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रवीश कुमार

प्राइम टाइम एंकर, तीन बार रामनाथ गोयनका पुरस्कार से सम्मानित, 20 साल की पत्रकारिता, ब्लॉगर, फेसबुक पेज @RavishKaPage, ट्विटर @ravishndtv, लेखक - The Free Voice, इश्क़ में शहर होना.

  • सीआरपीएफ हमेशा युद्धरत रहती है. माओवाद से तो कभी आतंकवाद से. साधारण घरों से आए इसके जाबांज़ जवानों ने कभी पीछे कदम नहीं खींचा. ये बेहद शानदार बल है. इनका काम पूरा सैनिक का है. फिर भी हम अर्ध सैनिक बल कहते हैं. सरकारी श्रेणियों की अपनी व्यवस्था होती है. पर हम कभी सोचते नहीं कि अर्ध सैनिक क्या होता है. सैनिक होता है या सैनिक नहीं होता है. अर्ध सैनिक?
  • प्रधानमंत्री ने अपने कार्यकाल का कितना हिस्सा यात्राओं में बिताया इसे लेकर स्क्रोल और दि प्रिंट ने दो रिपोर्ट की है. स्क्रोल की रिपोर्ट आप ज़रूर देखें. इसलिए भी कि किस तरह डेटा जर्नलिज़्म किया जा सकता है.
  • आज गजब हो गया. राफेल पर सीएजी की रिपोर्ट तो आई, मगर सार्वजनिक होकर भी गोपनीय नज़र आई. अभी तक दि वायर और हिन्दी में गोपनीय रिपोर्ट सार्वजनिक हो रही थी मगर आज सार्वजनिक होकर भी रिपोर्ट के कई अंश गोपनीय नज़र आए. सीएजी ने यूरो और रुपये के आगे संख्या की जगह अंग्रेज़ी वर्णमाला के वर्म लिखे हैं. इस तरह रिपोर्ट पढ़ते हुए आपको ये तो दिखेगा कि मिलियन और बिलियन यूरो लिखा है मगर मिलियन के आगे जो कोड इस्तेमाल किए हैं उसे पढ़ने के लिए जग्गा जासूस को हायर करना पड़ेगा. आप पेज 120 और 121 पर जाकर देखिए. राफेल विमान कितने में खरीदा गया, कितने का प्रस्ताव था इनकी जगह जो संकेत चिन्ह लिखे गए हैं, उन्हें पढ़ने के लिए आईआईटी में एडमिशन लेकर फेल होना ज़रूरी है.
  • सोचिए 6 फरवरी तक रक्षा मंत्रालय बता रहा है कि डील को लेकर कीमतों के बारे में नहीं बताना है. 13 फरवरी को रिपोर्ट संसद में रखी जाती है. आप चाहें तो अनुमान लगा सकते हैं कि यह सब मैनेज किए जाने की निशानी है या सीएजी आखिरी वक्त तक काम करती है. वैसे मंत्री लोग ही अलग अलग चरणों में दाम बता चुके थे.
  • बेरोज़गारी से ही कहना होगा कि अगर वह कहीं है तो सरकार को दिख जाए. क्योंकि सरकार के पास नौकरियों के जो आंकड़े हैं उससे लगता है कि बेरोज़गार नौकरी लेकर मुझसे व्हाट्सऐप मैसेज से मज़ाक करते रहते हैं कि हमारी ख़बर दिखा दीजिए.
  • रफाल मामले की कहानी 360 डिग्री घूम कर फिर से वहीं पहुंच गई है. क्या ऐसा सुना था आपने कि पहले प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में रक्षा मामले की मंत्रिमंडल समिति जिन शर्तों के साथ डील को पास करे, उसके कुछ दिनों बाद रक्षा मंत्रालय की समिति उन शर्तों को हटा दे.
