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मध्यप्रदेश : राजधानी भोपाल की सीटों पर आ सकते हैं चौंकाने वाले चुनाव परिणाम

बीजेपी का गढ़ बन चुकीं छह सीटों पर जहां कांग्रेस ने इस बार जोर लगाया वहीं आम आदमी पार्टी ने भी दम लगाया

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मध्यप्रदेश : राजधानी भोपाल की सीटों पर आ सकते हैं चौंकाने वाले चुनाव परिणाम

प्रतीकात्मक फोटो.

खास बातें

  1. सपा, बसपा समेत कई छोटे दलों ने चुनाव में जोरआजमाइश की
  2. बीजेपी और कांग्रेस के लिए बागी प्रत्याशी परेशानी का कारण बने रहे
  3. भोपाल जिले के सात विधानसभा क्षेत्रों में से छह पर बीजेपी का कब्जा
नई दिल्ली:

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल की सीटों पर इस बार का विधानसभा चुनाव काफी फेरबदल करा सकता है. बीजेपी का गढ़ बन चुकीं छह सीटों पर जहां कांग्रेस ने इस बार जोर लगाया वहीं आम आदमी पार्टी ने भी दम लगाया है. इसके अलावा सपा, बसपा समेत कई छोटे दल चुनाव में जोरआजमाइश कर चुके हैं. बीजेपी हो या कांग्रेस, इस बार इन दोनों प्रमुख दलों के लिए बागी प्रत्याशी भी परेशानी का कारण बने रहे हैं. मंगलवार को मतगणना के साथ परिणाम सामने आएंगे और तय हो जाएगा कि राजधानी के मतदाताओं की क्या पसंद रही.   

भोपाल जिले में कुल सात विधानसभा क्षेत्र हैं  बैरसिया, भोपाल उत्‍तर, भोपाल दक्षिण-पश्चिम, भोपाल मध्‍य, हुजूर, नरेला एवं गोविन्‍दपुरा. फिलहाल इनमें से छह पर बीजेपी का और एक पर कांग्रेस का कब्जा है. छह सीटें भोपाल शहर की हैं जबकि एक सीट बैरसिया ग्रामीण क्षेत्र की है.  

भोपाल उत्तर : कांग्रेस में राजधानी की इकलौती सीट बचाने की चुनौती
भोपाल उत्तर विधानसभा सीट पर कांग्रेस के आरिफ अकील एक बार फिर भाग्य आजमा रहे हैं. इस बार उन्हें बीजेपी की फातिमा रसूल सिद्दीकी ने टक्कर दी है. आरिफ अकील सन 1998 से लगातार इस क्षेत्र के विधायक हैं. बीजेपी ने इकलौती मुस्लिम महिला प्रत्याशी को इस सीट पर टिकट दिया. आरिफ अकील के लिए इस बार का चुनाव खासी मशक्कत वाला रहा.


भोपाल उत्तर सीट पर पर कुल 9 प्रत्याशी चुनाव लड़े हैं. कांग्रेस से आरिफ अकील, बीजेपी से फातिमा रसूल सिद्दीकी के अलावा आम आदमी पार्टी से मुन्ना सिंह चौहान, बीएसपी से प्रकाश और राष्ट्रीय लोक समता पार्टी से योगेंद्र कैलाशिया चुनाव लड़े. चार निर्दलीय उम्मीदवार भी मैदान में थे.

फातिमा कहती हैं कि वे अपने पिता की हार का बदला लेने के लिए कांग्रेस के आरिफ अकील के खिलाफ मैदान में उतरीं. सन 1980 और 1985 में उनके पिता कांग्रेस के रसूल अहमद विधानसभा चुनाव जीते थे. साल 1990 में हुए चुनाव में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा और निर्दलीय उम्मीदवार आरिफ अकील जीत गए. सन 1977 में अस्तित्व में आई इस सीट पर पहली बार जनता पार्टी के हामिद कुर जीते थे. इसके बाद  इस सीट पर बीजेपी को सन 1993 में कामयाबी मिली और रमेश शर्मा यहां से जीते. इलाके में मुस्लिम वोटरों के दबदबे वाली इस सीट पर बीजेपी ने मुस्लिम प्रत्याशी का दांव खेला है.

