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चुनावी ब्लॉग

  • UP elections 2017: कुछ कह गए वो, सुन कर हम भी चल दिए
    ऐसा कुछ है हमारे देश के चुनावों में कि अच्छे भले नेता भी कुछ ऐसा कहने को मजबूर हो जाते हैं जिससे उनके बारे में लोगों की राय बदल जाए.
  • समझ नहीं आता हम कहां के नागरिक हैं ?
    भोली जनता उस वक्त और ठगी सी रह जाती है जब विकास न करने के लिए राज्य, केंद्र और केंद्र, राज्य को बिना सोचे-समझे कठघरे में खड़ा कर देते हैं. एक बोलता है हम केंद्र से पैसा भेजते हैं वह आप तक नहीं पहुंच पाते, दूसरा बोलता है पैसा ही नहीं है तो विकास कहां से करें ! संशय में हैं कि हम नागरिक, दोषी ठहराएं तो कि‍से, श्रेय दें तो कि‍से ?
  • यूपी चुनाव : मुद्दों के बजाय आरोप-प्रत्‍यारोप में उलझे सियासी दल
    जब सभी राजनीतिक दलों के नेता रोज लंबे-लंबे भाषण दे रहे हैं तो यह कहना भी ठीक नहीं होगा कि यूपी चुनाव में मुददे की बातें हो नहीं रही हैं. जिसकी अपनी जो विशेषता, विशेषज्ञता होती है वह जरूर चाहता है कि चुनाव में उसकी विशेषता ही मुख्य मुददा बन जाए. सो यह बात यूपी में पिछले दस दिनों में खूब दिखाई दी. इस तरह एक से बढ़कर एक चुनावी खिलाड़‍ियों ने अपने प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ी की बात का जवाब देने की बजाए सिर्फ अपनी बात ही कहना ठीक समझा.
  • यूपी चुनाव : सौगंध राम की खाते हैं से गंगा की सौगंध तक...
    वाकई ट्रंप ने अगर यूपी चुनाव में भाषा का स्तर देख लिया तो उनके और नीचे आने की उम्मीद की जा सकती है. ट्रंप का असर दुनिया में हो रहा है, कहीं उन पर यूपी का असर न हो जाए.
  • रवीश कुमार का ब्‍लॉग: क्या लगता है आपको, यूपी में कौन जीतेगा!
    यूपी में कौन जीत रहा है, इस सवाल के दागते ही फन्ने ख़ां बनकर घूम रहे पत्रकारों के पाँव थम जाते हैं. लंबी गहरी साँस लेने लगते हैं. उनके चेहरे पर पहला भाव तो यही आता है कि दो मिनट दीजिये, नतीजा बताता हूँ लेकिन दो मिनट बीत जाने के बाद चेहरे का भाव बदल जाता है.
  • खुल गई अखिलेश यादव, राहुल गांधी के धर्मनिरपेक्षता के दावों की पोल
    दिवंगत राजनेता तथा लेखक रफीक ज़कारिया कि पुस्तक 'कम्युनल रेज इन सेक्युलर इंडिया' के लिए नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन द्वारा भविष्यदृष्टा की तरह लिखी गई प्रस्तावना के एक हिस्से में उन्होंने भारत में सांप्रदायिक दंगों का विश्लेषण भी किया था, जो भावनाओं को झकझोर डालता है... उन्होंने लिखा था, "हर किसी के कई-कई व्यक्तित्व हैं, और इसका ताल्लुक सिर्फ किसी के धर्म या समुदाय से नहीं है.
  • मायावती के संघर्ष को अन्य नेताओं के समकक्ष न रखे मीडिया
    इन दिनों मायावती की चर्चा इस बात पर काफी हो रही है कि मीडिया में उनकी चर्चा नहीं हो रही. खुद मायावती भी इसे अब अपनी रैलियों में कहने लगी हैं. रैलियों में जाकर महसूस किया कि मायावती जिस समाज से आती हैं, उस समाज के लोग उन्हें बहुत आशा भरी निगाहों से देखते हैं, उन्हें किसी हीरो की तरह मानते हैं. मायावती एक बार पूरे 5 वर्षों के लिए सरकार चला चुकी हैं तो अब उनका मूल्यांकन दो तरह से किया जाएगा कि उन्होंने अपने समाज के लिए क्या किया और एक मुख्यमंत्री के तौर पर कैसी रहीं.
