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    2018 Assembly Elections All Your Questions Answered

    इस चुनाव, यानी लोकसभा चुनाव 2019 में कितने लोग वोट देने के पात्र हैं...?

    इस चुनाव में 80 करोड़ से ज़्यादा मतदाता अपने अधिकार का इस्तेमाल करने के पात्र हैं. मतदाता सूची को अंतिम रूप देने के बाद चुनाव आयोग इस साल के लिए मतदाताओं की सटीक संख्या जारी करेगा. 2014 में हुए आम चुनाव में 83.4 करोड़ मतदाता वोट देने के पात्र थे.

    हालांकि वोट देने वाले लोगों की वास्तविक संख्या इस संख्या से कहीं कम होती है.

    भले ही वर्ष 2014 में हुए आम चुनाव में स्वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे ज़्यादा 66.4 प्रतिशत मतदान हुआ था, जिसका अर्थ यह हुआ कि लगभग 28 करोड़ लोगों ने वोट नहीं दिया था.

    क्यों वोट नहीं दिया था...? आपको बता दें कि इसके पीछे मतदाताओं की उदासीनता से लेकर प्रवास समेत कई कारण हो सकते हैं.

    लोग किसलिए वोट देंगे...?

    यह चुनाव 17वीं लोकसभा को चुनेगा. भारतीय जनता देशभर में 543 लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों के प्रतिनिधियों का चुनाव करेगी. उसके बाद सबसे बड़ी पार्टी या गठबंधन के सदस्य प्रधानमंत्री का चुनाव करेंगे. लोकसभा, हमारी द्विसदनीय संसद का निचला सदन है, जबकि राज्यसभा को उच्च सदन कहा जाता है.

    क्या लोकसभा चुनाव के विजेता के चयन में राज्य विधानसभा के पिछले चुनाव का असर पड़ता है...?

    हां... आंकड़े दर्शाते हैं कि यदि लोकसभा चुनाव राज्य में हुए विधानसभा चुनाव के एक साल के भीतर ही हो जाते हैं, तो लगभग हमेशा वही पार्टी लोकसभा चुनाव में आगे रहती है, जो राज्य विधानसभा का चुनाव जीती थी, लेकिन यदि दोनों चुनाव की समयावधि इससे ज़्यादा होती है, तो ऐसी संभावना कम हो जाती है.

    इसका अर्थ यह हुआ कि कर्नाटक, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, मिज़ोरम, राजस्थान और तेलंगाना, जहां भी लोकसभा चुनाव से कुछ ही समय पहले विधानसभा चुनाव हुए हैं, वहां मतदाताओं द्वारा वैसे ही रुझान प्रदर्शित करने की संभावना है, जैसे विधानसभा चुनाव के परिणामों में देखने को मिले थे.

    इसके अलावा स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजों से भी मतदाताओं के रुझान का काफी हद तक अंदाज़ा लगाया जा सकता है.

    थिंक टैंक ब्रुकिंग्स इंडिया के साथ विदेश नीति विशेषज्ञ के रूप में काम करने वाले ध्रुव जयशंकर की वर्ष 2018 के अंत में की गई एक गणना के अनुसार, यदि सभी राज्यों की जनता ने अपने राज्य में हुए पिछले विधानसभा चुनाव की तरह ही मतदान किया, तो भारतीय जनता पार्टी (BJP) की अगुवाई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन, यानी NDA के हिस्से में 207 सीटें आएंगी, जबकि कांग्रेस की अगुवाई वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन, यानी UPA को 163 सीटें मिल सकती हैं. गौरतलब है कि लोकसभा में बहुमत का आंकड़ा 272 सीटों का है.

    इस बार चुनाव में कौन से मुद्दे अहम हैं...?

    मोटे तौर पर यह कह पाना कठिन होता है कि किसी चुनाव के नतीजों को प्रभावित करने वाले कारक क्या होंगे, लेकिन मोटे तौर पर निम्नलिखित मुद्दों के बारे में चुनाव प्रचार के दौरान आपको सुनने को मिल सकता है.

