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संजय किशोर

सोच को साझा करने का शौक रहा है. सोच को शब्दों का पंख मिला और फिर परवाज़. क्षितिज की तलाश भारतीय जन संचार संस्थान तक ले आयी. सोच जब विचारों से टकराया तो शब्द और सपने को नई धार मिली. इलेक्ट्रॉनिकिस मीडिया की शुरुआती उड़ान में सीट मिल गई. सोच की छटपटाहट को खेल सीमित नहीं कर पाया. लिहाज़ा लिखता हूं...

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