बिहार के सभी दलित विधायकों ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को पत्र लिख एससी-एसटी आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों पर जताई चिंता

बिहार में सभी राजनीतिक दलों के दलित विधायकों ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को पत्र लिख अनुसूचित जाति और जनजाति के आरक्षण के प्रावधान के सम्बंध में सुप्रीम कोर्ट के हाल के फ़ैसले पर अपनी चिंता जाहिर की है.

बिहार के सभी दलित विधायकों ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को पत्र लिख एससी-एसटी आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों पर जताई चिंता

बिहार के सभी दलित विधायकों ने एससी-एसटी आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों पर चिंता जाहिर की है.

पटना:

बिहार में सभी राजनीतिक दलों के दलित विधायकों ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को पत्र लिख अनुसूचित जाति और जनजाति के आरक्षण के प्रावधान के सम्बंध में सुप्रीम कोर्ट के हाल के फ़ैसले पर अपनी चिंता जाहिर की है. शुक्रवार को बिहार विधानसभा की लॉबी में सभी पार्टी के दलित विधायकों नें एससी/एसटी आरक्षण के विषय पर बैठक की. उन्होंने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को इस संबंध में पत्र लिखा है. इस पत्र में उन्होंने अनुसूचित जाति/जनजाति को प्राप्त संवैधानिक संरक्षण एवं सामाजिक न्याय के अधिकारों के विरूद्ध सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्देशों को निरस्त करते हुए प्रतिनिधित्व आरक्षण के प्रावधान को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग की है.

इस 4 पन्नों के पत्र पर बिहार सरकार में उद्योग मंत्री श्याम रजक, पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी, विधायक लालन पासवान, रामप्रीत पासवान, शिवचंद्र राम, प्रभुनाथ प्रसाद, रवि ज्योति, शशिभूषण हजारी, निरंजन राम, स्वीटी हेंब्रम सहित कुल 22 दलित विधायकों ने अपने हस्ताक्षर किए हैं.

इस पत्र में उन्होंने लिखा, "सुप्रीम कोर्ट भारतीय संविधान का संरक्षक और अंतिम व्याख्याकार है. किन्तु बहुत ही दुख से कहना पड़ रहा है कि 2017 से अब तक लगातार सुप्रीम कोर्ट का अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति वर्ग को प्राप्त प्रतिनिधित्व आरक्षण एवं प्रमोशन में प्रतिनिधित्व आरक्षण के विरोध में फैसला आया है." सारे विधायकों ने इस सम्बन्ध में उचित और न्यायसंगत निर्णय लेने की अपील की है.

विधायकों का कहना है, 'भारतीय संविधान के मौलिक अधिकार के अंतर्गत अनुच्छेद 15.4 और 16.4 में स्पष्ट प्रावधान किया गया है कि सामाजिक एवं शैक्षणिक दृष्टि से अनुसूचित जाति एवं जनजाति वर्ग के लिए शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश में तथा सरकारी सेवाओं की नियुक्तियों में विशेष प्रावधान किया जा सकेगा. इसी के तहत सभी श्रेणियों को शिक्षण संस्थानों में नामांकन में और राज्य की सेवाओं में प्रतिनिधित्व आरक्षण एवं प्रमोशन में आरक्षण दिया जा रहा था.' उन्होंने कहा कि इसमें आर्थिक आधार पर आरक्षण प्रतिनिधित्व देने की कोई बाते नहीं कही गई है.

Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com

विधायकों ने पत्र में लिखा कि उत्तराखंड में बीजेपी की सरकार ने 2019 में अनसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए पूर्व से जारी प्रमोशन में आरक्षण को लागू नहीं करने का निर्णय लिया. इसके विरोध में इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला भी आया था और सरकार द्वारा जारी अधिसूचना को निरस्त कर दिया था. लेकिन उत्तराखंड सरकार ने उसे लागू नहीं कर सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर कर दी.

पत्र में लिखा गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करते हुए निर्णय दिया कि प्रमोशन में आरक्षण लागू करने हेतु न्यायालय राज्य सरकार को कोई आदेश नहीं दे सकती है और यह मामला राज्य के विवेक पर निर्भर करेगा कि वह आरक्षण लागू करे या न करें. विधायकों के पत्र में लिखा है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपनी संवैधानिक सीमा और दायित्व से अलग हटकर कहा है कि आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है. जबकि लोग जानते है कि प्रमोशन में आरक्षण के प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 16.4(क), 16.4 (ख) में है और वह मौलिक अधिकार के अंतर्गत आता है.