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चुनावी ब्लॉग

  • आरा का औरंगज़ेब और उसका दोस्त राहुल
    पीले टी शर्ट में मोहम्मद औरंगजेब है और हल्के नीले रंग वाला राहुल। औरंगज़ेब कम बोलता है और राहुल बहुत अच्छा बोलता है। राहुल खुल कर औरंगजेब से ठिठोली कर लेता है और औरंगज़ेब राहुल की ठिठोली पर चुपके से हंस लेता है।
  • सुधीर जैन : बिहार चुनाव के 'ग्रीन रूम' की अटकलें
    बिहार में चुनावी मंच सजा है। मंच से अलग वह कमरा भी जरूर होगा जहां पात्र सजते-संवरते हैं और डायलॉग की प्रेक्टिस की जाती है। राजनीति में भी ग्रीन रूम होता है। वहां बस एक फर्क दिखता है कि पात्रों से ज्यादा कथा लेखकों और चुनावी विद्वानों का प्रभुत्व रहता है। वे ही तय करते हैं कि चुनावी मंच पर क्या बोला जाना है?
  • सुशील महापात्रा की कलम से : बिहार के चुनावी शोर में महंगाई का मुद्दा गायब
    बिहार के चुनाव में रोज नेताओं के भाषण और बयानबाजी हैडलाइन बन रहे हैं। ऐसा लग रहा है कि नेताओं के भाषण बिहार का भविष्य तय करने वाले हैं। हर मुद्दे पर नेता बात कर रहे हैं लेकिन जिस मुद्दे पर सबसे ज्यादा बात करना चाहिए वह मुद्दा चुनावी सरगर्मियां से गायब है। यह मुद्दा है महंगाई का।
  • निधि का नोट : सही नीयत के इंतजार में बिहार...
    बिहार में विधानसभा के चुनाव चल रहे हैं और इसी सरगरमी के बीच मुझे यहां एक बार फिर जाने का मौका मिल गया। पिछले साल लोकसभा चुनावों में पंजाब की बजाय बिहार को चुना था। एक उत्सुक्ता थी उस राज्य को समझने की जिसे कई मापदंडों में पिछड़ा हुआ बताया गया।
  • बिहार की बेचैनियां ही उसकी खुशियां हैं
    बिहार कसमसा रहा है। भीतर से बेचैन है और बाहर से शांत। शोर वह कर रहा है जो संसाधन, सत्ता और राजनीति के नेटवर्क से जुड़ा है। ऐसे लोग ही अपनी सत्ता को लेकर बेचैन हैं। जो संसाधनों और संपर्कों के नेटवर्क से वंचित है, वह चुप है।
  • सुशील महापात्रा की नजर से : क्या कहते हैं पटना के पोस्टर
    इन दिनों यदि आप बिहार की राजधानी पटना पहुंचें तो वहां कुछ अलग सा बदला हुआ शहर नजर आएगा। अलग-अलग रंगीन पोस्टरों ने पटना को अपने कब्जे में ले लिया है।
  • मनीष शर्मा की नज़र से: आखिर क्यों हैं नीतीश सबकी पहली पसंद ?
    सन 2005 में नीतीश कुमार पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने। तभी से उन्होंने बिहार के चार मुख्य वर्गों- महिलाओं, अति पिछड़ा वर्ग, महा दलित और अल्पसंख्यकों से जुड़ी समस्याओं की तरफ ध्यान दिया और समय-समय पर उनको सशक्त बनाने के लिए कदम उठाए।
  • उमाशंकर सिंह का ब्लॉग : लालू क्या विपक्ष में बैठने के लिए लड़ रहे हैं?
    बिहार चुनाव में बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि बीजेपी की जीत की रणनीति को कहीं लालू की राजनीति और आसान तो नहीं कर रही? ये सवाल इसलिए क्योंकि लालू की राजनीतिक व्यवहार और उनके बयानों के कई पहलु ऐसा सोचने को मजबूर कर रहे हैं।
  • बिहार की चुप्पी और चुप्पी की बोली!
    बिहार का मतदाता बोल नहीं रहा है। सोच रहा है। एक राजनेता की सभा में मंच की सुरक्षा कर रहे कमांडो को पानी देते हुए पूछा कि आप तो कई जगहों पर जाते होंगे क्या महसूस करते हैं। कमांडो ने बिना आंखे मटकाये कहा कि सर, मोहभंग हो गया है। किससे? दोनों से। क्यों ?
  • मनीष शर्मा की नजर से : बिहार में किसकी सरकार ?
