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विजय अग्रवाल

लोगों में निराशा दूर कर उत्साह भरने का शौक है. इसलिए इससे जुड़े विषयों पर कई किताबें लिखी हैं जो लोगों ने काफी पसंद की हैं. अधिकतर पुस्तकें जीवन प्रबंधन से जुड़ी हुई हैं.

  • यूनान के दार्शनिक सुकरात ने कहा था, "मेरे इस शहर के सभी लोग मूर्ख हैं, क्योंकि वे यह जानते हैं कि वे सब कुछ जानते हैं... एक केवल मैं ही ज्ञानी हूं, क्योंकि मैं यह जानता हूं कि मैं कुछ नहीं जानता..."
  • मूर्ख से मूर्ख व्यक्ति भी यह सोचने को मजबूर है कि बात-बात पर, यहां तक कि बिना बात का भी बतंगड़ बनाकर लगभग रोजाना ही दहाड़ने वाला वह शेर आज मौन क्यों है? आरोप कोई बाहरी व्यक्ति नहीं लगा रहा है. लगाने वाला उन्ही के मंत्रीपरिषद का उनका एक विश्वसनीय साथी है. तो क्या उन आरोपों का उत्तर चुप्पी होगी ? देश के वित्तमंत्री ने उन पर मानहानि का मुकदमा ठोंक दिया है. यह विकल्प केजरीवाल के पास भी है. क्या वे भी कपिल मिश्रा के साथ ऐसा ही कुछ करके जनता के सामने अपने निर्दोष होने का प्रमाण पेश करेंगे?
  • ज़ाहिर है, जहां राजसत्ता के पास लोकचेतना की इतनी मजबूत, बड़ी और गहरी शक्ति हो, उसे क्यों अपने आपको किसी विधान का मोहताज बनना चाहिए. फिर भी यदि ऐसा किया जाता है, तो वह कहीं न कहीं राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमज़ोरी को व्यक्त करता है, चाहे इस कमज़ोरी का कारण कुछ भी हो...
  • योगी अदित्यनाथ ने अपने अभी तक के बढ़ाए गए कदमों से यह तो सिद्ध करने में सफलता हासिल कर ली है कि 'मेरा अपना कोई स्वार्थ नहीं है'. यह जनविश्वास के लिए बहुत जरूरी था. उन्होंने नौकरशाहों को यह संदेश स्पष्ट रूप से दे दिया है कि काम किए बिना गुजारा नहीं है, और सही तरीके से काम करना पड़ेगा. इसी के साथ जुड़ी हुई बात है- टारगेट फिक्स करना. यानी कि अब 'देखा जाएगा और देखते हैं' के स्थान पर 'होगा' की कार्यसंस्कृति को अपनाने के बहुत स्पष्ट निर्देश दे दिए गए हैं.
  • जो संसद अत्यंत महत्वपूर्ण विधेयकों को निर्धारित समय से भी कम समय में पारित कर देती है, उसी संसद की लोकसभा ने मानसिक स्वास्थ्य बिल के लिए निर्धारित दो घंटे के बदले सात घंटे लिए. ज़ाहिर है, देश मानसिक स्वास्थ्य के प्रति काफी चिंतित जान पड़ रहा है.
  • वांगनुई न्यूजीलैंड की तीसरी सबसे लंबी नदी का नाम है. गंगा-यमुना भारत की सबसे चर्चित दो नदियां हैं. अलग-अलग देशों में होने के बावजूद इनमें एक बहुत बड़ी समानता यह है कि ये नदियां-नदियां न होकर अब एक जीवित व्यक्ति बन गई हैं. आइए, इस रहस्य को थोड़ा समझते हैं.
  • केंद्र में सत्ता में आते ही मंत्रिमंडल ने पहला निर्णय काले धन के लिए एक समिति गठित करने का लिया था, और देश के सबसे बड़े राज्य में सत्ता में आते ही इस मंत्रिमंडल ने अगला अत्यंत परिवर्तनवादी एवं प्रभावशाली फैसला किया है - राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति का.
  • महेश भट्ट की पहली और अद्भुत फिल्म “सारां” की शुरुआत ही इस दृश्य से होती है कि एक पिता विदेश में पढ़ रहे अपने जवान बेटे का अस्थि-कलश लेने के लिए लाइन में लगा हुआ है, और बाद में उसके लिए तंत्र से जूझता है. फिलहाल हमारे सामने ठीक इसके विपरीत यथार्थ दृश्य मौजूद है. इस दृश्य में एक पिता अपने मृत बेटे को बेटा मानने से इनकार करके उसके शव को लेने से मना कर देता है. ऊपरी तौर पर तो देखने से यही लगता है कि फिल्म का पिता एक करुणामय पिता है, तथा सच का पिता कठोर. किन्तु सच्चाई को जानने के बाद यह धारणा एकदम से पलट जाती है. आइए, इसे जानते हैं.
  • ऐसी स्थिति में विश्व राजनीति का उभरता हुआ जो नया समीकरण दिखाई दे रहा है, वह यह कि अमेरिका दुनिया के मामलों से खुद को अलग करता जाएगा. इससे जो स्थान रिक्त होगा, उसे भरने के लिए चीन तेजी के साथ आगे आएगा.
