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चुनावी ब्लॉग

  • सोचिएगा, समझिएगा, दुनिया में हिन्दुस्तान की भद्द न पिटवाइएगा
    परीक्षा में पास होने के लिए न्यूनतम 33 प्रतिशत अंक होने चाहिए. हमने पिछली लोकसभा में 34 प्रतिशत ऐसे सांसदों को चुन लिया, जिन्होंने अपने घोषणा पत्र में स्वयं पर कोई न कोई आपराधिक मामला दर्ज होना घोषित किया था. 2019 में एक बार फिर यही राजनेता आपके सामने वोट मांगने के लिए आ खड़े हुए हैं.
  • अब तक कहां छिपे बैठे हैं चुनावी मुद्दे
    अनुमान यह लगता है कि इस बार के चुनाव में किसानों और देश के युवावर्ग के दुख या संकट को कम करने के लिए व्यावहारिक योजना पेश करने की होड़ मचेगी. खासतौर पर मौजूदा सरकार की बेदखली की कोशिश करने वाले विपक्ष के नेताओं में यही होड़ मचेगी कि कौन सबसे ज्यादा विश्वसनीय तरीके से अपनी योजनाएं पेश कर पाता है.
  • पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 'किंतु-परंतु' और जनाक्रोश से जीत चुके हैं PM नरेंद्र मोदी
     उत्तर प्रदेश में प्रतिद्वंद्वी दोस्त बन गए हैं, ताकि 'साझा दुश्मन' BJP से मुकाबिल हो सकें. बहुजन समाज पार्टी (BSP), समाजवादी पार्टी (SP) तथा राष्ट्रीय लोकदल (RLD) के अलावा भी कई दल महागठबंधन बनाकर एक साथ आ रहे हैं, और उम्मीद कर रहे हैं कि उनकी मिली-जुली ताकत प्रतिद्वंद्वी को बुरी तरह हरा देगी.
  • क्या मोदी सरकार ने अपनी ज़िम्मेदारियां निभाईं?
    इन पांच सालों में काफी कुछ बदल गया. जो सबसे ज़्यादा बदला वो सवाल पूछने की व्यवस्था. इस व्यवस्था की बुनियाद जाने अनजाने में 1975 में 'दीवार' फिल्म में सलीम जावेद ने डाली थी. जब अमिताभ अपने दारोगा भाई शशि कपूर को कहते हैं कि जाओ पहले उस आदमी का साइन लेकर आओ. मेरी राय में यही लाइन अब लाइन में बदल गई है कि जाओ पहले यह पूछ कर आओ कि 70 सालों में क्यों नहीं हुआ.
  • एनडीए की पटना रैली के बाद नीतीश के चेहरे पर मुस्कराहट और भाजपा में बेचैनी क्यों?
    बिहार की राजनीति में रविवार तीन मार्च का दिन कई कारणों से याद किया जाएगा. इस दिन सुबह कश्मीर में शहीद हुए सब इंस्पेक्टर पिंटू सिंह का पार्थिव शरीर पटना आया था. तब न तो नीतीश कुमार समेत उनके मंत्रिमंडल के किसी सदस्य ने, न ही मोदी मंत्रिमंडल में शामिल बिहार के किसी मंत्री ने पटना में मौजूद रहने के बावजूद पटना एयरपोर्ट पर जाकर सिंह को श्रद्धांजलि देने की जरूरत समझी. इससे साफ है कि पुलवामा हो या अन्य घटना, इन नेताओं के लिए मीडिया में प्रचार पाने के अलावा कुछ नहीं.
  • आसमान छूती बेरोज़गारी, राष्ट्रवाद के सहारे हवा हवाई प्रधानमंत्री मोदी
    आप समझ सकते हैं कि क्यों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बेरोज़गारी पर बात नहीं कर रहे हैं. पुलवामा के बाद एयर स्ट्राइक उनके लिए बहाना बन गया है. देश प्रेम-देश प्रेम करते हुए चुनाव निकाल लेंगे और अपनी जीत के पीछे भयावह बेरोज़गारी छोड़ जाएंगे. प्रधानमंत्री का एक ही देश प्रेम है जो चुनाव में जीत प्रेम है. मोदी सरकार के पांच साल में शिक्षा क्षेत्र का कबाड़ा हुआ. जो यूपीए के समय से होता चला आ रहा था.