आरिफ अकील के लिए इस बार यह चुनाव कड़ी चुनौती के रूप में सामने आया जबकि बीजेपी इस सीट पर नई उम्मीद तलाश रही है.

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नरेला में बड़ी संख्या में प्रत्याशी, बंट सकते हैं वोट
भोपाल की नरेला विधानसभा सीट पर बीजेपी के मौजूदा विधायक और मंत्री विश्वास सारंग एक बार फिर चुनाव लड़े हैं. कांग्रेस ने महेंद्र सिंह चौहान से उनका मुकाबला हुआ. महेन्द्र सिंह वर्ष 2013 में हुए विधानसभा चुनाव में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ सीहोर की बुधनी सीट से मैदान में थे और बड़े अंतर से हार गए थे.

नरेला में कुल 28 उम्मीदवार चुनाव लड़े हैं. बीजेपी के विश्वास सारंग, कांग्रेस के डॉ महेंद्र सिंह चौहान, सपाक्स के कर्नल केसरी सिंह, बीएसपी से मेहरबान सिंह तितोरिया, समाजवादी पार्टी के विपिन कुमार यादव और शेष छोटी पार्टियों के व निर्दलीय प्रत्याशी हैं. खास बात यह है कि महेंद्र नाम के तीन प्रत्याशी हैं.

मध्यप्रदेश की नरेला विधानसभा सीट पर अब तक दो बार चुनाव हुए हैं. यह सीट साल 2008 में अस्तित्व में आई. दोनों ही बार बीजेपी को जीत मिली है. कांग्रेस का खाता इस सीट पर अब तक नहीं खुला है. विश्वास सारंग ने साल 2013 के चुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार सुनील सूद को 26 हजार से ज्यादा वोटों से हराया था. सारंग शिवराज सरकार में राज्यमंत्री हैं. इससे पहले 2008 के चुनाव में भी यहां पर बीजेपी को ही जीत मिली थी. तब भी विश्वास सारंग ने कांग्रेस के सुनील सूद को हराया था. तब सुनील सूद को 53802 वोट और सारंग को 57075 वोट मिले थे.

दावा किया जा रहा है नरेला में सारंग ने विकास के कई काम किए. उन्होंने यहां पर कई फ्लाईओवर बनवाए जिसका फायदा उन्हें मिला है. सारंग सिविल इंजीनियर हैं. इस बार इस सीट पर आम आदमी पार्टी का भी  उम्मीदवार है. आप से रिहान जाफरी चुनाव लड़े हैं. यानी कि बीजेपी का मुकाबला सिर्फ कांग्रेस से ही नहीं आम आदमी पार्टी से भी था.

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गोविंदपुरा में बहू के सामने ससुर की 44 साल पुरानी सीट बचाने की चुनौती  
गोविंदपुरा विधानसभा सीट से बीजेपी की ओर से कृष्णा गौर ने चुनाव लड़ा. कांग्रेस से गिरीश शर्मा मैदान में हैं.  गोविंदपुरा विधानसभा सीट बीजेपी के दिग्गज नेता, पूर्व मुख्यमंत्री और कृष्णा गौर के ससुर बाबूलाल गौर की पारंपरिक सीट रही है.  

गोविंदपुरा में 17 प्रत्याशी चुनाव लड़े हैं. बीजेपी से कृष्णा गौर, कांग्रेस से गिरीश शर्मा, बीएसपी से बाबूलाल वाल्मीकि, आप से मनोज कुमार पाल, सपाक्स से शैलेंद्र व्यास और बाकी छोटे दलों के व निर्दलीय उम्मीदवार हैं.

88 साल के बाबूलाल गौर भोपाल के गोविंदपुरा क्षेत्र से अब तक विधायक हैं. उन्होंने इस बार भी टिकट की दावेदारी की थी लेकिन पार्टी ने उनकी जगह उनकी बहू को टिकट दिया. बाबूलाल गौर पिछले 44 साल से इस सीट से विधायक हैं. वे रिकॉर्ड दस बार यहां से चुनाव जीत चुके हैं. गोविंदपुरा सीट पर बाबूलाल गौर पहली बार 1974 में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतरे थे और जीते थे.

