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रवीश कुमार

प्राइम टाइम एंकर, तीन बार रामनाथ गोयनका पुरस्कार से सम्मानित, 20 साल की पत्रकारिता, ब्लॉगर, फेसबुक पेज @RavishKaPage, ट्विटर @ravishndtv, लेखक- The Free Voice, इश्क़ में शहर होना। हिन्दी मेरी जान, भोजपुरी मेरा ईमान।

  • दिल्ली के साकेत कोर्ट में एक महिला वकील के साथ बलात्कार का मामला सामने आया है. आरोपी वकील ही है और घटना कोर्ट परिसर में हुई है. वकील गिरफ्तार है और उसका चेंबर सील है. मैं इसका ज़िक्र इसलिए नहीं कर रहा क्योंकि किसी रिपोर्ट में भारत को महिलाओं के लिए सबसे असुरक्षित जगह बताया गया है. मैं इसलिए भी नहीं कर रहा कि कुछ लोग अपनी भड़ास निकालने आ जाएं कि इन सबको चौराहे पर फांसी दे देनी चाहिए. दरअसल मैं इसीलिए कह रहा हूं, क्योंकि फांसी-फांसी करके हमने हासिल कुछ नहीं किया. कई राज्यों ने फांसी की सज़ा जोड़ दी मगर हमारे समाज में औरतों के प्रति क्रूरता का अंत नहीं हुआ. अंत छोड़िए, लगता नहीं कि ऐसी घटनाएं कम हो रही हैं. आए दिन ऐसी घटना ज़रूर हो जाती हैं जो पिछली घटना से ज़्यादा क्रूर होती है.
  • लोकसभा टीवी के अनुराग पुनेठा के सवाल का जवाब देते हुए भारतीय रेलवे बोर्ड के चेयरमैन अश्विनी लोहानी कहते हैं कि रेलवे लगातार कर्मचारियों की संख्या में कमी लाती जा रही है. जब बिजनेस डबल हो चुका है तब हम पहले के 18 लाख कर्मचारियों की तुलना में 13 लाख पर आ गए. लोहानी कहते हैं कि हमें वैकेंसी भरनी हैं अन्यथा रेलवे चला नहीं पाएंगे.
  • 12 जुलाई के प्राइम टाइम में जब हम सहरसा मधेपुरा नेशनल हाईवे 107 की बात कर रहे थे तब अमरीका के न्यू जरसी में दिवाकर भी प्राइम टाइम देखते हुए अपने ज़िले की सड़क को याद कर सिहर उठे. दिवाकर ने तुरंत मुझे मैसेज किया उनके होमटाउन भागलुर से कहलगांव के बीच नेशनल हाईवे 80 का हाल बहुत बुरा है.
  • अब अगर नेशनल हाईवे की मरम्मत भी प्राइम टाइम देखने के बाद होने लगे तो आप सभी को अपने-अपने इलाके की सड़क की रिपोर्ट कहां भेजनी चाहिए, बताने की ज़रूरत नहीं है. हमें कई जगहों से सड़क निर्माण संघर्ष समिति के ईमेल मिले हैं. लोग अपने-अपने इलाके में नई सड़क और टूटी सड़क की मरम्मत के लिए समिति बनाकर संघर्ष कर रहे हैं.
  • हम सबने पढ़ा है कि भारत एक कृषि प्रधान देश है मगर भारत एक विचित्र प्रधान देश भी है. इससे प्रधान लोगों को आहत होने की ज़रूरत नहीं है बस उस कॉलेज को खोजने की ज़रूरत है जो दस साल बाद इंस्टिट्यूट ऑफ एमिनेंस बनता हुआ दुनिया के टॉप 500 में शामिल हो जाएगा. एक कॉलेज और है जो था मगर गायब हो गया है, जिसे वापस लाने की मांग को लेकर छात्र आंदोलन कर रहे हैं.
  • हिन्दी प्रदेशों में विवाद तो दो ही विश्वविदयालय के चलते हैं एक जेएनयू के और दूसरा एएमयू. चैनलों ने जब चहा यहां से देशद्रोही और हिन्दू-मुस्लिम नेशनल सिलेबस का कोई न कोई चैप्टर मिल ही जाता है.
  • यह न तंज है और न व्यंग्य है. न ही स्लोगन बाज़ी के लिए बनाया गया सियासी व्यंजन है. रोज़गार के डेटा को लेकर काम करने वाले बहुत पहले से एक ठोस सिस्टम की मांग करते रहे हैं जहां रोज़गार से संबंधित डेटा का संग्रह होता रहा हो. लेकिन ऐसा नहीं है कि रोज़गार का कोई डेटा ही नहीं है.
