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राज्यसभा सदस्यता खत्म होने के बाद शरदजी का क्या होगा?

अब शरद यादव के पास लालू शरणम गच्छामी के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं, बिहार में शरद यादव के अभियान का असर नगण्य

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राज्यसभा सदस्यता खत्म होने के बाद शरदजी का क्या होगा?

शरद यादव (फाइल फोटो).

खास बातें

  1. शरद यादव को जेडीयू की तरह सम्मान लालू यादव से कभी नहीं मिलेगा
  2. अपने पुराने संसदीय क्षेत्र मधेपुरा से शरद को चुनाव लड़ाना चाहते हैं लालू
  3. 2019 के लोकसभा चुनाव में एक हार-जीत पर राजनीतिक भविष्य निर्भर
पटना: शरदजी का क्या होगा? वो चाहे शरद यादव के समर्थक हों या विरोधी, सब इस सवाल का जवाब चाहते हैं खासकर उनकी राज्यसभा सदस्यता रद होने के बाद. बिहार की राजनीति में शरद यादव को ‘ शरद जी’ के नाम से लोग सम्बोधित करते हैं.

जहां तक जनता दल यूनाइटेड का सवाल है उसने ये कहकर पल्ला झाड़ लिया कि सदस्यता रद करने का निर्णय राज्यसभा के सभापति का है, उनका निर्णय से कोई लेना देना नहीं. ये बात अलग है कि उनकी सदस्यता न बचे, इस मुहिम की शुरुआत और उसको तार्किक परिणति तक पहुंचाने में वर्तमान अध्यक्ष नीतीश कुमार के निर्देशन में कोई कसर नहीं छोड़ी गई थी. हालांकि शरद की सदस्यता न जाए इसके लिए कांग्रेस पार्टी ने भी बहुत प्रयास किए, जिसका उदाहरण था पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल का उनकी तरफ से घंटों चुनाव आयोग में बहस करना.

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शरदजी की सदस्यता नहीं बचेगी इस बात का आभास राजद की उस रैली के दौरान हो गया था जहां उनकी तब की पार्टी जनता दल यूनाइटेड ने सार्वजनिक रूप से न जाने का आग्रह किया था. शरद चाहते थे कि उस रैली में उनकी साझा विरासत का एक बैनर लग जाता तो उनकी सदस्यता बच सकती थी. लेकिन लालू इसके लिए नहीं माने.

लेकिन अब शरदजी की मजबूरी है कि उनके पास लालू शरणम गच्छामी के बाद कोई दूसरा विकल्प नहीं. बिहार में अभी तक अपने अभियान में उनका असर नगण्य रहा है. जो नेता उनके साथ हैं वे पराजित सांसद या विधायक हैं. जो पिछले हफ़्ते पटना के श्रीकृष्णा मेमोरियल हाल भी नहीं भर सके जिसकी पूरी क्षमता मात्र 2200 लोगों की है.

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हालांकि लालू शायद उन्हें राज्यसभा भेजने की जल्दीबाज़ी में फ़िलहाल नहीं हैं. लालू के पास वर्तमान में राज्यसभा में दो सदस्यों को भेजने की शक्ति है लेकिन वे पहले बीएसपी सुप्रीमो को बिहार से राज्यसभा भेजने का सार्वजनिक वादा कर चुके हैं. ऐसे में उनकी इच्छा है कि शरद, अपने पुराने संसदीय क्षेत्र मधेपुरा से चुनाव लड़ें. शरद के लिए ये बहुत सम्माजनक रास्ता नहीं है क्योंकि अगर वे चुनाव हार गए तो उनके राजनीतिक भविष्य पर एक सवाल खड़ा हो जाएगा.

जो सम्मान नीतीश के साथ जनता दल यूनाइटेड में शरदजी को मिलता था शायद वैसी राजनीतिक इज़्ज़त न राजद और न ही लालू यादव या उनके राजनीतिक वंशज से उन्हें मिल सकती है. नीतीश कुमार जब तक पानी सर से ऊपर नहीं जाता तब तक मुंह फुलाकर संवाद खत्म नहीं करते और शरद जब तक पार्टी में रहे ससम्मान रहे. लेकिन उन्होंने 2014 लोकसभा चुनाव में पराजय के बाद नीतीश कुमार की राजनीतिक हैसियत खत्म करने के चक्कर में अपना राजनीतिक क़ब्र खोद डाली.

VIDEO : शरद यादव की राज्यसभा सदस्यता समाप्त


राजनीति में किसी का राजनीतिक आबिचुरी नहीं लिखी जाती लेकिन शरद यादव अपनी राजनीति के उस चौराहे पर खड़े हैं जहां 2019 लोकसभा चुनाव में एक हार और जीत उनका पूरा राजनीतिक भविष्य तय करेगा.


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