  • क्या पत्रकार को मतदान करना चाहिए?
    इस बार कई चुनावों के बाद मतदान करने का मौका मिला. वर्ना हर बार मतदान यहां होता था और हम कहीं और रिपोर्टिंग की ड्यूटी पर होते थे. मैं ख़ुद भी अपील करता रहा हूं कि बड़ी संख्या में मतदान करें. इसलिए यह बात कचोटती भी थी कि मतदान नहीं किया. पहले सोचता था कि जवानों की तरह पत्रकारों को भी पोस्टल बैलेट से मतदान की अनुमति मिले ताकि वे ड्यूटी पर रहते हुए मतदान कर सकें. लेकिन अब मेरी राय बदल रही है.
  • यूपी चुनाव : हर छोटे-बड़े दल ने पाल रखी हैं उम्मीदें
    उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए मतदान अपने दूसरे चरण में पहुंच चुका है, लेकिन अभी भी कुछ राजनीतिक दलों में चुनावी रणनीति को लेकर असमंजस बरक़रार है. ये दल कोई छोटे या महत्त्वहीन नहीं, बल्कि ऐसे दल हैं जो एक न एक प्रदेशों में सत्ता में हैं.
  • रवीश कुमार का ब्‍लॉग: ग़ैर जाटवों को समेटती बसपा के मुश्किल रास्ते
    यह लड़का वहाँ खड़ा था जहाँ खड़े होने की जगह नहीं थी. दो टाँग वालों की भीड़ में वह एक टाँग पर खड़ा था. अपने नेता मायावती को एक झलक देखने की वह बेताबी क्या होती है, न तो इसे फ़िल्म स्टार की दीवानगी से समझ सकते हैं और न ही क्रिकेट स्टार की दीवानगी से.
  • काल्पनिक डर और हमारे अंदर के 'रावण'
    भारत में, और विशेषकर उत्तर भारत के राज्यों में चुनावी प्रचार एक तरह से फ्री-स्टाइल कुश्ती की तर्ज पर होता है जिसमें कोई भी नियम या बंदिश नहीं होती. भले ही भारत का चुनाव आयोग अपने तमाम आदेशों से चुनाव प्रचार के वक्तव्यों, टिप्पणियों और भाषणों के लिए दिशा निर्देश निर्धारित करता रहा हो, लेकिन नेता हैं कि मानते ही नहीं. उनके लिए प्रचार का एक-एक मौका अपनी बात को अतिरंजित कर कहने के लिए इस्तेमाल किया जाता है भले ही इससे किसी की संवेदनाओं पर चोट क्यों न पहुंचती हो.
  • वरुण गांधी की अनदेखी से हो सकती है बीजेपी में बड़ी बगावत
    एक सप्ताह पहले पांच सांसद बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह से मिले और उनसे स्टार प्रचारकों की सूची में वरुण गांधी का नाम जोड़ने को कहा क्योंकि उनका नाम न होने से आम जनता में गलत संदेश जा रहा था. पांच सांसदों के दल में शामिल रहे हाथरस से बीजेपी सांसद राजेश दिवाकर का कहना है, "मुझे 2009 में टिकट भैयाजी ने ही दिलवाया था. उन्होंने 2009 में मेरी दावेदारी का समर्थन किया था. वह मेरे नेता हैं और मेरे उनसे पारिवारिक संबंध हैं. भैयाजी के अपमान से मेरे क्षेत्र के लोगों में गलत संदेश जा रहा था.