  • काला टीका लगाया जाना ज़रूरी है, अन्यथा नज़र लगने की यह बीमारी संक्रामक रूप ले लेगी. फिल्मों के रिलीज़ होने से पहले ही लोगों की आस्थाएं आहत होने लगती हैं. यहां तक कि उन वकीलों की भी, जिन्हें समाज तार्किक-बुद्धिजीवी मानता है. किताबें आहत करती हैं, कथन आहत करते हैं, लेख आहत करते हैं.
  • हर उस रचनाकार को, चाहे उसके हाथ में कलम हो, कूची हो, या कैमरा हो, जो यथास्थितिवादिता के विरुद्ध खड़े होने का साहस दिखाते हैं, उस दौर से गुजरना ही पड़ता है, जिससे 'पद्मावती' फिल्म के निर्देशक संजय लीला भंसाली गुजरे. फिल्म 'बाजीराव मस्तानी' बनाने और दिखाने का भी उनका रास्ता कोई निरापद नहीं था.
  • इन पंचरंगी चुनावों में फिलहाल सबसे गाढ़ा और चटख रंग है उत्तर प्रदेश का, और इसके बाद बारी आती है पंजाब की. लोकसभा में बहुत कम सांसद भेजने वाले उत्तराखंड (5), गोवा (2) और मणिपुर (2) इसमें महज कदमताल भर कर रहे हैं, हालांकि 'आप' की उपस्थिति के कारण गोवा के बारे में थोड़ा-बहुत सुनाई पड़ जाता है.
  • इस बार का बजट कैसा होना चाहिए, इसके अनुमान के लिए हमारे पास फिलहाल दो सबसे प्रमुख तत्व हैं. इनमें से एक आर्थिक है, तो दूसरा विशुद्ध राजनीतिक. आर्थिक के केंद्र में है - विमुद्रीकरण के बाद बनी देश की आर्थिक तस्वीर. राजनीतिक फ्रंट पर तात्कालिक रूप में पांच राज्यों के चुनाव हैं.
  • उत्तर प्रदेश के चुनाव, चाहे वे लोकसभा के हों या विधानसभा के, उस पर उस प्रदेश की ही नहीं बल्कि पूरे देश की नजर हमेशा से ही रही है, सो इस बार भी है. गणना वाली राजनीतिक प्रणाली में सबसे बड़ी जनसंख्या वाले राज्य की हैसियत भी बड़ी हो जाती है, वह तो है ही, लेकिन इस बार के चुनाव परिणाम और चुनावी परिदृश्य, दोनों अपने अंदर इससे कई गुना अधिक अर्थों को समेटे हुए हैं.
  • क्या सचमुच काले धन को खत्म करने की यह कोशिश व्यर्थ सिद्ध होगी? अर्थशास्त्री इस बारे में दुनिया के देशों द्वारा उठाए गए कदमों का उदाहरण देते हुए इस कोशिश को महज़ 'राजनीतिक एवं अहमकाना' कदम मानते हैं. उनके इस निष्कर्ष का ठोस बौद्धिक आधार है - 'दुनिया के बहुत से देश', लेकिन यहां कुछ सवाल कौंधते हैं.
  • वस्तुतः काले धन की नींव पर खड़े महल का तल दलदल का होता है, जो कभी भी धंसकर गायब हो सकता है. भुजियावाले जैसों के महल का हश्र आप पढ़ ही रहे हैं, जबकि सफेद धन से बनाई गई एक झोंपड़ी भी चट्टान पर खड़ी रहती है, जिसके अस्तित्व और साथ के प्रति आप आश्वस्त हो सकते हैं.
  • थोड़ा सब्र रखें. बड़े-बड़े अर्थशास्त्री अपने कैलकुलेटर की गणना से नोटबंदी को असफल घोषित कर रहे हैं. यह महज उनकी आर्थिक सोच है, सामाजिक और राजनैतिक नहीं. भले ही यह घटना उस रूप में सफल न हो पाए, लेकिन इतना पक्का है कि यह असफल तो नहीं ही होगी.
  • अंतिम दो प्रश्न. पहला, यदि आप सचमुच काले धन को खत्म करना चाहते हैं, तो बताएं कि जो अभी किया गया है, उसका विकल्प क्या है...? और दूसरा, यदि इससे बेहतर विकल्प थे तो वे अब तक किए क्यों नहीं गए...? इसलिए अब यदि किसी ने किया है, तो यह हमारा नागरिक दायित्व है कि हम उसका साथ दें. इसका नतीजा क्या निकलेगा, भविष्य पर छोड़ दें.
  • विशेषकर पिछले चार महीनों के दौरान हमारा देश चार ऐसे अत्यंत चर्चित मुद्दों से गुज़रा है, जिनमें देश की राजनीति के बदले और बदलते चेहरे की झलक देखी जा सकती है.
  • नोटबंदी के मामले में भी तो कहीं ऐसा ही फिर से तो नहीं हो रहा है? यह इस बार सत्ता पक्ष की ओर से नहीं, बल्कि कुछ अपवादों को छोड़कर सम्पूर्ण विपक्ष की ओर से है.
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