    राष्ट्रीय सुरक्षा : पुलवामा आतंकवादी हमले के बाद पाकिस्तान के साथ हुए संघर्ष तथा दोनों के बीच रिश्तों में बढ़े तनाव ने राष्ट्रीय सुरक्षा को चुनावी मुद्दों के केंद्र में लाकर खड़ा कर दिया है. इसके बाद पाकिस्तान के बालाकोट में आतंकियों के ठिकानों पर भारतीय हवाई हमले से लेकर पाकिस्तान द्वारा जम्मू एवं कश्मीर में सैन्य ठिकानों पर हमले के लिए युद्धक विमान भेजे जाने तक की परिस्थितियों से निपटने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदमों की बारीक समीक्षा की जा रही है. एक तरफ विपक्ष आरोप लगा रहा है कि BJP ने सेना की बहादुरी का राजनीतिकरण किया है, जिसकी वजह से ज़्यादा नुकसान हुआ, वहीं सत्ता पक्ष का कहना है कि आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए सेना को अभूतपूर्व छूट दी गई.

    किसान : पिछले कुछ महीनों के दौरान किसानों ने देशभर में कई बड़े आंदोलन किए. राज्य और केंद्र सरकारों से कर्ज़माफी से लेकर फसल के बेहतर दामों और बुनियादी ढांचों की मांगों को लेकर किसान सड़कों पर उतरे.

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2022-23 तक किसानों की आय दोगुनी करने का वादा किया है, तथा विपक्षी दलों की राज्य सरकारों ने किसानों के कर्ज़ माफ करने के लिए बड़े-बड़े पैकेज जारी किए हैं. इससे साफ ज़ाहिर है कि दोनों ही पक्ष किसानों के मतों की महत्ता को समझते हैं.

    बेरोज़गारी : कुछ रिपोर्ट्स में सामने आया कि भारत में बेरोज़गारी का आंकड़ा चार दशक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है, और ऐसी भी रिपोर्ट आईं, जिनके मुताबिक सिर्फ वर्ष 2018 के दौरान भारत में एक करोड़ से ज़्यादा नौकरियां कम हो गईं - सो, नौकरियां (या उनका न होना) आम चुनाव 2019 में बड़ा मुद्दा बन सकती हैं.

    माना जा रहा है कि सत्तारूढ़ BJP सामान्य वर्ग के लोगों को जाति-धर्म के बंधन के बिना आर्थिक आधार पर दिए गए 10 फीसदी आरक्षण के साथ-साथ उसके द्वारा स्व-रोज़गार और उद्यमिता बढ़ाए जाने के लिए उठाए गए कदमों का प्रचार कर सकती है, जबकि विपक्ष बेरोज़गारी के आंकड़ों के साथ पलटवार करेगा, और PM नरेंद्र मोदी को करोड़ों नौकरियां देने के उनके वादे याद दिलाएगा.

    गरीबी : हाल ही में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों में बेरोज़गारी और कृषि संकट के अलावा ग्रामीण स्तर पर गरीबी भी अहम मुद्दा बनकर उभरी. तीनों राज्यों के चुनाव परिणामों के आंकड़ों से ज़ाहिर है कि ग्रामीण वोट सत्तारूढ़ BJP से दूर गए. यह कतई निश्चित नहीं है कि मतदाओं में यह प्रवृति बरकरार रहेगी, लेकिन अब गरीबी से उबारने के सरकार के प्रयासों से गांव के (और शहरों के भी) लोग कितने संतुष्ट हैं, यह बात लोकसभा चुनाव के नतीजों को ज़रूर प्रभावित करेगी.

    व्यापार : वस्तु एवं सेवा कर (गुड्स एंड सर्विसेज़ टैक्स), यानी GST के रूप में भारतीय कर व्यवस्था में आए बदलाव से व्यापार का प्रभावित होना तथा वर्ष 2016 मे अंत में बड़े करेंसी नोटों (1,000 तथा 500 रुपये) को अचानक बंद किया जाना इस साल बड़ा चुनावी मुद्दा ज़रूर बनेंगे.

    हालांकि केंद्र में सत्तासीन BJP अपनी बात पर अडिग है, और लगातार यही कहती आ रही है कि उसके द्वारा उठाए गए कदम अर्थव्यवस्था के लिए फायदेमंद हैं, असल सवाल यह है कि छोटे तथा मझोले दर्जे के व्यापारी तथा मध्यम वर्ग उनकी पार्टी पर भरोसा करता है या नहीं.

