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इस साल मैगी, बीफ, योग और असहिष्‍णुता के विवाद में उलझा रहा देश...

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इस साल मैगी, बीफ, योग और असहिष्‍णुता के विवाद में उलझा रहा देश...

हर साल की तरह 2015 ने भी अपने हिस्से के विवाद देखे और उनसे अपने हिसाब से निपटने की कोशिश भी की। हालांकि भारत में एक्शन की कमी नहीं है और हर पल कुछ न कुछ ऐसा घटता रहता है जिसके पीछे विवाद अपने आप खिंचे चले आते हैं, लेकिन कुछ ऐसे मुद्दे रहे जो लगभग पूरे साल ही लोगों का ध्‍यान बटोरते रहे। सोशल मीडिया के आने के बाद राधे मां के वीडियो से लेकर मार्क ज़करबर्ग और मोदी की मुलाकात तक शायद ही कोई मौका बिना विवाद के गुज़रा हो। हालांकि यहां कोशिश की गई है उन विवादों का ज़िक्र करने की जो सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रहे हैं। एक नज़र ऐसी ही कुछ घटनाओं पर…
 
मैगी की विदाई और वापसी
देश के ज्यादातर घरों की रसोई में जगह बना चुके मैगी नूडल्स पर तब अचानक बिजली गिरी जब उसके उत्पादन से लेकर बिक्री तक पर प्रतिबंध लगा दिया गया। पिछले साल उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में मैगी नूडल्स के नमूने में लेड की मात्रा तय सीमा से ज्यादा पाई गई। फिर इस साल मई-जून में देश के कई राज्यों में नेस्ले कंपनी के इन नूडल्स के नमूने का परीक्षण किया गया जिसमें भी लेड की मात्रा जरूरत से ज्यादा मिली। 5 जून को भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने मैगी पर प्रतिबंध लगा दिया।
 


हालांकि अगस्त में बांबे हाईकोर्ट ने मैगी से कुछ शर्तों के साथ पाबंदी हटा दी थी जिन्हें पूरा करने के बाद  9 नवंबर, 2015 को मैगी को फिर बाजार में उतारा गया। लेकिन तब तक बच्चे बच्चे की ज़बान पर चढ़ चुके मैगी के स्वाद ने अपने हिस्से की बदनामी भी देख ली। बता दें कि मैगी का भारत के करीब 80 प्रतिशत नूडल बाज़ार पर कब्ज़ा है और ऐसा लगता नही कि आने वाले समय में 2015 में पड़ी इस बड़ी मुसीबत को मैगी बनाने वाली नेस्ले कंपनी 2 मिनट के लिए भी भूल पाएगी। वैसे, मैगी की विदाई भारतीय बाजार से विदाई जितनी चर्चा में रही, उतनी ही टेस्‍ट में 'पास' होने के बाद उसकी वापसी। साल के अंत में इसने फिर बाजार में अपनी पहुंच बना ली।

व्यापमं घोटाले में फंसे सीएम
मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल स्थित व्यावसायिक परीक्षा मंडल (व्यापमं) तब एक राष्ट्रीय मुद्दा बन गया जब इससे जुड़े घोटाले की रिपोर्टिंग कर रहे एक न्यूज़ चैनल के रिपोर्टर की अाक्समिक मौत हो गई। विभिन्न नौकरियों के लिए मध्य प्रदेश व्यावसायिक परीक्षा मंडल (व्यापमं) की परीक्षाओं में हुई कथित धांधलियों में राज्य के राज्यपाल से लेकर मुख्यमंत्री तक सभी आरोपों के घेरे में आते गए। ऊपर से इस घोटाले से जुड़े लोगों की अचानक हो रही मौतों ने भी इस पूरे मुद्दे को सनसनीखेज़ बना दिया। 
 


दिल्ली से मध्य प्रदेश के कई छोटे-बड़े शहरों तक- जबलपुर, इंदौर, उज्जैन, झाबुआ- हर जगह व्यापमं की चर्चा रही। टेक्‍निकल कॉलेजों में दाखिला हो या नौकरियों का मसला- इसमें इतने तरह का भ्रष्टाचार सामने आया कि सब हैरान हैं। जिस मामले में राज्यपाल, मंत्री, संतरी, डॉक्टर, शिक्षक सब आरोपी ठहराए जाएं, उसका सिर्फ़ अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि वह कितना बड़ा होगा। इस केस में अब तक हज़ारों लोग आरोपी बनाए जा चुके हैं, सैकड़ों लोग जेल के पीछे हैं और सबसे ख़तरनाक पहलू है कि कई लोगों की जान गई है। मामले की जांच अब सीबीआई के हाथों में है।