इस सीट पर 1967 में पहली बार चुनाव हुआ था. यहां अब तक 11 विधानसभा चुनाव हुए हैं. इनमें कांग्रेस दो बार, बीजेपी आठ बार और अन्य एक बार विजयी रहे. 2013 के चुनाव में गौर ने कांग्रेस के गोविंद गोयल को हराया था. 2013 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 64.34 प्रतिशत और कांग्रेस को 25.35 प्रतिशत मत मिले थे.

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भोपाल मध्य में पुराने प्रतिद्वंदियों के बीच मुकाबला
मध्य विधानसभा क्षेत्र से बीजेपी के सुरेंद्रनाथ सिंह चुनावी रणभूमि में उतरे. कांग्रेस ने इस सीट पर आरिफ मसूद को फिर मौका दिया. भोपाल मध्य में कांग्रेस से आरिफ मसूद, बीजेपी से सुरेंद्रनाथ सिंह, आप से फराज खान, बीएसपी से गोकुल शाक्य, सीपीआई से फिदा हुसैन, सपाक्स से पीके मंजूरे, सपा से जितेंद्र कुमार साहू ने चुनाव लड़ा.

भोपाल मध्य विधानसभा क्षेत्र से 2013 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के सुरेंद्र नाथ सिंह जीते थे. उन्होंने कांग्रेस के आरिफ मसूद को हराया था. साल 2008 के चुनाव में बीजेपी के ध्रुवनारायण सिंह ने कांग्रेस के नासिर इस्लाम को चुनावी मैदान में मात दी थी. 2013 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के सुरेंद्र नाथ सिंह को 70696 वोट और कांग्रेस के आरिफ मसूद को 63715 वोट मिले थे. सन 2008 के चुनाव में बीजेपी के ध्रुवनारायण सिंह को 50061 और कांग्रेस के सुनील सूद को 47542 वोट हासिल हुए थे.

2013 के विधानसभा चुनाव में कुल 230 विधानसभा सीटों में से बीजेपी ने 165 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी. वहीं कांग्रेस 58 सीटों पर ही जीत हासिल कर पाई थी. बसपा ने 4 और अन्य ने 3 सीटों पर जीत दर्ज कराई थी

भोपाल दक्षिण-पश्चिम में 'आप' बिगाड़ सकती है खेल
भोपाल दक्षिण-पश्चिम विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस के पीसी शर्मा का मुकाबला फिर बीजेपी के उमाशंकर गुप्ता से हुआ लेकिन इस बार आम आदमी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष आलोक अग्रवाल भी चुनाव लड़े जो कि इस सीट के परिणाम को प्रभावित करेंगे.

पीसी शर्मा की बड़े वोट बैंक पर अच्छी पकड़ है जिससे उमाशंकर गुप्ता के सामने काफी मुश्किल पैदा हुई. भोपाल दक्षिण-पश्चिम में नौ प्रत्याशी हैं. बीजेपी से उमाशंकर गुप्ता,  कांग्रेस से पीसी शर्मा, आम आदमी पार्टी से आलोक अग्रवाल, बीएसपी से रणधीर भोजाने चुनाव लड़े.

दक्षिण-पश्चिम विधानसभा सीट राज्य की हाई प्रोफाइल सीटों में से एक है. यहां के विधायक उमाशंकर गुप्ता शिवराज कैबिनेट में मंत्री हैं. इस सीट पर ज्यादातर बीजेपी का ही कब्जा रहा है. परिसीमन से पहले साल 1998 में कांग्रेस के पीसी शर्मा ने यहां चुनाव जीता था. उसके बाद से इस सीट पर बीजेपी ने ही जीत हासिल की है.

सन 2013 के चुनाव में बीजेपी के उमाशंकर गुप्ता ने कांग्रेस के संजीव सक्सेना को 18 हजार से ज्यादा वोटों से हराया था. उमाशंकर गुप्ता को इस चुनाव में 71167 वोट मिले थे. कांग्रेस के संजीव सक्सेना को 52969 वोट मिले थे. इससे पहले 2008 के चुनाव में भी गुप्ता ने जीत हासिल की थी. इस बार भी उन्होंने कांग्रेस के संजीव सक्सेना को हराया था. तब गुप्ता ने 26 हजार से ज्यादा वोटों से सक्सेना को हराया था.

