NDTV Khabar

2015 में जलवायु, बाल श्रम और जीनोफोबिया पर चिंतित रहे लेखक

 Share
ईमेल करें
टिप्पणियां
2015 में जलवायु, बाल श्रम और जीनोफोबिया पर चिंतित रहे लेखक

प्रतीकात्मक तस्वीर

नई दिल्ली: लेखकों ने जहां देश में ‘बढ़ती असहिष्णुता’ का विरोध करते हुए अपने पुरस्कार लौटाए हैं, वहीं कुछ प्रमुख लेखक जलवायु परिवर्तन और बाल श्रम के साथ-साथ वैश्विक तौर पर बढ़ते धार्मिक चरमपंथ, शहरों के बेतरतीबी से होते विकास और आम जीवन में बौद्धिक सामग्री के घटते स्तर को लेकर भी चिंतित रहे।

अमित चौधरी, ताबिश खर, अश्विन सांघी और रोस्विथा जोशी उन तीन मुद्दों पर अपने विचार साझा कर रहे हैं, जिन्होंने उन्हें वर्ष 2015 में बतौर लेखक प्रतिष्ठा दी। चौधरी के अनुसार, इनमें से एक मुद्दा ऐसे ‘‘मजबूत एवं सक्रिय नागरिक’’ संगठनों की कमी है, जिन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कानूनी एवं संवैधनिक ढांचे की पूरी समझ हो और जो विरोध का स्वर और हमारे नागरिक अधिकारों को दबाए जाने का इस जानकारी के आधार पर प्रतिरोध शुरू कर सके।

अपनी पीढ़ी के सर्वश्रेष्ठ इतिहासकारों में शामिल छह उपन्यासों के लेखक चौधरी शहरों के विकास में किसी विजन का अभाव होने को लेकर भी चिंतित थे।

कोलकाता में जन्मे इस लेखक ने बताया कि हमारे आधुनिक शहरों में बिना किसी विजन के किए जाने वाले विकास का नतीजा मुंबई में और हाल ही में चेन्नई में देखने को मिला है।

वर्ष 2015 में लेखकों की चिंता के विषयों में से एक मुद्दा जीनोफोबिया का भी रहा। बिहार में जन्मे और डेनमार्क निवासी लेखक ताबिश खर अपनी नयी किताब ‘द न्यू जीनोफोबिया’ में इस मुद्दे पर विस्तार से लिखते हैं। वह युद्ध, शरणार्थियों के साथ बर्ताव, धार्मिक चरमपंथ और नवउदारवाद के कई पहलुओं को इससे जोड़ते हैं।

इस किताब में खर अजनबियों के डर का अध्ययन एक ऐतिहासिक, दार्शनिक, सामाजिक-आर्थिक परिप्रेक्ष्य में करते हैं और साथ ही वह सत्ता और पूंजीवाद के साथ इसके रिश्ते की भी पड़ताल करते हैं। वह दिखाते हैं कि किस तरह से पूंजीवाद में आए बदलावों ने किसी अजनबी की छवि को बदलकर रख दिया है।

टिप्पणियां
इस साल के दौरान वह ‘‘दुनिया में बढ़ती आर्थिक निराशा को लेकर और आम जीवन में बौद्धिक सामग्री में आने वाली गिरावट को लेकर भी चिंतित रहे। यह गिरावट तेजी से बढ़ती व्यर्थ मीडिया संस्कृति, बुद्धिजीवियों पर हमलों, धार्मिक चरमपंथ, पर्यावरणीय जागरूकता की कमी, खोखले साहित्यिक गुटों और विश्वविद्यालयों, विशेषकर मानविकी की ‘बाजार’ द्वारा की जा रही कटौती में दिखती है।’’ ‘द रोजबल लाइन’, ‘चाणक्य चैंट’ और ‘द कृष्णा की’ जैसे चर्चित उपन्यास लिख चुके सांघी के दिमाग में चिंता के तीन बड़े विषय वैश्विक तौर पर व्याप्त धार्मिक चरमपंथ, जलवायु परिवर्तन का असर और खाद्य एवं जल संसाधन थे।

एक लेखिका के तौर पर जो तीन मुद्दे जोशी के दिमाग में चिंता पैदा कर रहे थे और कागज पर उतारे जा रहे थे, वे थे - बाल श्रम, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की भूमिका और बलात्कार किसे कहा जाए? दिल्ली निवासी इस जर्मन लेखिका ने ‘लाइफ इज पिक्यूल्यर’, ‘ऑन द रॉक्स एंड अदर स्टोरीज’, ‘वन्स मोर’, ‘फूल्स पैराडाइज’ और ‘इंडियन ड्रीम्स’ जैसी किताबें लिखी हैं।


Hindi News से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करे...

Advertisement