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सुधीर जैन

सागर विश्वविद्यालय से अपराधशास्त्र व न्यायालिक विज्ञान में स्नातकोत्तर के बाद उसी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर रहे, Ph.D. के लिए 307 सज़ायाफ़्ता कैदियों पर छह साल तक शोधकार्य, 27 साल 'जनसत्ता' के संपादकीय विभाग में रहे, सीएसई की नेशनल फैलोशिप पर चंदेलकालीन तालाबों के जलविज्ञान का शोध अध्ययन, देश की पहली हिन्दी वीडियो मैगज़ीन के संस्थापक निदेशक, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस और सीबीआई एकेडमी के अतिथि व्याख्याता, विभिन्न विषयों पर टीवी पैनल डिबेट. विज्ञान का इतिहास, वैज्ञानिक शोधपद्धति, अकादमिक पत्रकारिता और चुनाव यांत्रिकी में विशेष रुचि.

  • बुंदेलखंड समस्या एक पहेली बन गई है। नवीनतम स्थिति यह है कि उप्र और केंद्र सरकार के बीच उठापटक के अलावा कुछ भी होता नहीं दिख रहा। बुंदेलखंड के हालात घंटे दर घंटे बिगड़ रहे हैं। इमरजेंसी जैसे हालात में उप्र और केंद्र के बीच एक दूसरे पर आरोप लगाने या अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने की हरकतों को समझना पड़ेगा।
  • आजादी के बाद पहली बार है कि बुंदेलखंड में किसी राहत या आपदा प्रबंधन के लिए सरकारों ने हाथ खड़े कर दिए हैं। पिछले दो महीनों में दिल्ली, भोपाल और लखनऊ के चार सौ से ज्यादा बड़े पत्रकार बुंदेलखंड का दौरा कर चुके हैं। लेकिन बुंदेलखंड की व्यथा कथाएं लिखने के अलावा वे भी ज्यादा कुछ सुझा नहीं पाए।
  • बाबा साहेब आंबेडकर क्या अचानक ज्यादा प्रासंगिक हो गए हैं? अगर सिर्फ इसी साल के लिहाज से देखें तो 125वीं जयंती के विशेष अवसर पर उनका जिक्र स्वाभाविक है।
  • शनि मंदिर में महिलाओं को तेल चढ़ाने की मनाही थी। इस पाबंदी के खिलाफ मुकदमा अदालत गया। अदालती फैसला आया कि लिंग के आधार पर यह भेदभाव गलत है। पाबंदी हटाने का फैसला हुआ। इसी बीच परंपरावादियों ने हरचंद कोशिश की कि यह परंपरा बनी रहे।
  • सुप्रीम कोर्ट ने सूखे के हालात को लेकर केंद्र सरकार को फटकार लगा दी। अदालत ने कहा कि केंद्र सरकार देश के 12 राज्यों में सूखे के हालात देखने से आंखें नहीं मूंद सकती। अदालत की डांट सुनने के बाद केंद्र सरकार को अब बताना पड़ेगा कि वह इस संकट से निपटने के लिए क्या कर रही है।
  • अगर केंद्र बुंदेलखंड पर श्वेतपत्र जारी करने की मांग मान ले तो पता तो चले कि समस्या कितनी बड़ी है। इससे सरकार को वैज्ञानिक तरीके से समस्या के समाधान का उपाय भी सूझ सकता है। खैर, उपाय जब होगा, तब होगा, अभी तो सबसे बड़ा खतरा जल संकट से अभूतपूर्व हाहाकार का है।
  • उत्तर प्रदेश में प्रशांत किशोर की योजना के तहत कांग्रेस के लिए 100 सीटों का लक्ष्य है। यह बताता है कि प्रशांत किशोर ने कांग्रेस के लक्ष्य प्रबंधन के लिए विश्वसनीयता के पहलू पर कितनी ईमानदारी से सोचा है।
  • केंद्र सरकार ने गांवों में सभी के लिए पक्के मकान बनाने के वादे को पूरा करने की अपनी योजना का ऐलान किया है। मौजूदा सरकार के 2014 के चुनावी वादों में एक वादा यह भी किया गया था।
  • भले ही कुछ करने का समय निकल गया हो, लेकिन मुश्किल हालात में लोगों का हौसला बनाए रखने के लिए दलीलें जमा करके रखने का काम तो फौरन शुरू हो ही जाना चाहिए, क्योंकि कहीं ऐसा न हो कि सरकार के प्रवक्ताओं को ऐन मौके पर कुछ भी न सूझे।