    दिवाली से ठीक तीन दिन पहले 8 नवंबर को बिहार को उसका मुख्यमंत्री मिल जाएगा। चुनाव से पहले कई गठबंधन बन चुके हैं। महागठबंधन, एनडीए, समाजवादी पार्टी का तीसरा मोर्चा, लेफ्ट की 6 पार्टियों के बीच मुकाबला चल रहा है।
  • बिहार की चुनावी जंग में हावी हो रहा आरक्षण का मुद्दा
    बिहार के चुनावी जंग में आरक्षण का मुद्दा फिर हावी होता दिख रहा है। गुरूवार को शरद यादव ने बीजेपी पर आरोप लगाया कि आरएसएस प्रमुख के बयान से आरक्षण के दायरे में आने वाले लोगों में असुरक्षा का माहौल है। उधर बीजेपी ने महागठबंधन पर समाज में जहर फैलाने का आरोप लगा दिया।
  • राजनीति में कब, कौन बदल जाए, कहना मुश्किल
    कभी एक दूसरे की हमेशा टांग खींचते रहने वाले, कभी राजनीति में धुर विरोधी रहने वाले आज कदम से कदम मिलाकर चल रहे हैं। बिहार की जनता ने शायद कभी ये सोचा भी नहीं होगा कि लालू यादव और नीतीश कुमार कभी मंच साझा भी करेंगे। मगर, राजनीति में कब, कौन, कहां और कैसे बदल जाएगा यह कह पाना बहुत मुश्किल है।
  • बिहार चुनाव में बढ़ता जा रहा बगावत के बिगुल का शोर
    बिहार में भी इस बार पार्टियों की सबसे बड़ी चिंता अपने बागियों को काबू में रखना है। चाहे महागठबंधन हो या फिर एनडीए, हर जगह बागी ताल ठोककर खड़े हैं।
  • बाबा की कलम से : बिहार चुनाव में भाई-भतीजावाद, दामादों का दम कम
    बिहार चुनाव में दामादों की पूछ कम होने से रिश्तों पर असर होता दिख रहा है। वैसे तो बिहार और बंगाल में दामादों की खातिरदारी खूब होती है, मगर चुनाव तो चुनाव है, यहां सब जायज होता है।
  • सुशांत सिन्हा का ब्लॉग : बिहार विधानसभा चुनाव का 'दलित फैक्टर'
    बिहार में चुनावी आंच पर मुद्दों की हांडी तो चढ़ा दी गई है लेकिन अभी यही नहीं तय हो पाया है कि पकेगा क्या और हांडी में क्या कितना डलेगा... मतलब बीजेपी और उसके सहयोगी दल न तो सीएम पद के उम्मीदवार का नाम तय कर पाए हैं और न ही यह कि कौन कितनी सीट पर लड़ेगा।
  • राजीव पाठक : जंगलराज के बावजूद लालू यादव क्यों अब भी हैं पिछड़ों के मसीहा
    सबसे पहले तो मैं ये बताना चाहता हूं कि ये ब्लॉग लिखने की वजह यह है कि मैं एक नॉन-रेसिडेंट बिहारी हूं। विदेश में नहीं, बल्कि गुजरात के अहमदाबाद में रहता हूं। हर थोड़े वक्त पर बिहार जाता रहता हूं, इसलिए शायद बिहार की बदलती तस्वीर को ज्यादा अच्छी तरह से महसूस कर पाता हूं।
  • सुशांत सिन्‍हा का ब्‍लॉग : गड़बड़ा गया है बिहार चुनाव का DNA
    किसी चुनाव का DNA क्या होता होगा? ये सवाल यूं ही तो मन में नहीं आया। दरअसल आजकल बिहार चुनाव में इतना DNA-DNA हो रहा है कि ये सवाल भी बिन बुलाए मेहमान की तरह टपक पड़ा।
  • मैं बिहार हूं, मेरे लिए किसकी झोली में क्‍या?
    मैं बिहार हूं......हूं तो हूं.... मैं जो था वही हूं जो हूं वही रहूंगा। बिहार क्या है, कौन है बिहार? दरअसल ये सवाल ही क्यों है कि किसका है बिहार। ऐलान ही तो हुआ है कि पांच चरणों में मुझे लेकर चुनाव होंगे।
  • आखिर मुलायम सिंह यादव को इतना गुस्सा क्यों आता है...
    समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव इन दिनों नाराज चल रहे हैं। हर राजनीतिक व्यक्ति इन दिनों इसी सवाल का जवाब खोज रहा हैं कि 'नेताजी' को गुस्सा क्यों आता है।
  • बदला, बदला और बदला... बस यही होगा बिहार में चुनावी मुद्दा
    बिहार विधानसभा चुनावों की अधिसूचना अब किसी भी दिन चुनाव आयोग की घोषणा के साथ जारी हो सकती है। इस देश में हर राजनीतिक दल, हर राजनेता, हर राजनीतिक कार्यकर्ता को बस बिहार के चुनाव के परिणाम का इंतजार है।
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