  • अंधेर नगरी चौपट खेती, टके सेर झांसा, टके सेर जुमला, खेती में फेल मोदी सरकार
    मोदी कहते हैं कि 2024 तक वही प्रधानमंत्री होंगे. होंगे तो उनके कार्यकाल के दूसरे हिस्से में भी खेती की असफलता मुंह बाये खड़ी रहेगी. किसान हाहाकार कर रहे होंगे. उन्हें भटकाने के लिए युद्ध का उन्माद रचा जा रहा होगा या सांप्रदायिकता का ऊबाल पैदा किया जा रहा होगा. तब किसान दस साल के व्हाट्स एप मेसेज पलट कर देख रहे होंगे कि उन्होंने अपने जीवन का एक दशक किन बातों में निकाल दिया.
  • आधा दर्जन छोटे दलों के संपर्क में हैं प्रियंका
    कांग्रेस उत्तर प्रदेश में अपने पांव जमाने की कोशिश में लगी है. जब से पूर्वी उत्तर प्रदेश का जिम्मा प्रियंका गांधी को मिला है और पश्चिमी उत्तर प्रदेश का ज्योतिरादित्य सिंधिया को, दोनों ने अपने-अपने ढंग से कांग्रेस को फिर से खड़ा करने के लिए काम करना शुरू कर दिया है. इसके लिए प्रियंका अपनी खास कोशिशों में जुट गई हैं. इसी रणनीति का हिस्सा है कि प्रियंका ने उत्तर प्रदेश के सभी छोटे-छोटे दलों की खोज खबर लेना शुरू कर दिया है.
  • गठबंधन : बीजेपी का दक्षिण दर्द
    बीजेपी ने तमिलनाडु में अपने गठबंधन की घोषणा कर दी है. एक ही दिन में महाराष्ट्र के बाद तमिलनाडु दूसरा राज्य है जहां बीजेपी ने गठबंधन बनाने में देरी नहीं की है. वहां बीजेपी और शिवसेना में लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ में लड़ने पर सहमति बन चुकी है.
  • बीजेपी भी 'महागठबंधन' के सहारे!
    सोचिए अगर इस आम चुनाव में किसी भी पार्टी को बहुमत न मिले. किसी गठबंधन को भी न मिले. त्रिशंकु संसद की हालत में क्या होगा? यह एक ऐसा सवाल है जो बार-बार पूछा जा रहा है. इसका एक जवाब यह भी है कि ऐसे हालात में राष्ट्रपति सबसे बड़ी पार्टी या फिर चुनाव पूर्व सबसे बड़े गठबंधन को सरकार बनाने के लिए बुला सकते हैं. ऐसा पहले भी हुआ है. हम यह बात इसलिए उठा रहे हैं कि चुनाव नजदीक आते ही बीजेपी ने न सिर्फ अपना कुनबा बढ़ाना शुरू कर दिया है.
  • सभी तरफ 'महामिलावट' का जमाना
    देश में लोकसभा चुनाव की तैयारी राजनैतिक दलों ने युद्ध स्तर पर शुरू कर दी है और जैसे जंग के मैदान में होता है लड़ाई के लिए एक लकीर सी खींच दी गई है...दोनों तरफ गठबंधन करने की होड़ सी लगी हुई है. एक-एक दल और एक-एक राज्य के हिसाब से नफे नुकसान का जायजा लेने के बाद पार्टियां आपस में बात कर रही हैं.
  • क्या भाजपा अब 'सहयोगी शरणम् गच्छामि' हो गई है?
