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ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता चौधरी का मत, पुरस्कार वापसी अपरिपक्व कदम

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ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता चौधरी का मत, पुरस्कार वापसी अपरिपक्व कदम

रघुवीर चौधरी

अहमदाबाद: दिग्गज गुजराती साहित्यकार और इस साल के ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता रघुवीर चौधरी ने ‘देश में बढ़ती असहिष्णुता’ को लेकर कुछ अग्रणी लेखकों द्वारा पुरस्कार लौटाने को ‘अपरिपवक्व कदम’ करार दिया और कहा कि इन लेखकों का विरोध करने का तरीका ‘उचित नहीं था।’ चौधरी ने कहा कि लेखक अपने पुरस्कार लौटाने की बजाय सरकार के खिलाफ विरोध दर्ज कराने के लिए दूसरे तरीकों का इस्तेमाल कर सकते थे क्योंकि आज के हालात आपातकाल जैसे नहीं हैं।

मुद्दे को बाढ़ाचढ़ाकर पेश किया
इस 77 वर्षीय लेखक ने कहा, ‘मेरा मानना है कि पुरस्कार लौटाना लेखकों का अपरिपक्व कदम था। हालांकि यह लेखक ध्यान खींचने में सफल रहे, लेकिन एक मुद्दे को इतना बढ़ाचढ़ाकर पेश करना और इस ढंग से विरोध जताना उचित नहीं था। पुरस्कार वापसी में पड़ने की बजाय लेखक के पास विरोध के दूसरे कई रास्ते होते हैं।’ कथित रूप से देश में बढ़ती असहिष्णुता के विरोध में कई लेखकों ने अपने पुरस्कार लौटाए हैं।

चौधरी देश का सर्वोच्च साहित्य पुरस्कार पाने वाले चौथे गुजराती लेखक हैं। उन्हें उनके उपन्यास ‘उपरवास’ के लिए 1977 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था। उन्होंने कहा कि लेखक एक चुनी हुई सरकार को चुनौती देने की बजाय दूसरे माध्यमों से भी अपना विरोध दर्ज करा सकते हैं।

आज के हालात आपातकाल जैसे नहीं
चौधरी ने कहा, ‘लेखक निश्चित तौर पर सरकार की आलोचना कर सकते हैं। वे गिरफ्तारी का भी सामना कर सकते हैं जैसे कि हम में से कई ने अतीत में किया है। परंतु आज के हालात आपातकाल के नहीं है। लोकतंत्र में हमें चुने हुए नेताओं से पद छोड़ने के लिए कहने की बजाय उन्हें अपना कार्यकाल पूरा करने देना चाहिए।’ हाल के महीनों में कुछ लेखकों एवं तर्कवादियों की हत्या के संदर्भ में साहित्य अकादमी की भूमिका के बारे में उन्होंने कहा कि इस संस्था ने कभी दुख प्रकट करने में हिचक नहीं की।

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अकादमी देश नहीं चलाती
गुजराती लेखक ने कहा, ‘अकादमी पुरस्कार लौटाने की घोषणा करने वालों को यह जानना चाहिए कि अकादमी देश नहीं चलाती है। इस पर भी संज्ञान लेना चाहिए कि संविधान में पुरस्कार लौटाने को लेकर कोई प्रावधान नहीं है।’ ज्ञानपीठ चयन बोर्ड ने मंगलवार को ऐलान किया कि चौधरी को 51वां ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया जाएगा।

किसी की भी मातृभाषा की उपेक्षा न हो
चौधरी ने कहा कि किसी की मातृभाषा की उपेक्षा नहीं होनी चाहिए और इसे स्कूलों में अंग्रेजी के साथ पढ़ाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, ‘मेरे विचार से एसएससी (10वीं) तक शिक्षा गुजराती भाषा में होनी चाहिए ताकि युवा पीढ़ी यह जान सके कि हमारी संस्कृति और मूल्य क्या हैं। इसके बाद जरूरत के मुताबिक अंग्रेजी पढ़ाई जा सकती है।’


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