  • पानी का मुद्दा पंजाब के चुनाव के लालच में सन गया है। सतलज यमुना जोड़ नहर का मसला अभी पंजाब और हरियाणा तक सीमित दिख रहा है। जल्द ही यह फैलेगा।
  • अब तक डाकिये और जज जैसी भूमिका में दिखती आई पत्रकारिता खुल्लमखुल्ला खुद ही वकील और राजनीतिक दलों के सहायकों के वर्गों में बंटती नजर आ रही है। ऐसे में उस पर पक्षधर होने का आरोप लगना स्वाभाविक है। बहुत संभव है कि उसकी विश्वसनीयता घटने का संकट इसी कारण उपजा हो।
  • अकादमिक रुझान के लेखकों-पत्रकारों से हमेशा उम्मीद रहती है, लेकिन इन सबको हम मुश्किल में पड़ता देख रहे हैं। उनकी विश्वसनीयता पर हमला, भौतिक धक्का-मुक्की का डर, देशद्रोह के भावनात्मक आरोपों का बढ़ता प्रजनन फिर भी उतने बड़े संकट नहीं है, जितना विद्वानों को फुसलाया जाना दिख रहा है।
  • विद्वानों के सोच-विचार से ही आसन्न संकट से निकलने का कोई रास्ता पकड़ में आ सकता है, वरना कहीं ऐसा न हो कि आर्थिक दुर्घटना की स्थिति में हम अफसोस मनाएं कि पहले सोचा जाना चाहिए था। वैसे संकट सिर्फ विश्लेषकों को दिख रहा है, और सरकार का काम फीलगुड से चल ही रहा है।
  • जाट आंदोलन से तबाही के बाद हरियाणा के मुख्यमंत्री जब कह रहे थे कि सारे गरीबों को नौकरियां दे देंगे तो इस बात पर हूटिंग हुई। जनता अगर अब अविश्वसनीय वायदों के चक्कर में आने से इंकार कर रही है तो समझ जाना चाहिए कि वाजिब वायदे भी संकोच के साथ करने का समय आ गया है।
  • बुधवार को पटियाला हाउस कोर्ट में देशभक्ति के नए रूप के सहारे भयावह नज़ारा पेश किया गया। सुप्रीम कोर्ट को फौरन दखल देकर अपने वरिष्ठ वकीलों को भेजना पड़ा, और जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार पर मामले की सुनवाई को रोकना पड़ा।
  • यह मामला भी भविष्य में होने वाले चुनावों के दौरान धाराप्रवाह चुनावी भाषणों में इस्तेमाल के लिए बनकर तैयार हो गया है। इस बात के सही या गलत होने का अंदाज़ा जल्द ही लगेगा, क्योंकि उत्तर प्रदेश और दूसरे राज्यों में चुनाव आ ही रहे हैं।
  • गुरुवार को 800 अंकों की गिरावट के कारणों पर विश्लेषक रटे-रटाए कारण ही बोलते रहे। यहां गौर करने लायक सबसे खास बात यह है कि यह बजट पेश होने का महीना है। यानी यह अंदेशा क्यों नहीं जताया जा सकता कि बजट की दिशा मोड़ने के आसान तर्क मिल गए हैं।
  • बजट का खाका बनकर तैयार हो गया होगा। बजट पेश होने में सिर्फ तीन हफ्ते ही बचे हैं। इस लंबे चौड़े दस्तावेज में तथ्यों और आंकड़ों में किसी गलती को ठीक करने के लिए बहुत सारे अफसरों की निगाह से गुजारना पडता है। प्रूफ रीडिंग और छपाई का काम भी वक्त मांगता है।
  • 168 देशों में भ्रष्टाचार की मौजूदा स्थिति पर टीआई की वस्तुनिष्ठ रिपोर्ट के बाद क्या यह ठीक नहीं रहेगा कि देश के विषय विशेषज्ञ एक बार फिर मिल-बैठकर भ्रष्टाचार के खिलाफ साढ़े चार साल पहले हुए आंदोलन की समीक्षा कर लें।
  • रोहित की खुदकुशी को लेकर छात्रों के असंतोष का सामना करते समय प्रधानमंत्री का रुआंसा होते हुए भाषण देना चर्चा में है। प्रधानमंत्री ने ऐसा क्यों किया? इसकी अकादमिक व्याख्या भी की जा सकती है।
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