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चुनावी ब्लॉग

  • लोकसभा चुनाव 2019 का प्रचार अभियान : हैरानी है, अब तक सिर्फ उर्मिला मातोंडकर रहीं 'सुपरहिट'
    वह नेता कहां है, जो समूचे भारत की बात करे, उन लाखों भारतीयों को आश्वस्त करे, जो मौजूदा निज़ाम में डरा हुआ महसूस करते हैं, कोई सकारात्मक संदेश देकर युवाओं को प्रेरित करे, शासन को सुशासन बनाए, और नई पीढ़ी के लिए सबको साथ लेकर चलने वाले भारत का झंडा बुलंद किए रहे...? नेहरू के उत्तराधिकारी का इंतज़ार जारी है...
  • बीजेपी की नई रणनीति, हिंदुत्व का नया स्वरूप
    लोकसभा चुनाव के लिए दूसरे चरण का मतदान खत्म होते ही बीजेपी ने भी अपनी चुनावी रणनीति का दूसरा चरण शुरू कर दिया है. यह वह चरण है जिसमें बीजेपी अपने तरकश में मौजूद हर तीर का इस्तेमाल कर रही है. इसे हिंदुत्व 2.0 का नाम दिया गया है. यानी मोदी-शाह का वह हिंदुत्व जो वाजपेयी-आडवाणी के हिंदुत्व से बिल्कुल अलग है. तब मंदिर मंडल का दौर था तो इस दौर में मंदिर और मंडल को मिलाकर हिंदुत्व का नया रूप तैयार किया गया है. यह आक्रामक हिंदुत्व है जो खुलकर ध्रुवीकरण करता है.
  • प्रज्ञा ठाकुर को चुनकर मोदी-शाह ने दिखा दिया, जीत के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं...
    भोपाल में दिग्विजय सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ने के लिए BJP की पसंद हैं, 48-वर्षीय साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, जो हत्या, षड्यंत्र रचने और इससे भी ज़्यादा वर्ष 2008 में हुए मालेगांव बम ब्लास्ट केस की आरोपी हैं.
  • क्यों चुनावों में मशीन का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए?
    बताया कि ये पर्ची पांच साल तक नहीं मिटेगी. बेहतर है इसे गिना जाना चाहिए. वीवीपैट के अपने खर्चे भी हैं. इसका इस्तेमाल करने पर मतगणना की रफ्तार भी धीमी होती है. फिर बैलेट पेपर ही क्यों नहीं?
  • क्यों ग़ायब हैं किसानों के मुद्दे किसानों के ही देश से...?
    सरकार को यह समझना होगा कि जब ज़रूरत ओपन-हार्ट सर्जरी की हो, तो बैंड-एड देकर इलाज नहीं किया जा सकता. असली मसला तो खेती को बचाने का है, ऐसा हुआ, तो किसान ख़ुद-ब-ख़ुद बच जाएंगे.
  • मायावती के रंग समझना आसान नहीं, विपक्ष के लिए बढ़ गया है सिरदर्द...
    लग रहा है कि जिस तरह की 'लेन-देन की राजनीति' आज तक 'बहन जी' करती रही हैं, वह किसी भी राष्ट्रीय पार्टी के साथ जा सकती हैं, जो 23 मई को आने वाले चुनाव परिणाम पर निर्भर करेगा.
  • बिहार के 'लेनिनग्राद' बेगूसराय से कन्हैया ने ठोकी ताल
    बिहार का बेगूसराय इन दिनों तरह-तरह के सराय में बदल गया है. सराय का मतलब होता तो लंबे सफर का छोटा सा ठिकाना, जहां यात्रि अंधेरे होने पर सुस्साते हैं और अगली सुबह अपनी यात्रा पर निकल पड़ते हैं. दिल्ली में एक है जुलैना सराय. यूसुफ सराय. बिहार में सबसे अधिक राजस्व देने वाला ज़िला बेगूसराय के एक गांव का लड़का जेएनयू गया था रिसर्च करने. आज उसने बेगूसराय से सीपीआई के उम्मीदवार के नाते पर्चा भर दिया.
  • बीजेपी के संकल्प पत्र से बाकी बड़े नेता ग़ायब क्यों?