    भ्रष्टाचार : एक तरफ BJP वर्ष 2014 से पहले कांग्रेस-नीत UPA सरकार के आखिरी सालों के दौरान उठे भ्रष्टाचार के मुद्दे जनता को याद दिलाएगी, तो दूसरी ओर विपक्ष राफेल विमान सौदे में अपने आरोपों के साथ पलटवार करेगा, और जनता को याद दिलाएगा कि सरकार अपने 'घनिष्ठ कारोबारी मित्रों' के व्यापार को बढ़ाने की कोशिश कर रही है.

    राम मंदिर : लगभग 80 फीसदी हिन्दू आबादी वाले मुल्क में हिन्दुओं द्वारा सबसे ज़्यादा पूजे जाने वाले देवताओं में से एक का मंदिर उत्तर प्रदेश के अयोध्या में उस स्थान पर बने या नहीं, जहां 16वीं सदी में बनाई एक मस्जिद को ढहाया गया था, मुख्य चुनावी मुद्दों में से एक है.

    राष्ट्रवाद और उदारवाद : दोनों में से किस 'वाद' के मतदाता अपने 'वाद' के पक्ष में ज़्यादा मज़बूती से सोचते हैं, यही आम चुनाव 2019 में निर्णायक कारक होगा. पिछले कई महीनों में लोगों की शिकायत रही है कि आइडेंटिटी पॉलिटिक्स में बढ़ोतरी देखने को मिली है, और साथ ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को खतरा पैदा हुआ है तथा असहिष्णुता बढ़ रही है.

    आदर्श आचार संहिता क्या है और यह कब लागू होती है...?

    आदर्श आचार संहिता वे दिशा-निर्देश हैं, जिनका पालन चुनावों को निष्पक्ष बनाए रखने के लिए प्रत्याशियों, राजनीतिक दलों और सरकारों को करना होता है. इनमें आमतौर ऐसी सरकारी घोषणाओं और मुफ्त बांटी जाने वाली सामग्री पर पाबंदियां होती हैं, जो मतदाताओं को प्रभावित कर सकती हैं.

    चुनाव आयोग द्वारा चुनाव की तारीखों के ऐलान के साथ ही आदर्श आचार संहिता लागू हो जाती है.

    EVM क्या है...? VVPATs क्या हैं...?

    वोट दर्ज करने के इलेक्ट्रॉनिक उपकरण को इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन, यानी EVM कहते हैं. इसमें दो इकाइयां होती हैं. एक के माध्यम से वोट दर्ज कराए जाते हैं, जिसे मतदान इकाई कहते हैं, जबकि दूसरे से इसे नियंत्रित किया जाता है, जिसे कंट्रोल यूनिट कहा जाता है. नियंत्रण इकाई मतदान अधिकारी के पास होती है, वहीं मतदाता इकाई मतदान कक्ष के भीतर रखी जाती है.

    वर्ष 2010 से ही निर्वाचन आयोग EVM में तीसरी इकाई VVPAT, यानी वोटर वेरिफाएबल पेपर ऑडिट ट्रेल को चरणबद्ध तरीके से जोड़ रहा है, जिसके ज़रिये मतदाता को एक रसीद हासिल होती है, जिससे यह पता चल जाता है कि उसका वोट सही प्रत्याशी के नाम दर्ज हुआ है या नहीं. आगामी आम चुनाव तथा विधानसभा चुनावों सभी EVM में VVPAT का इस्तेमाल किया जाएगा.

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    क्या EVM पर भरोसा किया जा सकता है...?

    चुनाव आयोग का कहना है कि EVM से छेड़छाड़ संभव नहीं है और यह बिल्कुट सटीक है.

    पिछले कुछ सालों में EVM पर कई बार सवाल उठाए जाते रहे हैं. ज़्यादातर मौकों पर EVM को लेकर सवाल उन्हीं पार्टियों ने उठाए हैं, जो चुनाव हार गईं (हालांकि चुनाव जीतने पर यही पार्टियां इसी तरह के सवालों को जवाब नहीं देती हैं).

