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गुजरात : 'भारतीय मूल्यों' के सत्र में उपस्थित रहने के लिए स्कूलों को सर्कुलर जारी, उठा विवाद

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गुजरात : 'भारतीय मूल्यों' के सत्र में उपस्थित रहने के लिए स्कूलों को सर्कुलर जारी, उठा विवाद

आरएसएस की एनजीओ द्वारा आयोजित सत्र में स्कूल के प्रतिनिधियों ने भाग लिया

अहमदाबाद:

अहमदाबाद के आधा दर्जन स्कूलों के अधिकारियों को आरएसएस द्वारा आयोजित एक सत्र में सिखाया गया की किस तरह स्कूली शिक्षा के जरिए बच्चों के बीच 'भारतीय मूल्यों' को लेकर जागरुकता बढ़ाई जाए। कम उपस्थिति के बावजूद भारतीय शिक्षण मंडल (बीएसएम) द्वारा आयोजित इस तीन घंटे के सत्र ने विवाद खड़ा कर दिया क्योंकि जिला शिक्षा कार्यालय (डीईओ) ने एक सर्कुलर जारी कर स्कूल प्रतिनिधियों से इस ट्रेनिंग कार्यक्रम में उपस्थित रहने के लिए कहा था।

इस कार्यक्रम को सरकार द्वारा मिले समर्थन से कुछ शिक्षकों की भौंहें तन गई हैं और उन्हें सत्र के पीछे एक गुप्त एजेंडा नज़र आ रहा है। शिक्षाविद् हेमंत शाह के मुताबिक 'सरकारी तंत्र का इससे ज्यादा दुरुपयोग क्या होगा और जो सत्ता में हैं वह अपने अधिकार का इस्तेमाल कर रहे हैं जैसे डीईओ स्कूलों से ऐसे कार्यक्रम में हाजिर रहने के लिए कह रहा है जो आरएसएस की एक एनजीओ शाखा द्वारा आयोजित है।'

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'अंग्रेजी क्लास का प्रचार क्यों..'
हालांकि शिक्षा विभाग ने इस सर्कुलर पर किसी तरह की टिप्पणी करने से इंकार कर दिया है लेकिन आयोजकों ने डीईओ द्वारा कार्यक्रम के समर्थन को सही ठहराया है। बीएसएम के सचिव मुकुल कनिटकर के अनुसार 'डीईओ ने हमारी मदद की है। ऐसी अहम वर्कशॉप के बारे में जानकारी देना उनका फर्ज़ है। उन्होंने स्कूलों पर किसी तरह का दबाव तो नहीं डाला। अगर डीईओ कार्यालय अंग्रेजी बोलने की क्लास का प्रचार कर सकता है तो इसका क्यों नहीं।'


उधर विपक्ष में बैठी कांग्रेस ने सरकार और आरएसएस पर निशाना साधा और पार्टी के प्रवक्ता मनीष दोषी ने कहा 'हम कहते आ रहे हैं कि नागपुर के गुप्त एजेंडे का इस्तेमाल हो रहा है जिसका प्रभाव शिक्षा तंत्र खासतौर से स्कूलों पर पड़ रहा है।' गौरतलब है कि नागपुर स्थित बीएसएम संस्था 22 राज्यों और भारत के एक तिहाई से ज्यादा जिलों में काम कर रही है। संस्था का उद्देश्य स्कूलों से लेकर उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रम को बदलकर भारतीय ज्ञान की परंपरा पर आधारित करना है। बीएसएम की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक 'यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अंग्रेज तो भारत से चले गए लेकिन उनकी उपनिवेशी मानसिकता की विरासत यहीं छूट गई जो आज की घातक शिक्षा प्रणाली को अंजाम दे रही है।'



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