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विश्लेषण : कुशवाहा अगर लालू के साथ चले जाएं तो बिहार की राजनीति में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा

बिहार की राजनीति इन दिनों इस बात को लेकर गरम है कि केंद्रीय मंत्री उपेन्द्र कुशवाहा का अगला क़दम क्या होगा.

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विश्लेषण : कुशवाहा अगर लालू के साथ चले जाएं तो बिहार की राजनीति में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा

उपेंद्र कुशवाहा.

पटना: बिहार की राजनीति इन दिनों इस बात को लेकर गरम है कि केंद्रीय मंत्री उपेन्द्र कुशवाहा का अगला क़दम क्या होगा. उनकी भविष्य की राजनीति को लेकर पिछले काफ़ी समय से क़यास लगाए जा रहे हैं लेकिन मंगलवार को उनकी ‘शिक्षा सुधार मानव क़तार' के नाम पर मानव श्रृंखला में राष्ट्रीय जनता दल के तीन वरिष्‍ठ नेता शामिल होने के साथ ही अटकलों और राज्य की राजनीति में नए राजनीतिक समीकरण पर चर्चा तेज़ हो गयी. 

ये अटकल का बाज़ार इसलिए भी गर्म हुआ कि जनता दल यूनाइटेड और भाजपा ने इस आधार पर अपने को अलग रखा कि जहां राजद है वहां हम साथ खड़े नहीं हो सकते. लेकिन जहां तक उपेन्द्र कुशवाहा का सवाल हैं उनकी प्रतिक्रिया थी कि वो किसी के कृपा पर राजनीति नहीं करते. मानव श्रृंखला एक ग़ैर राजनीतिक कार्यक्रम था. इसको राजनीति से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए. कुशवाहा निश्चित रूप से नीतीश कुमार के बाल विवाह और दहेज प्रथा के मानव श्रृंखला में अपनी पार्टी के अन्य नेताओं के साथ शामिल हुए थे. उनकी उम्मीद रही होगी कि नीतीश ख़ुद भले ना आये लेकिन उनकी पार्टी के लोग ज़रूर आयेंगे. वैसे उन्हें ये भी उम्मीद नहीं होगी कि राजद के एक नहीं तीन नेता एक साथ आ जाएंगे. 

निश्चित रूप से आगामी लोकसभा और विधानसभा चुनाव तक सबसे ज़्यादा इस बात पर सट्टेबाज़ी होगी कि आख़िर उपेन्द्र कुशवाहा और जीतन राम मांझी क्या वर्तमान एनडीए छोड़कर लालू-कांग्रेस के साथ जायेंगे? भाजपा को शायद नीतीश कुमार के वापस साथ आ जाने के बाद इन दोनों नेताओं और उनके दलों की अब उतनी ज़रूरत नहीं रही. भाजपा को बिहार की राजनीति का दो सत्य मालूम हैं- एक बिहार की राजनीति में तीन ध्रुव हैं. पहला ख़ुद भाजपा जिसके साथ अगड़ी जातियों का समर्थन हासिल हैं, दूसरा नीतीश जिनके ऊपर ग़ैर यादव पिछड़ी ख़ासकर अति पिछड़ी जातियों के अलावा महादलित समुदाय में किए गये काम से बनाया एक वोट बैंक हैं और तीसरा लालू यादव जिनके साथ यादव-मुस्लिम समुदाय चट्टानी एकता के साथ खड़ा है. जहां तक मांझी हैं तो बीजेपी को पिछले विधानसभा चुनाव का अनुभव हैं कि उनका प्रभाव केंद्रीय बिहार के कुछ जिलो तक ही सीमित है. उतर बिहार के मांझी उन्हें अपना नेता नहीं मानते. वहीं कुशवाहा अपनी जाति के अभी भी सर्वमान्य नेता हैं कम से कम विधान सभा चुनाव में यह साबित नहीं हो पाया. हालांकि इस मामले में वो चाहे नीतीश हों या लालू या भाजपा, रामविलास पासवान को ज़्यादा प्रभावी सहयोगी मानते हैं. इसका मुख्‍य कारण यह है कि पासवान वोट रामविलास के इशारे पर ही वोटिंग करता है. 

