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चुनावी ब्लॉग

  • अखिलेश शर्मा की कलम से : अभी खत्म नहीं हुआ बिहार चुनाव
    पहले दो चरण के मतदान के बाद नीतीश कुमार के शपथग्रहण की तैयारियाँ शुरू कर दीं गई हैं। विश्लेषक भी इस आकलन से सहमत नजर आ रहे हैं। लेकिन क्या ज़मीनी हकीकत वाकई ऐसी है?
  • रवीश कुमार : इस वक्त बिहार चुनाव से भी अहम हैं एर्नाकुलम के पंचायत चुनाव...
    केरल में जो हो रहा है, वह सामान्य घटना नहीं है। कंपनियां अगर कॉरपोरेट सामाजिक दायित्व के तहत किए जाने वाले कार्यों के बदले पंचायतों पर कब्ज़ा कर लें तो क्या होगा। कंपनी के प्रभुत्व वाले कॉरपोरेट के साथ राजनीतिक दल कैसे बर्ताव करेंगे।
  • रवीश कुमार : सैय्यद अयान इमाम मुस्लिम नहीं सिर्फ खिलाड़ी है...
    अयान पटना ज़िला शेरपुर की महिला वॉलीबॉल टीम की एक मात्र मुस्लिम खिलाड़ी है। अंडर- 19 की टीम में सारी खिलाड़ी उससे बड़ी हैं, जिन्हें अयान दीदी कहती है।
  • उमाशंकर सिंह : वोट काटने में जुटे नेताओं को परवाह नहीं गंगा के कटाव की
    खरही के ऊंचे पौधों के बीच संकरी कच्ची सड़क पर जब हम आगे बढ़े तो हमें भाड़े की बोलेरो गाड़ी किसी वरदान से कम नहीं लगी। आमतौर पर शहरों को जोड़ने वाली सड़क की शानदार हालत मुख्य सड़क से हटते ही थोड़ी पतली हो जाती है। ग्रामीण सड़कों की हालत चमचमाते हाईवेज़ से उलट है।
  • बिहार : यादव या भूमिहार!
    हमारे राजनीतिक दलों में गजब की क्षमता है। कभी वे सबको हिन्दू-मुसलमान खेमे में गोलबंद कर देते हैं तो कभी अलग-अलग जातियों को बांट देते हैं। बिहार चुनाव ने पूरे जनमत को जाति के फ्रेम में कैद कर दिया है।
  • बिहार : क़स्बों का शहर होना और शहर का कस्बा बने रहना
    बिहार के कस्बाई चरित्र के शहरों में आकांक्षाएं खौल रही हैं, उनका भाप इन बेतरतीब शहरों में निकल नहीं पा रहा है। जैसे तसले के भीतर चावल का पानी तो खौल रहा है लेकिन ढक्कन के कारण एक बार में बाहर नहीं आ पा रहा है।
  • दिखी बदलाव की बयार, अगर साइकिल न होती तो न होता यह बिहार
    बिहार में बाइक-सवार लड़कियां कम दिखती हैं, मगर गली-गली में साइकिल-सवार लड़कियों को देख लगता है कि काफी कुछ बदला है। हमारी राजनीति शायद लड़कियों के बदलाव को बदलना नहीं मानती, मगर आप किसी भी सड़क पर झुंड में या अकेले साइकिल चलाती लड़कियों को देख गदगद हो सकते हैं।
  • बिहार का स्टिंग - राजनीति की पिक्चर का पूरा सच
    ऐसे स्टिंग तो बानगी हैं, और पूरी पिक्चर तो सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर काले धन को लेकर गठित समिति द्वारा राजनेता-माफिया-अपराध के गठजोड़ के विस्तृत विवरण के माध्यम से पहले ही उपलब्ध है।
  • आरा का औरंगज़ेब और उसका दोस्त राहुल
    पीले टी शर्ट में मोहम्मद औरंगजेब है और हल्के नीले रंग वाला राहुल। औरंगज़ेब कम बोलता है और राहुल बहुत अच्छा बोलता है। राहुल खुल कर औरंगजेब से ठिठोली कर लेता है और औरंगज़ेब राहुल की ठिठोली पर चुपके से हंस लेता है।
  • सुधीर जैन : बिहार चुनाव के 'ग्रीन रूम' की अटकलें
    बिहार में चुनावी मंच सजा है। मंच से अलग वह कमरा भी जरूर होगा जहां पात्र सजते-संवरते हैं और डायलॉग की प्रेक्टिस की जाती है। राजनीति में भी ग्रीन रूम होता है। वहां बस एक फर्क दिखता है कि पात्रों से ज्यादा कथा लेखकों और चुनावी विद्वानों का प्रभुत्व रहता है। वे ही तय करते हैं कि चुनावी मंच पर क्या बोला जाना है?
