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रवीश कुमार

प्राइम टाइम एंकर, तीन बार रामनाथ गोयनका पुरस्कार से सम्मानित, 20 साल की पत्रकारिता, ब्लॉगर, फेसबुक पेज @RavishKaPage, ट्विटर @ravishndtv, लेखक- The Free Voice, इश्क़ में शहर होना। हिन्दी मेरी जान, भोजपुरी मेरा ईमान।

  • सोमवार को 12 बज कर 03 मिनट पर डॉलर ने भारतीय रुपये को फिर धक्का दिया है. इस समय पर रुपये का भाव ऐतिहासिक रूप से नीचे चला गया. एक डॉलर 72 रुपये 55 पैसे का हो गया. वाकई अब श्री श्री रविशंकर से कहना होगा कि वे आएं और कुछ भभूत-वभूत छिड़कें ताकि डॉलर का नशा उतर जाए.
  • यह व्यवस्था किसी साहूकार या निजी कंपनियों द्वारा नहीं चलाई जा रही है बल्कि यह व्यवस्था स्वयं शासन के द्वारा चलाई जा रही है. जी हां, मैं बात कर रहा हूं मध्य प्रदेश पॉलिटेक्निक अतिथि व्याख्याताओं के लिए बनाए गए नियमों के बारे में इन नियमों के तहत अतिथि अध्यापकों को प्रति कालखंड सिर्फ 275 का भुगतान किया जाता है. अगर किसी दिन किसी भी कारण से कक्षा नहीं लगती है तो उस दिन अतिथि व्याख्याताओं को कोई भी भुगतान नहीं किया जाता है.
  • आईटी सेल आईटी सेल होता है. पिछले साल मेरे बयान का आधा हिस्सा काट कर ग़लत संदर्भ में पेश किया गया और उसे शेयर कर दिया था आईटी सेल के सरदार ने. ग़नीमत है कि प्रतीक सिन्हा ऑल्ट न्यूज़ वाले ने पकड़ लिया. आप भी देखिए ये काम कैसे होता है.
  • राम नाम सत्य है... राम का नाम तब भी सत्य था अब भी सत्य है मगर जो साल था तब भी झूठ था अब भी झूठ है. वो 2013 का साल था. अजीब साल था वह. किसी भूत की तरह श्मशान से निकल आता है. सिलेंडर की अरथी निकली थी. दाम 600 के आस पास था. अब उसी सिलेंडर का दाम 833 रुपया हो चुका है, मगर शवयात्रा निकालने वाले गायब हैं. दरअसल वो अरथी का अर्थ समझ चुके हैं. वो जानते हैं कि राजनीति झूठी है, राम का नाम सत्य है.
  • कई बार सर्वोच्च अदालत के कुछ फैसलों को इसलिए नहीं पढ़ा जाना चाहिए कि वो आपके हिसाब से आया है, बल्कि इसलिए भी पढ़ा जाना चाहिए कि फैसले तक पहुंचने से पहले तर्कों की प्रक्रिया क्या है. उसकी भाषा क्या है, भाषा की भावना क्या है.
  • 11 लाख परीक्षार्थी रेलवे की परीक्षा नहीं दे सके. 11 लाख क्या छोटी संख्या है? 47 लाख परीक्षार्थियों में से 11 लाख परीक्षा में शामिल नहीं हो सके, यह बात हर दर्ज़े से शर्मनाक़ है. आप जानते हैं कि रेलवे ने अगस्त में 64,037 पदों के लिए परीक्षा ली है.
  • अंबानी जी पाठकों को लेकर हमेशा उदार रहे हैं. उन पर कभी मानहानि नहीं करते. कैरवान ने भी उन्हें मानहानि देने के लिए ये अंक निकाला है. आप पढ़कर ख़ुद से अंबानी की मानहानि की भरपाई करें.
  • 5 सितंबर 2017 को बेंगलुरु में गौरी लंकेश की हत्या कर दी गई थी. धार्मिक कट्टरता के ख़िलाफ़ लिखने वाली गौरी लंकेश ने हमेशा हिंसा और हत्या की राजनीति का विरोध किया. अपनी लेखनी में वो कर्नाटक के भीतर उभर रही ऐसी ताकतों की पहचान कर रही थीं और उनके बारे में खुलकर लिख रही थीं. ज़ाहिर है इसी तबके से उनकी हत्या के बाद सोशल मीडिया में जश्न मनाया गया था और किसी की मौत पर अफसोस प्रकट करने की परंपरा को तोड़ते हुए खुशी ज़ाहिर की गई थी. उस दिन सिर्फ गौरी लंकेश की हत्या नहीं हुई थी बल्कि यह भी पता चला था कि हमारे समाज में हत्या को उचित ठहराने वाले लोगों की कमी नहीं है जो समय समय पर एक खास राजनीतिक विचारधारा का भी समर्थन करते हैं जिसका संबंध सत्ता से है.  
