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क्या कर्नाटक भी हो जायेगा इस बार 'कांग्रेस मुक्त'? साख बचाने की बड़ी चुनौती

कर्नाटक में इस समय तीन बड़ी पार्टियां हैं जिनमें बीजेपी-कांग्रेस और देवगौड़ा की जनता दल सेक्युलर शामिल है हालांकि इसके अलावा कई छोटी पार्टियां भी हैं.

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क्या कर्नाटक भी हो जायेगा इस बार 'कांग्रेस मुक्त'?  साख बचाने की बड़ी चुनौती

कांग्रेस के सामने इस कर्नाटक की सत्ता बचाने की चुनौती है

खास बातें

  1. बीजेपी के साथ इस बार येदियुरप्पा और श्रीरामलू
  2. 2014 में बड़ा बीजपी का वोटबैंक
  3. विधान परिषद में कांग्रेस का वोटबैंक बढ़ा
नई दिल्ली: क्या कर्नाटक  भी कांग्रेस मुक्त हो जायेगा? बीजेपी ने पीएम नरेंद्र मोदी सहित पूरी ताकत झोंक रही है. कांग्रेस की ओर से पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने मोर्चा संभाल रखा है. इसी बीच अचानक खबर आई कि यूपीए की अध्यक्ष और कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी भी आज बीजापुर में रैली करेंगी. करीब दो साल बाद चुनावी रण में वह मैदान में हैं. दरअसल सोनिया गांधी कांग्रेस की परंपरागत सीट बेल्लारी से एक बार चुनाव जीत चुकी हैं और कांग्रेस के रणनीतिकार एक बार फिर से सोनिया की छवि को भुनाने चाहते हैं जबकि सोनिया खुद राजनीति से संन्यास का इशारा कर चुकी हैं. ऐसे में सवाल इस बात का है कि कर्नाटक के चुनाव में भारी-भरकम फौज के साथ उतरे राहुल गांधी को अचानक सोनिया गांधी की जरूरत क्यों पड़ गई है? क्या कर्नाटक में कांग्रेस को सत्ता विरोधी लहर का डर सता रहा है.

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कर्नाटक में इस समय तीन बड़ी पार्टियां हैं जिनमें बीजेपी-कांग्रेस और देवगौड़ा की जनता दल सेक्युलर शामिल है हालांकि इसके अलावा कई छोटी पार्टियां भी हैं. कर्नाटक में 224 विधानसभा और 28 लोकसभा सीटें हैं. बीएस येदियुरप्पा ने 2013 में बीजेपी छोड़कर अपनी पार्टी बना ली थी क्योंकि भ्रष्टाचार के आरोप के उनको पार्टी ने सीएम प्रत्याशी नहीं बनाया था.
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इस चुनाव में बीजेपी को 20 फीसदी, कांग्रेस को 36.6 फीसदी और जेडीएस को 20 फीसदी के करीब वोट मिले थे. कांग्रेस ने इस चुनाव में जीती थी और सिद्धारमैया सीएम बने थे. इसमें बीजेपी की हार का बड़ा कारण बीएस येदियुरप्पा रहे हैं.
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जिन्होंने अपनी पार्टी की बनाकर चुनाव लड़ा था और 9.8 फीसदी वोट पाये थे. ऐसा माना जाता है कि अगर येदियुरप्पा बीजेपी में रहते तो कांग्रेस का जीतना मुश्किल था. क्योंकि इन हालात में बीजेपी के हिस्से में येदियुरप्पा की पार्टी केजीपी के वोट भी मिल जाते और बीजेपी का वोट करीब 30 फीसदी के आसपास सीधे-सीधे हो जाता है. 

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इसके अलावा एक और बड़े नेता बी श्रीरामलू जो अब बीजेपी सांसद भी हैं. जिन्होंने उस बीजेपी से अलग होकर बीएसआर पार्टी बनाई थी जिनको 2.7 फीसदी मिली थी. अगर इनके भी वोट जोड़ लें तो बीजेपी के पास 32.4 फीसदी वोट हो जाता.
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मतलब बीजेपी के इन दो बड़े नेताओं ने 12 प्रतिशत से ज्यादा वोट काट लिये थे. यानी इन सबको जोड़ लिया जाये तो कांग्रेस के वोट प्रतिशत से बीजेपी को सिर्फ 4 फीसदी ही वोट ज्यादा मिलते हैं.  अब बात करें लोकसभा चुनाव 2014 जब बीएस येदियुरप्पा और बी. श्रीरामलू बीजेपी में वापस आ गये. इस चुनाव में बीजेपी को 43 कांग्रेस को 40.8 और जेडीएस को 11 फीसदी वोट मिला. जेडीएस का वोट प्रतिशत घट गया था.
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लेकिन बीजेपी के वोट प्रतिशत में 10 फीसदी से ज्यादा  और कांग्रेस का भी 4 फीसदी बढ़ गया. कर्नाटक विधानसभा में बहुमत के लिए 113 सीटें चाहिए और साल 2014 में मिले वोट प्रतिशत को विधानसभा सीटों में बदले तो बीजेपी को 132, कांग्रेस को 77 और जेडीएस को 11 सीटें मिलेंगी. यानी कांग्रेस को अभी वर्तमान सीटों में से 40 से 45 सीटें का नुकसान हो जायेगा.

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अगर मान लिया कि लोकसभा में मोदी लहर के चलते बीजेपी का वोट प्रतिशत बढ़ गया था ऐसा इस चुनाव में नहीं होगा और इस हिसाब से हम बीजेपी के वोट प्रतिशत में 2 फीसदी की कटौती कर दें और उसे कांग्रेस में जोड़ दें तो भी बीजेपी को 112 सीटें मिल रही हैं. इसी तरह 3 फीसदी की कटौती करते हैं तो बीजेपी को 103 और कांग्रेस को 111 सीटें मिलेंगी और जेडीएस को 10 सीटें मिलेंगी. ऐसे में जेडीएस किंग मेकर पार्टी बन जाएगी.  वहीं 2016 में हुए जिला परिषद के चुनाव में तो बीजेपी के वोट शेयर 34.8, कांग्रेस 46.9 और जेडीएस को 15.7 फीसदी वोट मिले. इस हिसाब से बीजेपी का वोट फीसदी काफी घट गया था. इसको विधानसभा सीट के हिसाब से देखें तो कांग्रेस को 149, बीजेपी को 46 और जेडीएस को 29 सीटें मिलती दिखाई दे रही हैं. 
 


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