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पीएम का वाराणसी दौरा : टिकट बंटवारे के असंतोष को कितना कम कर पाए मोदी?

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खास बातें

  1. वाराणसी में प्रचार के आखिरी दिन भी पीएम ने पूरा जोर लगाया
  2. प्रधानमंत्री ने किसी पर भरोसा न करके प्रचार की कमान अपने हाथ में ली
  3. हर उस जगह पर गए जहां से वोट को बैलेंस कर सकते थे
वाराणसी: वाराणसी मे प्रचार के आखिरी दिन भी प्रधानमंत्री पूरे दम ख़म के साथ नजर आए. आज भी उनके स्वागत में लोग सड़कों के किनारे जमा नजर आए.  प्रधानमंत्री ने उनका अपने अंदाज में अभिवादन भी किया. आखिरी चरण के चुनाव प्रचार के आखिरी दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वो गड़वाघाट एक आश्रम में गए वहां लोगों से मिले. उसके बाद लाल बहादुर शात्री की प्रतिमा पर माल्यार्पण करने पहुंचे. मूर्ती पर माला पहनाया और फिर संकरी गली से शात्री जी के घर गए. जहां म्यूजियम में बदल चुके उनके घर का अवलोकन किया. शास्त्री जी पर एक भजन भी सुना.

शास्त्री जी के प्रति इस प्रेम को भाजपा के लोग मोदी की कार्यशैली को शास्त्री जी से जोड़ कर देख रहे हैं.  भाजपा के  लक्षमण आचार्य कहते हैं "दोनों के बीच में बहुत साम्यता है, दोनों ईमानदार, दोनों सादगी, दोनों स्वाभिमान, सच्चे राष्ट्र भक्त और जय जवान और जय किसान दोनों की चिंता करने वाले लाल बहादुर शात्री जी थे. ये आगमन विचारों के अनुकूलता के कारण है.  

साफ़ है कि यहां पर प्रधानमंत्री का आगमन बड़े राजनितिक उद्देश्य के लिए था. वाराणसी में तीन दिन का उनका प्रवास भी राजनीतिक ही था. यहां वो पहले दिन दर्शन करने के लिए सड़क मार्ग से खुली जीप में गए जो अनौपचारिक रूप से रोड शो में तब्दील हो गया. मंदिर के पास उन्होंने शहर दक्षिणी से टिकट न मिलने से नाराज विधायक को भीड़ से खींचकर अपने साथ लेकर बड़ी सफाई से एक संदेश दिया. दूसरे दिन उन्होंने बड़ा रोड शो किया और बाद में सभा में वाराणसी के विकास के लिए दी गई अपनी योजनाओं को गिनाया और राज्य सरकार किस तरह वाराणसी के विकास के राह में रोड़े बिछा रही है. इसे भी बताने से नहीं चूके.

वाराणसी में प्रधानमंत्री जिस तरह तीन दिन प्रचार में अपने आपको झोंका, उसके पीछे बड़ी वजह टिकट के बंटवारे को लेकर उपजा वो असंतोष था जिससे उनके हाथ से यहां की परंपरागत सीट के निकल जाने के डर था. लिहाजा प्रधानमंत्री ने खुद यहां किसी पर भरोसा न करके प्रचार की कमान अपने हाथ में संभाल ली. और वो हर उस जगह गए जहां से वोट को बैलेंस कर सकते थे. यही नहीं उनका पूरा मंत्रिमंडल भी यहां लगा रहा. स्मृति ईरानी महिलाओं से मिल रही थीं तो अरुण जेटली व्यापारियों से. दूसरे मंत्री भी अपने अपने मंत्रालय से संबंधित लोगों से बैठकें कर रहे थे.

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जानकारों का कहना है कि इतनी बड़ी कवायद के बाद पूरा नहीं पर थोड़ा असर जरूर हुआ है. कुछ लोगों ने प्रतिक्रियास्वरूप बताया कि उनकी इस पूरी कवायद से लगता है कि उनका संसदीय क्षेत्र कमजोर हो रहा है, इनके आने से कुछ तो असर पड़ा है. टिकट बंटवारे को लेकर इनकी पार्टी में असंतोष था लेकिन मोदी आए हैं तो सबको मना लिए है आगे देखिये क्या होता है.

प्रधानमंत्री दो दिन का दौरा में वाराणसी सीट को बैलेंस करने के लिए नजर आया तो आखिरी दिन जिस तरह वो गढ़वाघाट और शास्त्री जी की प्रतिमा तक गए उसके वाराणसी से अलग मायने भी दिखाई पड़ रहे हैं. एक तो वो पिछड़ी जाति के मान्य संत के दरबार में जाकर उस बिरादरी को साधने की कोशिश की तो शास्त्री जी के यहां जा कर उनके विचारों से अपने को जुड़ता हुआ दिखाने की कोशिश की जो आखिरी चरण के 7 जिलों की 40 सीटों पर गहरा असर डालने का बड़ा मकसद हो सकता है.


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