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विजय अग्रवाल

लोगों में निराशा दूर कर उत्साह भरने का शौक है. इसलिए इससे जुड़े विषयों पर कई किताबें लिखी हैं जो लोगों ने काफी पसंद की हैं. अधिकतर पुस्तकें जीवन प्रबंधन से जुड़ी हुई हैं.

  • वर्तमान में भाषा के संकट ने अवचेतन तक पहुंच पाने के हमारे संकट को कई-कई गुना बढ़ाकर उसे असंभव बना दिया है, क्योंकि न तो चेतन की भाषा को अवचेतन समझ पा रहा है, और न अवचेतन की भाषा (जो संकेतों में, कोड में, स्वप्न के दृश्यों में होते हैं) को चेतन डीकोड कर पा रहा है. भाषा की इस खाई ने 'इनोवेशन' की हमारी सारी संभावनाओं की भ्रूण-हत्या कर दी है.
  • ज़ाहिर है, ट्रंप की आज की आवाज़ में 'विश्व-विजेता' के अहंकार की हुंकार सुनाई दे रही है. सिकंदर को खुद की अवहेलना कतई स्वीकार नहीं थी, जबकि वह दूसरों की अवहेलना करने को अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझता था... सो, अमेरिका आज का सिकंदर है. इसलिए लग रहा है कि 'विश्व-राष्ट्र' के दिन अब पूरे होने वाले ही हैं. यदि ट्रंप जीते, तो फिर इस जीत को इसके ताबूत की अंतिम कील मान लिया जाना चाहिए.
  • ऐसा लगता है कि निश्चित रूप से गोपीचन्द और पीवी सिंधु की गुरु-शिष्य की यह जोड़ी अब खेल जगत में नए प्रतिमान स्थापित करेगी. इसके लिए गुरु एवं शिष्य; इन दोनों की जितनी भी प्रशंसा की जाए, वह कम ही होगी, क्योंकि उनकी यह सफलता केवल खेलों की सफलता की ही राह नहीं दिखाती है, बल्कि जिन्दगी की भी सफलता की राह दिखाती है.
  • यदि मानवाधिकार कार्यकर्ता इरोम चानू शर्मिला ने अपने 16 साल से जारी भूख हड़ताल को खत्म करने की तारीख को पांच दिन आगे बढ़ा दिया होता, तो देश की स्वंत्रता दिवस के साथ उसका एक सुखद संयोग बैठ सकता था. यदि उन्होंने ऐसा नहीं किया, तो निश्चित रूप से उसके पीछे कोई सोचा-समझा विचार जरूर होगा.
  • अपने अंदर झांकने के लिए जो आंखें चाहिए, वे हैं - समर्पण की आंखें, सरलता, सहजता और आंतरिक संतुलन की आंखें. क्या केजरीवाल जी ने अपने पास इनमें से एक भी आंख होने को कोई प्रमाण अभी तक लोगों को दिया है?
  • नसीरुद्दीन शाह ने हिन्दुस्तानी सिल्वर स्क्रीन के पहले सुपर स्टार के बारे में कुछ नकारात्मक टिप्पणी करके दरअसल कला, कलाकार और समाज के बारे में एक बहस को जन्म दिया है। यह विषय वैसे तो काफी पुराना हो चुका है, लेकिन विषय ऐसा है, जो समकालीनता के संदर्भ में हमेशा विचार किये जाने की मांग करता रहता है।
  • मैंने जिन चार घटनाओं का ज़िक्र किया है, ऊपर से देखने पर तो ये चारों अलग-अलग दिखाई देती हैं, लेकिन ध्यान से देखने पर इनके बीच एक बहुत मजबूत और स्पष्ट धागा दिखाई देने लगता है... क्या यह सच है...? आइए, यहां इनकी गहराई में दुबके इस सच की तलाश करने की कोशिश करते हैं... इसमें छिपे सच ही इसके फरमान हैं...
