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चुनावी ब्लॉग

  • राजनीति की नई चिढ़ाती-बरगलाती भाषा...
    कर्नाटक विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार के दौरान जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि चुनाव बाद कांग्रेस PPP पार्टी बन जाएगी, तो मुझे पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप की तर्ज पर लगा कि वह विपक्षियों के बीच गठबंधन की बात कर रहे हैं. लेकिन बाद में उन्होंने खुद इसका अर्थ बताया कि कांग्रेस 'पंजाब, पुदुच्चेरी और परिवार' की पार्टी रह जाएगी. दो दिन के बाद राहुल गांधी ने जेडीएस का नया अर्थ दिया - जनता दल संघ परिवार. निःसंदेह, जनता को इससे मजा आ रहा है.
  • विपक्ष के पास राहुल गांधी का विकल्प क्या है...?
    राहुल गांधी या उनकी मां सोनिया गांधी पर यह इल्ज़ाम नहीं लगाया जा सकता कि उनमें प्रधानमंत्री बनने की चाहत है. 2004 में UPA को मिले बहुमत के बाद जब कई दलों ने अपने समर्थन की चिट्ठी सोनिया गांधी के नाम कर दी थी और जब BJP की सुषमा स्वराज और उमा भारती जैसी नेता सोनिया के प्रधानमंत्री बनने पर बाल मुंडाने की बात कर रही थीं, तब सोनिया ने यह पद छोड़कर इस पूरी राजनीति को अंगूठा और आईना दिखा दिया था. उस एक मास्टरस्ट्रोक के साथ सोनिया का कद काफी ऊंचा हो गया था. 2009 में जब कांग्रेस दोबारा सरकार बनाने की स्थिति में आई, तो उत्साही कांग्रेसियों ने राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने की मांग की. तब राहुल ने बड़ी शालीनता से यह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया. यह शील BJP के बड़े नेताओं ने भी नहीं दिखाया. आडवाणी मज़ाक में 'PM इन वेटिंग' कहे जाने लगे और अंततः नई पीढ़ी के महत्वाकांक्षी नेताओं द्वारा मार्गदर्शक मंडल में निर्वासित कर दिए गए.
  • राहुल गांधी के PM बनने की बात से इतनी हलचल क्यों...?
    अब राहुल गांधी देश में जहां-जहां जाएंगे और बोलेंगे, जनता उनसे यही उम्मीद लगाएगी कि वह देश के लिए भविष्य की योजनाएं भी बताएं. हालांकि किसानों और बेरोज़गारों की चिंताओं को वह पहले से उठा रहे हैं, लेकिन अब किसानों और बेरोज़गारों के लिए मांग उठाने का वक्त नहीं बचा. उन्हें अब वैसी योजनाओं का खाका लेकर आना पड़ेगा, जिनमें इन दोनों वर्गों की समस्याओं का समाधान हो.
  • मध्य एशिया से आया मोधुल हाउंड कुत्ता कांग्रेस को कैसे सिखाएगा देशभक्ति
    भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि कांग्रेस को उत्तरी कर्नाटक में पाए जाने वाले मुधोल हाउंड कुत्ते से देशभक्ति सीखनी चाहिए, जिसे भारतीय सेना में शामिल किया गया है. राहुल गांधी का नाम तो नहीं लिया, मगर JNU में राहुल ही गए थे. वहां लगाए गए जिस नारे का ज़िक्र प्रधानमंत्री ने किया, उसकी सत्यता का आज तक पता नहीं. कौन लगाकर गए, आज तक नहीं पकड़े गए.
  • क्या राहुल को पीएम स्वीकार करेंगे कांग्रेस के सहयोगी दल?
    राहुल यह दावा करते हुए नहीं दिख रहे हैं कि कांग्रेस को बहुमत मिलेगा. सिर्फ कांग्रेस के सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने भर पर ही वे प्रधानमंत्री बनने को तैयार हैं.
  • कर्नाटक चुनाव : लिंगायत वोटों पर टिकीं कांग्रेस और बीजेपी की उम्मीदें
    सबसे बड़ा दांव खेला है मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने. उन्होंने लिंगायत को एक अलग धर्म का दर्जा देते हुए उसे अल्पसंख्यकों में शामिल करने की घोषणा कर दी. कई लोग इसे बड़ा राजनैतिक जुआ बता रहे हैं.
  • चुनाव मैदान में नहीं, चैनलों में हो रहा है, जिन पर नज़र ही नहीं किसी की...
