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साल 2015 में दिवंगत होने वाली कुछ शख्सियतें जिन्हें दुनिया याद रखेगी

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साल 2015 में दिवंगत होने वाली कुछ शख्सियतें जिन्हें दुनिया याद रखेगी

पूर्व राष्ट्रपति डॉ एपीजे अब्दुल कलाम (फाइल फोटो)

साल 2015 जाने को है और नए साल के स्वागत की तैयारियों शुरू हो गई हैं। तमाम इवेंट मैनेजमेंट कंपनियां इस मौके को भुनाने में लगी हैं। ऐसे में जब एक जश्न का माहौल बनता जा रहा है, हम उन चंद लोगों की बात भी कर लें जो इस साल हमें अलविदा कह गए।

1. सुभाष घीसिंग
सुभाष घीसिंग का 29 जनवरी 2015 को दिल्ली में 78 वर्ष की आयु में निधन हो गया। गोरखा आंदोलन से सम्बद्ध गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (GNLF) सशक्त दल के ये संस्थापक थे।
 


सुभाष घीसिंग पश्चिम बंगाल के गोरखा आंदोलन के सबसे सशक्त हस्ताक्षर रहे थे। यह आंदोलन राज्य में नेपाली मूल के गोरखा वासियों के लिए पृथक राज्य की मांग से सम्बन्धित है। 1980 में सुभाष घीसिंग ने गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (GNLF) की स्थापना की थी। इन्होंने पृथक गोरखालैण्ड (Gorkhaland) की मांग के चलते दार्जिलिंग जिले में वर्ष 1986 से 1988 के बीच हिंसात्मक आंदोलन का संचालन किया था।

इस मुद्दे को 1988 में अस्थाई रूप से तब सुलझा लिया गया था जब पश्चिम बंगाल के अधीन ही एक स्वायत्त निकाय दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल (DGHC) का गठन किया गया था। सुभाष घीसिंग इसके पहले अध्यक्ष थे तथा वे 1988 से 2008 तक इसके अध्यक्ष रहे थे। लेकिन 2008 में इनके अपने सहयोगी बिमल गुरुंग ने इनको इस पद से हटा दिया था तथा अपने खुद के संगठन गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (GJMM) की स्थापना भी कर ली। इसके चलते सुभाष घीसिंग के GNLF की लोकप्रियता भी लगभग समाप्त हो गई और गुरुंग गोरखा आंदोलन के मुख्य कर्ताधर्ता बन कर उभरे।


2. हुकुम सिंह
हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री मास्टर हुकुम सिंह का साल के आरंभ में गुड़गांव के एक प्राइवेट अस्पताल में 26 फरवरी को निधन हो गया था।

वे कुछ दिनों से बीमार थे। जब उनका निधन हुआ तब वे 89 साल के थे। किसान, शिक्षक और मजदूर नेता रहे हुकुम सिंह का जन्म भिवानी के चरखी दादरी में हुआ था। वह जुलाई 1990 से मार्च 1991 तक जनता दल सरकार में राज्य के मुख्यमंत्री रहे। इससे पहले तीन बार वह चरखी दादरी से विधायक चुने जा चुके थे।

3. राम सुंदर दास
बिहार के पूर्व मुख्‍यमंत्री और वरिष्‍ठ जदयू नेता रामसुंदर दास का निधन 6 मार्च हो गया था। वे 95 साल के थे। रामसुंदर दास अप्रैल 1979 से फरवरी 1980 तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे। वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में हाजीपुर संसदीय क्षेत्र से दास ने दिग्गज नेता और लोकजनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष रामविलास पासवान को हराया था। वह 2014 के लोकसभा चुनाव में हाजीपुर से जदयू के उम्मीदवार थे।
 
रामसुंदर दास 1977 से 1980 तक बिहार विधानसभा के सदस्य रहे। इसके पहले 1968 से 1977 तक वह विधानपरिषद के भी सदस्य थे। वे विधानसभा में अनुसूचित जाति और जन जाति कल्याण समिति के सभापति तथा विशेषाधिकार समिति के भी सभापति रहे। वे 1991 तथा 2009 में सांसद भी निर्वाचित हुए थे। आजादी की लड़ाई में भाग लेने वाले रामसुंदर दास ने हिंद मजदूर सभा के साथ-साथ कई संगठनों के अध्यक्ष व सदस्य के रूप में काम किया था।