    11 अप्रैल को पहला मतदान है. मतदान से ठीक तीन दिन पहले भाजपा का घोषणापत्र आया है. 2014 और 2019 के घोषणापत्र के कवर को ही देखें तो बीजेपी या तो बदल गई है या फिर बीजेपी में सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी रह गए हैं. 2014 में कवर पर 11 नेता थे. इनमें से अटल बिहारी वाजपेयी और मनोहर पर्रिकर अब दुनिया में नहीं हैं. आडवाणी और मुरली मनोहन जोशी को टिकट नहीं मिला है.
  • जनता को छलने वाले चुनावी वादे - लोकपाल से समझें
    लोकसभा चुनाव जीतने के लिए सभी पार्टियों ने लुभावने वायदों की बारिश कर दी है. नेताओं के चुनावी वायदों के पीछे बदलाव की विस्तृत रूपरेखा नहीं होती है इसीलिए सरकार बदलने के बावजूद सिस्टम नहीं बदलता है. चुनावों के बाद इन वायदों का क्या हश्र होता है, इसे लोकपाल मामले से समझा जा सकता है.
  • कांग्रेस के घोषणा-पत्र पर रवीश कुमार का विश्‍लेषण
    100 करोड़ से अधिक आबादी वाले देश में कुल संपत्तियों का 70 फीसदी एक प्रतिशत आबादी के बाद चला गया है. इस एक प्रतिशत ने सुधार के नाम पर राज्य के पास जमा संसाधनों को अपने हित में बटोरा है. आज प्राइवेट जॉब की स्थिति पर चर्चा छेड़ दीजिए, दुखों का आसमान फट पड़ेगा, आप संभाल नहीं पाएंगे. हम आज एक महत्वपूर्ण मोड़ पर हैं. हमें राज्य के संसाधन, क्षमता और कारपोरेट के अनुभवों का तुलनात्मक अध्ययन करना चाहिए. एक की कीमत पर उसे ध्वस्त करते हुए कारपोरेट का पेट भरने से व्यापक आबादी का भला नहीं हुआ.
  • राहुल कहते हैं मार्च 2020 तक 20 लाख केंद्रीय पदों को भर देंगे, मोदी क्यों नहीं कहते ऐसा?
    राहुल गांधी ने शिक्षा और सरकारी नौकरी से संबंधित दो बातें कही हैं. उन्होंने मालदा में कहा कि गांव और कस्बों में सरकारी कालेजों के नेटवर्क को दुरुस्त करेंगे. दूसरा सरकार में आने पर मार्च 2020 तक केंद्र सरकार के खाली पड़े 20 लाख पदों को भर देंगे. डेढ़ साल से नौकरी सीरीज़ और यूनिवर्सिटी सीरीज़ कर रहा हूं.
  • वैज्ञानिक कथाकार नरेंद्र मोदी का राष्ट्र को संबोधन और चुनाव आयोग का समापन
    इसरो और रक्षा अनुसंधान का इस्तमाल नरेंद्र मोदी अपने राजनीतिक हित के लिए कर रहे हैं. उनका राष्ट्र के नाम संबोधन करना और कुछ नहीं बल्कि मतदाताओं को प्रभावित करना था. वे पुलवामा के बाद ऐसा कुछ चाहते थे जिससे पांच साल की नाकामी पर चर्चा और सवाल ग़ायब हो जाएं.
  • चुनाव 2019 - मतदाता का हल्का होना लोकतंत्र का खोखला हो जाना है
    मैं फील्ड में कभी यह सवाल नहीं करता कि आप किसे वोट देंगे. इस सवाल में मेरी दिलचस्पी नहीं होती है. मैं यह ज़रूर देखना चाहता हूं कि एक मतदाता किस तरह की सूचनाओं और धारणाओं से ख़ुद को वोट देने के लिए तैयार करता है. बाग़पत ज़िले के कई नौजवानों से मिला. शहरी नौजवानों की तरह किसी ने कहा नहीं या फिर जताया नहीं कि वे मुझे जानते हैं. मैं ऐसे ही नौजवानों के बीच जाना चाहता था जो मुझे ठीक से नहीं जानते हों.
  • गैर-कानूनी चुनावी रथ, रोड शो और बाइक रैलियां- सारे चौकीदार चुप क्यों
    भारत में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए चुनाव आयोग को संविधान के अनुच्छेद-324 के तहत असीमित अधिकार मिले हैं. उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक डॉ. विक्रम सिंह ने चुनाव आयोग को 3 लीगल नोटिस देने के बाद सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके रोड-शो और बाइक रैली पर प्रतिबन्ध लगाने की मांग की.