  • कुछ तो ऐसा अनोखा है कि यह बेजुबान किताबें लाखों की जुबान बनकर बोलने लगती हैं, कभी खामोशी में तो कभी नारों में तब्दील होकर। और कभी-कभी तो ज़हीन लोगों की कलम की स्याही में भी उतरकर। कुछ ऐसा ही करिश्मा हुआ जस्टिस कौल के साथ जब वे चेन्नई की अदालत में बैठे हुए थे। तब उनकी कलम ने अल्फाज़ बयां किए।
  • भारतकालीन नियोग परम्परा में ‘मां’अपनी होती थी, ‘इन-विट्रो फर्टिलाइज़ेशन’ परम्परा में पिता अपना होता है। बात तो वही है, केवल पाला बदल गया है।अब हमें इस कटु और कड़वे सच से आंख मिलाने की हिम्मत दिखानी ही होगी कि चाहे लड़के हों या लड़कियां, शादी के नाम से घबराने लगे हैं।
  • ब्रिटेन का पढ़ा-लिखा वर्ग यूरोपीय समुदाय में रहने के पक्ष में था। उनकी नहीं चली। चली उन आम लोगों की जो अर्थशास्त्र के सिद्धांतों एवं सूत्रों से पूरी तरह अनजान हैं, और जिन्हें इस बात की चिंता अधिक है कि हमारी संस्कृति का क्या होगा।
  • एक बहुत बड़ी मुश्किल अभी बाकी है... अंग्रेजी में कहावत है, 'ओल्ट हैबिट्स डाई हार्ड...' सुनने में आ रहा है कि अब निहलानी जी ने अनुराग कश्यप की अगली फिल्म 'हरामखोर' में यह कहकर पेंच डाल दिया है कि उसकी कहानी हमारे समाज के सम्मानित शिक्षकों की गरिमा के खिलाफ है...
  • क्या यह बेहतर नहीं होता कि कलर से सोनी में शिफ्ट करने की यात्रा के दौरान आप कुछ नया सोचते... खुद का अनुसंधान करते, इनोवेट करते... सोनी का यह शो एक नया शो है, सो, कुछ तो नया दिखता...
  • पूंजीपतियों की अकूत सम्पत्ति उनमें 'अमरता का बोध' पैदा कराने लगी है। यह वृत्ति उनमें भी है, जो स्वयं को समाज का 'विशिष्ट व्यक्ति' समझने लगे हैं। ज़ाहिर है, इससे साहित्य में आत्मकथाओं का सैलाब आ गया है। सिनेमा में भी शुरुआत हो चुकी है 'गुरु' से... देखें, यह आगे कहां तक जाती है।
  • यदि अभी चार राज्यों एवं एक केन्द्र शासित प्रदेश में हुए विधानसभा चुनावों को नरेंद्र मोदी की सरकार के पिछले दो सालों के कामों पर दिया गया जनमत मान लिया जाये तो निश्चित रूप से निष्कर्ष उनके पक्ष में जायेंगे।
  • किसी भी ‘दलित लड़की’ का नाम सुनते ही हमारे जेहन में जो तस्वीर उभरती है, उसे बताना यहाँ जरूरी नहीं है। लेकिन यदि आपने पिछले दिनों एक लड़की टीना डाबी को टी.वी. चैनलों पर देखा हो, तो पक्का है कि टीना की छवि उस तस्वीर से मैच नहीं करेगी, दूर-दूर तक मैच नहीं करेगी।
  • बहुत पुरानी नहीं, यही मुश्किल से करीब पचास साल पहले की बात है, जब मेरी दादी अपने पैर छूने वाली अपनी हर जवान बहू को एक यही आशीर्वाद देती थी ‘दूधो नहाओ, पूतो फलो।’
  • नोबेल पुरस्कार विजेता श्रीनिवास रामानुजन के बारे में जानना हर भारतीय का 'ज्ञान का अधिकार' है। क्या कोई मेरे इस अधिकार की रक्षा के लिए आगे आएगा...? क्या कोई मेरी इस गुहार को सुनेगा...?
  • सोचता हूं कि यदि यही कंगना और ऋतिक टाइम ट्रेवल करके आज से 50 साल पीछे चले जाएं, तो वे एक-दूसरे से किस प्रकार का व्यवहार कर रहे होते...? प्रेमी ही नहीं, उस समय के फैन्स भी ऐसे ही होते थे, लेकिन यह 50 साल पहले की बात है।
  • किसी भी सार्वजनिक बहस में सार्थकता तभी आती है, जब वह अपने वर्गहितों से ऊपर उठकर तार्किक आधार पर की जाए। अन्यथा उसकी सामाजिक भूमिका एक फूलझड़ी से अधिक नहीं रह जाती। वह मात्र एक बौद्धिक-विलास बनकर रह जाती है।
  • मुझे जिस बात का सबसे ज़्यादा अंदेशा है, वह यह है कि कहीं धीरे-धीरे यह हैप्पीनेस मंत्रालय एक धार्मिक मंत्रालय न बन जाए। किसी नेता या अफसर को अचानक जब एक दिन यह ज्ञानोदय होगा कि 'आनंद को केवल धर्म के जरिये पाया जा सकता है', उस दिन क्या होगा, आप सोच सकते हैं।
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