  • सरकार बार-बार कहती है कि रफाल डील में कोई भ्रष्टाचार नहीं हुआ है. वही सरकार एक बार यह भी बता दे कि रफाल डील की शर्तों में भ्रष्टाचार होने पर कार्रवाई के प्रावधान को क्यों हटाया गया? वह भी प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली रक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति की बैठक में इसे हटाया गया.
  • इस नोटिंग में रक्षा सचिव इस बात पर एतराज़ ज़ाहिर करते हैं कि अगर प्रधानमंत्री कार्यालय को भरोसा नहीं है तो वह डील के लिए अपनी कोई नई व्यवस्था बना ले. जाहिर है जो कमेटी कई साल से काम कर रही है, अचानक उसे बताए बगैर या भंग किए बगैर प्रधानमंत्री कार्यालय सक्रिय हो जाए तो किसी को भी बुरा लगेगा.
  • प्रधानमंत्री मोदी इस आधार पर भाषण की शुरूआत करते हैं कि जनता को सिर्फ वही याद रहेगा जो वह उनसे सुनेगी. उनका यकीन इस बात पर लगता है और शायद सही भी हो कि पब्लिक तो तथ्यों की जांच करेगी नहीं, बस उनके भाषण के प्रवाह में बहती जाएगी. इसलिए वे अपने भाषण से ऐसी समां बांधते हैं जैसे अब इसके आर-पार कोई दूसरा सत्य नहीं है. लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण के जवाब में उनका लंबा भाषण टीवी के ज़रिए प्रभाव डाल रहा था मगर इस बात से बेख़बर कि जनता जब तथ्यों की जांच करेगी तब क्या होगा.
  • गुजरात की आबादी 6 करोड़ से कुछ अधिक है. कल्पना कीजिए पूरे राज्य के लोगों को एक कंपनी ठग ले और राज्य की तमाम संस्थाएं कुछ न कर सकें. पीएसीएल कंपनी ने 5 करोड़ 85 लाख लोगों के लाखों करोड़ लूट लिए. तीन साल हो गए सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मगर वही आदेश पूरी तरह लागू नहीं हो सका और लोगों के पैसे नहीं मिल सके.
  • रिपोर्ट की ईमानदारी बताती है कि किसी नतीजे पर पहुंचने से पहले वह उन प्रक्रियाओं को खोजती है जिससे छेडछाड़ करने के नतीजे में 58 लोग कटकर मर जाते हैं. क्या पता इन लापरवाहियों के कारण आज भी इसी तरह की ट्रेन दुर्घटनाएं हो रही हों. अगर आप इस रिपोर्ट में किसी एक को नाप देने की हेडलाइन खोज रहे हैं तो निराशा होगी लेकिन यह रिपोर्ट किसी एक को भी नहीं छोड़ती है.
  • ये बेहद आम लोग होते हैं जो न ट्विटर पर आकर अपने मुद्दे को ट्रेंड करा सकते हैं और न ही टीवी चैनलों के सामने रो सकते हैं. हमने 4 फरवरी के प्राइम टाइम में पर्ल एग्रोटेक कोरपोरेशन लिमिटेड के पीड़ितों की कहानी बताई थी.