  • हमारी पार्टियों के लिए बेरोज़गारी कोई मुद्दा है?
    2019 के चुनाव में बेरोज़गारी की बात बहुत हो रही है, मगर इस पर न तो सरकार की तरफ से कुछ ठोस आ रहा है और न ही विपक्ष की तरफ से. पक्ष और विपक्ष की उदासीनता के बीच बेरोज़गारों को भी समझ नहीं आ रहा है कि वे अपने मुद्दों का क्या करें. 20 मार्च के इंडियन एक्सप्रेस में जे मजूमदार की खबर छपी है. इस खबर के अनुसार वर्क फोर्स यानी काम करने वालों की तादाद में तेज़ी से गिरावट आई है. पांच साल पहले की तुलना में इस वक्त कम लोग काम पर लगे हुए हैं. 1993-94 के बाद पहली बार आई कार्य बल में गिरावट आई है.
  • सोचिएगा, समझिएगा, दुनिया में हिन्दुस्तान की भद्द न पिटवाइएगा
    परीक्षा में पास होने के लिए न्यूनतम 33 प्रतिशत अंक होने चाहिए. हमने पिछली लोकसभा में 34 प्रतिशत ऐसे सांसदों को चुन लिया, जिन्होंने अपने घोषणा पत्र में स्वयं पर कोई न कोई आपराधिक मामला दर्ज होना घोषित किया था. 2019 में एक बार फिर यही राजनेता आपके सामने वोट मांगने के लिए आ खड़े हुए हैं.
  • अब तक कहां छिपे बैठे हैं चुनावी मुद्दे
    अनुमान यह लगता है कि इस बार के चुनाव में किसानों और देश के युवावर्ग के दुख या संकट को कम करने के लिए व्यावहारिक योजना पेश करने की होड़ मचेगी. खासतौर पर मौजूदा सरकार की बेदखली की कोशिश करने वाले विपक्ष के नेताओं में यही होड़ मचेगी कि कौन सबसे ज्यादा विश्वसनीय तरीके से अपनी योजनाएं पेश कर पाता है.
  • पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 'किंतु-परंतु' और जनाक्रोश से जीत चुके हैं PM नरेंद्र मोदी
     उत्तर प्रदेश में प्रतिद्वंद्वी दोस्त बन गए हैं, ताकि 'साझा दुश्मन' BJP से मुकाबिल हो सकें. बहुजन समाज पार्टी (BSP), समाजवादी पार्टी (SP) तथा राष्ट्रीय लोकदल (RLD) के अलावा भी कई दल महागठबंधन बनाकर एक साथ आ रहे हैं, और उम्मीद कर रहे हैं कि उनकी मिली-जुली ताकत प्रतिद्वंद्वी को बुरी तरह हरा देगी.
  • क्या मोदी सरकार ने अपनी ज़िम्मेदारियां निभाईं?
    इन पांच सालों में काफी कुछ बदल गया. जो सबसे ज़्यादा बदला वो सवाल पूछने की व्यवस्था. इस व्यवस्था की बुनियाद जाने अनजाने में 1975 में 'दीवार' फिल्म में सलीम जावेद ने डाली थी. जब अमिताभ अपने दारोगा भाई शशि कपूर को कहते हैं कि जाओ पहले उस आदमी का साइन लेकर आओ. मेरी राय में यही लाइन अब लाइन में बदल गई है कि जाओ पहले यह पूछ कर आओ कि 70 सालों में क्यों नहीं हुआ.
  • एनडीए की पटना रैली के बाद नीतीश के चेहरे पर मुस्कराहट और भाजपा में बेचैनी क्यों?
    बिहार की राजनीति में रविवार तीन मार्च का दिन कई कारणों से याद किया जाएगा. इस दिन सुबह कश्मीर में शहीद हुए सब इंस्पेक्टर पिंटू सिंह का पार्थिव शरीर पटना आया था. तब न तो नीतीश कुमार समेत उनके मंत्रिमंडल के किसी सदस्य ने, न ही मोदी मंत्रिमंडल में शामिल बिहार के किसी मंत्री ने पटना में मौजूद रहने के बावजूद पटना एयरपोर्ट पर जाकर सिंह को श्रद्धांजलि देने की जरूरत समझी. इससे साफ है कि पुलवामा हो या अन्य घटना, इन नेताओं के लिए मीडिया में प्रचार पाने के अलावा कुछ नहीं.
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