  • लाखों अर्धसैनिक बल सेना की तरह समान पेंशन और वेतन की मांग को लेकर सड़क पर हैं, यूपी के 8000 बीटीसी शिक्षक नियुक्ति पत्र मिलने के इंतज़ार में धरने पर बैठे हैं, इन्हीं के साथ 4000 उर्दू शिक्षक नियुक्ति पत्र के इंतज़ार में सड़क पर हैं, पौने दो लाख शिक्षा मित्र समय से वेतन मिलने और 10,000 से 40,000 होने की मांग को लेकर दर दर भटक रहे हैं.
  • जो पुलिस पंजाब में नशे के तस्करों पर लगाम लगाती अब सरकार उसी की जांच करेगी कि पुलिस में से कितने नशे के ग़ुलाम हो चुके हैं. पुलिस ही नहीं पंजाब के सरकारी कर्मचारियों की जांच होगी कि वे नशा लेते हैं या नहीं. सरकार को भी सरकार से लड़ना पड़ रहा है.
  • दिल्ली को राज्य तो नहीं मिला मगर कौन राज करेगा उसका हिसाब आज साफ हो गया. लेफ्टिनेंट गवर्नर के सहारे दिल्ली सरकार न चलने देने का जो खेल दो साल से चला है, उस खेल को सही ठहराने के तमाम तर्कों के कंकाल आपको टीवी चैनलों के आर्काइव में मिल जाएंगे. सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के फैसले से भले कुछ न बदले ऐसा कहने वाले वही कह सकते हैं, जिन्हें अब भी भरोसा है कि कभी विधायकों की सदस्यता खत्म करने की चाल से तो कभी गवर्नर के बहाने दिल्ली में खेल अब भी खेला जाएगा. फिर भी लंबे समय के लिए दिल्ली के संवैधानिक आसमान पर छाई धुंध छंट गई है. अब दिल्ली का वक्त इस सवाल को लेकर बर्बाद नहीं होगा कि मुख्यमंत्री सरकार चलाएंगे या लेफ्टिनेंट गवर्नर.
  • यह कहानी सिर्फ उत्तर प्रदेश की नहीं है, हर प्रदेश में ऐसी कहानी होगी जहां कर्मचारी कई साल तक सरकार के अलग-अलग विभागों में काम करने के बाद बाहर फेंक दिए जाते हैं. 10 साल, 20 साल सरकार के यहां नौकरी करने के बाद बाहर फेंक दिए गए ये लोग सचिवालयों और ज़िलाधिकारी कार्यालय के बाहर धरना देते हुए नज़र आते हैं. ऐसा नहीं है कि ये अदालतों से नहीं जीतते, जीतने के बाद भी इनकी नियुक्ति नहीं होती है और अगर हार गए तो कोर्ट के फैसले का बहाना बनाकर हमेशा के लिए इनकी सुनवाई बंद कर दी जाती है.
  • जिस भीड़ के ख़तरे के बारे में चार साल से लगातार आगाह कर रहा हूं, वो भीड़ अपनी सनक के चरम पर है या क्या पता अभी इस भीड़ का चरम और दिखना बाकी ही हो. कभी गौ रक्षा के नाम पर तो कभी बच्चा चोरी की अफवाह के नाम पर किसी को घेर लेना, मार देना, आसान होता जा रहा है.
  • बलात्कार की हर घटना हम सबको पिछली घटना को लेकर हुई बहस पर ला छोड़ती है. सारे सवाल उसी तरह घूर रहे होते हैं. निर्भया कांड के बाद इतना सख़्त कानून बना इसके बाद भी हमारे सामने हर दूसरे दिन निर्भया जैसी दर्दनाक घटना सामने आ खड़ी होती है.
  • देहरादून का एक वीडियो वायरल हो रहा है. 28 जून के इस वीडियो में दिख रहा है उसमें देखने के लिए कई बातें हैं. एक अध्यापिका हैं जो सिस्टम से झुंझलाई हुई हैं, उनकी कोई नहीं सुन रहा है, सामने एक मुख्यमंत्री हैं जो बैठे तो हैं सुनने के लिए मगर सुनते ही झुंझला जा रहे हैं, एक मीडिया है जो कभी आम लोगों की समस्या से वास्ता नहीं रखता मगर एक मुख्यमंत्री ने बेअदबी की है तो उसमें चटखारे ले रहा है.
  • स्वि‍स नेशनल बैंक ने अपनी सालाना रिपोर्ट में बताया है कि 2017 में उसके यहां जमा भारतीयों का पैसा 50 प्रतिशत बढ़ गया है. नोटबंदी के एक साल बाद यह कमाल हुआ है. ज़रूरी नहीं कि स्विस बैंक में रखा हर पैसा काला ही हो लेकिन काला धन नहीं होगा, यह क्लीन चिट तो मोदी सरकार ही दे सकती है.