  • हर साल बजट आता है. हर साल शिक्षा और स्वास्थ्य में कमी होती है. लोकप्रिय मुद्दों के थमते ही शिक्षा और स्वास्थ्य पर लेख आता है. इस उम्मीद में कि सार्वजनिक चेतना में स्वास्थ्य से जुड़े सवाल बेहतर तरीके से प्रवेश करेंगे. ऐसा कभी नहीं होता. लोग उसे अनदेखा कर देते हैं. इंडियन एक्सप्रेस में लोक स्वास्थ्य पर काम करने वाली प्रोफेसर इमराना क़ादिर और सौरिन्द्र घोष के लेख को अच्छे से पेश किया गया है ताकि पाठकों की नज़र आए. इस लेख के कुछ बिन्दु इस प्रकार हैं-
  • 2 फरवरी को दिल्ली में देश भर से आए ये लोग उन 5 करोड़ 60 लाख लोगों में से है जिन्हें पर्ल एग्रोटेक कोरपोरेशन लिमिटेड ने एक बचत योजना के नाम पर लूट लिया है. तीन साल पहले यानी 2 फरवरी 2016 को सुप्रीम कोर्ट ने इनके पैसे वापस दिलाने के आदेश दिए थे मगर अभी तक पैसे नहीं मिले
  • इसी 2 फरवरी को दिल्ली के संसद मार्ग पर देश भर से हज़ारों की संख्या में ऐसे लोग जुटे थे, जिन्हें पर्ल एग्रोटेक कॉरपोरेशन लिमिटेड (PACL) ने लूटा है. माना जाता है कि यह भारत की सबसे बड़ी चिट-फंड लूट है. 49,100 करोड़ रुपये भारत के भोले निवेशकों से फर्ज़ी स्कीम चलाकर ठग लिए गए.
  • अब आपको याद भी नहीं होगा कि प्रधानमंत्री की हत्या की कथित साज़िश में गिरफ्तार सुधा भारद्वाज जैसों के साथ क्या हो रहा होगा? मीडिया और राजनीति आपके सामने आतंकवाद के ख़तरे परोसते रहे. पहले बताया कि आतंकवाद के लिए एक खास धर्म के लोग ज़िम्मेदार हैं. एक दुश्मन का चेहरा दिखाया गया. फिर अचानक आपके ही बीच के लोगों को उसके नाम पर उठाया जाने लगा.
  • फरवरी 2019 में 29 साल का एक मज़दूर असंगठित क्षेत्र में प्रवेश करता है. 31 साल तक हर महीने 100 रुपये जमा कराता है. सरकार भी 100 रुपये जमा कराती है. 2050 में वह साठ साल का हो जाता है. तब उसे पीयूष गोयल की स्कीम के अनुसार हर महीने 3000 की पेंशन मिलेगी.
  • सरकार के पास पिछले दिसंबर से यह रिपोर्ट पड़ी है. जुलाई 2017 से जून 2018 के बीच सर्वे किया है. इसमें यह बात निकल कर आई है कि नोटबंदी के बाद शहरों में बेरोज़गारी की दर 7.8 प्रतिशत हो गई थी और गांवों में 5.3 प्रतिशत. अगर यह रिपोर्ट बाहर आती तो आप जान पाते कि 15 से 29 साल के युवाओं के बीच बेरोज़गारी की दर 17.4 है.
  • बिज़नेस स्टैंडर्ड के सोमेश झा ने इस रिपोर्ट की बातें सामने ला दी है. एक रिपोर्टर का यही काम होता है. जो सरकार छिपाए उसे बाहर ला दे. अब सोचिए अगर सरकार खुद यह रिपोर्ट जारी करे कि 2017-18 में बेरोज़गारी की दर 6.1 हो गई थी जो 45 साल में सबसे अधिक है तो उसकी नाकामियों का ढोल फट जाएगा. इतनी बेरोज़गारी तो 1972-73 में थी. शहरों में तो बेरोज़गारी की दर 7.8 प्रतिशत हो गई थी और काम न मिलने के कारण लोग घरों में बैठने लगे थे.
  • इस रिपोर्ट के आधार पर बैंक के बोर्ड ने चंदा कोचर को निकाल दिया है. चंदा कोचर को दिया जाने वाला बोनस वगैरह सब रोक लिया गया है. उन्हें अब कोई सुविधा नहीं मिलेगी. बकाया राशि भी नहीं दी जाएगी. उन्हें जो शेयर वगैरह मिले थे अब सब रोक लिए जाएंगे. जस्टिस श्रीकृष्णा ने अपनी जांच में चंदा कोचर को दोषी पाया है. बताया है कि उनके कार्यकाल में नियमों को तोड़ कर कई फैसले लिए गए और उसकी जानकारी बैंक की सालाना रिपोर्ट से छिपाई गई.
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