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संजय किशोर

सोच को साझा करने का शौक रहा है. सोच को शब्दों का पंख मिला और फिर परवाज़. क्षितिज की तलाश भारतीय जन संचार संस्थान तक ले आयी. सोच जब विचारों से टकराया तो शब्द और सपने को नई धार मिली. इलेक्ट्रॉनिकिस मीडिया की शुरुआती उड़ान में सीट मिल गई. सोच की छटपटाहट को खेल सीमित नहीं कर पाया. लिहाज़ा लिखता हूं...

  • जब बॉल सालाह के बूट से टकराकर गोलपोस्ट के भीतर जाती है, तो लिवरपूल फुटबॉल क्लब स्टेडियम का नज़ारा कुछ ऐसा हो उठता है - पहले जश्न और शोर, फिर कुछ क्षण की खामोशी, फिर हाथ आसमान की तरफ उठता है खुदा को शुक्रिया कहने के लिए, और फिर जब वह धरती को चूमता है, तो उन लम्हों की पवित्रता के लिए ज़रूरी शांति का उसके प्रशंसक सम्मान करते हैं.
  • 'मॉर्निंग वॉक' के समय 'वॉक' कम, 'टॉक' ज़्यादा होने लगा है. पहले यह बीमारी 'काउ बेल्ट' तक सीमित थी, जहां हर चर्चा राजनीति से शुरू होकर राजनीति पर खत्म होती है. इसलिए भी, क्योंकि छोटे शहरों में भागमभाग कम है और समय ज़्यादा. फुर्सत ही फुर्सत. लिहाज़ा, चाय की चुस्की के साथ राजनीति पर बहसबाज़ी सबसे पसंदीदा शगल है.
  • अस्सी के दशक के शुरुआती साल थे. बाज़ार में VHS नया-नया आया था. आज जैसे हर गली और नुक्कड़ पर सेल-फ़ोन की दुकानें हैं. ठीक उसी तरह वीडियो पार्लर कुकुरमुत्तों की भांति मानों रातो-रात उग आए थे. धक्के खाकर बदमिजाज ब्लैकिए से महंगे टिकट खरीदने की बजाए, 10 रुपये में पूरा परिवार घर के सुकून में पूरी फ़िल्म देख रहा था. जो वीसीआर-वीडियो कैसेट्स रिकॉर्डर खरीद नहीं पाए वे भाड़े पर ले आते और 3 से 4 फ़िल्म एक ही रात में देख जाते.
  • नाम में 'किशोर' जोड़ लेने से कुदरत की अदालत से उम्र पर 'स्टे ऑर्डर' थोड़े ही मिल जाता है... ज़िन्दगी का अर्द्धशतक कुछ ही साल के फासले पर इंतज़ार कर रहा है... 'मिड-लाइफ क्राइसिस' जैसी कोई बात नहीं है, शायद इसलिए, क्योंकि बचपना बचा हुआ है.
  • 'व्हॉट अ गाई!' शतक दर शतक के बाद हीरोइन हैरान थी. जवाब में ऐतिहासिक जीत के बाद हीरो ने दुनिया के सामने एक बार फिर अपने इश्क़ का इज़हार कर दिया... “यह दौरा काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है. मैदान के बाहर के लोगों को इसका श्रेय मिलना चाहिए. मेरी पत्नी मुझे लगातार प्रेरित करती रहती है उसे भी काफी श्रेय दिया जाना चाहिए.”
  • एक मुस्कान पर देश न्योछावर हुए जा रहा है. पलक की एक झपकन करोड़ों दिलों से आहें भरवा रही है. केरल के त्रिशूर के विमला कॉलेज की 18 साल की बीकॉम की छात्रा और आने वाली एक मलयालम फ़िल्म की नायिका प्रिया प्रकाश वारियर ने सिर्फ़ 24 घंटों में सोशल मीडिया के जरिए दिलों को जीत लिया. जनमानस पर छा गयीं. नेशनल क्रश बन गयीं.
  • खेल के मैदान पर कोच शिक्षक होता है. कोच का ईमानदार प्रयास और खिलाड़ी की मेहनत से ही कामयाबी की कहानी लिखी जाती है. एक अकेले शख्स पुलेला गोपीचंद की प्रतिबद्धता ने भारतीय बैडमिंटन को बदल दिया है. भारतीय बैडमिंटन में सुनहरे युग की शुरुआत हो चुकी है. वर्ल्ड और ओलिंपिक सिल्वर मेडलिस्ट पीवी सिंधु और ओलिंपिक कांस्य पदक विजेता साइना नेहवाल इन्‍हीं गोपीचंद की शागिर्द हैं.
  • हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद को देश वो सम्मान आज भी नहीं दे पाया है जो दुनिया के सबसे बड़े तानाशाह एडॉल्फ़ हिटलर तक के प्रस्ताव को ठुकरा आया था.
  • कल मैच देखने बैठ गया. बहुत दिनों बाद हुआ कि टेलीविजन स्क्रीन के सामने से उठ नहीं पाया. आमतौर पर स्पोर्ट्स रिपोर्टर से लोग रश्क करते हैं-क्या नौकरी है!
