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चुनावी ब्लॉग

  • मोदी सरकार का शपथ समारोह, जेडीयू ने बनाई दूरी; नीतीश बाबू क्यों बने शादी में 'नाराज फूफा'
    नीतीश कुमार का कहना था कि जब अकाली दल के पास दो सांसद हैं और उन्हें एक मंत्री पद मिल रहा है और रामविलास पासवान की पार्टी के पास छह सांसद हैं और उन्हें एक कैबिनेट का पद मिल रहा है, तो जेडीयू के पास 16 सांसद हैं, उन्हें किस आधार पर एक ही कैबिनेट मंत्री पद दिया जा रहा है.
  • यह PM नरेंद्र मोदी का सर्वश्रेष्ठ भाषण था, लेकिन अब उन्हें 'विश्वास' सचमुच जीतना होगा
    अगर मोदी अपनी नई पारी की शुरुआत सचमुच सबको साथ जोड़कर करने के प्रति गंभीर हैं, तो उन्होंने बहुत-से मुद्दों पर आत्ममंथन करना होगा. उन्हें BJP और संघ परिवार को भी उन्हीं की लाइन पर चलने के लिए बाध्य करना होगा. उन्हें खुद आगे बढ़कर मुस्लिम समुदाय के प्रभावी और सम्मानित प्रतिनिधियों को नियमित वार्ताओं के लिए आमंत्रित करना होगा, जिनमें उनके कड़े आलोचक भी शामिल हों, और भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में ताकत के विभिन्न स्तरों पर उन्हें भी हिस्सेदारी देनी होगी.
  • लालू प्रसाद की अनुपस्‍थ‍िति या तेज प्रताप का विद्रोह, आखिर कैसे डूबी बिहार में महागठबंधन की नैया?
    लालू प्रसाद यादव जेल में सजा काट रहे हैं. यह पहला मौका है जब किसी चुनाव में लालू प्रसाद यादव रैली, सभा से दूर रहे. इसका नुकसान उनकी पार्टी राष्‍ट्रीय जनता दल समेत उनके सहयोगी दलों को भी उठाना पड़ा. चुनावी समर में नेतृत्‍व उनके बेटे तेजस्‍वी यादव के कंधों पर था. अभी तक चली आ रही जातिगत समीकरण पर आधारित राजनीति ने सभी दलों को उसके हिसाब से चुनावी मैदान में उम्‍मीदवार उतारने को विवश कर दिया. चाहे एनडीए हो या यूपीए, किसी ने उस फार्मूले से किनारा नहीं किया.
  • क्या 2019 के चुनाव में मैं भी हार गया हूं
    2019 का जनादेश मेरे ख़िलाफ कैसे आ गया? मैंने जो पांच साल में लिखा बोला है क्या वह भी दांव पर लगा था? जिन लाखों लोगों की पीड़ा हमने दिखाई क्या वह ग़लत थी? मुझे पता था कि नौजवान, किसान और बैंकों में गुलाम की तरह काम करने वाले लोग भाजपा के समर्थक हैं. उन्होंने भी मुझसे कभी झूठ नहीं बोला. सबने पहले या बाद में यही बोला कि वे नरेंद्र मोदी के समर्थक हैं. मैंने इस आधार पर उनकी समस्या को खारिज नहीं किया कि वे नरेंद्र मोदी के समर्थक हैं. बल्कि उनकी समस्या वास्तविक थी इसलिए दिखाई. आज एक सांसद नहीं कह सकता कि उसने पचास हज़ार से अधिक लोगों को नियुक्ति पत्र दिलवाया है. मेरी नौकरी सीरीज़ के कारण दिल्ली से लेकर बिहार तक में लोगों को नियुक्ति पत्र मिला है. कई परीक्षाओं के रिज़ल्ट निकले. उनमें से बहुतों ने नियुक्ति पत्र मिलने पर माफी मांगी की वे मुझे गालियां देते थे. मेरे पास सैंकड़ों पत्र और मैसेज के स्क्रीन शॉट पड़े हैं जिनमें लोगों ने नियुक्ति पत्र मिलने के बाद गाली देने के लिए माफी मांगी है. इनमें से एक भी यह प्रमाण नहीं दे सकता कि मैंने कभी कहा हो कि नरेंद्र मोदी को वोट नहीं देना. यह ज़रूर कहा कि वोट अपने मन से दें, वोट देने के बाद नागरिक बन जाना.