बीफ को लेकर सड़क पर  उतरा 'उन्‍माद'
मार्च में महाराष्ट्र सरकार ने बीफ (गोमांस) के उपयोग, बिक्री या सेवन पर प्रतिबंध लगा दिया था जिसके समर्थन और विरोध में देशभर में आवाजें उठने लगीं। मामला तब और चर्चा में आया जब सितंबर में बॉम्बे हाई कोर्ट ने बकरीद के दौरान बैलों और बछड़ों की क़ुर्बानी की अनुमति मांगने वाली याचिका को ख़ारिज कर दिया। महाराष्ट्र के देखादेखी कई और राज्यों ने भी गोमांस पर प्रतिबंध का ऐलान कर दिया। बात कुछ संभलती, उससे पहले दिल्ली से सटे दादरी इलाके में भीड़ ने बीफ खाने के शक में अख़लाक़ नाम के शख्स की पीट पीटकर हत्या कर दी।
 


इसके बाद बीफ को लेकर लगातार हिंसा की खबरें आती रहीं। जम्मू-कश्मीर के निर्दलीय सांसद इंजीनियर राशिद ने गोमांस पर प्रतिबंध के खिलाफ बीफ पार्टी दी जिसकी वजह से विधानसभा में भाजपा सांसदों ने उनकी पिटाई कर दी। यही नहीं, दिल्ली में उन पर स्याही फेंकी गई। गोमांस को लेकर विवाद अभी भी जारी है और हाल ही में महाराष्ट्र  सरकार ने बॉम्बे हाईकोर्ट में को जानकारी दी है कि मार्च में प्रतिबंध लगाने से लेकर अक्‍टूबर तक 300 से भी ज्यादा लोगों के खिलाफ नए गोमांस प्रतिबंध कानून के तहत मुकदमा चलाया गया है।
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असहिष्णुता : दो खेमों में बंटा देश
क्या देश में असहिष्‍णुता (इनटालरेंस) का माहौल बनता जा रहा है? 2015 में भारत के सामने यह सबसे बड़ा सवाल था जिसके जवाब की तलाश में संसद के शीतकालीन सत्र में भी बेनतीजा बहस चली। असहिष्णुता या असहनशीलता ने 2015 में अखबार के पहले पन्ने पर सबसे पहले कब जगह बनाई, बताना थोड़ा मुश्किल है, लेकिन इस साल हुई हिंसक वारदातों ने मिलजुलकर एक सवाल खड़ा किया कि क्या वाकई में देश में असहिष्णुता का माहौल बनता जा रहा है।
 


कन्नड़ साहित्यकार एमएम कलबुर्गी की हत्या से लेकर दादरी में अख़लाक़ की मौत और आमिर ख़ान के 'देश छोड़ने' वाले बयान ने यह बहस शुरू कर दी कि भारत की पहचान सहिष्णुता का रंग बरकरार है या बेकार है। असहिष्‍णुता के मसले पर देश दो खेमों में भी बंटता दिखा। जहां प्रबुद्ध वर्ग के कई लोगों ने देश से सहनशीलता का भाव खत्‍म होने पर चिंता का इजहार किया, वहीं ऐसे लोगों की भी कमी नहीं थी जो इनसे सहमत नहीं थे।
 
लंबा चला अवार्ड वापसी का दौर
देश में कथित रूप से फैल रही असहिष्णुता ने ही 2015 के एक और बड़े मामले को जन्म दिया जिसे 'अवार्ड वापसी' का नाम दिया गया। इसकी शुरुआत हुई हिंदी साहित्यकार उदय प्रकाश से जिन्होंने अंधविश्वास के खिलाफ लड़ रहे कन्नड़ विद्वान कलबुर्गी की हत्या की निंदा करते हुए अपना साहित्य अकादमी सम्मान लौटाने का फैसला किया। उन्होंने कहा कि पिछले समय से देश में लेखकों, कलाकारों, चिंतकों और बौद्धिकों के प्रति जिस तरह का हिंसक, अपमानजनक, अवमानना पूर्ण व्यवहार लगातार हो रहा है, उसने उन्‍हें भीतर से हिला दिया है।
 

