इस साल को भुला पाना आसान नहीं होगा इन हस्तियों के लिए...

इस साल को भुला पाना आसान नहीं होगा इन हस्तियों के लिए...

साल 2015 में कई नामी-गिरामी हस्तियों के विवादों में फंसने और आलोचनाओं की जद में आने का सिलसिला चला। राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में बात करें या फिर सामाजिक, जनता के दिमाग से कई शख्‍स उतरे और कई चढ़े। आइए जानते हैं, कुछ ऐसे धुरंधरों के बारे में, जिनके लिए यह साल कामयाबियों का कम और नाकामियों वाला अधिक रहा...

मोदी के जादू पर सवाल
पीएम मोदी की अगुवाई में लड़ा गया लोकसभा चुनाव बीजेपी के लिए तूफानी जीत लेकर आया। ऐसा लगा जैसे पूरे देश में मोदी ही मोदी गूंज रहे हों। कांग्रेस से पस्त हुई जनता को इस नई सरकार और अपने नए नेता नरेंद्र मोदी से बेहद उम्मीदें थीं,  लेकिन उनका जादू कम होता गया और वह भी बेहद तेजी से। दिल्ली में 70 सीटों में से केवल 3 सीटों पर सिमटी बीजेपी बिहार में औंधे मुंह गिरी। बिहार विधानसभा चुनाव में पीएम मोदी ने पूरी ताकत झोंकते हुए 30 रैलियों को संबोधित किया, लेकिन इसके बावजूद पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा। बिहार में रैलियों के दौरान दिए गए भाषणों में प्रयोग किए गए शब्दों के लिए भी मोदी की खासी आलोचना हुई। जिन 26 जगहों पर उन्होंने प्रचार किया था, उनमें से 11 सीटें बीजेपी हार गई। इसके बाद गुजरात में हुए निकाय चुनाव के नतीजे भी बीजेपी,  खासकर मोदी के करिश्मे को लेकर विश्‍वास से भरे लोगों के लिए झटके की तरह थे। हालांकि शहरों में बीजेपी ने अपना दबदबा कायम रखा लेकिन लेकिन कांग्रेस ग्रामीण क्षेत्रों में 31 जिला पंचायतों में तथा 230 तालुक पंचायतों में से 110 में 21 में विजयी रही। जाहिर है, बीजेपी के लिए अभेद गढ़ बन चुके गुजरात के लिए आने वाले दिन मुख्‍यमंत्री आनंदीबेन पटेल के लिए चुनौती भरे साबित होंगे।

व्‍यापमं का 'जहर' गले में उतारने को विवश शिवराज
मध्‍य प्रदेश के मुख्‍यमंत्री और बीजेपी के दिग्‍गज युवा नेताओं में शुमार शिवराज सिंह चौहान इस साल व्यापमं की कालिख से घिरते और बचते ही नज़र आते रहे। प्रदेश के मुख्‍यमंत्री के रूप में बागडोर संभाले उन्हें 10 साल हो गए हैं, लेकिन, उनकी जैसी फजीहत इस घोटाले के चलते हुई, वैसी किसी और कारण से नहीं हुई। प्रदेश के राज्यपाल रामनरेश यादव तक का नाम इस घोटाले में आया। व्यापमं व्यापारिक परीक्षा मंडल का संक्षिप्त रूप है। इसके तहत राज्य में प्री मेडिकल टेस्ट, प्री इंजीनियरिंग टेस्ट और कई सरकारी नौकरियों के एग्जाम होते हैं। यह एक मंडल के रूप में काम करता है। इस घोटाले से जुड़े लोगों ही नहीं, बल्कि इसकी जांच या पड़ताल से जुड़े लोगों की भी मौतें इसे और ज्यादा संदिग्ध बनाती हैं। पुलिसिया आंकड़ों पर यकीन करें तो इससे जुड़े 42 लोगों की मौत हो चुकी है। व्यापमं घोटाले की जांच कर रहे डॉक्टर अरुण शर्मा की मौत भी कई सवाल खड़े करती है।

महागठबंधन से अलग होने का 'नेताजी' का दांव पड़ा उलटा
समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने बिहार चुनाव के लिए पहले तो महागठबंधन बनाने में जोरशोर से भूमिका निभाई। इसके बाद खुद ही इससे अलग हो गए। काफी आलोचना होने के बाद उन्होंने कहा कि महागठबंधन में कांग्रेस को शामिल करने की वजह से वह इससे अलग हुए थे। सपा प्रमुख ने कहा कि महागठबंधन में कांग्रेस को शामिल कर उनके साथ धोखा किया गया। बाद में बिहार में चुनाव वह अकेले लड़े, लेकिन उनकी पार्टी के हिस्से में एक भी सीट नहीं आई । दूसरी ओर नीतीश-लालू और कांग्रेस के महागठबंधन ने रिकॉर्ड 170 से ज्‍यादा सीटें हासिल कीं। हालांकि महागठबंधन से अलग होने के बाद रामगोपाल यादव ने कहा था कि जनता परिवार ने बिहार में सपा को 5 सीटें दी थी। जब पार्टी गठबंधन में थी, तो सीटों का फैसला करते समय हमसे भी बात करनी चाहिए थी। यह किसी गठबंधन धर्म के मुताबिक नहीं था।