  • ईवीएम की सुरक्षा को लेकर इतना हंगामा क्यों?
    अगर उनके जमा होने का कारण यह है कि ई वी एम मशीन बदली जा सकती है या गड़बड़ी हो सकती है तो यह दुर्भाग्यपूर्ण है. यह चुनाव आयोग की विश्वसनीयता के लिए अच्छा नहीं है. जिस तरह इस चुनाव में उसके फैसलों पर नज़र रखी गई है, हर फैसले को लेकर संदेह किया गया है यह पहले के चुनावों से कहीं ज़्यादा है. 
  • एग्जिट पोल की अटकलभर से पूंजी बाजार बमबम...
    एग्जिट पोल में मोदी सरकार की जीत की अटकल लगते ही शेयर बाजार की बांछें खिल गईं. सोमवार को बाजार खुलते ही एक मिनट के भीतर बाजार के सांड ने दौड़ लगा दी.
  • एग्ज़िट पोल्स को लेकर कई सवाल भी उठ रहे हैं...
    एग्ज़िट पोल पर अब ऐसी कोई बात नहीं है जो कही जा सकती है. टीवी में मुश्किल यही है कि जब सारी बात कह जा चुकी हो तो फिर से उसे कैसे कहें. दरअसल यही टीवी है. एग्जिट पोल के बाद सारे चैनलों को 22 तारीख की आधी रात तक वैसे ही ग़ायब हो जाना चाहिए जैसे एग्ज़िट पोल शुरू होते ही नमो टीवी अपने आप ग़ायब हो गया है.
  • आख़िर कांग्रेस ख़त्म क्यों नहीं होती?
    योगेंद्र यादव के ट्वीट को लेकर हंगामा हो रहा है, लेकिन उसे ध्यान से देखने की ज़रूरत है. उन्होंने लिखा है, 'कांग्रेस को ख़त्म हो जाना चाहिए. अगर वो भारत के विचार की रक्षा के लिए बीजेपी को इन चुनावों में रोक पाने में नाकाम रही तो इस पार्टी के लिए भारतीय इतिहास में कोई सकारात्मक भूमिका नहीं है. आज किसी विकल्प के निर्माण में ये सबसे बड़ी बाधा की प्रतिनिधि है.'
  • ब्लॉग: प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान शादी में आए 'नाराज फूफा' क्यों बने रहे पीएम मोदी?
    जब से यह खबर आई कि प्रधानमंत्री बीजेपी दफ्तर आ रहे हैं, जहां वे बीजेपी कार्यकर्ताओं को संबोधित करेंगे, तो लगा कि सब कुछ सामान्य है. वे आएंगे 40 मिनट तक बोलेंगे, कांग्रेस को भला-बुरा कहेंगे..कुछ अपनी बात कहेंगे, अपने कार्यकर्ताओं का धन्यवाद करेंगे, और बात खत्म हो जाएगी. मगर जब यह खबर आई कि वे प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगे तो फिर न्यूज रूम में आपाधापी मच गई. एक अजीब तरह की उत्तेजना और जोश दिखाई देने लगा. सभी तैयारी करने लगे और कहने लगे कि चलो जिस दिन का पिछले पांच साल से इंतजार कर रहे थे वो आखिर आ ही गया...
  • गांधी की संतानों से डरती हैं गोडसे की औलादें
    प्रज्ञा ठाकुर को भले पार्टी के दबाव में माफ़ी मांगनी पड़ी, लेकिन उनकी यह बात सौ फ़ीसदी सही है कि एक ख़ास विचारधारा के तहत गोडसे देशभक्त था- उसकी नज़र में देश की जो परिभाषा थी, उससे वह पूजा करता था. उसकी गांधी जी से कोई निजी दुश्मनी नहीं थी. उसको आरएसएस या हिंदू महासभा ने जो कुछ सिखाया, उस पर उसने पूरी तरह अमल किया. संकट यह है कि आज जो आरएसएस या उससे जुड़े संगठन हैं, उनको अपनी वैचारिकता का भरोसा ही नहीं, इसलिए वे गोडसे की तरह गांधी को सामने से गोली नहीं मारते, पीछे-पीछे उनका वध करते हैं.