उदय प्रकाश के बाद मशहूर लेखिका और जवाहरलाल नेहरू की भांजी नयनतारा सहगल ने अपना साहित्य अकादमी सम्मान वापिस लौटा दिया। साहित्यकारों के साथ ही फिल्मकार, कलाकार और वैज्ञानिक भी अवार्ड वापसी अभियान में शामिल हो गए, वहीं श्याम बेनेगल और विद्या बालन जैसे कुछ नाम ऐसे भी थे जो विरोध दर्ज करने के लिए सम्मान लौटाने के तरीके से सहमत नज़र नही आए। वहीं लेखकों और कलाकारों के अवार्ड वापसी अभियान के विरोध में अभिनेता अनुपम खेर ने दिल्ली में एक मार्च का नेतृत्व किया और राष्ट्रपति से मुलाकात की।

'युधिष्ठिर' की नियुक्ति पर ठप एफटीआईआई 
2015 के सबसे विवादित मुद्दों में से एक भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान (एफटीआईआई) मामला रहा जिसमें संस्था के नए अध्यक्ष की नियुक्ति पर छात्रों ने कड़ी आपत्ति जताई। अध्यक्ष पद के लिए भाजपा से जुड़े अभिनेता गजेंद्र चौहान को चुना गया जिन्हें दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले 'महाभारत' में युधिष्ठिर के किरदार से ख्याति प्राप्त हुई थी। गजेंद्र की नियुक्ति के विरोध में छात्र हड़ताल पर चले गए जो 139 दिन चली और इसके बाद छात्रों ने कहा गजेंद्र चौहान की नियुक्ति के खिलाफ 'शांतिपूर्ण' विरोध जारी रहेगा।
 


इस पूरे विरोध के दौरान कई हस्तियां भी छात्रों के समर्थन में आगे आईं। निर्देशक दिबाकर बनर्जी, आनंद पटवर्धन सहित आठ कलाकारों ने आंदोलनकारी छात्रों के साथ एकजुटता दिखाते हुए और देश में बढ़ती असहिष्णुता के विरोध में अपने पुरस्कार लौटा दिए। 18 दिसंबर को गजेंद्र चौहान ने करीब 6 महीने बाद पुणे फिल्म संस्थान की जिम्मेदारी संभाली और अब अगले साल तक ही पता चल पाएगा की भारी विरोध के बीच चौहान अपनी कुर्सी पर कितने वक्त तक जमे रह पाएंगे।
 
पटेल आंदोलन से सहमी आनंदीबेन सरकार
22 साल के हार्दिक पटेल की अगुवाई में गुजरात के पटेल आंदोलन ने देशभर का ध्यान अपनी तरफ खींचा। पटेल समुदाय के लिए आरक्षण की मांग को लेकर हार्दिक ने 25 अगस्त को अहमदाबाद में महारैली का आयोजन किया जिसमें करीब पांच लाख लोग पहुंचे।  इस विशाल रैली से पहले हार्दिक ने कई और छोटी-छोटी रैलियां भी आयोजित कीं जिसमें बड़ी संख्‍या में पटेल समुदाय के लोगों ने हिस्सा लिया।
 

रैली में तब हिंसा भड़क गई जब पुलिस ने हार्दिक को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद तो गुजरात में प्रदर्शन और आगजनी का दौर शुरू हो गया। करीब सवा सौ गाड़ियां फूंक डालीं गई, 16 थाने जलाए गए और एक व्यक्ति की मौत हो गई। कई शहरों में ट्रेन की पटरियां उखाड़ दी गईं। फिलहाल हार्दिक पटेल पर सूरत में दिए एक बयान को लेकर देश द्रोह का मामला चल रहा है और वह न्यायिक हिरासत में है।
 
योग में राजनीति के रंग
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अनुरोध पर संयुक्त राष्ट्र ने  21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया।  इस मौके पर दिल्ली में एक विशाल आयोजन किया गया जिसमें राजपथ पर पीएम के साथ 35,985 लोगों ने हिस्सा लिया और पहली बार एक साथ एक जगह इतने सारे लोगों के योगाभ्यास करने का एक विश्‍व रिकॉर्ड बन गया। पीएम मोदी को अनुलोम-विलोम करते हुए देखा गया लेकिन यह आयोजन अपने हिस्से की राजनीति से भी बच नहीं पाया।
 