भोपाल-हुजूर पर बीजेपी के सामने कब्जा बरकरार रखने की चुनौती
हुजूर विधानसभा क्षेत्र से बीजेपी के रामेश्वर शर्मा और कांग्रेस के नरेश ज्ञानचंदानी ने चुनाव लड़ा है. हुजूर सीट पर 12 उम्मीदवार हैं जिनमें सपाक्स से डॉ संभव कुमार जैन, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी से राधा, बीएसपी से डीके सिरसवाल शामिल हैं.

इस सीट पर बीजेपी के बागियों ने पार्टी के सामने मुश्किल खड़ी की. सन 2008 में इस सीट से चुने गए बीजेपी के जितेंद्र डागा 2013 में टिकट कटने के बाद शांत रहे. इस बार उनको उम्मीद थी कि उन्हें मौका मिलेगा. लेकिन रामेश्वर शर्मा को फिर से टिकट मिलने से नाराजगी के बाद निर्दलीय नामांकन जमा कर दिया. हालांकि बाद में उन्हें मना लिया गया और उन्होंने नाम वापस ले लिया.

साल 2013 के चुनाव में रामेश्वर शर्मा ने 59 हजार से ज्यादा वोटों के अंतर से जीत दर्ज की. कांग्रेस के राजेंद्र मंडलोई को 49390 वोट मिले थे और रामेश्वर शर्मा को 108994 वोट मिले थे. साल 2008 के चुनाव में बीजेपी के जितेंद्र डागा ने कांग्रेस के भगवान दास साबनानी को 16 हजार से ज्यादा वोटों से हराया था. इस चुनाव में जितेंद्र डागा को 40241 वोट मिले थे तो वहीं भगवान दास साबनानी को 23261 वोट मिले थे.

हुजूर सीट पर 2008  से बीजेपी का कब्जा है. रामेश्वर शर्मा यहां के विधायक हैं. हुजूर पहले गोविंदपुरा विधानसभा का हिस्सा थी. हुजूर विधानसभा सीट भोपाल का सबसे बिखरा हुआ इलाका है. शहर का हर बाहरी क्षेत्र इस विधानसभा में आता है. विधानसभा क्षेत्र मुख्य रूप से तीन हिस्सों में बंटा हुआ है जिस वजह से तीनों इलाकों की समस्याएं अलग-अलग हैं.

बैरसिया में बगावत का झंडा
भोपाल जिले की बैरसिया विधानसभा सीट पर सात प्रत्याशी चुनाव लड़े हैं. कांग्रेस से जयश्री, बीजेपी से विष्णु खत्री, आप से शिवनारायण,  बीएसपी से अनीता अहिरवार, राष्ट्रीय लेक समता पार्टी से तोरण सिंह अहिरवार मैदान में हैं.

बीजेपी के विष्णु खत्री बैरसिया से मौजूदा विधायक हैं. उन्हें बीजेपी के बागी ब्रह्मानंद रत्नाकर का भी मुकाबला करना पड़ा है. बीजेपी के विष्णु खत्री 2013 में बैरसिया से चुनाव जीतकर विधायक बने थे. ब्रह्मानंद रत्नाकर ने साल 2008 में कांग्रेस के हीरालाल को इसी सीट पर 23 हजार वोट से हराया था. बैरसिया बीजेपी का किला माना जाता है. कांग्रेस महज दो बार 1957 और 1998 में इस सीट पर काबिज हो पाई है.

बैरसिया सीट पर साल 2013 के विधानसभा चुनाव में विष्णु खत्री (बीजेपी) ने 76657 वोट हासिल कर जीत दर्ज की थी. उन्होंने अपने प्रतिद्वंदी को 29304 मतों के अंतर से हराया था. कांग्रेस के महेश रत्नाकर को  47353 वोट मिले थे.

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VIDEO : बीजेपी की इकलौती महिला उम्मीदवार

मध्यप्रदेश में कुल 231 विधानसभा सीटें हैं. इनमें से 230 सीटों पर चुनाव होते हैं जबकि एक सदस्य को मनोनीत किया जाता है. साल 2013 के चुनाव में बीजेपी को 165, कांग्रेस को 58, बसपा को चार और अन्य को तीन सीटें मिली थीं.



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