  • आम आदमी पार्टी का बज सकता है पंजाब में डंका
    यदि आप पंजाब के गांव-देहात से गुजरें तो आपको गांव की चौड़ी सड़कें नजर आएंगी. कुछ मकान तो दिल्ली की डिफेंस कॉलोनी को भी मात दे रहे हैं. बेहतर बिजली और पानी के बेहतर इंतजाम से लगेगा कि वर्तमान बादल सरकार को सत्ता से बाहर करने की बात जनता क्यों करेगी. आप इन चीजों को देखकर अकाली दल के तीसरी बार सत्ता में आने पर शर्त लगाएंगे. लेकिन आप अपना दांव हार सकते हैं. सच्चाई इससे कुछ हटकर है. यह ऐसी सच्चाई है जो अकाली दल को सत्ता से दूर कर सकती है. यहां तक कि इस राज्य के दो पार्टी सिस्टम के चलन को पूरी तरह से बदल सकती है.
  • जाट..भारत की राजनीति की बेचैन आत्मा!
    सांप्रदायिक जूनून समुदायों को बदल देता है. हठी बना देता है. कोई भी पक्ष आसानी से अपनी बात से पीछे नहीं हटता है. पश्चिम उत्तर प्रदेश के जाटों का यह भोलापन मुझे बहुत पसंद आया कि वे अपने ग़ुस्से की बात को कबूल कर रहे हैं.
  • कांग्रेस के साथ गठबंधन अखिलेश के लिए बड़े फायदे का सौदा नहीं दिखता
    अखिलेश यादव और राहुल गांधी ने सपा-कांग्रेस गठबंधन का हिस्‍सा भले ही अजित सिंह की पार्टी राष्‍ट्रीय लोक दल(रालोद) को नहीं बनाया लेकिन पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश में बीजेपी से नाराज जाट समुदाय अपने समर्थन पर पुनर्विचार कर रहे हैं.
  • विधानसभा चुनाव 2017 : ओपिनियन या एग्ज़िट पोल पर ओपिनियन...
    सिद्ध होता है कि चुनाव सर्वेक्षण अपनी संपूर्ण सतर्कता की स्थिति में भी अविश्वसनीय ही हैं. हालांकि ऐसे अनुमानों को तरह तरह से वैज्ञानिकता और सैम्पल के साइज़ का तर्क देकर विश्वसनीय दिखा दिया जाता है.
  • बीजेपी अपने इस विज्ञापन से ख़ुद जाल में फंस सकती है....
    मंगलवार सुबह-सुबह बीजेपी उत्तरप्रदेश के फेसबुक पेज पर पार्टी के इस प्रचार पोस्टर को देखकर चुनावी विज्ञापनों की चालाकी पकड़ने का मन कर गया. इस पोस्टर में जो आंकड़े दिए गए हैं वे तथ्य के हिसाब से सही हैं मगर जिस रिपोर्ट के आधार पर दिए गए हैं, उसी में और भी ऐसे तथ्य हैं जो बीजेपी पर भी भारी पड़ सकते हैं.
  • अखिलेश यादव-राहुल गांधी की नई दोस्ती से उठते नए सवाल
    कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच चुनावपूर्व समझौता हाल के दशकों में सबसे आश्चर्यजनक और महत्‍वपूर्ण राजनीतिक गठबंधनों में एक है.
  • नोटबंदी का चुनावों के चेहरे-मोहरे पर और उसकी सेहत पर क्या प्रभाव पड़ा
    इन पंचरंगी चुनावों में फिलहाल सबसे गाढ़ा और चटख रंग है उत्तर प्रदेश का, और इसके बाद बारी आती है पंजाब की. लोकसभा में बहुत कम सांसद भेजने वाले उत्तराखंड (5), गोवा (2) और मणिपुर (2) इसमें महज कदमताल भर कर रहे हैं, हालांकि 'आप' की उपस्थिति के कारण गोवा के बारे में थोड़ा-बहुत सुनाई पड़ जाता है.
  • पंजाब और गोवा में आम आदमी पार्टी की ताकत का यह है राज...
    पंजाब में एक तरफ शिरोमणि अकाली दल के बादल परिवार की राजनीतिक जड़ें गहरी हैं वहीं दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी अपनी पहचान बना रही है. सवाल यह है कि अरविंद केजरीवाल ने दो राज्यों में ही चुनाव लड़ने का फैसला क्यों लिया?

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