  • भारत की राजनीति और उसके मुद्दे व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के गुडमॉर्निंग मैसेज की तरह हो गए हैं. जिस तरह से अब सबको पता है कि व्हाट्सएप यूनिवर्सिटि में गुडमॉर्निंग मैसेज आएगा ही और मैसेज में धार्मिक तस्वीरें होंगी, नैतिक संदेश होंगे, माता-पिता का आदर करना है टाइप के, गुलाब का फूल तो होता ही है और पहाड़ों से निकलते सूरज की तस्वीर के बिना गुडमॉर्निग मैसेज कभी पूरा नहीं होता है. आप लाख मना करें कि प्लीज़ मेरे इनबॉक्स में गुडमॉर्निग मैसेज न भेजें, फिर भी अगली सुबह गुडमॉर्निंग मैसेज आ ही जाता है. ये एक किस्म की बीमारी है, इससे गुडमॉर्निंग कम, ऊब ज्यादा होती है. ठीक इसी तरह भारत की राजनीति में अब तय सा हो गया है कि आज क्या प्रोपेगैंडा चलेगा.
  • कई बार हमें लगता है कि किसी विश्वविद्यालय की समस्या इसलिए है क्योंकि वहां स्वायत्तता नहीं है इसलिए उसे स्वायत्तता दे दी जाए. जब भी उच्च शिक्षा की समस्याओं पर बात होती है, ऑटोनमी यानी स्वायत्तता को एंटी बायेटिक टैबलेट के रूप में पेश किया जाता है. लेकिन आप किसी भी विश्वविद्यालय को देखिए, चाहे वो प्राइवेट हो या पब्लिक यानी सरकारी क्या वहां सरकार या राजनीतिक प्रभाव से स्वायत्त होने की स्वतंत्रता है. सरकार ही क्यों हस्तक्षेप करती है, वो हस्तक्षेप करना बंद कर दे. कभी आपने सुना है कि वाइस चांसलर की नियुक्ति की प्रक्रिया बेहतर की जाएगी, उनका चयन राजनीतिक तौर पर नहीं होगा.
  • भारत का नौजवान जिन सवालों पर नेताओं को बोलते सुनना चाहता है, नेता पूरी कोशिश में लगे हैं कि उन सवालों पर न बोला जाए. टीवी के ज़रिए सवालों से देश को बहकाकर वहां ले जाया जा रहा है जहां उस बहस का कोई मतलब नहीं मगर उस बहस में चंद मिनटों का रोमांच ज़रूर है. लम्हों को धोखा देकर पीढ़ियों को बर्बाद किया जा रहा है. अच्छी बात यही है कि भारत के नौजवानों ने भी कसम खा ली है कि राजनीति के इस खेल को नहीं समझना है वरना इंदौर की डॉक्टर स्मृति लहरपुरे ने फीस के जिस दबाव में आत्महत्या की है, उस सवाल पर नेताओं को फर्क भले न पड़े, नौजवानों का सर शर्म से झुक जाना चाहिए था. अच्छी बात है कि कुछ मेडिकल संस्थानों के छात्रों ने स्मृति लहरपुरे के समर्थन में प्रदर्शन किया है. देश के ढाई करोड़ नौजवान 31 मार्च से इंतज़ार कर रहे हैं कि रेलवे के ग्रुप-डी और ग्रुप-सी की जो परीक्षा का फॉर्म भरा था वो परीक्षा कब होगी.
  • गंगा उन सभी को बुला रही है जिन्हें वो साल में कई बार बुलाती रहती है. वो चाहती है कि वे सारे लोग उसका हाल देखें और बताएं कि उसका पानी साफ क्यों नहीं हुआ ? पानी कम क्यों होता जा रहा है और गाद से भरी गंगा कब साफ होगी. अगर आपको मां गंगा ने कभी बुलाया है तो प्लीज इस वक्त बनारस जाइये, क्योंकि वहां गंगा से जुड़ी दो योजनाएं आपसे कुछ पूछना चाहती हैं. नमामि गंगे के तहत साफ पानी नहीं दिख रहा है बल्कि पानी ही नहीं दिख रहा है और जलमार्ग बनाने के बड़े एलान का हाल ये है कि गंगा की गोदी में जब बालू और मिट्टी की गाद देखेंगे तो आपको सिर्फ गिल्ली डंडा खेलने का ख्याल आएगा, जहाज़ चलाने का नहीं. तीसरा सवाल है कि बनारस में जो पानी का अलर्ट जारी हुआ है उसकी नौबत क्यों आई. इन तीन सवालों के लिए गंगा सबको खोज रही है, बल्कि फिर से बुला रही है.
  • अहमदाबाद ज़िला सहकारिता बैंक में नोटबंदी के दौरान 8 से 14 नवंबर के बीच 745 करोड़ रुपये जमा हुआ. देश भर में सबसे ज्यादा पैसा इसी बैंक में जमा हुआ. अहमदाबाद ज़िला सहकारिता बैंक की वेबसाइट पर लिखा है कि बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ही इसके अध्यक्ष हैं.
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