    चुनाव आयोग ने इस संदर्भ में लोगों के सभी संदेहों को दूर करने के लिए पिछले साल 'हैकेथॉन' का आयोजन किया था, लेकिन इसके बाद भी EVM को एक खास पक्ष में इस्तेमाल किए जाने के आरोप सामने आते रहे.

    भारत में मतदाताओं की बहुत बड़ी संख्या को देखते हुए EVM को छोड़ देने की संभावना बेहद कम है. विशेषज्ञों का कहना है कि मतपेटियों की तुलना में EVM में गड़बड़ियों के अवसर कम होते हैं, क्योंकि मतपेटियों को चुरा लेने, बदल दिए जाने और नष्ट कर देने की ख़बरें आम हुआ करती थीं.

    चुनाव आयोग ने मतपत्र के स्थान पर EVM का इस्तेमाल कब शुरू किया था...? EVM से मतदान के बाद मतगणना में कितना समय लगता है...?

    EVM का पहली बार इस्तेमाल मई, 1982 में केरल के परूर विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र में हुए उपचुनाव के दौरान 50 मतदान केंद्रों पर किया गया था. बड़े पैमाने पर EVM का पहली बार इस्तेमाल वर्ष 1998 में किया गया था. जब मध्य प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली की 16 विधानसभा सीटों पर EVM का इस्तेमाल किया गया. वर्ष 2004 का लोकसभा चुनाव ऐसा पहला चुनाव था, जब पूरे देश के सभी केंद्रों पर EVM का इस्तेमाल किया गया.

    EVM ने मतगणना की प्रक्रिया को कहीं-कहीं तो 10 गुणा तेज़ कर दिया है. पहले प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में मतपत्रों की गिनती का काम 30 से 40 घंटे तक चला करता था, लेकिन अब रुझान और परिणाम दो से तीन घंटों में ही मिल जाते हैं.

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    NOTA क्या है और इसे वोटिंग मशीन में विकल्प के रूप में पहली बार कब इस्तेमाल किया गया...? किस राज्य में अब तक सबसे ज़्यादा NOTA वोट डाले गए हैं...?

    NOTA का अर्थ है - नन ऑफ द एबव, यानी इनमें से कोई नहीं. EVM पर यह मतदान का विकल्प है, जो मतदाताओं को उनके निर्वाचन क्षेत्र में हर उम्मीदवार को अस्वीकार करने की अनुमति देता है. इसे सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अक्टूबर, 2013 में शुरू किया गया था. 

    वर्ष 2018 में हुए विधानसभा चुनाव में, गुजरात में 1.8 प्रतिशत NOTA वोट डाले गए, जो दूसरी सबसे बड़ी संख्या है, जबकि बिहार 2.48 फीसदी NOTA मतों के साथ शीर्ष पर रहा है.

    अगर NOTA वोटों की संख्या मुख्य पार्टियों को मिले वोटों की संख्या से ज़्यादा हो, तो क्या होगा...?

    चुनाव आयोग के अनुसार, भले ही NOTA चुनने वाले मतदाताओं की संख्या किसी भी उम्मीदवार के वोटों की संख्या से अधिक हो, जिस उम्मीदवार को सबसे ज़्यादा वोट मिलेंगे, उसे निर्वाचित घोषित करना होगा.

    अगर मुझे मतदाता सूची में अपना नाम नहीं मिल रहा हो, तो मैं क्या करूं, किसके पास मदद के लिए जाऊं...?

    आप अपने निकटतम चुनाव आयोग कार्यालय से संपर्क कर सकते हैं या राष्ट्रीय मतदाता सेवा पोर्टल, यानी www.nvsp.in पर जा सकते हैं.

    अगर मेरे पास वोटर आईडी कार्ड (मतदाता पहचानपत्र) नहीं है, तो क्या होगा...? मैं अपना पंजीकरण कैसे करूं...? क्या मैं ऑनलाइन पंजीकरण भी कर सकता हूं...?