'मोदी भक्ति' पर पहलाज निहलानी की फजीहत
सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष पहलाज निहलानी को मोदी भक्ति काफी भारी पड़ी। निहलानी द्वारा तैयार किए गए एक वीडियो 'मोदी काका' में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गुणगान किया गया है। उन्‍हें इस वीडियो में बतौर 'एक्‍शन हीरो' दिखाया गया है। 11 नवंबर से सलमान ख़ान की फ़िल्म 'प्रेम रतन धन पायो' के इंटरवल के दौरान यह वीडियो दिखाया गया। डायरेक्शन, शॉट्स, साउंड से लेकर कैमरा एंगल तक... इस वीडियो में दिखी हर चीज़ की आलोचना सोशल मीडिया पर की गई। सूत्रों के मुताबिक, इसे रिलीज़ करने से पहले केंद्र से अनुमति ज़रूरी थी, वह भी नहीं ली गई थी। वैसे सेंसर बोर्ड की फजीहत तब भी खूब हुई जब जेम्स बॉन्ड की फिल्म 'स्पेक्टर' के किसिंग सीन काटे गए। सोशल मीडिया पर संस्कारी बॉन्ड हैशटैग भी खूब चला। हालांकि पहलाज ने खुद 'स्पेक्टर' देखने से इंकार किया था। इसके बाद सेंसरशिप के खिलाफ़ फ़िल्मकार दिबाकर बनर्जी, सुधीर मिश्रा, महेश भट्ट और हंसल मेहता ने मिलकर एक ऑनलाइन स्पूफ बनाया, इसमें फ़िल्म के शुद्धिकरण का मज़ाक उड़ाते हुए 'तितली' फ़ेम कनु बहल को सेंसर बोर्ड की सख्ती से बचने के उपाय सुझा रहे हैं।

भाजपा के 'चाणक्‍य' अमित शाह की रणनीति फेल
पीएम नरेंद्र मोदी के खास सिपहसालार, बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की रणनीति बुरी तरह फेल हुईं। अपने बड़बोलेपन की वजह से वह विवादों में फंसे। दिल्ली के बाद बिहार विधानसभा चुनावों में पार्टी के धराशायी होने के का जिम्मा अमित शाह पर भी डाला गया। दिल्ली चुनावों के दौरान काले धन को वापस लाने और 15-15 लाख रुपए बंटवाने के मोदी के बयान को उन्‍होंने 'चुनावी जुमला' बताया था। इसके बाद  बिहार चुनाव के परिणामों से कुछ घंटों पहले अमित शाह ने कथित तौर पर गैरजिम्मेदाराना बयान दिए। उन्होंने कहा था कि सुबह 7 बजे मतगणना शुरू होगी और 9 बजे तक ये ब्रेकिंग न्यूज आना शुरू हो जाएगी कि भाजपा अधिकांश सीटों पर आगे है। 11 बजने तक भाजपा दो तिहाई बहुमत हासिल कर लेगी और फिर 1 बजे तक तो बिहार में शानदार विजय का परचम भाजपा लहरा देगी और 2 बजे अंतिम बार बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मुख्यमंत्री निवास से निकलकर राज भवन जाएंगे और अपनी हार पर इस्तीफा दे देगें। वोटों के ध्रुवीकरण के लिए वे यह कहने से भी नहीं चूके कि यदि बिहार में महागठबंधन जीता तो सबसे ज्‍यादा पटाखे पाकिस्‍तान में फूटेंगे। हुआ इसके उलट। अमित शाह की अगली परीक्षा यूपी चुनावों में होनी है।