    कोई भी चुनाव हो, TV का कवरेज अपने चरित्र में सतही ही होगा. इसका स्वभाव ही है नेताओं के पीछे भागना. चैनल अब अपनी तरफ से तथ्यों की जांच नहीं करते, इसकी जगह डिबेट के नाम पर दो प्रवक्ताओं को बुलाते हैं और जिसे जो बोलना होता है, बोलने देते हैं. संतुलन के नाम पर सूचना गायब हो जाती है. पिछले कई साल से चला आ रहा यह फॉर्मेट अब अपने चरम पर है. यही कारण है कि TV के ज़रिये चुनाव को मैनेज करना आसान है. राजनीतिक दल अपने आलस्य और TV को न समझ पाने के कारण इसके ख़तरे को समझ नहीं रहे हैं. उन्हें अभी भी लगता है कि न्यूज़ चैनलों में सबके लिए बराबर का स्पेस है. मगर आप खुद देख लीजिए कि कैसे चुनाव आते ही चैनलों की चाल बदल जाती है. पहले भी वैसी रहती है, मगर चुनावों के समय ख़तरनाक हो जाती है.
  • कर्नाटक बना कुरूक्षेत्र: क्‍या कांग्रेस के आखिरी किले को ध्‍वस्‍त कर पाएगी बीजेपी
    प्रधानमंत्री पहले यहां 15 रैलियां करने वाले थे अब वे 21 रैलियां करेंगे. यानि बीजेपी ने सबकुछ दांव पर लगा दिया है यहां तक की प्रधानमंत्री को भी. मगर सबसे बडा सवाल उठता है कि आखिर कर्नाटक बीजेपी के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों है.
  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हर झूठ हीरा है, इन हीरों का कंगन बना लेना चाहिए...
    तथ्यों को कैसे तोड़ा-मरोड़ा जाता है, आप प्रधानमंत्री से सीख सकते हैं. मैं इन्हें सरासर झूठ कहता हूं, क्योंकि यह खास तरीके से डिज़ाइन किए जाते हैं और फिर रैलियों में बोला जाता है. गुजरात चुनावों के समय मणिशंकर अय्यर के घर की बैठक वाला बयान भी इसी श्रेणी का था, जिसे लेकर बाद में राज्यसभा में चुपचाप माफी मांगी गई थी. 1948 की घटना का ज़िक्र कर रहे हैं, तो ज़ाहिर है टीम ने सारे तथ्य निकालकर दिए ही होंगे, फिर उन तथ्यों के आधार पर एक झूठ बनाया गया होगा.
  • बीजेपी के वंशवाद पर चला मोदी का चाबुक
    तारीख 23 अप्रैल. दिन सोमवार. कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु से करीब 150 किलोमीटर दूर वरुणा में सुबह तक सड़कों पर चहल-पहल थी. बीजेपी के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार बी एस येदियुरप्पा अपने समर्थकों के साथ मौजूद थे. उनके बेटे विजयेंद्र वरुणा सीट से पर्चा भरने के लिए तैयार थे. पर्चा भरने के लिए मुहूर्त भी देख लिया गया था. पर्चा भरने की आखिरी तारीख मंगलवार 24 अप्रैल थी लेकिन ज्योतिष के हिसाब से वह सही दिन नहीं था. इसलिए सोमवार को ही पर्चा भरने का फैसला हुआ. मीडिया में इसे लेकर बहुत उत्सुकता थी क्योंकि यहां महामुकाबला होने वाला था.
  • गुजरात का हिसाब, कर्नाटक में होगा बराबर?
    तो गुजरात का हिसाब कर्नाटक में चुकाने की तैयारी है. गुजरात बीजेपी का गढ़ तो कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार. वैसे 2013 के बाद से अब तक जिस भी राज्य में बीजेपी और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला हुआ, कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी है. लेकिन गुजरात में कांग्रेस जैसे जीतते-जीतते हार गई और बीजेपी हारते-हारते जीत गई.
  • 2019 के लिहाज़ से गुजरात के जनादेश का संदेश
    इस मुख्य फैसले को कोई नहीं नकार सकता कि गुजरात का जनादेश BJP के पक्ष में आया है, लेकिन उसके साथ जुड़े दूसरे कई और जनादेशों को देखना हो, तो जनता की दी कई और व्यवस्थाओं को पढ़ा जाना भी ज़रूरी है. यह कवायद इसलिए भी ज़रूरी है, क्योंकि गुजरात का विधानसभा चुनाव वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव को नज़र में रखकर लड़ा जा रहा था.
