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चुनावी ब्लॉग

  • आसमान छूती बेरोज़गारी, राष्ट्रवाद के सहारे हवा हवाई प्रधानमंत्री मोदी
    आप समझ सकते हैं कि क्यों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बेरोज़गारी पर बात नहीं कर रहे हैं. पुलवामा के बाद एयर स्ट्राइक उनके लिए बहाना बन गया है. देश प्रेम-देश प्रेम करते हुए चुनाव निकाल लेंगे और अपनी जीत के पीछे भयावह बेरोज़गारी छोड़ जाएंगे. प्रधानमंत्री का एक ही देश प्रेम है जो चुनाव में जीत प्रेम है. मोदी सरकार के पांच साल में शिक्षा क्षेत्र का कबाड़ा हुआ. जो यूपीए के समय से होता चला आ रहा था.
  • अंधेर नगरी चौपट खेती, टके सेर झांसा, टके सेर जुमला, खेती में फेल मोदी सरकार
    मोदी कहते हैं कि 2024 तक वही प्रधानमंत्री होंगे. होंगे तो उनके कार्यकाल के दूसरे हिस्से में भी खेती की असफलता मुंह बाये खड़ी रहेगी. किसान हाहाकार कर रहे होंगे. उन्हें भटकाने के लिए युद्ध का उन्माद रचा जा रहा होगा या सांप्रदायिकता का ऊबाल पैदा किया जा रहा होगा. तब किसान दस साल के व्हाट्स एप मेसेज पलट कर देख रहे होंगे कि उन्होंने अपने जीवन का एक दशक किन बातों में निकाल दिया.
  • आधा दर्जन छोटे दलों के संपर्क में हैं प्रियंका
    कांग्रेस उत्तर प्रदेश में अपने पांव जमाने की कोशिश में लगी है. जब से पूर्वी उत्तर प्रदेश का जिम्मा प्रियंका गांधी को मिला है और पश्चिमी उत्तर प्रदेश का ज्योतिरादित्य सिंधिया को, दोनों ने अपने-अपने ढंग से कांग्रेस को फिर से खड़ा करने के लिए काम करना शुरू कर दिया है. इसके लिए प्रियंका अपनी खास कोशिशों में जुट गई हैं. इसी रणनीति का हिस्सा है कि प्रियंका ने उत्तर प्रदेश के सभी छोटे-छोटे दलों की खोज खबर लेना शुरू कर दिया है.
  • गठबंधन : बीजेपी का दक्षिण दर्द
    बीजेपी ने तमिलनाडु में अपने गठबंधन की घोषणा कर दी है. एक ही दिन में महाराष्ट्र के बाद तमिलनाडु दूसरा राज्य है जहां बीजेपी ने गठबंधन बनाने में देरी नहीं की है. वहां बीजेपी और शिवसेना में लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ में लड़ने पर सहमति बन चुकी है.
  • बीजेपी भी 'महागठबंधन' के सहारे!
    सोचिए अगर इस आम चुनाव में किसी भी पार्टी को बहुमत न मिले. किसी गठबंधन को भी न मिले. त्रिशंकु संसद की हालत में क्या होगा? यह एक ऐसा सवाल है जो बार-बार पूछा जा रहा है. इसका एक जवाब यह भी है कि ऐसे हालात में राष्ट्रपति सबसे बड़ी पार्टी या फिर चुनाव पूर्व सबसे बड़े गठबंधन को सरकार बनाने के लिए बुला सकते हैं. ऐसा पहले भी हुआ है. हम यह बात इसलिए उठा रहे हैं कि चुनाव नजदीक आते ही बीजेपी ने न सिर्फ अपना कुनबा बढ़ाना शुरू कर दिया है.
  • सभी तरफ 'महामिलावट' का जमाना
    देश में लोकसभा चुनाव की तैयारी राजनैतिक दलों ने युद्ध स्तर पर शुरू कर दी है और जैसे जंग के मैदान में होता है लड़ाई के लिए एक लकीर सी खींच दी गई है...दोनों तरफ गठबंधन करने की होड़ सी लगी हुई है. एक-एक दल और एक-एक राज्य के हिसाब से नफे नुकसान का जायजा लेने के बाद पार्टियां आपस में बात कर रही हैं.