कांग्रेस नेताओं का आरोप था कि मुस्लिम समुदाय के धार्मिक नेता सरकार के इरादे से सहज नहीं हैं, वहीं बसपा नेता मायावती ने आरोप लगाया कि यह कार्यक्रम 'सांप्रदायिक सद्भाव' को बिगाड़ने का काम करेगा। यही नहीं, भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ अपने इस बयान से आग में घी डालने का काम किया कि जो लोग सूर्य नमस्कार का विरोध करते हैं उन्हें 'समुद्र में डूब जाना चाहिए'
 
रोहित शर्मा के विकेट पर बांग्‍लादेश का 'बाउंसर'
यूं तो किसी भी खेल में तनातनी चलती रहती है, लेकिन 2015 के क्रिकेट वर्ल्ड कप के भारत-बांग्‍लादेश के मैच ने दोनों देशों के आपसी संबंधों में तल्‍खी ला दी। दरअसल क्वार्टर फाइनल में बांग्लादेश के गेंदबाज़ रूबेल हुसैन की फुलटॉस पर टीम इंडिया के रोहित शर्मा कैच आउट हो गए, लेकिन अंपायर को गेंद बहुत ऊंची लगी और उसे 'नो बॉल' क़रार दिया गया।
 

रोहित तो नॉट आउट रहे लेकिन रिप्ले में पता चला कि गेंद कमर की ऊंचाई तक थी और नो बॉल नहीं थी। बस यहीं से विवाद शुरू हो गया। आईसीसी के अध्यक्ष बांग्लादेश के मुस्तफा कमाल ने अम्पायरों की निष्पक्षता पर सवाल खड़े किए। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने तो यहां तक कह दिया कि अंपायर गलत फैसला नहीं लेते तो उनकी टीम जीत जाती। वैसे इस वर्ल्ड कप में भारत की हार के बाद विराट कोहली और अनुष्का शर्मा भी ख़बरों में छाए रहे।
 
सम-विषम फॉर्मूले  की प्रासंगिकता पर सवाल 
हाल ही में हाईकोर्ट ने बढ़ते प्रदूषण की वजह से दिल्‍ली महानगर के 'गैस चैंबर'  में तब्‍दील होने की बात कहते हुए सरकार को फटकार लगाई। इसके बाद अरविंद केजरीवाल सरकार ने आननफानन बैठक बुलाई। फैसला लिया गया कि दिल्ली में एक जनवरी से सम-विषम फॉर्मूला के हिसाब से सड़कों पर गाड़ियां निकाली जाएंगी यानि सम नंबरों की गाड़ी एक दिन और विषम नंबरों की गाड़ी दूसरे दिन।
 

इस फैसले के आते ही सोशल मीडिया और विपक्षी दलों ने आलोचना शुरू कर दी जिसके बाद केजरीवाल ने इसे सिर्फ 15 दिन के लिए प्रयोग के रूप में लागू करने की बात कही। यह फॉर्मूले हिट रहेगा या फ्लॉप और इसकी व्यावहारिकता के बारे में तो 2016 में ही पता चल पाएगा।
 
सलमान खान को सज़ा और फिर रिहाई
बॉलीवुड के इस सुपरस्टार के लिए पूरा साल 'रोलर कोस्टर राइड' से कम नहीं रहा। जनवरी में मुंबई की एक अदालत ने साल 2002 के हिट एंड रन मामले में सलमान खान पर गैर इरादतन हत्या का मामला चलाने का फैसला सुनाया। फिर मई के महीने में अदालत ने खान को पांच साल की सज़ा सुनाई लेकिन हाईकोर्ट से उन्हें जमानत मिल गई। सलमान के लिए अभी भी चैन से सोने का वक्त नहीं आया था क्योंकि फैसला आना बाकी था।
 

10 दिसंबर को पांच साल की सज़ा के ख़िलाफ़ अभिनेता सलमान ख़ान को बॉम्बे हाईकोर्ट ने सभी आरोपों से बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष की दलीलें और साक्ष्य मज़बूत नहीं थे और वह यह साबित नहीं कर सके कि घटना के दिन गाड़ी सलमान चला रहे थे और तो और इसका भी कोई सुबूत नहीं है कि सलमान ख़ान उस दिन नशे में थे। इस फैसले ने खाने की टेबल से लेकर सोशल मीडिया की चर्चाओं में काफी ध्यान बटोरा और कई लोगों ने न्याय व्यवस्था को ही कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया।


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