4. जेबी पटनायक
ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री एवं असम के पूर्व राज्यपाल जानकी बल्लभ पटनायक का 21 अप्रैल की सुबह तिरूपति में निधन हो गया। वह 89 वर्ष के थे। पटनायक ओडिशा के तीन बार मुख्यमंत्री रहे। साहित्य एवं संस्कृति के प्रति उल्लेखनीय योगदान के लिए जाने जाने वाले बहुमुखी व्यक्तित्व के पटनायक का जन्म 3 जनवरी 1927 को हुआ था। कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे पटनायक 1980 में मुख्यमंत्री बने और 1989 तक पद पर बरकरार रहे। 1995 में वह फिर मुख्यमंत्री बने और 1999 तक पद पर रहे। पटनायक को 2009 में असम का राज्यपाल नियुक्त किया गया था। वह केंद्र में भी मंत्री रहे।
 


खुर्दा हाईस्कूल से शुरुआती शिक्षा पूरी करने के बाद पटनायक ने 1947 में उत्कल विश्वविद्यालय से बीए की उपाधि हासिल की और 1949 में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर किया।

5. एपीजे अब्दुल कलाम
भारत के ‘मिसाइल मैन’ के रूप में लोकप्रिय डॉ एपीजे अब्दुल कलाम बेहद साधारण पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखते थे तथा जमीन और जड़ों से जुड़े रहकर उन्होंने ‘‘जनता के राष्ट्रपति’’ के रूप में लोगों के दिलों में अपनी खास जगह बनाई थी। 15 अक्तूबर 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम में पैदा हुए कलाम ने मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलोजी से स्नातक करने के बाद भौतिकी और एयरोस्पेस इंजीनियरिंग का अध्ययन किया और फिर उसके बाद रक्षा शोध एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) से जुड़ गए। रक्षा और अंतरिक्ष क्षेत्र में शोध पर ध्यान केंद्रित करने वाले डॉ कलाम बाद में भारत के मिसाइल कार्यक्रम से जुड़ गए। बैलेस्टिक मिसाइल और प्रक्षेपण वाहन तकनीक में उनके योगदान ने उन्हें ‘‘भारत के मिसाइल मैन’’ का दर्जा प्रदान कर दिया।
 


भारत रत्न समेत कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किए गए कलाम ने 1998 में भारत द्वारा पोखरण में किए गए परमाणु हथियार परीक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। 27 जुलाई 2015 को शिलॉन्ग में एक कार्यक्रम में शामिल होने गए डॉ कलाम का वहीं निधन हो गया।


6. रवींद्र जैन
रवींद्र जैन का जन्म 28 फरवरी, 1944 को अलीगढ़ में संस्कृत के प्रकांड पंडित और आयुर्वेद विज्ञानी इंद्रमणि जैन की संतान के रूप में हुआ। 70 के दशक में उन्‍होंने बतौर बॉलीवुड संगीतकार के रूप में अपने करियर की शुरुआत की।
 


उन्‍होंने फिल्म 'चोर मचाए शोर' (1974), 'गीत गाता चल' (1975), 'चितचोर' (1976), 'अखियों के झरोखों से' (1978) सरीखी हिंदी फिल्मों में संगीत दिया था। उनका संगीत काफी लोकप्रिय हुआ। साल के उत्तराद्ध में 9 अक्टूबर को उनका निधन हो गया।

7. अशोक सिंघल
अशोक सिंघल (1926-2015) हिन्दू संगठन विश्व हिन्दू परिषद के 20 वर्षों तक अंतरराष्ट्रीय अध्य़क्ष थे। दिसंबर 2011 में बिगड़ते स्वास्थ्य के कारण उन्हें अपना स्थान छोड़ना पड़ा और डॉ प्रवीण तोगड़िया ने उनका स्थान लिया।
 


मेटलर्जी इंजीनियर से हिन्दुत्व के मुद्दे को आगे बढ़ाने और राम मंदिर आंदोलन में प्रखर भूमिका निभाने वाले अशोक सिंघल 1980 के दशक के अंतिम वर्षों और बाद में राष्ट्रीय स्तर पर सुखिर्यों में रहे। उन्होंने बीजेपी के नेतृत्व वाले इस राजनीतिक आंदोलन में विश्व हिन्दू परिषद (वीएचपी) के अध्यक्ष के रूप में अहम भूमिका निभाई।

तेजतर्रार नेता सिंघल (89) ने अपना जीवन हिन्दुत्व के मुद्दे पर समर्पित किया। उन्होंने आक्रामक शैली अपनाते हुए राम जन्मभूमि और राम सेतु आंदोलनों के लिए लोगों को एकजुट करने में प्रमुख भूमिका निभाई।उनके नेतृत्व में वीएचपी ने विदेश में कार्यालय स्थापित किए। वीएचपी को अपने अभियान के लिए भारत के बाहर से बहुत योगदान मिला। सिंघल का 'कार सेवक' अभियान में भी योगदान महत्वपूर्ण था। इसी अभियान के चलते 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में 16वीं सदी की कथित बाबरी मस्जिद ढहाई गई। आगरा में 2 अक्टूबर 1926 को जन्मे सिंघल ने साल 1950 में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के 'इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलाजी' से मेटलर्जिकल इंजीनियरिंग में स्नातक की डिग्री हासिल की थी।