    भले ही आपके पास वोटर आईडी कार्ड नहीं है, तो भी आप सरकार द्वारा जारी अधिकतर फोटो पहचानपत्रों की मदद से मतदान कर सकते हैं. इनमें शामिल हैं -

    • पासपोर्ट
    • ड्राइविंग लाइसेंस
    • केंद्र या राज्य सरकार द्वारा संचालित कंपनियों के कर्मचारियों को जारी किए गए फोटोयुक्त सेवा पहचानपत्र
    • बैंक या डाकघर द्वारा जारी की गई फोटोयुक्त पासबुक
    • पैन (PAN) कार्ड
    • राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर के तहत भारत के रजिस्ट्रार जनरल (RGI) द्वारा जारी किया गया स्मार्टकार्ड
    • मनरेगा (MNREGA) जॉब कार्ड
    • श्रम मंत्रालय की योजना के अंतर्गत जारी स्वास्थ्य बीमा स्मार्ट कार्ड
    • तस्वीर के साथ पेंशन दस्तावेज़
    • चुनाव मशीनरी द्वारा जारी की गई प्रमाणित फोटोयुक्त मतदाता पर्ची
    • सांसदों या विधायकों को जारी किए गए आधिकारिक पहचानपत्र
    • आधार कार्ड

    अगर आपके पास इनमें से कुछ भी नहीं है, तो आप एक वोटर आईडी कार्ड के लिए ऑफलाइन और ऑनलाइन, दोनों तरीकों से पंजीकरण कर सकते हैं.

    ऑफलाइन रजिस्ट्रेशन के लिए आपको राज्य चुनाव कार्यालय जाना होगा और फॉर्म 6 मांगना होगा. फॉर्म में ज़रूरी जानकारी भरने तथा सभी संबद्ध दस्तावेज़ देने के बाद आप उसे जमा करा देंगे, ताकि आपको उचित समयावधि के भीतर वोटर आईडी कार्ड जारी किया जा सके.

    ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन के लिए आपको राष्ट्रीय मतदाता सेवा पोर्टल, यानी www.nvsp.in पर जाना होगा.

    क्या कोई मौजूदा विधायक किसी लोकसभा सीट पर चुनाव लड़ सकता है...? क्या वह दोनों पदों पर बना रह सकता है...?

    हां, एक विधायक भारत में संसदीय चुनाव लड़ सकता है. हालांकि, जीतने की स्थिति में दोहरी सदस्यता प्रतिबंध नियम, 1950 के अंतर्गत, उन्हें लोकसभा चुनाव के परिणाम घोषित होने के 14 दिन के भीतर विधानसभा सदस्य के पद से इस्तीफा देना होगा. इसीलिए, वे दोनों पदों पर एक साथ नहीं रह सकते.

    क्या मैं मताधिकार के लिए अपने आधार कार्ड का उपयोग कर सकता हूं...?

    हां, यदि आपका नाम मतदाता सूची में है, तो आप मतदान केंद्र जाकर पहचानपत्र के रूप में आधार कार्ड दिखाकर वोट डाल सकते हैं.

    क्या प्रवासी भारतीयों (NRI) के पास मताधिकार होता है...?

    हां, यदि उन्होंने किसी अन्य देश की नागरिकता हासिल नहीं की है, और वह भारत में अपने निवास स्थान पर मतदाता के रूप में पंजीकृत होने योग्य हैं.

    क्या मैं पोस्टल बैलट का इस्तेमाल कर मताधिकार का इस्तेमाल कर सकता हूं...?

    पोस्टल बैलेट की व्यवस्था कुछ परिस्थितियों में ही मिलती है. यदि आप सेना या सरकार के लिए काम करते हैं या चुनाव की ड्यूटी के लिए अपने राज्य से बाहर तैनात हैं या आपको 'प्रिवेंटिव डिटेंशन' में रखा गया है.

    बेलवेदर सीटें क्या होती हैं...?

    चुनावी जानकारों के अनुसार 'बेलवेदर' सीटें उन्हें कहा जाता है, जो पिछले (कई) चुनावों में विजेता पार्टी के लिए वोट करती रही हों, इसलिए इन्हें 'आने वाले मौसम' की भविष्यवाणी करने वाली सीटों की उपमा दी जाती हैं. इन सीटों पर चुनाव प्रचार के शुरुआती दिनों तथा मतगणना के दौरान शुरुआती रुझानों से ही मज़बूत संकेत मिल जाते हैं कि चुनाव का नतीजा क्या होगा.