    लोकसभा चुनाव सिर पर है और हर दल अपने-अपने हिसाब से राजनीतिक दांव खेलने में व्यस्त हैं. जहां एक ओर राष्ट्रीय दल भाजपा और कांग्रेस के बीच सहयोगियों को जोड़ने की होड़ लगी है. वहीं, क्षेत्रीय दल भी अपने-अपने हिसाब से यानी कांग्रेस या BJP के साथ अब तालमेल को अंतिम रूप दे रहे हैं. कांग्रेस अगर सहयोगी या क्षेत्रीय दलों से समझौता कर रही है तो उसकी मजबूरी समझ में आती है लेकिन अचानक बीजेपी जिस तरह से महत्वपूर्ण राज्यों में अपने पुराने स्टैंड से 360 डिग्री घुमकर समझौते कर रही है, उससे तो यही लगता है कि भाजपा को अब सहयोगियों का महत्व समझ में आ रहा है. इतना ही नहीं, बीजेपी को शायद उनके बिना चुनाव में जाना आत्मघाती लग रहा है. इसलिए भाजपा एक बार फिर 'सहयोगी शरणम् गच्छामी' के मुद्रा में है. 
  • प्रियंका गांधी वाड्रा: अपना भी टाइम आएगा
    तीन दिनों के अपने लखनऊ प्रवास के दौरान प्रियंका ने दिन रात बैठकें करके करीब चार हजार कांग्रेस कार्यकर्ताओं से मुलाकात की. यदि उत्तर प्रदेश के कांग्रेस अध्यक्ष राज बब्बर की माने तो प्रियंका ने पूर्वी उत्तर प्रदेश के चार हजार कार्यकत्ताओं से मुलाकात कर इन ईलाकों के लिए एक खाका तैयार कर लिया है और उनके पास एक रणनीति भी है जो कांग्रेस को इन ईलाकों में फिर से जिंदा कर सकती है.
  • दौरा, दौरा, दौरा, दौड़ते ही रह गए प्रधानमंत्री, कार्यकाल का एक तिहाई इसी में कटा
    प्रधानमंत्री ने अपने कार्यकाल का कितना हिस्सा यात्राओं में बिताया इसे लेकर स्क्रोल और दि प्रिंट ने दो रिपोर्ट की है. स्क्रोल की रिपोर्ट आप ज़रूर देखें. इसलिए भी कि किस तरह डेटा जर्नलिज़्म किया जा सकता है.
  • 'पापा' को पीएम पसंद हैं...
    मुलायम सिंह यादव ने वह कह दिया जो कोई सोच भी नहीं सकता था. उन्होंने कह दिया कि वे चाहते हैं कि नरेंद्र मोदी फिर से प्रधानमंत्री बनें. मुलायम ने यह बात सोलहवीं लोकसभा के विदाई भाषण में कही. एक ऐसी बात जो बीजेपी नेताओं के कानों में मधुर सुर की तरह गूंजी तो, वहीं विपक्ष के कानों में कर्कश राग की तरह. यह ऐसी बात है जो सपा-बसपा गठबंधन से तगड़ी चुनौती झेल रही बीजेपी उत्तर प्रदेश में एक ब्रहास्त्र की तरह इस्तेमाल कर सकती है. खासतौर से उन यादव मतदाताओं को भ्रमित करने के लिए जिन पर शिवपाल सिंह यादव पहले से ही डोरे डालने को तैयार बैठे हैं. मुलायम के बयान के राजनीतिक निहितार्थ के बारे में आगे बात करेंगे, लेकिन पहले आइए सुन लेते हैं उन्होंने क्या क्या कहा.
  • भगोड़े विजय माल्या ने सचिन पायलट और ज्योतिरादित्य सिंधिया को दी बधाई, तो लोगों ने किया ट्रोल
    भगोडे विजय माल्या ने कांग्रेस नेता सचिन पायलट और ज्योतिरादित्य सिंधिया को ट्वीट कर दी बधाई तो ट्रोलर्स ने घेर लिया.
  • पांच राज्यों के चुनाव 2019 का सेमीफाइनल क्यों हैं?