  • सुशील महापात्रा की कलम से : बिहार के चुनावी शोर में महंगाई का मुद्दा गायब
    बिहार के चुनाव में रोज नेताओं के भाषण और बयानबाजी हैडलाइन बन रहे हैं। ऐसा लग रहा है कि नेताओं के भाषण बिहार का भविष्य तय करने वाले हैं। हर मुद्दे पर नेता बात कर रहे हैं लेकिन जिस मुद्दे पर सबसे ज्यादा बात करना चाहिए वह मुद्दा चुनावी सरगर्मियां से गायब है। यह मुद्दा है महंगाई का।
  • निधि का नोट : सही नीयत के इंतजार में बिहार...
    बिहार में विधानसभा के चुनाव चल रहे हैं और इसी सरगरमी के बीच मुझे यहां एक बार फिर जाने का मौका मिल गया। पिछले साल लोकसभा चुनावों में पंजाब की बजाय बिहार को चुना था। एक उत्सुक्ता थी उस राज्य को समझने की जिसे कई मापदंडों में पिछड़ा हुआ बताया गया।
  • बिहार की बेचैनियां ही उसकी खुशियां हैं
    बिहार कसमसा रहा है। भीतर से बेचैन है और बाहर से शांत। शोर वह कर रहा है जो संसाधन, सत्ता और राजनीति के नेटवर्क से जुड़ा है। ऐसे लोग ही अपनी सत्ता को लेकर बेचैन हैं। जो संसाधनों और संपर्कों के नेटवर्क से वंचित है, वह चुप है।
  • सुशील महापात्रा की नजर से : क्या कहते हैं पटना के पोस्टर
    इन दिनों यदि आप बिहार की राजधानी पटना पहुंचें तो वहां कुछ अलग सा बदला हुआ शहर नजर आएगा। अलग-अलग रंगीन पोस्टरों ने पटना को अपने कब्जे में ले लिया है।
  • मनीष शर्मा की नज़र से: आखिर क्यों हैं नीतीश सबकी पहली पसंद ?
    सन 2005 में नीतीश कुमार पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने। तभी से उन्होंने बिहार के चार मुख्य वर्गों- महिलाओं, अति पिछड़ा वर्ग, महा दलित और अल्पसंख्यकों से जुड़ी समस्याओं की तरफ ध्यान दिया और समय-समय पर उनको सशक्त बनाने के लिए कदम उठाए।
  • उमाशंकर सिंह का ब्लॉग : लालू क्या विपक्ष में बैठने के लिए लड़ रहे हैं?
    बिहार चुनाव में बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि बीजेपी की जीत की रणनीति को कहीं लालू की राजनीति और आसान तो नहीं कर रही? ये सवाल इसलिए क्योंकि लालू की राजनीतिक व्यवहार और उनके बयानों के कई पहलु ऐसा सोचने को मजबूर कर रहे हैं।
  • बिहार की चुप्पी और चुप्पी की बोली!
    बिहार का मतदाता बोल नहीं रहा है। सोच रहा है। एक राजनेता की सभा में मंच की सुरक्षा कर रहे कमांडो को पानी देते हुए पूछा कि आप तो कई जगहों पर जाते होंगे क्या महसूस करते हैं। कमांडो ने बिना आंखे मटकाये कहा कि सर, मोहभंग हो गया है। किससे? दोनों से। क्यों ?
  • मनीष शर्मा की नजर से : बिहार में किसकी सरकार ?
    दिवाली से ठीक तीन दिन पहले 8 नवंबर को बिहार को उसका मुख्यमंत्री मिल जाएगा। चुनाव से पहले कई गठबंधन बन चुके हैं। महागठबंधन, एनडीए, समाजवादी पार्टी का तीसरा मोर्चा, लेफ्ट की 6 पार्टियों के बीच मुकाबला चल रहा है।
  • बिहार की चुनावी जंग में हावी हो रहा आरक्षण का मुद्दा
    बिहार के चुनावी जंग में आरक्षण का मुद्दा फिर हावी होता दिख रहा है। गुरूवार को शरद यादव ने बीजेपी पर आरोप लगाया कि आरएसएस प्रमुख के बयान से आरक्षण के दायरे में आने वाले लोगों में असुरक्षा का माहौल है। उधर बीजेपी ने महागठबंधन पर समाज में जहर फैलाने का आरोप लगा दिया।
  • राजनीति में कब, कौन बदल जाए, कहना मुश्किल
    कभी एक दूसरे की हमेशा टांग खींचते रहने वाले, कभी राजनीति में धुर विरोधी रहने वाले आज कदम से कदम मिलाकर चल रहे हैं। बिहार की जनता ने शायद कभी ये सोचा भी नहीं होगा कि लालू यादव और नीतीश कुमार कभी मंच साझा भी करेंगे। मगर, राजनीति में कब, कौन, कहां और कैसे बदल जाएगा यह कह पाना बहुत मुश्किल है।
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