भभुआ उपचुनाव: 2015 में इस सीट पर पहली बार खिला था कमल, इस बार किसे हाथ लगेगी बाजी?

बिहार के भभुआ विधानसभा सीट पर बीते रविवार को उपचुनाव हुआ. भाजपा के आनंद भूषण पांडेय यहां से जीते थे. उनके निधन से सीट खाली हुई.

भभुआ उपचुनाव: 2015 में इस सीट पर पहली बार खिला था कमल, इस बार किसे हाथ लगेगी बाजी?

प्रतीकात्मक फोटो

खास बातें

  • 2015 में इस सीट पर पहली बार खिला था कमल
  • भभुआ विधानसभा सीट पर बीते रविवार को उपचुनाव हुआ
  • भाजपा के आनंद भूषण पांडेय यहां से जीते थे
नई दिल्ली:

बिहार के भभुआ विधानसभा सीट पर बीते रविवार को उपचुनाव हुआ. भाजपा के आनंद भूषण पांडेय यहां से जीते थे. उनके निधन से सीट खाली हुई. इस सीट पर बीजेपी ने अपने दिवंगत विधायक आनंदभूषण पांडेय की पत्नी रिंकी रानी पांडेय को प्रत्याशी बनाया था, जबकि कांग्रेस ने इस सीट से शंभु पटेल कांग्रेस को मैदान में उतारा था. कांग्रेस ने सुनील कुशवाहा का टिकट काट दिया. बीते रविवार को 326 मतदान केंद्रों पर यहां मतदान हुए. कई केंद्रों पर ईवीएम में खराबी के कारण मतदान देर से शुरू हुआ. 25 मतदान केंद्रों पर मशीन में तकनीकी खराबी के कारण मतदान नहीं हो सका. चुनाव के दौरान दस लोगों को हिरासत में लिया गया है, जबकि भभुआ प्रखंड के मीरियां गांव के मतदाताओं ने विकास न होने पर वोट का बहिष्कार किया था.

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भभुआ सीट को लेकर कांग्रेस पहले तीखे तेवर दिखाए थे. इस सीट पर पहले आरजेडी चुनाव लड़ना चाहती थी, लेकिन कांग्रेस के तेवरों को देखते हुए उसने ये सीट छोड़ दी. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सदानंद सिंह ने कहा था कि अगर महागठबंधन में कांग्रेस को भभुआ सीट नहीं मिली, तो वो तीनों उपचुनाव क्षेत्र से चुनाव लड़ेंगे. बाद में कांग्रेस के प्रभारी अध्यक्ष कौकब कादरी और तेजस्वी यादव ने बैठक कर तय किया कि यहां से कांग्रेस ही चुनाव लड़े.

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साल 2015 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में भभुआ सीट से भाजपा के आनंद भूषण पांडे ने जीत हासिल की थी. भाजपा ने तत्कालीन राजद-जदयू-कांग्रेस महागठबंधन के पक्ष में जनसमर्थन के बीच 2015 में भभुआ विधानसभा सीट पर जीत हासिल की थी. जिले में जन संघ पार्टी से 1969 में चंद्रमौली मिश्र के विधायक बनने के बाद भाजपा को जीत के लिए 46 वर्ष का इंतजार करना पड़ा था. 2015 के विधान सभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी आनंद भूषण पांडेय उर्फ मंटू पांडेय के जीतने पर यहां पहली बार कमल खिला है. भाजपा से चुनाव लड़ने के तीसरे प्रयास में उन्हें सफलता मिली थी.

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आनंद भूषण पांडेय ने अक्टूबर 2005 से बसपा प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ना शुरू किया. वर्ष 2010 के चुनाव में वे भाजपा से लड़े, जिसमें उन्हें 400 मत से हार का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और दल ने भी उनमें विश्वास व्यक्त करते हुए 2015 के चुनाव में पुन: उन्हें टिकट देकर चुनाव लड़ने का अवसर प्रदान किया.

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आनंद भूषण पांडेय को सात हजार से अधिक मतों से जीत हासिल हुई.