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UP elections 2017: 'ब्रांड अखिलेश' धराशायी, टीपू नहीं बन पाए सुल्‍तान-पिछड़ने की 5 वजहें

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UP elections 2017: 'ब्रांड अखिलेश' धराशायी, टीपू नहीं बन पाए सुल्‍तान-पिछड़ने की 5 वजहें

यूपी में सपा-कांग्रेस गठबंधन को सफलता नहीं मिली

चुनाव शुरू होने से ऐन पहले ओपिनियन पोलों में अखिलेश यादव को सीएम की पहली पसंद के रूप में माना गया. परिवार में कलह के बाद जब पार्टी में अखिलेश यादव का वर्चस्‍व स्‍थापित हो गया तो उस वक्‍त उनकी लोकप्रियता में जबर्दस्‍त इजाफा हुआ. उसके बाद कांग्रेस के साथ गठबंधन को उनका 'मास्‍टर स्‍ट्रोक' माना गया. हालांकि चुनाव शुरू होने के बाद जैसे-जैसे चरणवार चुनाव बढ़ता गया, वैसे-वैसे यह गठबंधन प्रचार में बीजेपी के आक्रामक प्रचार के जवाब में रक्षात्‍मक मुद्रा में देखने को मिला. हालांकि राजनीति के जानकार यह कहते हैं कि 'ब्रांड अखिलेश' तो यूपी में मजबूत था लेकिन लगता है कि इन वजहों से यह गठबंधन पिछड़ रहा है:  
   
कुनबे में कलह
चुनाव शुरू होने से छह महीने पहले ही सपा के यादव परिवार में कुलह खुलकर सामने आ गई. इन सबका नतीजा यह हुआ कि पार्टी पूरी तरह से दो फाड़ हो गई. एक तरफ अखिलेश यादव और रामगोपाल यादव थे तो दूसरी तरफ मुलायम सिंह यादव अपने भाई शिवपाल के साथ खड़े दिखाई दिए. इसकी चरण परिणति पार्टी पर दावेदारी के लिए चुनाव आयोग का दरवाजा खटखटाने पद देखने को मिली. हालांकि उसके बाद अखिलेश के पक्ष में आयोग का फैसला तो आ गया लेकिन कुनबे में फूट का खामियाजा निचले स्‍तर पर देखने को मिला. उससे पार्टी की एकजुटता पर बुरा असर पड़ा.

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विश्‍वसनीयता का संकट 
कानून-व्‍यवस्‍था के मामले में सपा सरकार का दामन दागदार रहा. नौकरियों में भेदभाव, लचर कानून-व्‍यवस्‍था, कुशासन के आरोप से विश्‍वसनीयता का संकट खड़ा हुआ. प्रतिष्ठित नौकरियों की परीक्षाओं के पर्चे लीक हुए. इन सबके चलते युवाओं में खासा आक्रोश पनपा. विरोधी बीजेपी ने चुनावों में इसको जमकर भुनाया.  
 
कांग्रेस के साथ गठबंधन
अखिलेश यादव और राहुल गांधी के एक साथ आने से माना गया था कि इनके वोट आपस में एक-दूसरे को ट्रांसफर होंगे लेकिन ऐसा देखने को नहीं मिला. अखिलेश पर कांग्रेस को ज्‍यादा सीटें देने का आरोप लगा. अमेठी समेत तकरीबन 15 सीटों पर दोनों दलों के घोषित प्रत्‍याशियों ने पीछे हटने से इनकार कर दिया. सपा के नेताओं ने यह भी आरोप लगाया कि सपा का तो वोट कांग्रेस में ट्रांसफर हुआ लेकिन कांग्रेस का वोट इसकी तुलना में ट्रांसफर नहीं हो सका. दूसरी बड़ी बात यह रही कि राहुल गांधी के अलावा कांग्रेस के ज्‍यादातर बड़े नेता चुनाव प्रचार से दूर रहे. इसका नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस की तरफ से जमीनी स्‍तर पर चुनाव आक्रामक तरीके से देखने को नहीं मिला.
   
टिकटों की किचकिच
सबसे पहले सपा के तत्‍कालीन प्रदेश अध्‍यक्ष शिवपाल यादव ने प्रत्‍याशियों की सूची जारी की. उसके समानांतर अखिलेश यादव ने सूची जारी कर दी. उसके बाद सपा में कुनबे की कलह के बाद अखिलेश ने कांग्रेस से गठजोड़ किया और उसके बाद फिर टिकटों की किचकिच देखने को मिली. इस चक्‍कर में कई बार पार्टी के प्रत्‍याशी बदल गए. कार्यकर्ताओं के मनोबल पर बुरा असर पड़ा. उसका नतीजा हार के रूप में देखने को मिला.
 
मोदी मैजिक
विरोधियों को हैरान करते हुए बीजेपी की तरफ से पीएम नरेंद्र मोदी ने धुआंधार प्रचार किया. सपा-कांग्रेस गठबंधन को इतनी उम्‍मीद नहीं थी. अंतिम चरणों में तो मोदी ने तीन दिनों तक वाराणसी में जमकर प्रचार किया. इसका सीधा फायदा बीजेपी को मिला.जिस तरह की आक्रामकता पीएम मोदी के प्रचार में देखने को मिली वैसे किसी अन्‍य दल में देखने को नहीं मिली.

मायावती का ट्रंप कार्ड
बीएसपी ने इस बार अपने सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूले के तहत तकरीबन 100 मुस्लिम प्रत्‍याशियों को चुनाव मैदान में उतार दिया. परंपरागत रूप से इस तबके को सपा का वोटर माना जाता रहा है. राजनीतिक विश्‍लेषकों के मुताबिक इस तबके के वोटों के बिखराव को रोकने के लिए ही सपा ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया था. हालांकि इन सबका नतीजा यह हुआ कि अल्‍पसंख्‍यक तबके का वोट सपा और बसपा के बीच बंट गया और इसका सीधा फायदा बीजेपी को मिला.


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