वह साल 1942 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ गए थे, लेकिन स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद वह पूर्णकालिक प्रचारक बने। उन्होंने उत्तर प्रदेश में कई स्थानों पर काम किया और दिल्ली तथा हरियाणा के प्रांत प्रचारक बने। साल 1980 में उन्हें वीएचपी में जिम्मेदारी देते हुए इसका संयुक्त महासचिव बनाया गया। साल 1984 में वह इसके महासचिव बने और बाद में इसके कार्यकारी अध्यक्ष का पद सौंपा गया। इस पद पर वह दिसंबर 2011 तक रहे।

साल 1980 में वीएचपी के लिए काम करना शुरू करने वाले सिंघल तमिलनाडु में 1981 में मीनाक्षीपुरम धर्मांतरण के बाद उस समय सक्रिय हुए जब वीएचपी ने खास तौर पर दलितों के लिए 200 मंदिर बनवाए और दावा किया कि इसके बाद धर्मांतरण रुक गया। सिंघल ने दिल्ली में साल 1984 में वीएचपी की पहली 'धर्मसंसद' के प्रमुख आयोजन की जिम्मेदारी संभाली जिसमें हिन्दू धर्म मजबूत करने पर चर्चा में सैकड़ों साधुओं और हिन्दू संतों ने भाग लिया।

यहीं पर अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर पर दावा फिर से हासिल करने के आंदोलन का जन्म हुआ और जल्द ही सिंघल राम जन्मभूमि आंदोलन के मुख्य सदस्य के रूप में उभरे। आरएसएस प्रचारक होने के नाते वह आजीवन अविवाहित रहे। 17 नवंबर 2015 को 89 वर्ष की उम्र में उनका निधन हुआ।

8. महीप सिंह
सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ महीप सिंह का 24 नवंबर को दोपहर दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। 85 वर्षीय महीप सिंह मौत से पहले करीब एक सप्ताह अस्पताल में भर्ती रहे।

डॉ. महीप सिंह का जन्म 15 अगस्त 1930 को हुआ था। महीप सिंह का परिवार पाकिस्तान के झेलम से उत्तर प्रदेश के उन्नाव में आकर बस गया था। वे हिंदी के लेखक और स्तंभकार के रूप में जाने जाते थे। उन्होंने चार दशकों तक संचेतना पत्रिका का संपादन किया था।

डॉ. महीप सिंह ने लगभग 125 कहानियां लिखीं। ‘काला बाप गोरा बाप', ‘पानी और पुल', ‘सहमे हुए', ‘लय', ‘धूप की उंगलियों के निशान', ‘दिशांतर और कितने सैलाब' जैसी कहानियां हिन्दी कहानी के मील के पत्थर हैं। उनके उपन्यास ‘यह भी नहीं' और ‘अभी शेष है' काफी चर्चित रहे। आपका उपन्यास पंजाबी, गुजराती, मलयालम व अंग्रेज़ी में अनुदित हुआ।

उन्होंने अनेक कहानी-संग्रह लिखे जिनमें 'सुबह के फूल', 'उजाले के उल्लू', 'घिराव', 'कुछ और कितना', 'मेरी प्रिय कहानियां', 'समग्र कहानियां', 'चर्चित कहानियां', 'कितने सम्बंध', 'इक्यावन कहानियां', 'धूप की उंगलियों के निशान सम्मिलित हैं।

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9. शरद जोशी
शरद जोशी का महाराष्ट्र में किसान आंदोलन में बड़ा योगदान रहा है। जोशी का जन्म 3 सिंतबर 1935 को सतारा में हुआ था। उन्होंने सन 1977 में विदेश की नौकरी छोड़ किसानों के लिए संगठन शुरू किया था। नासिक में प्याज आंदोलन की वजह से उनका किसान संगठन सूर्खियों में आया था। उन्होंने मजदूर संघ का भी काम किया था। इतना ही नहीं असंगठित क्षेत्र के लोगों को संगठित करने का काम भी उन्होंने किया। सन 2004 से 2008 तक वें भारतीय मजदूर संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी रहे। इसके अलावा वे राज्यसभा सदस्य भी रहे हैं।

उन्होंने सन 1958 से भारतीय पोस्टल सर्विस ज्वाइन की थी। पिन कोड बनाने में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उन्होंने किसानों को लेकर किताबें लिखी हैं। उनकी हिंदी में लिखी हुई किताबें 'भारत की समस्याएं' और 'स्वाधीनता क्यों नाकाम हो गई' काफी फेमस हुई थी। 12 दिसंबर को वह इस दुनिया को छोड़कर चले गए।



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