मोदी की मदद पर मुश्किल में 'महारानी' और सुषमा
ब्रिटेन में इमीग्रेशन के मामले में जब आईपीएल के पूर्व कमिश्‍नर ललित मोदी को गवाहों की जरूरत थी तब राजस्‍थान की मुख्‍यमंत्री वसुंधरा राजे से बतौर गवाह एक हलफनामा दिया था। इसी हलफनामे के चलते वह इस मुसीबत में फंसी हैं। ललित मोदी ने खुद कहा है कि साल 2011 में जब वह ब्रिटेन में प्रवास बढ़ाना चाहते थे, तब राजे ने मामले को गोपनीय बनाए रखने की शर्त पर उनकी इमीग्रेशन अर्जी का समर्थन किया था। इस पूरे मामले पर वसुंधरा की अच्छी खासी फजीहत हुई। बता दें कि 2010 में ललित मोदी, भारत से लंदन चले गए थे जब उन पर टैक्स चोरी और मनी लॉन्डरिंग का आरोप लगा था। यह सारे आरोप उन पर आईपीएल के चेयरमैन होने के दौरान लगे थे। वैसे, इस पूरे मामले में विदेश मंत्री सुषमा स्‍वराज भी विपक्ष के निशाने पर रही। ललित मोदी के लिए मानवीय आधार पर मदद मुहैया कराने के मुद्दे पर विपक्ष ने उनका इस्‍तीफा मांगा।

गोगोई के डांस ने कांग्रेस को किया शर्मिंदा
पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के निधन के चलते जब पूरा देश में शोक में डूबा हुआ था और एक सप्ताह का राष्ट्रीय शोक मना रहा था, तब एक चाय बागान में मजदूरों के साथ एक नृत्य में शामिल होकर असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई विवाद में फंस गए। एक सार्वजनिक समारोह में मजदूरों के साथ नाचने की तस्वीरें सामने आने के बाद तमाम राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों ने मुख्यमंत्री की कड़ी निंदा की। बवाल बढ़ता देख गोगोई ने माफी मांग ली, लेकिन विवाद थमने से पहले गोगोई की मुसीबत बढ़ा गया। विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर गोगोई को घेरा। यह मामला गोलाघाट जिले के हाथीकुली में 29 जुलाई को चाय बागान मजदूरों के लिए एक अस्पताल के उद्घाटन समारोह का था। गोगोई ने वहां आदिवासी युवतियों के साथ झूमर नृत्य किया।

टेरी के डीजी थे कभी, आर के पचौरी का यूं हुआ पतन
द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (टेरी) के डीजी और जाने माने पर्यावरणविद आर के पचौरी यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था। उन पर आपत्तिजनक SMS और ईमेल भेजने का आरोप लगा। दिल्ली पुलिस ने एक 29 साल की महिला की शिकायत पर मामले की जांच भी की। यह महिला टेरी में ही काम करती थीं। विवाद बढ़ने पर पचौरी को यूएन में जलवायु से जुड़े वैज्ञानिक पैनल के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा और टेरी का पद भी छोड़ना पड़ा। इसके चलते उन्हें काफी फजीहत झेलनी पड़ी थी।

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आनंदीबेन के लिए चुनौतियों को दौर शुरू
जमीन से आसमान तक का सफर तय करने वालीं गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल के लिए भी साल निराश करने वाला रहा। गुजरात की पहली महिला मुख्यमंत्री आनंदीबेन गुजरात की राजनीति में 'लौह महिला' के रूप में जानी जाती हैं। लेकिन पटेल समुदाय को आरक्षण के लिए हार्दिक पटेल द्वारा शुरू किए आंदोलन को वह सही से संभाल नहीं पाईं। इस आंदोलन ने जब विशाल रूप धारण कर लिया, तब जाकर सरकार चेती। तब तक जो नुकसान होना था, हो चुका था। इसके बाद हुए गुजरात के स्‍थानीय निकाय चुनाव के नतीजों ने आनंदीबेन की मुश्किलें और बढ़ा दी। ग्रामीण इलाकों में कांग्रेस की बढ़ती पैठ ने इस बात का संकेत दे दिया कि गुजरात विधानसभा चुनाव में इस बार बीजेपी के लिए सब कुछ, पहले ही तरह आसान नहीं रहने वाला है।

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अकेले पड़े ममता के खास मुकुल रॉय
पूर्व रेलमंत्री मुकुल रॉय को कभी ममता बनर्जी के बाद तृणमूल कांग्रेस में नंबर दो की हैसियत पर आंका जाता था। दिनेश त्रिवेदी को रेल मंत्रालय से हटाकर ममता बनर्जी ने मुकुल रॉय को यह पद दिलवाया था। शारदा घोटाले में ममता बनर्जी के मंत्रियों के फंसने और मुकुल रॉय से सीबीआई की पूछताछ के बाद उनके लिए हालात खराब होने लगे। कभी तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी का दाहिना हाथ माने जाने वाले मुकुल रॉय को तृणमूल कांग्रेस ने पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव पद से बर्खास्त कर दिया। रॉय को इससे पहले राज्यसभा में तृणमूल के नेता पद से भी हटा दिया गया था।