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पिनराई विजयन : ताड़ी उतारने वाले परिवार का बेटा बना मुख्यमंत्री, जानिए 10 खास बातें

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पिनराई विजयन : ताड़ी उतारने वाले परिवार का बेटा बना मुख्यमंत्री, जानिए 10 खास बातें

पिनराई विजयन (फाइल फोटो)

नई दिल्ली: केरल में कम्युनिस्ट आंदोलन के उभार के साथ ही पिनराई विजयन का सियासी आगाज उनकी मुख्यमंत्री के रूप में ताजपोशी के साथ एक पड़ाव पूरा कर रहा है। बेहद गरीब परिवार से ताल्लुक रखने वाले विजयन ने इस सियासी शिखर तक पहुंचने से पहले राजनीतिक बियावान में वर्षों बिताए हैं। अदभुत संगठन क्षमता, जबर्दस्त प्रशासनिक क्षमता के रूप में पहचाने जाने वाले विजयन को केरल के फिदेल कास्त्रो वीएस अच्युतानंदन का धुर विरोधी माना जाता रहा है। उनकी शख्यियत विवादों के घेरे में भी रही है, मीडिया से उनका नाता बहुत सहज नहीं रहा है। आइए जानते हैं विजयन से जुड़ी 10 खास बातें-
  1. लगभग एक साथ शुरू हुए सफर: कम्युनिस्टों का गढ़ माने जाने वाले उत्तरी केरल के कन्नूर जिले के पिनाराई गांव के पी. विजयन की दास्तान और राज्य में उनकी कम्युनिस्ट पार्टी के उभार की कहानी में काफी कुछ समानता है। दोनों ने कुछ अंतराल पर लगभग एक साथ एक जगह से सफर शुरू किया है।
  2. पार्टी की शुरुआत और विजयन का जन्म : गौरतलब है कि 1939 में पिनाराई गांव के निकट स्थित पराप्रम में एक गुप्त मीटिंग का आयोजन हुआ और उसके साथ ही राज्य में कम्युनिस्ट पार्टी की औपचारिक शुरुआत हुई। 21 मार्च, 1944 में निकटवर्ती पिनाराई गांव में विजयन का जन्म हुआ।
  3. मुफलिसी में गुजरा बचपन: विजयन का बचपन बेहद गरीबी में बीता। वह ताड़ी बेचने वाले परिवार से ताल्लुक रखते हैं। स्थानीय स्कूल से 10वीं तक पढ़ाई करने के बाद उन्हें स्कूल छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा, क्योंकि उनके पास आगे की पढ़ाई करने के लिए पैसे नहीं थे। उस दौरान उन्होंने मैसूर की एक बेकरी में काम किया और बाद में घर लौटने के बाद बुनकर का काम किया।
  4. सियासी आगाज : 1960 के दशक के शुरुआती वर्षों में गवर्मेंट ब्रेनेन कॉलेज, थलासेरी में इकोनॉमिक्स में ग्रेजुएशन करने के दौरान विजयन का सियासी सफर शुरू हुआ और वह केरल स्टूडेंट फेडरेशन के सदस्य बने। यह फेडरेशन ही बाद में माकपा की छात्र शाखा स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया यानी एसएफआई के रूप में जानी गई। बाद में इसके स्टेट सेक्रेट्री बनने के साथ ही वह केरल राज्य युवा फेडरेशन के प्रांतीय युवा नेताओं की अग्रिम पंक्ति में शुमार हो गए।
  5. 26 साल की उम्र में एमएलए : उसी दशक में थलोसेरी क्षेत्र के कई वरिष्ठ कम्युनिस्ट नेताओं का झुकाव अति वामपंथ और नक्सल आंदोलन की तरफ हुआ। उसी दौर में विजयन के सियासी गुरू माने जाने वाले ए. अच्युतन का झुकाव भी जब नक्सलवाद की तरफ हुआ तो अन्य लोगों के साथ अच्युतन को भी पार्टी से निकाल दिया गया। इन लोगों के सियासी सीन से हटने के बाद विजयन इस क्षेत्र के प्रमुख नेता बनकर उभरे। 1968 में कन्नूर डिस्ट्रिक्ट कमेटी के सदस्य बने! 1970 में 26 साल की उम्र में वह कोठुपरंबा विधानसभा सीट जीतकर पहली बार विधानसभा पहुंचे।