जहां तक उपेन्द्र कुशवाहा के राजनीतिक सफ़र का सवाल है अभी तक एक बार विधायक वो नीतीश कुमार के समता पार्टी से बने. नीतीश ने उन्हें विपक्ष का नेता जैसे महत्वपूर्ण पद भी दिया. फिर दो बार विधानसभा चुनाव हारने के बाद उन्होंने शरद पवार की पार्टी का दामन थामा. उसके बाद नीतीश ने भाजपा के आग्रह पर उन्हें राज्यसभा भेजा लेकिन फिर उनके बग़ावती तेवर को देखते हुए उनसे पीछा छुड़ाया. उपेंद्र कुशवाहा के विषय में कहा जाता है कि वह नीतीश के ख़िलाफ़ कुछ भी बोले लेकिन हर कुछ में उनके समर्थक मानते हैं कि उनकी कोशिश नीतीश कुमार की नक़ल करने की होती हैं. इसलिए अगर नीतीश शराब बंदी और दहेज प्रथा के ख़िलाफ़ मानव श्रृंखला निकालते हैं तब उपेन्द्र कुशवाहा भी मानव श्रृंखला शिक्षा में सुधार विषय पर निकालेंगे. ये बात अलग हैं कि केंद्रीय मंत्री रहने के बावजूद उन्होंने आज तक बिहार में शिक्षा सुधार पर शायद ही पटना में एक घंटे भी संबंधित लोगों के साथ मंथन किया होगा. इसलिए मुद्दा अगर सही भी हो लेकिन उनका उद्देश्‍य साफ़ हैं कि नीतीश को घेरा जाये. 

वहीं नीतीश जानते हैं कि उपेन्द्र कुशवाहा अति महत्‍वाकांक्षी नेता हैं और फ़िलहाल एनडीए में उनकी वापसी के बाद विकल्प तलाशेंगे. लेकिन नीतीश को ये भी मालूम हैं कि उनके मांझी जैसे राजनीतिक प्रयोग के सार्वजनिक विफलता और फ़ज़ीहत के बाद लालू यादव वैसी ग़लती कभी नहीं दोहराएंगे. लालू के पार्टी के कई वरिष्‍ठ नेताओं ने उनके जेल जाने के पूर्व इस आधार पर कि मुस्लिम-यादव समीकरण एनडीए के वोटबैंक के ख़िलाफ़ बहुत प्रभावी जीत दर्ज करने वाला समीकरण नहीं हैं इसलिए उपेन्द्र कुशवाहा को नेता मान लेना चाहिए. लेकिन लालू ने सबकी बातों को सुनने के बाद उसका जवाब तेजस्वी यादव को अगले मुख्यमंत्री पद के लिए उम्मीदवार घोषित कर दिया. लालू चाहते हैं कि कुशवाहा आए लेकिन किसी शर्त के साथ नहीं. लालू का मानना हैं कि कुशवाहा नेता को एक साथ लंबे समय तक रख पाना बहुत आसान नहीं होता क्योंकि इस जाति का हर नेता सपने में मुख्यमंत्री का हर दिन शपथ लेते रहता है. 

वहीं भाजपा और नीतीश इस बात को लेकर निश्‍च‍िंत निश्चिंत हैं कि भले ही निकट भविष्य या लोकसभा चुनाव के पूर्व उपेन्द्र कुशवाहा राजद के साथ हाथ मिला लें, वो चुनाव इस बात पर होगा कि जनता नरेंद्र मोदी को लाना चाहती है या नहीं. वैसे ही विधान सभा चुनावों में जब तक मुक़ाबला नीतीश बनाम तेजस्वी होगा तब तक चुनाव का मुख्‍य केंद्र यही होगा कि बिहार की जनता लालू यादव को वापस सता में देखना चाहती हैं या नहीं. तेजस्वी कितना भी सक्रियता दिखाए लालू यादव के सत्ता में उनके नज़दीकी या उनकी जाति के लोग हावी रहते हैं. 

और अभी भी बिहार में आपको नीतीश कुमार के तेरह वर्षों में सरकार की कमियों को गिनाने वाले हज़ारों लोग मिल जायेंगे लेकिन इस सवाल पर क्या लालू को सता में वापस देखना चाहते हैं तो उन्हीं लोगों जवाब होता है- नहीं. और यही एक कारण हैं कि उपेन्द्र कुशवाहा भले ही राजद का हाथ थाम लें लेकिन चुनाव में लालू यादव के उम्मीदवारों के कुछ वोट ज़रूर बढ़ जाएंगे. जाहिर है सत्ता के खेल में बहुत फेरबदल नहीं होने वाला.

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मनीष कुमार NDTV इंडिया में एक्ज़ीक्यूटिव एडिटर हैं...

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति NDTV उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार NDTV के नहीं हैं, तथा NDTV उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायीनहीं है.


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