  • क्या भाजपा अब 'सहयोगी शरणम् गच्छामि' हो गई है?
    लोकसभा चुनाव सिर पर है और हर दल अपने-अपने हिसाब से राजनीतिक दांव खेलने में व्यस्त हैं. जहां एक ओर राष्ट्रीय दल भाजपा और कांग्रेस के बीच सहयोगियों को जोड़ने की होड़ लगी है. वहीं, क्षेत्रीय दल भी अपने-अपने हिसाब से यानी कांग्रेस या BJP के साथ अब तालमेल को अंतिम रूप दे रहे हैं. कांग्रेस अगर सहयोगी या क्षेत्रीय दलों से समझौता कर रही है तो उसकी मजबूरी समझ में आती है लेकिन अचानक बीजेपी जिस तरह से महत्वपूर्ण राज्यों में अपने पुराने स्टैंड से 360 डिग्री घुमकर समझौते कर रही है, उससे तो यही लगता है कि भाजपा को अब सहयोगियों का महत्व समझ में आ रहा है. इतना ही नहीं, बीजेपी को शायद उनके बिना चुनाव में जाना आत्मघाती लग रहा है. इसलिए भाजपा एक बार फिर 'सहयोगी शरणम् गच्छामी' के मुद्रा में है. 
  • प्रियंका गांधी वाड्रा: अपना भी टाइम आएगा
    तीन दिनों के अपने लखनऊ प्रवास के दौरान प्रियंका ने दिन रात बैठकें करके करीब चार हजार कांग्रेस कार्यकर्ताओं से मुलाकात की. यदि उत्तर प्रदेश के कांग्रेस अध्यक्ष राज बब्बर की माने तो प्रियंका ने पूर्वी उत्तर प्रदेश के चार हजार कार्यकत्ताओं से मुलाकात कर इन ईलाकों के लिए एक खाका तैयार कर लिया है और उनके पास एक रणनीति भी है जो कांग्रेस को इन ईलाकों में फिर से जिंदा कर सकती है.
  • दौरा, दौरा, दौरा, दौड़ते ही रह गए प्रधानमंत्री, कार्यकाल का एक तिहाई इसी में कटा
    प्रधानमंत्री ने अपने कार्यकाल का कितना हिस्सा यात्राओं में बिताया इसे लेकर स्क्रोल और दि प्रिंट ने दो रिपोर्ट की है. स्क्रोल की रिपोर्ट आप ज़रूर देखें. इसलिए भी कि किस तरह डेटा जर्नलिज़्म किया जा सकता है.
  • 'पापा' को पीएम पसंद हैं...
    मुलायम सिंह यादव ने वह कह दिया जो कोई सोच भी नहीं सकता था. उन्होंने कह दिया कि वे चाहते हैं कि नरेंद्र मोदी फिर से प्रधानमंत्री बनें. मुलायम ने यह बात सोलहवीं लोकसभा के विदाई भाषण में कही. एक ऐसी बात जो बीजेपी नेताओं के कानों में मधुर सुर की तरह गूंजी तो, वहीं विपक्ष के कानों में कर्कश राग की तरह. यह ऐसी बात है जो सपा-बसपा गठबंधन से तगड़ी चुनौती झेल रही बीजेपी उत्तर प्रदेश में एक ब्रहास्त्र की तरह इस्तेमाल कर सकती है. खासतौर से उन यादव मतदाताओं को भ्रमित करने के लिए जिन पर शिवपाल सिंह यादव पहले से ही डोरे डालने को तैयार बैठे हैं. मुलायम के बयान के राजनीतिक निहितार्थ के बारे में आगे बात करेंगे, लेकिन पहले आइए सुन लेते हैं उन्होंने क्या क्या कहा.