  6. आपातकाल का दौर : 1975-77 के दौरान देश में इमरजेंसी के दौरान विजयन पुलिस कस्टडी में भी रहे और उनकी थर्ड डिग्री यातनाएं दी गईं। रिहा होने के बाद जब वह विधानसभा पहुंचे तो वहां उन्होंने बेहद भावप्रवण भाषण देने के साथ ही पुलिस कस्टडी के दौरान रक्तरंजित हुई अपनी शर्ट भी दिखाई। इससे तत्कालीन सी. अच्युता मेनन की सरकार को काफी शर्मिंदगी उठानी पड़ी।
  7. एसएनसी लवालिन घोटाला : 1977, 1991 और 1996 में भी विधानसभा पहुंचने के साथ ही 1996 में ईके नयनार मंत्रिमंडल में पहली बार कैबिनेट में उर्जा मंत्री बने। प्रभावी मंत्री के रूप में उनकी पहचान बन ही रही थी कि तभी 374.5 करोड़ के एसएनसी लवालिन समझौते में हुए भ्रष्टाचार के मामले में उनका भी नाम उछला। वह समझौता तीन हाईडेल पॉवर प्रोजेक्ट के पुनरुद्धार के लिए हुआ था। इससे उनकी छवि को गहरा धक्का लगा लेकिन पांच नवंबर, 2013 को सीबीआई की विशेष अदालत ने उनको सभी आरोपों से बरी कर दिया। वह मामला फिलहाल केरल हाईकोर्ट में विचाराधीन है।
  8. स्टेट सेक्रेट्री : 1998 में सी गोविंदन की मौत के बाद मंत्रिमंडल से इस्तीफा देते हुए माकपा के स्टेट सेक्रेट्री बने। उन्होंने 2015 तक लगातार तकरीबन 17 साल तक इस पद पर रहकर सर्वाधिक लंबे समय तक इस पद पर रहने का इतिहास रचा है। इस दौरान की इनकी छवि कुशल संगठनकर्ता और सख्त प्रशासक की बनकर उभरी। उनके सख्त रुख के चलते राज्य इकाई में व्याप्त गुटबाजी कम हुई और पार्टी के भीतर उठ रही मुखर विरोधी आवाजें खामोश हुईं।
  9. वीएस अच्युतानंदन से नाता : एक दौर में अच्युतानंदन के विश्वस्त सिपहसालार माने माने जाते थे और 1998 में पलक्कड़ स्टेट कांफ्रेंस में राज्य माकपा की सीटू लॉबी को ध्वस्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाई थी। 2002 में पार्टी के शीर्ष निर्णय लेने वाले निकाय पोलित ब्यूरो के सदस्य बने। उसके बाद दोनों के रिश्तों में तल्खी आ गई, जिसका खामियाजा पार्टी को उठाना पड़ा। 26 मार्च, 2007 को सावर्जनिक रूप से एक-दूसरे के खिलाफ सार्वजनिक बयानबाजी करने के कारण विजयन और अच्युतानंदन को पोलित ब्यूरो से निलंबित कर दिया गया। हालांकि बाद में विजयन को बहाल कर दिया गया। इस बार चुनावों से पहले भी इन दोनों दिग्गजों को पार्टी ने चुनाव लड़ने का टिकट दिया। उस वक्त यह कयास लगाया जा रहा था कि सत्ता में एलडीएफ के आने के बाद मुख्यमंत्री पद की दावेदारी में इनके बीच संघर्ष की स्थिति बनेगी, लेकिन बढ़ती उम्र और राज्य के कास्त्रो की पदवी के साथ 93 साल के उम्रदराज अच्युतानंदन ने अपेक्षाकत अपने से कम आयु के विजयन के पक्ष में दावेदारी छोड़ते हुए विजयन का रास्ता साफ कर दिया।
  10. नए केरल का नारा : चुनाव से पहले विजयन ने राज्यव्यापी दौरा करते हुए एलडीएफ के सत्ता में आने की स्थिति में नए केरल के निर्माण का नारा दिया। पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ निकटता बनाने का प्रयास किया और अधिकाधिक लोगों तक पहुंचने की कोशिश की। धरमदोम विधानसभा सीट से चुनाव लड़कर कामयाबी हासिल की।


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