  • गोडसे को हीरो बताने के पीछे राजनीति क्या है?
    इस बात को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए. सोचा जाना चाहिए और पूछा जाना चाहिए कि वो कौन सी शक्तियां हैं, वो कौन से लोग हैं और वो लोग किस राजनीतिक खेमे के साथ नज़र आते हैं जो बार-बार गांधी के हत्यारे को अवतार बताने चले आते हैं. पहली बार नहीं हुआ है जब गोडसे को देशभक्त बताया गया है. भोपाल से बीजेपी की उम्मीदवार प्रज्ञा ठाकुर ने कहा है कि नाथूराम गोडसे देशभक्त है. आतंकवादी नहीं है.
  • लोकसभा चुनाव : तृणमूल और बीजेपी के बीच संघर्ष के पीछे की कहानी
    पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग ने प्रचार करने पर रात के 10 बजे के बाद से रोक लगा दी है..यह चुनाव आयोग का एक ऐसा फैसला है जिसको लेकर बहस छिड़ गई है..कई लोग कह रहे हैं कि यदि चुनाव आयोग को प्रचार बंद ही करना था तो 15 तारीख के 10 बजे से ही बंद कर देना चाहिए था. उसे 34 घंटे क्यों बढ़ाया गया. क्या इसलिए कि बंगाल में प्रधानमंत्री को दो रैली होनी थीं. चुनाव आयोग अपने इस फैसले को लेकर विवाद के घेरे में आ गया है और उस पर पक्षपात करने का आरोप लग रहा है.
  • गोरखपुर की चुनावी जंग में कड़ा मुकाबला
    गोरखपुर पूर्वांचल की सबसे हॉट सीट मानी जाती है. वजह है कि गोरखपुर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सीट है. मुख्यमंत्री बनने के पहले योगी इस सीट से पांच बार सांसद बने. पहली बार 1998 में जीते थे 21 हजार वोटों से फिर उनका जीत का अंतर बढ़ता चला गया. उससे पहले महंत अवैद्यनाथ 1991 से 1998 तक बीजेपी के टिकट पर जीते और 1989 से 1990 में हिंदू महासभा से जीते. मगर योगी के मुख्यमंत्री बनने के बाद हुए उपचुनाव में प्रवीण निषाद साढ़े 21 हजार वोटों से जीते. निषाद सपा-बसपा के संयुक्त उम्मीदवार थे.
  • लोकसभा चुनाव 2019 : बिहार में मोदी के सहारे लड़ते दिख रहे हैं नीतीश कुमार
    राष्ट्रीय राजमार्ग 31 के ज़रिये पटना में घुसने से ज़रा पहले शोरशराबा शुरू हो जाता है. एक किलोमीटर से भी ज़्यादा दूरी तक सड़क के एक किनारे पर ट्रक खड़े हुए हैं, और राजमार्ग का यह अहम हिस्सा पार्किंग लॉट में तब्दील हो गया है. इसी सड़क पर दूसरी लेन में ट्रक आ-आकर चलते ट्रैफिक में घुसते रहते हैं. ...और यह सब रोज़ाना होने के बावजूद यहां पुलिस का नाम-ओ-निशान भी दिखाई नहीं देता.
  • क्या हैं गठबंधन के पॉवरप्ले में सोनिया गांधी की वापसी के मायने...