  • भगोड़े विजय माल्या ने सचिन पायलट और ज्योतिरादित्य सिंधिया को दी बधाई, तो लोगों ने किया ट्रोल
    भगोडे विजय माल्या ने कांग्रेस नेता सचिन पायलट और ज्योतिरादित्य सिंधिया को ट्वीट कर दी बधाई तो ट्रोलर्स ने घेर लिया.
  • पांच राज्यों के चुनाव 2019 का सेमीफाइनल क्यों हैं?
    सिद्धांततः हर चुनाव अलग होता है और भारत जैसे विविधता भरे देश में एक चुनाव को दूसरे का सेमीफाइनल बताना मीडिया का सरलीकरण भर हो सकता है. इसके अलावा ऐसे अनुभव भी रहे हैं जब राज्यों में हारने वाली पार्टियां केंद्र में जीत गई हों. वर्ष 2003 में राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के नतीजे अपने पक्ष में देखकर ही अटल सरकार ने समय से पहले लोकसभा चुनाव कराए और हार गई.
  • क्या बदल सकती है राजस्थान की हवा?
    अब तक हर ओपीनियन पोल, हर राजनीतिक विश्लेषक यही कह रहा है कि राजस्थान हर पांच साल में सरकार बदलने की परंपरा को कायम रखते हुए कांग्रेस को सत्ता सौंपने जा रहा है. लेकिन क्या राजस्थान में हवा का रुख बदल सकता है? यह सवाल इसलिए क्योंकि कांग्रेस के भीतर टिकटों के गलत बंटवारे और प्रदेश नेतृत्व में तीखे मतभेदों को देखते हुए बीजेपी ने अब पूरी ताकत झोंकने का फैसला किया है. बीजेपी को अब अपनी संभावनाएं नजर आने लगी हैं. अब तक प्रधानमंत्री मोदी छह सभाएं कर चुके हैं. वे नागौर, भरतपुर, भीलवाड़ा, बांसवाड़ा, कोटा और अलवर जा चुके हैं. उनकी सभाओं में आई भीड़ और लोगों के उत्साह को देखते हुए बीजेपी ने अब उनकी और ज्यादा सभाएं कराने का फैसला किया है. वे पांच से छह और सभाएं कर सकते हैं. इनमें जोधपुर, हनुमानगढ़ सीकर और जयपुर पहले से ही तय है.
  • राजस्थान में हिन्दुत्व की प्रयोगशाला का क्या है हाल?
    26 नवंबर को ग्वालियर से चला, रात को भरतपुर में रुका. 27 को सुबह सात बजे रामगढ़ के लिए रवाना हो गया. चार महीना पहले यहीं रकबर को कथित तौर पर पीटा गया था, बाद में उसकी मौत हो गई थी. टैक्सी ड्राइवर से बात बढ़ाई तो बोलने लगा साहब यहां मेव अच्छी तादाद में हैं. पहले बहुत गाय बूचड़खाने जाती थी अब गौरक्षकों की बहुत निगरानी रहती है. मैंने पूछा ये बूचड़खाने किसके हैं, वो बोला अब ये का पता मुझे. मैं कौन सा आपकी तरह रिपोर्टर हूं. मैंने कहा फिर ये कैसे पता है कि सब गाय बूचड़खाने ही जा रही होंगी. वो बोला अरे साहब आप क्या जानते हैं अभी वीडियो दिखाता हूं कैसे कटती हैं. मैं कहा नहीं ये व्हाट्सअप वीडियो मत दिखाओ गाड़ी ध्यान से चलाओ. मैं सोचने लगा मोबाइल जाति और धर्म के ध्रुवीकरण के केंद्र में है. लोगों में डर और धारणाएं बहुत तेजी से बनाता है. इस बात का अंदाजा हुआ जब रामगढ़ के रास्ते में कई जगह बड़ी बड़ी गौशालाएं और गौरक्षकों के होर्डिंग्स लगे देखे.
  • मध्यप्रदेश में शिवराज या महाराज?
