कें ताकि डॉलर का नशा उतर जाए.
  • यह व्यवस्था किसी साहूकार या निजी कंपनियों द्वारा नहीं चलाई जा रही है बल्कि यह व्यवस्था स्वयं शासन के द्वारा चलाई जा रही है. जी हां, मैं बात कर रहा हूं मध्य प्रदेश पॉलिटेक्निक अतिथि व्याख्याताओं के लिए बनाए गए नियमों के बारे में इन नियमों के तहत अतिथि अध्यापकों को प्रति कालखंड सिर्फ 275 का भुगतान किया जाता है. अगर किसी दिन किसी भी कारण से कक्षा नहीं लगती है तो उस दिन अतिथि व्याख्याताओं को कोई भी भुगतान नहीं किया जाता है.
  • आईटी सेल आईटी सेल होता है. पिछले साल मेरे बयान का आधा हिस्सा काट कर ग़लत संदर्भ में पेश किया गया और उसे शेयर कर दिया था आईटी सेल के सरदार ने. ग़नीमत है कि प्रतीक सिन्हा ऑल्ट न्यूज़ वाले ने पकड़ लिया. आप भी देखिए ये काम कैसे होता है.
  • राम नाम सत्य है... राम का नाम तब भी सत्य था अब भी सत्य है मगर जो साल था तब भी झूठ था अब भी झूठ है. वो 2013 का साल था. अजीब साल था वह. किसी भूत की तरह श्मशान से निकल आता है. सिलेंडर की अरथी निकली थी. दाम 600 के आस पास था. अब उसी सिलेंडर का दाम 833 रुपया हो चुका है, मगर शवयात्रा निकालने वाले गायब हैं. दरअसल वो अरथी का अर्थ समझ चुके हैं. वो जानते हैं कि राजनीति झूठी है, राम का नाम सत्य है.
  • कई बार सर्वोच्च अदालत के कुछ फैसलों को इसलिए नहीं पढ़ा जाना चाहिए कि वो आपके हिसाब से आया है, बल्कि इसलिए भी पढ़ा जाना चाहिए कि फैसले तक पहुंचने से पहले तर्कों की प्रक्रिया क्या है. उसकी भाषा क्या है, भाषा की भावना क्या है.
  • 11 लाख परीक्षार्थी रेलवे की परीक्षा नहीं दे सके. 11 लाख क्या छोटी संख्या है? 47 लाख परीक्षार्थियों में से 11 लाख परीक्षा में शामिल नहीं हो सके, यह बात हर दर्ज़े से शर्मनाक़ है. आप जानते हैं कि रेलवे ने अगस्त में 64,037 पदों के लिए परीक्षा ली है.
  • अंबानी जी पाठकों को लेकर हमेशा उदार रहे हैं. उन पर कभी मानहानि नहीं करते. कैरवान ने भी उन्हें मानहानि देने के लिए ये अंक निकाला है. आप पढ़कर ख़ुद से अंबानी की मानहानि की भरपाई करें.
  • 5 सितंबर 2017 को बेंगलुरु में गौरी लंकेश की हत्या कर दी गई थी. धार्मिक कट्टरता के ख़िलाफ़ लिखने वाली गौरी लंकेश ने हमेशा हिंसा और हत्या की राजनीति का विरोध किया. अपनी लेखनी में वो कर्नाटक के भीतर उभर रही ऐसी ताकतों की पहचान कर रही थीं और उनके बारे में खुलकर लिख रही थीं. ज़ाहिर है इसी तबके से उनकी हत्या के बाद सोशल मीडिया में जश्न मनाया गया था और किसी की मौत पर अफसोस प्रकट करने की परंपरा को तोड़ते हुए खुशी ज़ाहिर की गई थी. उस दिन सिर्फ गौरी लंकेश की हत्या नहीं हुई थी बल्कि यह भी पता चला था कि हमारे समाज में हत्या को उचित ठहराने वाले लोगों की कमी नहीं है जो समय समय पर एक खास राजनीतिक विचारधारा का भी समर्थन करते हैं जिसका संबंध सत्ता से है.  
  • 8 नवंबर 2016 को जब नोटबंदी हुई थी तो बतौर प्रधानमंत्री किसी को पता नहीं था. सबको एक ही बार रात आठ बजे टीवी से पता चला था. लेकिन नोटबंदी फिर से हो सकती है इसका पता सबको चल चुका है और वो भी टीवी से. नीति आयोग के चेयरमैन प्रधानमंत्री होते हैं और उपाध्यक्ष होते हैं राजीव कुमार. राजीव कुमार ने श्रीनिवासन जैन से कहा है कि अर्थव्यवस्था की सफाई के लिए वे किसी भी दिन नोटबंदी करना चाहेंगे, ताकि ये औपचारिक हो सके. टैक्स भरने की आदत में सुधार हो. नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार के अनुसार टैक्स भरने की आदत में सुधार के लिए वे कभी भी नोटबंदी करना चाहेंगे. दुनिया भर में कई देश हैं जहां टैक्स भरने की आदत इस वक्त भी भारत से बेहतर से होगी, लेकिन क्या वहां आदत में ये सुधार नोटबंदी से आई है. तब तो जहां भी टैक्स चोरी होती है वहां नोटबंदी होनी चाहिए.