    विपक्ष की राजनीति के इस दौर में नए साझीदार तलाशने के लिए उठाया गया यह पहला कदम है, और काफी अहम है, क्योंकि हाल ही में दक्षिण भारत की राजनीति के मज़बूत चेहरे और तेलंगाना राष्ट्र समिति (TRS) प्रमुख के. चंद्रशेखर राव (KCR) ने द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) प्रमुख एम.के. स्टालिन से मुलाकात की, ताकि यह चर्चा की जा सके कि एक हफ्ते में ही घोषित होने जा रहे चुनाव परिणाम के बाद कौन किसके साथ गठबंधन करेगा. बहुजन समाज पार्टी (BSP) की मुखिया मायावती जैसे अन्य विपक्षी नेताओं ने तो देश के प्रशासन के शीर्ष पद पर विराजने की अपनी महत्वाकांक्षाओं को ज़ाहिर करने में कतई संकोच भी नहीं किया है.
  • लोकसभा चुनाव 2019 : एग्ज़िट पोल पर चुनाव आयोग का विरोधाभासी रवैया
    पार्टियों के बड़े खर्चे, नेताओं की बद्जुबानी, पेड न्यूज़ और आचार संहिता के संगठित उल्लंघन को रोकने में विफल चुनाव आयोग द्वारा, राजनीतिक विश्लेषण को रोकने का अतिरेकी प्रयास, आयोग की प्रभुसत्ता को और भी अप्रासंगिक बना देगा.
  • क्या आम आदमी पार्टी हाशिए पर आ गई है...
    दिल्ली में 12 मई को वोट डाले जा चुके हैं और उसके बाद मैं निकला दिल्ली की गलियों में, लोगों से पूछने कि अब उनको क्या लगता है कि दिल्ली में क्या होने वाला है? मैं अपने प्रोग्राम 'बाबा के ढाबा' के लिए पहुंचा दिल्ली के मशहूर चांदनी चौक पर. वहां के लोगों से बात करके एक बात साफ थी कि इस लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी अपना जलवा खोती जा रही है. इस बार मुद्दा आम आदमी पार्टी था ही नहीं. लोगों से जब मैं यह पूछता था कि विधानसभा चुनाव में आपने तो आम आदमी पार्टी को 67 विधानसभा सीटों पर जितवा दिया, तो लोग चुप हो जाते थे.
  • आरएसएस पर मायावती का पैंतरा
    क्या इस लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस बीजेपी और नरेंद्र मोदी के साथ वैसे खुलकर साथ नहीं आ रहा है जैसे कि पिछले लोकसभा चुनाव में आया था? क्या आरएसएस के स्वयंसेवक मोदी सरकार के कामकाज से खुश नहीं हैं? क्या आरएसएस के समर्थन के बिना मोदी की नैया डूब रही है? कम से कम बीएसपी प्रमुख मायावती का तो यही दावा है.
  • नीतीश कुमार ने खुद ही लिख डाला अपनी कहानी का दुखद मोड़
    68 वर्षीय नीतीश कुमार को लगातार साझीदार बदलते रहने की वजह से भारतीय राजनीति में बेहद कमतर माना जाने लगा है. भले ही वो अब भी बिहार के मुख्‍यमंत्री हों लेकिन पिछले महीने के आखिर में पीएम मोदी के साथ एक ही मंच पर उनके बुझे हुए चेहरे ने उनकी दशा जाहिर कर दी.
  • 'न्यूज़ छपती है कि नहीं लोकतंत्र में सिर्फ यही एक चीज़ नहीं है' - मोदी
    प्रधानमंत्री ने यह बात इंडियन एक्सप्रेस के रवीश तिवारी और राजमकल झा से कही है. यह इंटरव्यू 12 मई को छपा है. इस इंटरव्यू में प्रधानमंत्री इंडियन एक्सप्रेस को कई बार पत्रकारिता को लेकर लेक्चर देते हैं. एक्सप्रेस के पत्रकार काउंटर सवाल नहीं करते हैं. ऐसा लगता है कि उन्होंने सुनाने के लिए एक्सप्रेस को बुलाया है. वे यह नहीं बताते हैं कि एक्सप्रेस की कौन सी ख़बर ग़लत थी मगर यह बताना नहीं भूलते हैं कि कौन सी ख़बर उसने नहीं की. किसी प्रधानमंत्री का यह कहना है कि न्यूज़ का छपना ही लोकतंत्र में एक मात्र काम नहीं है, डरावना है. आपको डरना चाहिए कि फिर जनता कितने अंधेरे में होगी.
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