  • विधानसभा चुनाव परिणाम 2017 : उस एक घंटे का रोमांच याद रहेगा...
    नतीजों के दिन कभी इतने रोमांचक नहीं रहे. एक मानी हुई जीत अचानक उतार चढ़ाव में बदल गई. सुबह नौ से दस के बीच बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिए होश उड़ा देने वाला रहा होगा. एक पल में बीजेपी आगे निकलती थी तो दूसरे पल में कांग्रेस. कभी बराबर तो कभी आगे पीछे.
  • राहुल गांधी का विश्लेषण करके रखने का वक्त आ गया है
    राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने का यह दूसरा दिन है. वैसे उनके पास तेरह साल का राजनीतिक अनुभव है. बहुत कुछ उनके बारे में हम जान समझ चुके हैं लेकिन सबसे लंबे समय तक शासन करने वाले राजनीतिक दल के अघ्यक्ष बनने के बाद उनकी जिम्मेदारी और उनके सामने आने वाली चुनौतियां और जोखिम नए नए होंगे.
  • हां, मुझे मालूम है गुजरात चुनाव का नतीजा
    कुछ पत्रकार ट्विटर पर डोल गए हैं. बैलेंस करने या दोनों ही स्थिति में किसी एक साइड से लाभार्थी होने के चक्कर में अपना पोस्ट बदल रहे हैं, बीच बीच का लिख रहे हैं.
  • लालू यादव की ज़ुबानी, आडवाणी को कैसे किया था गिरफ्तार
    25 सितंबर, 1990 को उस समय BJP के सबसे शक्तिशाली नेताओं में से एक लालकृष्ण आडवाणी ने अयोध्या में राम जन्मभूमि - बाबरी मस्जिद विवादित स्थल पर राममंदिर निर्माण के लिए समर्थन जुटाने की खातिर गुजरात के सोमनाथ से रथयात्रा शुरू की थी, और 23 अक्टूबर को उन्हें बिहार के समस्तीपुर में तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के आदेश पर गिरफ्तार कर लिया गया था...
  • ग़ज़ब ढा रहे हैं ओपिनियन पोल के व्यापारी...
    चुनावी आंकड़ों के इस सांख्यिकीय विश्लेषण को सैफोलॉजी कहते हैं, और यह काम करने वाले खुद को विज्ञानी कहते हैं. वे खुद को सांख्यिकी और राजनीति विज्ञान का विशेषज्ञ कहलाना चाहते हैं. उनकी मुद्रा किसी भौतिक विज्ञानी या रसायनशास्त्री से कम नहीं होती. लेकिन दिक्कत यह है कि उनके आकलन विज्ञान के आकलन की तरह शुद्ध नहीं होते.
  • मोदी हार सकते हैं लेकिन क्‍या राहुल गांधी की सही में जीत होगी?
    क्या मोदी अपने गृह प्रदेश में हार रहे हैं? इसे आप इस प्रकार पढ़ें, 'क्या गुजरात में मोदी को हराया जा सकता है?' कश्मीर से कन्याकुमारी तक लोग इस सवाल में रुचि रखते हैं. कुछ परेशान हैं, कुछ उत्साहित हैं और कुछ उदास हैं. यहां तक कि जो लोग मानते हैं कि मोदी को कोई नहीं हरा सकता, वे घबराए हुए लग रहे हैं.
  • गुजरात चुनाव : CD छोड़िए, इन मुद्दों का तो पोस्टर भी नहीं बनता
    जब गुजरात सरीखे राज्य में चुनावी बयार शुरू होकर धीरे-धीरे पूरे मुल्क में इसलिए बिखरेगी, क्योंकि यह तो सीधे तौर पर प्रधानमंत्री की साख का मामला है. विपक्ष इसलिए पूरा ज़ोर लगाएगा, क्योंकि गुजरात जीत लिया तो उनका आधा रास्ता तय हो जाएगा. इसलिए दोनों ही स्तरों पर यह प्रतिष्ठा का विषय तो है ही.
  • क्या नया है इस बार गुजरात में...
    गुजरात चुनाव में इस बार नई बात यह है कि हरचंद कोशिश के बाद भी हिंदू मुसलमान का माहौल नहीं बन पाया. दूसरी खास बात ये कि वहां के पूर्व मुख्यमंत्री इस समय देश के प्रधानमंत्री हैं. लेकिन वहां सत्तारूढ़ भाजपा इस बार भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भरोसे है.
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