  • भाषणों के मास्टर कहे जाते हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. साल 2013 में जब वह डॉलर के मुक़ाबले भारतीय रुपये के गिरने पर दहाड़ रहे थे, तब लोग कहते थे, 'वाह मोदी जी, वाह... यह हुआ भाषण... यह भाषण नहीं, देश का राशन है... हमें बोलने वाला नेता चाहिए... पेट को भोजन नहीं, भाषण चाहिए...' यह बात भी उन तक पहुंची ही होगी कि पब्लिक में बोलने वाले नेता की डिमांड है. बस, उन्होंने भी बोलने में कोई कमी नहीं छोड़ी. पेट्रोल महंगा होता था, मोदी जी बोलते थे. रुपया गिरता था, मोदी जी बोलते थे. ट्वीट पर री-ट्वीट, डिबेट पर डिबेट. 2018 में हम इस मोड़ पर पहुंचे हैं, जहां 2013 का साल राष्ट्रीय फ्रॉड का साल नज़र आता है, जहां सब एक दूसरे से फ्रॉड कर रहे थे.
  • हिदायतुल्ला नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के 1000 के छात्र इन दिनों आंदोलन कर रहे हैं. 27 अगस्त से वे एक निर्णायक लड़ाई लड़ रहे हैं. उन सीनियरों के बदले भी जो सहते रहे और चुपचाप यूनिवर्सिटी से डिग्री लेकर चले गए. उनके बदले भी ये छात्र लड़ रहे हैं, ताकि उन्हें और आने वाली पीढ़ियों को अब और न झेलना पड़े.
  • नोटबंदी ने लघु व मध्यम उद्योगों की कमर तोड़ दी है. हिन्दू मुस्लिम ज़हर के असर में और सरकार के डर से आवाज़ नहीं उठ रही है लेकिन आंकड़े रोज़ पर्दा उठा रहे हैं कि भीतर मरीज़ की हालत ख़राब है. भारतीय रिज़र्व बैंक के अनुसार मार्च 2017 से मार्च 2018 के बीच उनके लोन न चुकाने की क्षमता डबल हो गई है.
  • यूनिफॉर्म सिविल कोड की इस वक्त न ज़रूरत है और न ही यह अनिवार्य है. यह राय भारत के क़ानून आयोग की है. पिछले शुक्रवार को कानून आयोग ने परिवार कानून सुधार पर अपनी तरफ से एक चर्चा-पत्र जारी किया है. आयोग का पक्ष है कि समुदायों के बीच समानता की जगह समुदायों के भीतर स्त्री और पुरुष के बीच समानता होनी चाहिए.
  • क्या आपको पता है कि भारत का रुपया क्यों लगातार कमज़ोर हो रहा है, आजकल भारत का रुपया गिरने में हर दिन इतिहास बना रहा है. 31 अगस्त को बाज़ार बंद होने पर एक डॉलर था 70 रुपये 99 पैसे. कहां तो इसे श्री श्री रविशंकर के अनुसार 40 रुपये के आस पास होना चाहिए था मगर अब यह 70 रुपये 99 पैसे पर पहुंच गया है. इसका सबसे बुरा असर तेल की कीमतों पर पड़ रहा है.
  • लोग पढ़ने की क्षमता कई कारणों से खोते जा रहे हैं. इसलिए उनके लिए सुबह की राम राम जी की जगह गुलाब के फूल, दो कप चाय और पहाड़ के पीछे से उगते सूरज से गुडमार्निंग भेजा जाता है. जो लोग मुश्किल से पढ़ने की साधना में लगे हैं, वो व्यापक समाज के अपढ़ होने की इस प्रक्रिया से बेचैन हैं.
  • याद कीजिए नोटबंदी की वो लाइनें. खासकर महिलाएं जिनके पास अपना जमा किया हुआ पैसा था, वो सब पतियों और पिताओं के हाथ चला गया. एक झटके में किसी बुरे वक्त के लिए बचा कर रखे गए पैसे निकाल कर देने पड़े क्योंकि वे अब वे अवैध हो चुके थे. बाद में वे पैसे लौट कर पत्नियों और बेटियों के हाथ आए या नहीं, वहीं बता सकती हैं मगर महिलाओं से लेकर आम किसानों तक लाइन में लग गए. अपना पैसा जमा कराने.
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