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कर्नाटक की मुधोल विधानसभा सीट : शिकारी कुत्तों के लिये मशहूर यह इलाका बीजेपी का है सुरक्षित गढ़

मुधोल तालुक में बहुत अधिक संख्या में हैंडलूम हैं, जहां हस्तनिर्मित साड़ी बनाई जाती हैं. इन साड़ियों की देश भर में अच्छी मांग भी हैं.

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कर्नाटक की मुधोल विधानसभा सीट : शिकारी कुत्तों के लिये मशहूर यह इलाका बीजेपी का है सुरक्षित गढ़

मुधोल के महाराजा ने किंग जॉर्ज पंचम को शिकारी कुत्तों का जोड़ा भेंट किया था.

बंगलोर: कर्नाटक विधानसभा चुनाव की जंग भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस की विचारधाराओं के साथ दिग्गजों की जंग के रूप में भी देखी जा रही है. दोनों पार्टियां जहां हर सीट पर जीत हासिल करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रही हैं तो वहीं कुछ सीटें ऐसी हैं जहां नेताओं का रुतबा उनकी जीत की गारंटी तय करता दिखाई देता है. भाजपा के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार बीएस येदियुरप्पा के बाद राज्य इकाई के दूसरे दिग्गज नेता गोविंद करजोल मुधोल विधानसभा क्षेत्र से मैदान में हैं. कर्नाटक विधानसभा क्षेत्र संख्या-19 यानी मुधोल निर्वाचन क्षेत्र दुनिया भर में शिकारी कुत्ते की मूल नस्ल के लिए जाना जाता है. 1900 के दशक में इंग्लैंड की यात्रा करने वाले मुधोल के महाराजा किंग जॉर्ज पांचवें को शिकारी कुत्तों का एक जोड़ा भेंट किया था, जो मुधोल नस्ल को लोकप्रिय बनाता था. मुधोल में शिव का एक बहुत पुराना भूमिगत मंदिर है. साथ ही मुधोल यहां पाए जाने वाले बारीक पत्थरों के लिए भी प्रसिद्ध है. 

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मुधोल तालुक में बहुत अधिक संख्या में हैंडलूम हैं, जहां हस्तनिर्मित साड़ी बनाई जाती हैं. इन साड़ियों की देश भर में अच्छी मांग भी हैं. इसके अलावा मुधोल कई चीनी कारखानों के लिए भी पूरे राज्य में प्रसिद्ध है. बात करें क्षेत्रीय राजनीति की तो मुधोल निर्वाचन क्षेत्र 1978 से लेकर 2008 से अनुसूचित जाति (एससी) श्रेणी के लिए आरक्षित था.  हालांकि 2013 में इसे एक सामान्य श्रेणी निर्वाचन क्षेत्र में बदल दिया गया था. उत्तरी कर्नाटक के बागलकोट जिले में स्थित मुधोल निर्वाचन क्षेत्र में चुनाव की शुरुआत 1957 के बाद से कभी भी भाजपा का नेता दूसरे नंबर पर नहीं रहा.  हालांकि 1999 इसका अकेला अपवाद रहा है, जहां कांग्रेस उम्मीदवार रामप्पा बालाप्पा ने गोविंद करजोल को शिकस्त दी थी.
 
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भाजपा कर्नाटक इकाई के उपाध्यक्ष गोविंद करजोल मुधोल निर्वाचन क्षेत्र के सबसे अनुभवी उम्मीदवार हैं. 1994 में जनता दल के टिकट पर कांग्रेस के उम्मीदवार रामप्पा बालाप्पा के खिलाफ चुनाव लड़कर जीतने वाले गोविंद ने इस क्षेत्र पर कब्जा जमाया था. हालांकि 1999 के विधानसभा चुनाव में उन्हें बालाप्पा के हाथों शिकस्त का सामना करना पड़ा था, लेकिन 2004, 2008 और 2013 के विधानसभा चुनावों में जीत दर्ज कर गोविंद ने इस सीट को भाजपा की सुरक्षित सीटों में शुमार कर दिया.

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प्रदेश उपाध्यक्ष गोविंद विधानसभा चुनाव 2018 में एक बार फिर से मैदान में हैं. वहीं लगातार पांच विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के हाथ के साथ मैदान में उतरने वाले रामप्पा बालाप्पा से पार्टी ने किनारा कर सतीश चिन्नपा बंदीवद्दार को टिकट दिया है. नए नेता सतीश को टिकट दिए जाने से कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने अपना विरोध दर्ज कराया था और पांच बार गोविंद के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले रामप्पा बालाप्पा को फिर से टिकट देने की मांग की थी. 

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वहीं राज्य में सत्ता की राह तलाश रही जनता दल (सेक्युलर) ने शंकर नाईक को चुनाव मैदान में उतारा है. शंकर ने 2003 में अखिल भारतीय प्रगतिशील जनता दल (एआईपीजेडी) का दामन छोड़कर जेडी (एस) का हाथ थामा था.  इसके साथ ही शिवसेना के अरविंद कांबली, रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के भीमराव कालवगोल, प्रबुद्ध रिपब्लिकन पार्टी के रमेश गोन्यागोल, कर्नाटक राज्य रोयता संघ के बस्वंत लक्ष्मण कांबली और एक निर्दलीय चुनाव मैदान में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं. ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन पहले ही जनता दल (सेक्युलर) को अपना समर्थन देने की घोषणा कर चुकी है. कर्नाटक की 224 सदस्यीय विधानसभा के लिए 12 मई को मतदान होगा और मतों की गणना 15 मई को होगी.

(हेडलाइन के अलावा, इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है, यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)


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