    सिद्धांततः हर चुनाव अलग होता है और भारत जैसे विविधता भरे देश में एक चुनाव को दूसरे का सेमीफाइनल बताना मीडिया का सरलीकरण भर हो सकता है. इसके अलावा ऐसे अनुभव भी रहे हैं जब राज्यों में हारने वाली पार्टियां केंद्र में जीत गई हों. वर्ष 2003 में राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के नतीजे अपने पक्ष में देखकर ही अटल सरकार ने समय से पहले लोकसभा चुनाव कराए और हार गई.
  • क्या बदल सकती है राजस्थान की हवा?
    अब तक हर ओपीनियन पोल, हर राजनीतिक विश्लेषक यही कह रहा है कि राजस्थान हर पांच साल में सरकार बदलने की परंपरा को कायम रखते हुए कांग्रेस को सत्ता सौंपने जा रहा है. लेकिन क्या राजस्थान में हवा का रुख बदल सकता है? यह सवाल इसलिए क्योंकि कांग्रेस के भीतर टिकटों के गलत बंटवारे और प्रदेश नेतृत्व में तीखे मतभेदों को देखते हुए बीजेपी ने अब पूरी ताकत झोंकने का फैसला किया है. बीजेपी को अब अपनी संभावनाएं नजर आने लगी हैं. अब तक प्रधानमंत्री मोदी छह सभाएं कर चुके हैं. वे नागौर, भरतपुर, भीलवाड़ा, बांसवाड़ा, कोटा और अलवर जा चुके हैं. उनकी सभाओं में आई भीड़ और लोगों के उत्साह को देखते हुए बीजेपी ने अब उनकी और ज्यादा सभाएं कराने का फैसला किया है. वे पांच से छह और सभाएं कर सकते हैं. इनमें जोधपुर, हनुमानगढ़ सीकर और जयपुर पहले से ही तय है.
  • राजस्थान में हिन्दुत्व की प्रयोगशाला का क्या है हाल?
    26 नवंबर को ग्वालियर से चला, रात को भरतपुर में रुका. 27 को सुबह सात बजे रामगढ़ के लिए रवाना हो गया. चार महीना पहले यहीं रकबर को कथित तौर पर पीटा गया था, बाद में उसकी मौत हो गई थी. टैक्सी ड्राइवर से बात बढ़ाई तो बोलने लगा साहब यहां मेव अच्छी तादाद में हैं. पहले बहुत गाय बूचड़खाने जाती थी अब गौरक्षकों की बहुत निगरानी रहती है. मैंने पूछा ये बूचड़खाने किसके हैं, वो बोला अब ये का पता मुझे. मैं कौन सा आपकी तरह रिपोर्टर हूं. मैंने कहा फिर ये कैसे पता है कि सब गाय बूचड़खाने ही जा रही होंगी. वो बोला अरे साहब आप क्या जानते हैं अभी वीडियो दिखाता हूं कैसे कटती हैं. मैं कहा नहीं ये व्हाट्सअप वीडियो मत दिखाओ गाड़ी ध्यान से चलाओ. मैं सोचने लगा मोबाइल जाति और धर्म के ध्रुवीकरण के केंद्र में है. लोगों में डर और धारणाएं बहुत तेजी से बनाता है. इस बात का अंदाजा हुआ जब रामगढ़ के रास्ते में कई जगह बड़ी बड़ी गौशालाएं और गौरक्षकों के होर्डिंग्स लगे देखे.
  • मध्यप्रदेश में शिवराज या महाराज?
    मध्यप्रदेश में तय हो गया कि अगले पांच साल किसका राज रहेगा- महाराज का या फिर शिवराज का. लोगों की पसंद ईवीएम में कैद हो गई है. पूरे राज्य में लोगों में मतदान के प्रति खासा उत्साह देखने को मिला. हालांकि सुबह मतदान की रफ्तार धीमी थी लेकिन दोपहर होते होते लोगों में जोश आया. कई जगहों से ईवीएम और वीवीपैट मशीनें खराब होने की शिकायतें आईं.
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