    मध्यप्रदेश में तय हो गया कि अगले पांच साल किसका राज रहेगा- महाराज का या फिर शिवराज का. लोगों की पसंद ईवीएम में कैद हो गई है. पूरे राज्य में लोगों में मतदान के प्रति खासा उत्साह देखने को मिला. हालांकि सुबह मतदान की रफ्तार धीमी थी लेकिन दोपहर होते होते लोगों में जोश आया. कई जगहों से ईवीएम और वीवीपैट मशीनें खराब होने की शिकायतें आईं.
  • मायावती-जोगी ने दिलचस्प बनाया चुनाव...
    छत्तीसगढ़ में एक चरण के चुनाव के बाद बसपा नेता मायावती ने यह साफ किया है कि उनकी पार्टी चुनाव के बाद बीजेपी और कांग्रेस से समान दूरी बनाकर रखेगी. हालांकि उनके ही सहयोगी अजीत जोगी ने एक दिन पहले यह पूछे जाने पर कि क्या जरूरत पड़ी जो बीजेपी को अपना सर्मथन दे सकते हैं. इस पर उन्होंने कहा था कि राजनीति में कुछ भी संभव है मगर बाद में वे अपने बयान से पलट गए. जाहिर है मायावती चुनाव परिणाम से पहले अपने पत्ते नहीं खोलना चाहती है. जाहिर है इन चुनावों का 2019 के लोकसभा चुनाव पर भी काफी असर पड़ने वाला है. सभी पार्टियों को पता है कि अभी तक छत्तीसगढ में बीजेपी और कांग्रेस के बीच जीत का अंतर एक फीसदी से भी कम होता है. ऐसे में यहां एक-एक वोट कीमती होता है.
  • कॉलेजों में शिक्षक नहीं हैं तो छत्तीसगढ़ के छात्र कॉलेज जाना ही बंद कर दें...?
    घोषणापत्र देखकर भले जनता वोट न करती हो मगर चुनावों के समय इसे ठीक से देखा जाना चाहिए. दो चार बड़ी हेडलाइन खोजकर हम लोग भी घोषणापत्र को किनारे लगा देते हैं. राजनीतिक दल कुछ तो समय लगाते होंगे, बात-विचार करते होंगे कि क्या इसमें रखा जा रहा है और क्या इससे निकाला जा रहा है, इसी को समझकर चुनावी चर्चाओं में घोषणापत्र को गंभीरता से लिया जाना चाहिए.
  • राजस्थान...गहलोत या पायलट
    राजस्थान में विधानसभा चुनाव के लिए रणनीति की बिसात बिछ चुकी है. इसके साथ ही हमेशा की तरह नेताओं में भी इस पार्टी से उस पार्टी में जाने के लिए भगदड़ मची हुई है...नेताओं को मौसम वैज्ञानिक भी कहा जाता है खासकर चुनाव के संर्दभ में उन्हें चुनाव के ठीक पहले अंदाजा हो जाता है कि ऊंट किस करवट बैठेगा. इसके बाद वह उन पार्टियों के तरफ रुख करते हैं, जिसके बारे में उन्हें लगता है कि इस पार्टी की सरकार बनने वाली है...कुछ ऐसा ही राजस्थान कांग्रेस में हो रहा है...
  • राजस्थान में कांग्रेस की बात उलझी या फिर सुलझी
    राजस्थान में खुद को सत्ता के करीब पा रही कांग्रेस किसी तरह का जोखिम मोल लेने को तैयार नहीं. सचिन पायलट और अशोक गहलोत की महत्वाकांक्षाओं से जूझ रही पार्टी ने अब बीच का रास्ता निकाला है. मध्य प्रदेश के उलट राजस्थान में इन दोनों ही नेताओं को चुनाव लड़ने के लिए कह दिया गया है.
  • राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनावों में फोन बांटने का खेल क्या है?
    हमारे वक्त की राजनीति को सिर्फ नारों से नहीं समझा जा सकता है. इतना कुछ नया हो रहा है कि उसके अच्छे या बुरे के असर के बारे में ठीक-ठीक अंदाज़ा लगाना मुश्किल हो रहा है. समझना मुश्किल हो रहा है कि सरकार जनता के लिए काम कर रही है या चंद उद्योगपतियों के लिए.
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