  • 8 नवंबर 2016 को जब नोटबंदी हुई थी तो बतौर प्रधानमंत्री किसी को पता नहीं था. सबको एक ही बार रात आठ बजे टीवी से पता चला था. लेकिन नोटबंदी फिर से हो सकती है इसका पता सबको चल चुका है और वो भी टीवी से. नीति आयोग के चेयरमैन प्रधानमंत्री होते हैं और उपाध्यक्ष होते हैं राजीव कुमार. राजीव कुमार ने श्रीनिवासन जैन से कहा है कि अर्थव्यवस्था की सफाई के लिए वे किसी भी दिन नोटबंदी करना चाहेंगे, ताकि ये औपचारिक हो सके. टैक्स भरने की आदत में सुधार हो. नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार के अनुसार टैक्स भरने की आदत में सुधार के लिए वे कभी भी नोटबंदी करना चाहेंगे. दुनिया भर में कई देश हैं जहां टैक्स भरने की आदत इस वक्त भी भारत से बेहतर से होगी, लेकिन क्या वहां आदत में ये सुधार नोटबंदी से आई है. तब तो जहां भी टैक्स चोरी होती है वहां नोटबंदी होनी चाहिए.
  • भाषणों के मास्टर कहे जाते हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. साल 2013 में जब वह डॉलर के मुक़ाबले भारतीय रुपये के गिरने पर दहाड़ रहे थे, तब लोग कहते थे, 'वाह मोदी जी, वाह... यह हुआ भाषण... यह भाषण नहीं, देश का राशन है... हमें बोलने वाला नेता चाहिए... पेट को भोजन नहीं, भाषण चाहिए...' यह बात भी उन तक पहुंची ही होगी कि पब्लिक में बोलने वाले नेता की डिमांड है. बस, उन्होंने भी बोलने में कोई कमी नहीं छोड़ी. पेट्रोल महंगा होता था, मोदी जी बोलते थे. रुपया गिरता था, मोदी जी बोलते थे. ट्वीट पर री-ट्वीट, डिबेट पर डिबेट. 2018 में हम इस मोड़ पर पहुंचे हैं, जहां 2013 का साल राष्ट्रीय फ्रॉड का साल नज़र आता है, जहां सब एक दूसरे से फ्रॉड कर रहे थे.
  • हिदायतुल्ला नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के 1000 के छात्र इन दिनों आंदोलन कर रहे हैं. 27 अगस्त से वे एक निर्णायक लड़ाई लड़ रहे हैं. उन सीनियरों के बदले भी जो सहते रहे और चुपचाप यूनिवर्सिटी से डिग्री लेकर चले गए. उनके बदले भी ये छात्र लड़ रहे हैं, ताकि उन्हें और आने वाली पीढ़ियों को अब और न झेलना पड़े.
  • नोटबंदी ने लघु व मध्यम उद्योगों की कमर तोड़ दी है. हिन्दू मुस्लिम ज़हर के असर में और सरकार के डर से आवाज़ नहीं उठ रही है लेकिन आंकड़े रोज़ पर्दा उठा रहे हैं कि भीतर मरीज़ की हालत ख़राब है. भारतीय रिज़र्व बैंक के अनुसार मार्च 2017 से मार्च 2018 के बीच उनके लोन न चुकाने की क्षमता डबल हो गई है.
  • यूनिफॉर्म सिविल कोड की इस वक्त न ज़रूरत है और न ही यह अनिवार्य है. यह राय भारत के क़ानून आयोग की है. पिछले शुक्रवार को कानून आयोग ने परिवार कानून सुधार पर अपनी तरफ से एक चर्चा-पत्र जारी किया है. आयोग का पक्ष है कि समुदायों के बीच समानता की जगह समुदायों के भीतर स्त्री और पुरुष के बीच समानता होनी चाहिए.
  • क्या आपको पता है कि भारत का रुपया क्यों लगातार कमज़ोर हो रहा है, आजकल भारत का रुपया गिरने में हर दिन इतिहास बना रहा है. 31 अगस्त को बाज़ार बंद होने पर एक डॉलर था 70 रुपये 99 पैसे. कहां तो इसे श्री श्री रविशंकर के अनुसार 40 रुपये के आस पास होना चाहिए था मगर अब यह 70 रुपये 99 पैसे पर पहुंच गया है. इसका सबसे बुरा असर तेल की कीमतों पर पड़ रहा है.
  • लोग पढ़ने की क्षमता कई कारणों से खोते जा रहे हैं. इसलिए उनके लिए सुबह की राम राम जी की जगह गुलाब के फूल, दो कप चाय और पहाड़ के पीछे से उगते सूरज से गुडमार्निंग भेजा जाता है. जो लोग मुश्किल से पढ़ने की साधना में लगे हैं, वो व्यापक समाज के अपढ़ होने की इस प्रक्रिया से बेचैन हैं.
  • याद कीजिए नोटबंदी की वो लाइनें. खासकर महिलाएं जिनके पास अपना जमा किया हुआ पैसा था, वो सब पतियों और पिताओं के हाथ चला गया. एक झटके में किसी बुरे वक्त के लिए बचा कर रखे गए पैसे निकाल कर देने पड़े क्योंकि वे अब वे अवैध हो चुके थे. बाद में वे पैसे लौट कर पत्नियों और बेटियों के हाथ आए या नहीं, वहीं बता सकती हैं मगर महिलाओं से लेकर आम किसानों तक लाइन में लग गए. अपना पैसा जमा कराने.
