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विराग गुप्ता

विराग गुप्ता सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट और संवैधानिक मामलों के जानकार हैं. साहित्य और विधि क्षेत्र में अनेक पुस्तकों के लेखन साथ आप हिन्दी और अंग्रेज़ी के राष्ट्रीय अख़बारों और पत्रिकाओं के लिए नियमित लिखते हैं. इनके प्रयासों से विधि और न्यायिक क्षेत्र में अनेक महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए, जिनमें सरकारी अधिकारियों के लिए ई-मेल और सोशल मीडिया नीति, साइबर जगत में बच्चों की सुरक्षा, इंटरनेट कंपनियों से टैक्स वसूली और चुनावों में सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर नियम उल्लेखनीय हैं

  • आईपीएल भारत में संगठित लूट का सबसे बड़ा प्रतीक है, जिसने इंडिया को पीकर सुखा दिया है। फिर आईपीएल के भ्रष्ट खेल पर महाराष्ट्र की बजाए पूरे राष्ट्र में क्यों न बैन लगना चाहिए...?
  • संविधान के अनुच्छेद 14,15 एवं 25 में समानता का मूल अधिकार है। मंदिरों में सभी वर्गों के प्रवेश के लिए महाराष्ट्र में 1956 में कानून बनाया गया था, जिसके उल्लंघन पर 6 महीने की सजा हो सकती है। इसके बावजूद तृप्ति देसाई की कानूनी मांग तथा हाईकोर्ट के आदेश का पालन कराने में महाराष्ट्र सरकार क्यों विफल रही?
  • ऑक्सफैम के अनुसार विश्व के 62 रईस लोगों के पास 3.5 अरब से ज्यादा की की सामूहिक संपत्ति है। क्या इसके लिए सरकार की आर्थिक, वित्तीय और टैक्स नीतियां जिम्मेदार नहीं...? क्या पनामा लीक्स का खुलासा सरकार और देश की आंख खोलेगा...?
  • उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाने के लिए जेटली द्वारा अपने ब्लॉग में दिए गए तीनों तर्क नैनीताल हाईकोर्ट के आदेश के बाद भोथरे साबित हुए हैं। नवीनतम आदेश के अनुसार सरकार के बहुमत का निर्धारण 31 मार्च को विधानसभा में कार्यवाही के आधार पर होगा।
  • बीजेपी द्वारा पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार की आर्थिक नीतियों को विश्व बैंक के इशारे पर लागू करने के आरोप लगाए जाते रहे हैं। अब पूर्ण बहुमत की नरेंद्र मोदी सरकार एक्साइज़ ड्यूटी को किस दबाव में लागू कर रहे हैं, जिसके विरोध में स्वयं मोदी जी वर्ष 2012 में पत्र लिख चुके हैं...?
  • लोकसभा में ‘आधार’ को मनी बिल के तौर पर पास करवाने के बाद राज्यसभा में बिल पेश किया गया है जिससे यह बिल संसद में पारित हो ही जाएगा। इस असंवैधानिक कदम को उठाने के लिए सरकार क्यों मजबूर हुई जो और भी कई वजहों से गैरकानूनी है?
  • श्री श्री रविशंकर पहले जुर्माना न देने की बात कर अब जुर्माना देने पर सहमत दिख रहे हैं, क्योंकि गैरकानूनी कार्यक्रम में प्रधानमंत्री के शरीक होने पर संवैधानिक संकट पैदा हो सकता था। श्री श्री का व्यक्तित्व और कृतित्व प्रेरणादायक है, लेकिन क्या वह कानून से ऊपर हैं...?
  • भविष्य में इन मुद्दों पर विचार किए बगैर ईपीएफ तथा बचत योजनाओं पर टैक्स यदि लगाया गया तो वह न सिर्फ गैरकानूनी होगा, वरन् जनता के संकट को भी बढ़ाएगा, जिसके दबाव में वित्तमंत्री को इस बार के बजट में रोलबैक की शुरुआत करनी पड़ी।
  • यह बीजेपी सरकार का तीसरा बजट है, जो पार्टी के घोषणापत्र तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन का सालाना दस्तावेज भी माना जा सकता है। राजनीतिक आग्रहों से इस बार के बजट के थीम को गांव, गरीब और किसान के लिए रखा गया है...