  • सच है कि हम अपने बच्चों को भीड़ का हिस्सा नहीं बनाना चाहते. हर मां-बाप की ख़्वाहिश होती है कि उनके बच्चे भीड़ नहीं, भीड़ में चेहरा बनें. लेकिन किसी भी हालत में कल इन्हें भीड़ का सामना तो करना ही पड़ेगा, जहां हर क़िस्म की शख्सियतें मिलेंगी. एक न एक दिन बच्चों पर से हमें अपना सुरक्षा चक्र हटाना होगा. ये आवरण एकाएक हटेगा तो ज़्यादा तकलीफ़देह हो सकता है. इसलिए समय-समय पर 'एक्सपोज़र' जरुरी है.
  • "मेरे साथ ऐसा नहीं हो सकता'. खीज के साथ झुंझलाहट बढ़ती जा रही थी. कंप्यूटर पर अक्षर धुंधले नज़र आ रहे थे. आंखें फैलाई. मिचमिचाई. मल कर भी देखी. वाशरूम जाकर पानी से धो भी ली. (दिल्ली में 23 साल से रहते-रहते "बाथरूम" कब "वाशरूम" बन गया पता ही नहीं चला.)
  • साल 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 640,867 गांव हैं. देश की 68.84 फीसदी आबादी गांवों में रहती है. 26% लोग गरीबी रेखा के अंतरराष्ट्रीय मानक से नीचे रहते हैं. इनसे आप स्मार्टफोन चलाने और कैशलेस बनने की बात कर रहे हैं. अरे मित्रो, इनके पास दो जून का खाना जुटाना भी मुश्किल होता है.
  • जरा सोचिए कि दादा कोंडके की मूवी के पहले राष्ट्रगान बजाया जाता तो क्या इससे राष्ट्रगान की गरिमा नहीं गिरती! आप सनी लियोनी की फिल्म के दर्शकों को राष्ट्रगान बजाकर खड़ा करवाएंगे!
  • इस बात से सहमत हूं कि स्कर्ट की लंबाई किसी का चरित्र मापने का पैमाना नहीं हो सकता. "पैमाना" भले ही न हो लेकिन स्कर्ट की लंबाई हमारे देश में "मायने" रखता है.... बहुत ज्यादा. "बच्चन", "नंदा", "गांधी", "अंबानी", या "बिरला" सरनेम के लिए स्कर्ट की लंबाई शायद मायने नहीं रखती हो क्योंकि यह समाज का प्रभावशाली वर्ग है.
  • टीवी चैनलों पर दिखने वाला अर्धनग्न शख्स संदीप कुमार था दिल्ली का महिला और शिशु कल्याण मंत्री जो अब पूर्व हो चुका है. उसकी सेक्स सीडी खबरिया चैनल वालों के लिए टीआरपी की चाबी बन गई थी. हर चैनल लगे सीडी की अश्लील तस्वीर से "खेलने", उसे अपनी-अपनी वेब साइटों पर "वायरल" करने. सभी के पास "एक्सक्लूसिव" फुटेज थे.
  • कामयाबी भुनाने के लिए होड़-सी मची हुई है. शहर-दर-शहर शोहरत के लुटेरे नज़र आ रहे हैं. दौलत का खजाना खुल गया है. कुछ अजीब सी विडंबना है. एक तरह का दोगलापन. इसी में छिपी है खेल में फ़िसड्डी होने की हमारी कहानी.
  • वक्त अगर किसी चीज को लौटाना चाहे तो बिलाशक भारतीय खेल जगत दद्दा यानि मेजर ध्यानचंद को मांगना चाहेगा. उनसा न कोई हुआ और हो सकता है भविष्य में हो भी नहीं. खेल से खिलाड़ी की पहचान बनती है लेकिन ध्यानचंद तो हॉकी का आइना बन गए.
  • सुपरपॉवर उसे माना जाता है, जो देश सामाजिक, आर्थिक और तकनीकी तौर पर मजबूत हो... प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण हो... ताकतवर और आधुनिक सैन्यशक्ति हो... जिस देश की बात दुनिया सुने और जिसके एथलीट खेल के मैदान में भी झंडे गाड़ें... जो भी देश सुपरपॉवर कहे जाते हैं, वे खेलों के भी पॉवरहाउस हैं... रूस और अमेरिका का उदाहरण सामने है... चीन सुपरपॉवर बनने की राह पर है... इसके लिए चीन ने खेल के मैदान से दबदबा बनाना शुरू किया...
  • लियोनेल मेसी और क्रिस्टियानो रोनाल्डो फ़ोर्ब्स के मुताबिक दुनिया के दो सबसे लोकप्रिय खिलाड़ी। सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा फॉलो किए जाने वाले एथलीट। दो महान फुटबॉलर लेकिन खेल और शख्सियत बिल्कुल जुदा।
  • क्रिकेट अनिश्चितताओं का खेल माना जाता है। इस खेल में दिग्गज जानकार भी भविष्यवाणी करने से कतराते हैं। लेकिन एक शख्स ऐसा है जो "अनिश्चित" को "सुनिश्चित" कर रहा है, "अनहोनी" को "होनी" में बदल रहा है। 27 साल का विराट कोहली आज क्रिकेट का सबसे भरोसेमंद चेहरा बन कर उभरा है।
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