  • कल्पना कीजिए, आज रात आठ बजे प्रधानमंत्री मोदी टीवी पर आते हैं और नोटबंदी के बारे में रिज़र्व बैंक की रिपोर्ट पढ़ने लगते हैं. फिर थोड़ा रूक कर वे 8 नवंबर 2016 का अपना भाषण चलाते हैं, फिर से सुनिए मैंने क्या क्या कहा, उसके बाद रिपोर्ट पढ़ते हैं. आप देखेंगे कि प्रधानमंत्री का गला सूखने लगता है. वे खांसने लगते हैं और लाइव टेलिकास्ट रोक दिया जाता है. वैसे कभी उनसे पूछिएगा कि आप अपने उस ऐतिहासिक कदम के बारे में क्यों नहीं बात करते हैं?
  • उपरोक्त संदर्भ में चौकीदार कौन है, नाम लेने की ज़रूरत नहीं है. वर्ना छापे पड़ जाएंगे और ट्विटर पर ट्रोल करने लगेंगे कि कानून में विश्वास है तो केस जीत कर दिखाइये. जैसे भारत में फर्ज़ी केस ही नहीं बनता है और इंसाफ़ झट से मिल जाता है. आप लोग भी सावधान हो जाएं. आपके ख़िलाफ़ कुछ भी आरोप लगाया जा सकता है. अगर आप कुछ नहीं कर सकते हैं तो इतना तो कर दीजिए कि हिन्दी अख़बार लेना बंद कर दें या फिर ऐसा नहीं कर सकते तो हर महीने अलग अलग हिन्दी अख़बार लें, तभी पता चलेगा कि कैसे ये हिन्दी अख़बार सरकार की थमायी पर्ची को छाप कर ही आपसे महीने का 400-500 लूट रहे हैं. हिन्दी चैनलों का तो आप हाल जानते हैं. मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं. इसके लिए आपको 28 और 29 अगस्त के इंडियन एक्सप्रेस में ऋतिका चोपड़ा की ख़बर बांचनी होगी. आप सब इतना तो समझ ही सकते हैं कि इस तरह की ख़बर आपने अपने प्रिय हिन्दी अख़बार में कब देखी थी.
  • जब सरकारें आपको कम्युनिस्ट बताकर गिरफ्तार करने आने लगे तो समझ लेने का वो आखिरी वक्त होता है कि अब आपकी कोई हैसियत नहीं है. जब टीवी चैनल अर्बन नक्सल और कम्युनिस्ट बताकर देश का दुश्मन टाइम बहस करने लगें तो समझ लेने का आखिरी वक्त होता है कि अब नौकरी से लेकर पढ़ाई पर बात नहीं होगी. अब आपकी बात ही नहीं होगी और जो भी होगी उस प्रोपेगैंडा के हिसाब से होगी, जिसे मैं अक्सर थीम एंड थ्योरी कहता हूं. जिसे लेकर एक तरफ विरोधी या सवाल करने वालों को कुचला जा सके और दूसरी तरफ सवाल न उठे इसका इंतज़ाम किया जा सके. थीम एंड थ्योरी के तहत तीन मूर्ति में किस किस की मूर्ति लगेगी बहुत कमज़ोर टॉपिक था. इसलिए आज एक नया टॉपिक न्यूज़ मीडिया के मार्केट में लांच हो गया है, जिसके सहारे धीरे-धीरे मीम बनकर आपके व्हाट्सऐप में आने लगेगा. आप लाठियां खाते रहें कि सरकारी नौकरी में बहाली कब होगी मगर आपके सारे रास्ते बंद हो चुके हैं.
  • हर दिन सोचता हूं कि अब नौकरी सीरीज़ बंद कर दें. क्योंकि देश भर में चयन आयोग किसी गिरोह की तरह काम कर रहे हैं. उन्होंने नौजवानों को इस कदर लूटा है कि आफ चाह कर भी सबकी कहानी नहीं दिखा सकते हैं. नौजवानों से फॉर्म भरने कई करोड़ लिए जाते हैं, मगर परीक्षा का पता ही नहीं चलता है. देश में कोई भी खबर होती है, ये नौजवान दिन रात अपनी नौकरी को लेकर ही मैसेज करते रहते हैं. मेरी नौकरी, मेरी परीक्षा का कब दिखाएंगे. परीक्षा देकर नौजवान एक साल से लेकर तीन साल तक इंतज़ार कर रहे हैं तो कई बार फॉर्म भरने के बाद चार तक परीक्षा का पता ही नहीं चलता है. यह सीरीज़ इसलिए बंद करना ज़रूरी है क्योंकि समस्या विकराल हो चुकी है. जब भी बंद करने की सोचता हूं किसी नौजवान की कहानी सुनकर कांप जाता हूं. तब लगता है कि आज एक और बार के लिए दिखा देते हैं और फिर सीरीज़ बंद नहीं कर पाता. 
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