  • सुरेश प्रभु जैसे पेशेवर और कुशल मंत्री से रेल बजट में विज़न की ठोस शुरुआत की उम्मीद थी, जो राजनीति के बैरियर से रुक गई लगती है। रेलमंत्री ने कहा कि मंदी के दौर से गुज़र रही दुनिया में रेलवे में सुधार की काफी गुंजाइश है, जिसकी शुरुआत करने में प्रभु अपने दूसरे बजट में भी विफल रहे हैं।
  • रेल बजट 25 फ़रवरी को पेश होगा। रेलमंत्री प्रभु ने कहा है कि रेल-बजट तो वित्तीय खर्च का लेखा-जोखा होता है इसलिए इसमें नई ट्रेनों और स्टेशनों की घोषणा नहीं होनी चाहिए? पर हकीकत यह है कि पुरानी योजनायें 6-8 लाख करोड़ फंड की कमी से पहले ही ठप पड़ी हैं तो फिर नयी योजनाओं की घोषणा का क्या औचित्य?
  • कोर्ट परिसर में हिंसा संविधान के शासन को चुनौती है, जो सबसे बड़ा राजद्रोह है, और इसके विरुद्ध सरकार का मौन दुःखद है। देश में कानून के शासन की रक्षा अब गाइडलाइन्स से नहीं, वरन् संविधान के निष्पक्ष अनुपालन से हो पाएगी, जिसके तहत सरकार और अदालतें काम कर रही हैं।
  • मिनिमम गवर्नमेंट और मैक्सिमम गवर्नेंस के नारों के शोर और खर्चीले विज्ञापनों में गवर्नमेंट तो दिख रही हैं, लेकिन गवर्नेंस क्यों गायब है...? हर सवाल का जवाब देने का दावा करने वाले नेता इसका जवाब देना शायद ही पसंद करें...!
  • सख्त कानूनों की गाज कमजोर और गरीब लोगों पर पड़ती है और रसूखदार लोग कानून की धाराओं से बच ही जाते हैं। बंगाल में ममता सरकार द्वारा मर्डर के अभियुक्त के विरुद्ध कार्यवाही करने के बजाय फेसबुक पोस्ट लिखने वाले युवा की गिरफ्तारी पुलिस की निरंकुशता तथा कानून की ऐसी ही मनमाफिक व्याख्या को जताती है।
  • सुप्रीम कोर्ट द्वारा समलैंगिकता को अपराध मानने के खिलाफ क्यूरेटिव पिटीशंस को 5 सदस्यीय संविधान पीठ को सौंपे जाने के मामले में सरकार और राजनीतिक दलों का दोहरा खेल उजागर हुआ है।
  • गांधीजी की पुण्यतिथि पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस का स्मरण स्वाभाविक है, जिन्होंने जुलाई 1944 में रेडियो रंगून से गांधी को राष्ट्रपिता कहकर सम्बोधित किया था। अब आज़ादी के नायक सुभाष, बंगाल में सत्ता की राजनीति के मोहरे ही बन गए हैं।
  • अंतरराष्ट्रीय मंदी का संकट तथा शेयर बाजार की लगातार गिरावट के बीच वित्त मंत्री अरुण जेटली को सिंगापुर तथा दावोस में निवेशकों को भारत की ग्रोथ स्टोरी के लिए आश्वस्त करना पड़ रहा है, जिनके लिए उन्हें आगामी बजट में प्रावधान भी सुनिश्चित करने होंगे।
  • 15 जनवरी के बाद बगैर 2000 रुपये जुर्माने के भी ऑड-ईवन को लागू किया जाए तो जनता के कथित स्वैच्छिक सहयोग के दावों का सच सामने आ जाएगा। इसके बावजूद ऑड-ईवन ने कानून के शासन की सफलता का व्यावहारिक रास्ता ज़रूर दिखाया है।
  • नए साल, यानी साल 2016 में कुछ अहम मामलों की अदालतों में होने वाली सुनवाई और फैसलों से देश में बड़े बदलाव आ सकते हैं। जानिए क्या है वह मामले...
  • साल 2015 में अदालतों ने कई बड़े फैसले लिए, जो राजनीति और समाज के लिए दूरगामी साबित होंगे।
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